Sunday, 5 November 2023

तेरहवीं बलि (पार्ट-2)





अब तक आपने पढ़ा...
कॉलेज के आठ दोस्त अरुण ,सुमन, रोशन, प्रिया, विवेक ,अनु शिवा और गिरजा मोहर गढ़ छुट्टियां बिताने आये। लेकिन उस जगह पर कोई भयानक रहस्य उनकी राह देख रहा था। इस बात से बेखबर वो लोग मौज मस्ती करते हुए अपने अपने कमरे में सो गए। उसी रात उनके साथ शुरू हुआ एक शैतानी खेल। अनु का भयानक रूप देख कर सुमन अपने कमरे की तरफ दौड़ी....

अब आगे......


चीखते हुए अपने कमरे की तरफ दौड़ने लगी सुमन। लेकिन पहुंच नहीं पाई। अनु का भयानक हाथ लंबा होकर सुमन की गर्दन पर कस गया। 

चीख सुन कर सब जाग उठे। लाईटें जल उठी। सब दौड़ कर बाहर आये। लेकिन वहाँ कोई नहीं था। सुमन के कमरे का दरवाजा खुला था।

 "सुमन कहाँ चली गयी?? उसके चीखने की आवाज सुनी थी।" अरुण  घबराते हुए बोला।

"और... और... ये अनु कहाँ है?? रात को मेरे कमरे में सोई थी। वो भी गायब है।" प्रिया बदहवास हुई सी बोली। सब लोग मिलकर अनु और सुमन को ढूंढने लगे। बूढ़ा अपने कमरे में ही दुबका था। सारी लाइट्स ऑन कर दी गयी।

"अरे देखो... बड़ी फाटक तो खुली पड़ी है।" विवेक चीखते हुए बोला। सब लोग गेस्ट हाउस से बाहर की तरफ भागे।

शिवा - "लगता है दोनों को किसी ने किडनेप कर लिया।" 

सब बुरी तरह घबरा गए थे। दौड़ के गेस्ट हाउस के बाहर निकल गए सभी। 

सुमन और अनु को आवाज लगाते हुए गेस्ट हाउस के आस पास ढूंढने लगे अनु और सुमन को। तभी एक पेड़ से टपकती खून के बूंदे गिरी गिरिजा के कंधे पर। इसी के साथ नज़र उपर उठ गई उसकी और हलक फाड़ कर चीख पड़ी वो... 

ऊपर सुमन की लाश लटक रही थी। गर्दन की हड्डी टूटी हुई... बुरी तरह नोच डाली गई लाश....।

सब चिल्लाते हुए गेस्ट हाउस की तरफ भागे। 
"बाबाssss.... बाबाssss.... दरवाजा खोलो।।।" बूढ़े के कमरे का दरवाजा जोर से भड़भड़ा दिया उन लोगों ने।
चेहरे पर दहशत लिए बूढ़े ने दरवाजा खोला।
 दरवाजा खोलते ही बूढा भय से बड़बड़ा उठा... "वो... वो आ गयी... वो आ गयी।"




"कौन आ गयी??... कौन आ गयी बाबा????" रोशन बूढ़े को झकझोरते हुए बोला।
 "वो... वो अब सबको मार डालेगी। किसी को नहीं छोड़ेगी!!"
इस से पहले की बूढा कोई जवाब दे पाता गेस्ट हॉउस की वो बड़ी फाटक तेज आवाज के साथ बन्द हो गयी। वहां कोई नज़र नहीं आ रहा था। सब के होश उड़ गए । सनसनी सी मच गई। सब बूढ़े के कमरे में जा घुसे। 

"ये... ये सब क्या हो रहा है बाबा...???" प्रिया रोते हुए बोली।

"तुझे यहां नहीं आना चाहिए था बेटी... तुझे यहां नहीं आना चाहिए था.... वो डायन तुझे छोड़ेगी नहीं... और तेरे साथ - साथ इन सबको भी मार डालेगी वो।"

"लेकिन ये है कौन? और.... मैंने इसका क्या बिगाड़ा है??" प्रिया सुबकते हुए बोली।

"अब तक मैं उसके खौफ से चुप था बेटी... लेकिन अब मैं तुझे बता के रहूंगा...
"आज से 40 बरस पहले....
(फ़्लैश बैक).... तुम्हारे दादाजी पहली बार यहां आए थे। उन्हें ये जगह इतनी भा गयी कि उन्होंने यहां एक गेस्ट हाउस बनाने की ठान ली। गांव से हटकर जंगल के बीच... इस छोटी सी पहाड़ी पर  ये जगह उन्हें सबसे ज्यादा अच्छी लगी थी। उन्होंने पैसा पानी की तरह बहाकर ये जगह खरीद ली। लेकिन... जिस जगह ये गेस्ट हाउस बना है... उस जगह उस वक़्त यहाँ एक छोटी सी झोंपड़ी हुआ करती थी। यहाँ रहती थी  एक बूढ़ी औरत.. 'हंजा'! लोगों को शक था कि वो एक डायन है। वो ना जाने कहाँ से आई थी... उसके बारे में किसी को ज्यादा कुछ नहीं पता था। वो बस अकेली इस वीरान जंगल में भटकती रहती। लोग उसके पास आना जाना पसंद नहीं करते थे। एक अफवाह भी थी... कि इस जंगल में अगर हंजा का बनाया टोटका कोई देख लेता तो वो ज़िन्दा नहीं बचता।
जब तुम्हारे दादाजी ने यहां काम शुरू करवाना चाहा तो हंजा की झोंपड़ी बीच में आ गयी। तब तुम्हारे दादाजी ने हंजा को झोपड़ी हटाने को कहा। लेकिन हंजा नहीं मानी। उसने साफ इंकार कर दिया। तब तुम्हारे दादाजी ने उसे जबरदस्ती हटाने जा फैसला किया। उन्होंने हंजा की झोपड़ी तुड़वा दी। हंजा आग बबूला हो उठी। उसे मजबूर हो के वहां से हटना पड़ा। लेकिन वो चेतावनी देकर गयी... वो फुफकारते हुए बोली ""सेठ... तूने मेरा ठिकाना छीन लिया... लेकिन तू भी यहां बस नहीं सकेगा। मैं तुझे यहां टिकने नहीं दूंगी।""

तुम्हारे दादाजी ने हंजा को गम्भीरता से नहीं लिया और वहां काम शुरू करवा दिया। लेकिन... कुछ दिनों बाद ही.. रहस्यमयी तरीके से ठेकेदार की मौत हो गयी।... फिर काम दूसरे ठेकेदार को दिया गया... लेकिन वो भी उसी तरीके से मारा गया। गांव में बात फैल गयी... लोग दहशत में आ गए। अब कोई ठेकेदार वहां काम करने को तैयार नहीं था। काम रुक गया। तुम्हारे दादाजी का बड़ा नुकसान हो रहा था। तब... वो एक बार फिर से हंजा से मिलने गए। उन्हें देखते ही हंजा बिफर पड़ी...
""यहां क्यों आया है सेठ...?? चला जा यहां से फौरन।।।""
तुम्हारे दादाजी अब थोड़ा नरम पड़ गए।
""हंजा... मुझसे गलती हो गयी... मैंने तुम्हारी झोपड़ी तोड़ दी।। मुझे माफ़ कर दो। लेकिन मेरे लिए ये ज़रूरी था। कानूनन हक़ था मुझे वहां काम करवाने का। इसलिए अब तुम गुस्सा छोड़ दो... और वहां काम चलने दो।""

हंजा चीखते हुए बोली ""कभी नहींsss... मैं तुझे कभी माफ नहीं कर सकती। तू ज़िंदगी भर तरसेगा उस जमीन के लिए...""

""देखो हंजा... तुम चाहो तो कोई हर्जाना ले लो। लेकिन वहां काम चलने दो.. मेरा बड़ा नुकसान हो जाएगा।"
 ""हर्जाना देने के लिए कलेजा लोहे के कर ले सेठ... क्योंकि मुझे जो हर्जाना चाहिए वो तू दे नहीं पायेगा।""
""क्या चाहिए तुझे??""  मैं हर कीमत चुकाने को तैयार हूं। 

"तो फिर ठीक है। सुन मेरा ठिकाना छीनने की कीमत .... अगर तू वहां अपना घर बनाना चाहता है तो तेरा काम पूरा होते ही मुझे एक साल तक हर अमावस्या को एक इंसान की बलि दे देना। ही ही ही..... और...."

हंजा की बात पूरी हो पाने से पहले ही बुरी तरह घबरा गए सेठ जी..""ये .... ये तुम क्या कह रही हो??? मैं... मैं ऐसा काम कैसे कर सकता हूँ??? नहीं.... मैं ये नहीं कर सकता।।""

""तो फिर भूल जा उस जमीन को... और चला जा ये गांव छोड़ के... वरना तेरी मौत भी ज्यादा दूर नहीं...""

सेठ जी वापस आ गए। इस जमीन पर बहुत पैसा लगा चुके थे। अगर यहाँ गेस्ट हाउस नहीं बनता तो बहुत बड़ा नुकसान हो सकता था। गहरी सोच में पड़ गए सेठ शिवनाथ। आखिर हंजा की बात मान ने के अलावा कोई चारा नहीं बचा था।

अगले दिन सेठ वापस जा पहुंचे हंजा के पास और बोले ""हंजा मुझे तेरी शर्त मंजूर है। मैं एक साल तक तुझे हर अमावस्या को एक इंसानी बलि दे दूंगा।""

""हाssssss... तूने पूरी बात नही  सुनी सेठ... मुझे कुछ और भी चाहिए।""

""और ... और क्या चाहिए तुझे??"" सेठ ने चौंकते हुए पूछा।
 ""इन बारह बलियों के बाद मुझे तेरहवीं बलि तेरी खानदान की लड़की की चाहिए। जब भी तेरे घर मे लड़की होगी... उसके 19 साल पूरे होते ही उस पर मेरा हक़ होगा... सोच ले।।""

सेठ शिवनाथ का दिल मानो धक्क से बैठ गया। काटो तो खून नहीं। कनपटी सनसना उठी।
शिवनाथ मन ही मन फैसला ले चुके थे। उन्होंने कहा, ""मुझे मंजूर है... बस अब काम में कोई रुकावट नहीं आनी चाहिए।""

""हाssssss.... नहीं आएगी... कोई रुकावट .... ही ही ही...""

गेस्ट हाउस का काम शुरू हो गया। तेजी से काम चल रहा था... शिवनाथ के मन में हलचल थम नहीं रही थी। एक साल में गेस्ट हाउस का काम पूरा हो गया। ख़ूबसूरत लोकेशन पर बना शानदार गेस्ट हाउस लोगों को लुभाने लगा। फुल बुकिंग होने लगी।
 सेठ शिवनाथ बहुत खुश थे।
लेकिन एक दिन... गेस्ट हाउस में हड़कंप मच गया। वहां ठहरे टूरिस्ट दल में से एक सदस्य रहस्यमय ढंग से गायब हो गया। छानबीन की गई तो पता चला शाम को पास ही के जंगल में आखिरी बार देखा गया था वो। 
पुलिस बुला ली गयी। लेकिन वो नहीं मिला। लोगों ने कयास लगाने शुरू कर दिए..."" कहीं किसी जंगली जानवर का शिकार तो नहीं हो गया ।""

""कहीं किसी खाई में ना गिर गया हो।""

पुलिस भी खाली हाथ लौट गई। 


असल में शिवनाथ ने अमावस्या की रात हंजा को पहली बलि दे दी थी उस आदमी की। रात को ठीक बारह बजे गंडासे से उसकी गर्दन धड़ से अलग करते हुए अट्टहास लगा उठी वो डायन।
"ही ही ही ssssss..." हंजा की भयानक हंसी से जंगल थर्रा उठा। 


जैसे तैसे मामला ठंडा हुआ। गेस्ट हाउस में आवक लगातार बनी हुई थी। शिवनाथ खूब पैसा कूट रहे थे। 





 लेकिन अगली अमावस्या को फिर से एक आदमी गायब हो गया। लोगों में भय व्याप्त हो गया। खबर गांव में आग की तरह फैल गयी। शिवनाथ ने जैसे तैसे बात दबाई। लेकिन ये सिलसिला नही रुका।

अब तक 5 महीनों में 5 लोग गायब हो चुके थे। गेस्ट हाउस की रेपुटेशन खराब होने लगी। पुलिस की आंखों में भी शिवनाथ और गेस्ट हाउस चढ़ चुके थे। 
लोगों को गेस्ट हाउस की तरफ जाने में डर लगने लगा। टूरिस्टों का आना एकदम से कम हो गया। शिवनाथ परेशान हो गए। आखिर उन्होंने मन ही मन एक खतरनाक फैसला ले लिया... एक रात हंजा की झोपड़ी की तरफ  कुछ सांये धीरे धीरे बढ़ रहे थे। फूस की बनी झोपड़ी को आग लगा दी गयी। धधक उठी झोपड़ी।
उन लोगों ने सोचा झोपड़ी के साथ ही हंजा भी जल मरी होगी। लेकिन वो गलत थे। चीत्कार करती हुई जंगल की तरफ से दौड़ती हुई आई वो। जलती झोपड़ी की रोशनी में उसने शिवनाथ को पहचान लिया। 
""सेठ ... तूने मेरे साथ धोखा कियाssss... इसका अंजाम तू भुगतेगा... हाsssssss""

शिवनाथ के इशारे पर एक गुंडे ने बुढ़िया के सर पर सरिया दे मारा। फिर सब मिलकर टूट पड़े । किसी ने कुल्हाड़ी... किसी ने सरिया... किसी ने लाठियों से मार मार कर अधमरी कर दिया उसे। हंजा के मुंह से फुफकार और कराह निकल रही थी। 

""सेठ... तू भुगतेगा.... हर्रररsss.... तुझे भुगतना पड़ेगा..... हा ssss""

""इसे उठाकर जलती झोपड़ी में फेंक दो।"" शिवनाथ ने सख्ती से कहा।

हंजा को उठाकर जलती झोपड़ी में फेंक दिया गया। उसकी चीखें गूंज उठी। 

जंगल मे घटी यह घटना दबा दी गयी।
शिवनाथ के सर से बहुत बड़ा बोझ हट गया था। गेस्ट हाउस में काम शांति से चलता रहा। अभी भी टूरिस्ट बहुत कम आ रहे थे। शिवनाथ को भरोसा था कि समय के साथ सब ठीक हो जाएगा। 
छठे मास की अमावस्या आ गयी। गेस्ट हॉउस खाली पड़ा था। शिवनाथ रेस्टरूम में बैठे थे। मैं अपने क्वार्टर में था। मुझे नौकरी पर लगे दस दिन ही हुए थे। तुम्हारे पापा भी यहीं थे।
स्टाफ उस दिन छुट्टी पर था। रात के 10 बजे एकाएक माहौल में जैसे शैतानियत छा गयी। पास जंगल मे सियारों के रोने का शोर गूंज उठा।
 उस दिन पहली बार मुझे डर का एहसास हुआ था। मैंने मेरे कमरे का दरवाजा खोला।
 जाड़े की तेज ठंड थी। बाहर गेस्ट हाउस की एक बत्ती जल रही थी। तभी  एक चरमराहट के साथ गेस्ट हाउस की बड़ी फाटक खुली। अंधेरे में मुझे बस एक साया दिखा.... जो धीरे धीरे गेस्ट हाउस की तरफ बढ़ रहा था। मैं कांप उठा। हिम्मत कर के मैंने आवाज लगाई...""कौन है वहां??""
वो साँया ठिठका... और फिर से धीमी चाल से आगे बढ़ने लगा। मैं लाठी लेकर उसकी तरफ बढ़ा। वो साँया गेस्ट हाउस की लाइट की रोशनी में आ चुका था... मेरे होश उड़ गए... उसे देखकर.... ऐसा भयानक रूप मैंने किसी का नहीं देखा।।"

कहते हुए बूढ़े का गला सूख गया। आंखे डर से भर गई। ज़ुबान लड़खड़ाने लगी। 

"बिखरे सफेद बाल। जला हुआ सूखा चेहरा... जिस पर मानो दरारे चली हो... सफेद होठ... मुड़े हुए से हाथ - पैर...  लंबे नाखून... हाथों में एक लंबी सी लकड़ी।

जब मेरी नज़र उसके पैरों पर गयी तो मेरा खून सुख गया। उसके पैर बिल्कुल उलटे थे।

मेरे मुंह से चीख निकल गयी। मैं उसे पहचान गया... वो हंजा थी... वो अपना बदला लेने आई थी।

मैं उस से 10 हाथ दूर खड़ा था। लेकिन उसने वहीं खड़े खड़े अपने हाथ लम्बा कर के एक थप्पड़ जड़ा मेरे गाल पर... मैं उछल कर दूर जा गिरा और होश खो बैठा।चीख सुनकर सेठ शिवनाथ और तुम्हारे पापा दौड़ कर बाहर आये।
 बाहर गहरा सन्नाटा था। ठंडी हवा चीखती हुई बह रही थी। झींगुरों का शोर बिखरा था। दोनों धीरे धीरे मेरे क्वार्टर की तरफ बढ़े। मेरा कमरा खुला था। वो आगे बढ़े... मैं बेहोश पड़ा उन्हें दिख गया। शिवनाथ ने तुम्हारे पिताजी को पानी लाने को कहा। वो पानी लाने दौड़े। शिवनाथ मुझे होश लाने की कोशिश कर ही रहे थे कि पीछे से उनकी गर्दन पर एक शिकंजा से कस गया.....
वो चीख उठे। तुम्हारे पापा पानी लेकर दौड़े आये। लेकिन वो भयानक दृश्य देखकर वही जड़ हो गए। हंजा शिवनाथ को खींचते हुए गेस्ट हाउस से बाहर ले जा रही थी। मैं तब तक थोड़ा होश में आ गया था। तुम्हारे पिताजी सदमे में खड़े थे। फाटक के पास पहुंच कर हंजा ने मुड़ के देखा। उसके चेहरे पर एक भयानक हंसी थी। शिवनाथ को लेकर वो जंगलों में खो गयी। अगले दिन शिवनाथ की गर्दन कटी क्षत विक्षत लाश जंगल में मिली। उनका अंतिम संस्कार कर के तुम्हारे पिताजी गेस्ट हॉउस छोड़ कर शहर चले गए।
तब से ये गेस्ट हाउस मैं ही संभाल रहा हूँ। तुम्हारे पिताजी हर महीने मनी आर्डर कर देते हैं। गेस्ट हाउस हमेशा के लिए पूरी तरह बंद कर दिया गया। हंजा आज भी गुर्राती हुई इन जंगलों में भटक रही है। तुम्हारे इंतज़ार में। शिवनाथ सहित छः बलि वो ले चुकी थी। धीरे धीरे वो गेस्ट हाउस के आस पास आने वाले लोगों को शिकार बनाने लगी।  पहले बारह लोग बलि के लिए मार दिए उसने। फिर गुस्से और प्रतिशोध के लिए मारने 
लगी।"

कहते कहते बूढ़े का स्वर ठंडा पड़ने लगा। 
 

" हंजा आज भी यहीं जंगलों में गुर्राती हुई भटकती है..... बारह बलियों के बाद तेरहवीं बलि के इंतज़ार में।... और वो तेरहवीं बलि.... तुम हो। जब तक वो तुम्हारी बलि नहीं ले लेती उसका अनुष्ठान पूरा नहीं होगा।"
 सब को जैसे करंट लग गया हो 440 वाल्ट का। 

"ओह... तो इस लिए पापा मुझे मन कर रहे थे यहां आने से... काश मैंने उनकी बात मान ली होती।" प्रिया रोते हुए बोली। "लेकिन एक बात बताओ... तुम यहाँ इतने सालों से बचे हुए कैसे हो??? हंजा ने तुम्हे क्यों नहीं मारा बाबा???"
अरुण ने गंभीर स्वर में पूछा।


"क्योंकि......... मैं हंजा का बेटा हूँ। जब तक मैं उसका नुकसान ना करूँ... वो मुझे नहीं मारेगी।" बूढ़ा रुआंसी आवाज में बोल।

"क्या????? तुम हंजा के बेटे हो??!!" एक और झटका लगा सभी को। चोंकते हुए बोले सभी।

"हां... मैं हंजा का बेटा हूँ। शिवनाथ ने हंजा को मारने के बाद मुझे सहारा दिया। अपने उस पाप का प्रायश्चित वो अभी तक कर रहे हैं... मरने के बाद भी। उनकी इच्छानुसार ही तुम्हारे पापा अब तक मुझे मनी आर्डर करते रहे हैं।
 "लेकिन तुमने यहां आते ही हमे क्यों नहीं बता दी ये बात?? और अब अचानक इस वक़्त क्यों बता रहे हो?? इस डायन को रोकने का कोई तरीका नहीं है??" शिवा ने आतुरता से पूछा।


बूढा आगे बोला," तुम्हारे यहां आते ही मैंने तुम्हें ये सब बताना चाहा था। लेकिन हंजा की झलक ने मेरे होंठ सी दिए। मेरी जबान रोक दी उसने। लेकिन अब मैं उस से नहीं डरता। अब तक मैं उसे मां समझ कर सब कुछ सहता रहा। मैं उसे मां समझ कर उसके सभी अत्याचारों के प्रति आंखे बंद करके बैठा रहा। लेकिन तुम जैसी फूल सी बच्ची को मैं मेरी आँखों के सामने मरने नहीं दे सकता। शिवनाथ के कई एहसान है मुझ पर।
" मैं तुम्हे बताता हूँ... इस डायन जो कैसे रोका जा सकता है। लेकिन उसके लिए मौत के मुंह में जाना पड़ेगा।"

"अरे... मौत के मुंह में तो अभी भी खड़े हैं। तुम जल्दी बताओ। क्या करना होगा??" विवेक उत्तेजना में बोला।


"इस गेस्ट हाउस के बेसमेंट में हंजा के अवशेष गढ़े हैं। शिवनाथ ने अगले दिन उस जलती झोपड़ी से अधजली हंजा के अवशेष इस गेस्ट हाउस के बेसमेंट में गाड़ कर ठिकाने लगवा दिया। उन्हें निकाल कर उन पर ये अभिमंत्रित जल छिड़क देना। ये जल मैंने बड़ी मुश्किल से काशी जाकर कई प्रयासों के बाद एक सिद्ध तांत्रिक से प्राप्त किया था। लेकिन ये काम इतना आसान नहीं होगा।  हंजा तुम्हे ऐसा करने नहीं देगी... एक बार मैंने कोशिश की थी... अपनी माँ को मुक्ति दिलाने की। लेकिन उसने मेरा वो हाल किया कि मैं दोबारा ऐसी हिम्मत नहीं कर सका।" बोलते बोलते अचानक बूढ़े के मुंह नाक और कान से खून बहने लगा।

"आह... अब.... वो मुझे .... आह... नहीं छोड़ेगी... ! सच में डायन ही है वो... आह..."

खून की एक तेज उल्टी के साथ बूढा मर गया।


इसी के साथ गेस्ट हाउस में मानो भूचाल सा आ गया। कांच के दरवाजे खन खना के टूटने लगे। वो लोग कमरे से बाहर आ गए। फाटक खुली थी। शिवा ने सबको बाहर भाग जाने को कहा और खुद बूढ़े का दिया जल लेकर बेसमेंट की और भागा। बाकी सब बाहर भागने लगे। तभी फाटक पर भयानक रूप लिए अनु प्रकट हो गयी। उसकी दहकती लाल आंखे और भयानक शक्ल ने सबके पांव रोक दिए। डरावनी हंसी हंस रही थी अनु। 
अचानक तेजी से उड़ती हुई आई अनु उनकी तरफ... और अरुण को दबोच लिया। बाकी सब भाग छूटे। अरुण ने प्रतिरोध किया लेकिन उस भयानक चुड़ैल के आगे उसकी क्या चलती!!?? नोंच डाला उसने अरुण को। अब वो उन सबकी तरफ पलटी। सब लोग फाटक से बाहर भाग गए थे। लेकिन जंगल में उन पर खतरा और ज्यादा मंडरा रहा था।
विवेक, रोशन, प्रिया और गिरिजा अब जंगल में दौड़े जा रहे थे।

"हे भगवान... बस एक बार यहां से निकल जाए... बस एक बार यहां से निकल जाएं..." 

लेकिन वहां से निकल पाना नामुमकिन था। चारों थक कर एक जगह कुछ देर के लिए रुके। घोर अंधेरा फैला था चारों ओर। विवेक के पास माचिस थी। उसने तीली जलाई। अचानक उस तीली की रोशनी में उसे अनु की भयानक शक्ल दिखी। एकदम चेहरे के सामने। उसके आस पास कोई नहीं था। वो अकेला था। दिमाग भन्ना गया उसका.."इतनी देर से मैं किसका हाथ पकड़े दौड़ रहा था???... बाकी तीनों कहाँ चले गए??" बस इतना ही सोच पाया वो। फिर अनु ने उसको मौका नहीं दिया। जंगल में उसकी चीख गूंज उठी। इधर वो तीनों भी हैरान थे.."ये.. ये विवेक कहाँ चला गया। अभी तो अपने साथ ही दौड़ रहा था। कहीं भटक तो नहीं गया। हे भगवान अब क्या होगा??"
इधर शिवा अपनी जान दांव पर लगा कर बेसमेंट की तरफ बढ़ रहा था। डायन हंजा को इसकी भनक लग चुकी थी। 

उधर जंगल में रोशन, प्रिया और गिरिजा बदहवास से खड़े थे। तभी विवेक की गर्दन पर दो भयानक पंजे कस गए। उसके मुंह से घुटी हुई सी चीख निकली। नाखून उसकी गर्दन में पैवस्त हो गए। 

"ही ही ही ssssss...." भयानक हंसी के साथ अनु ने एक झटके में रोशन की गर्दन तोड़ दी। ये दृश्य देख कर चीख पड़ी प्रिया और गिरिजा। अगले ही पल अनु ने प्रिया को दबोच लिया। वो उसे घसीट कर जंगल में बने बड़े टोटके की तरफ घसीटने लगी। उसके मुंह से भयानक गुर्राहटें निकल रही थी। गिरिजा चिल्लाते हुए  वापस गेस्ट हॉउस की तरफ भागी। 

इधर शिवा बेसमेंट में जा पहुंचा । उसके पीछे पीछे दो भयावह उल्टे पैर भी गेस्ट हाउस के बेस मेन्ट की तरफ बढ़ रहे थे। अब उसे ये देखना था कि हंजा कहाँ दफन थी। बेसमेंट में पड़ी एक कुदाल लेकर बूढ़े के बताई जगह पर खोदने लगा वो। तभी एक खतरनाक गुर्राहट ने उसके हाथ रोक दिए। हंजा वहां पहुंच चुकी थी। ठीक शिवा के पीछे। शिवा भय से जड़ हो गया। 





"ही ही ही ही हीssss..." भयानक हंसी के साथ हंजा शिवा की तरफ बढ़ी। डर के मारे शिवा ने उस पर कुदाल फेंक मारी। कुदाल हंजा की छाती में जा धंसी। लेकिन वो नहीं रुकी। उसके पंजे शिवा की गर्दन की तरफ बढ़ने लगे। जैसे ही हंजा के भयानक पंजे शिवा के गले से टकराए एक झटका खा कर पीछे जा उछली हंजा। 
"गुर्रर्रर्ररsss..... " तेज गुर्राहट के साथ उठ खड़ी हुई वो।
 शिवा भी आश्चर्य सेआंखे फाड़े वो दृश्य देखता रह गया। उसे अचानक ध्यान आया कि उसके शर्ट के नीचे गले में हनुमान
 लॉकेट डाला हुआ है। उसकी हिम्मत बंध गयी। आज उसकी भक्ति उसकी रक्षक बन गयी थी।


इधर अनु प्रिया को घसीटते हुए बलि स्थल पर ले आई थी।
 बेसमेंट में शिवा अब गड्ढे में टटोल रहा था। तभी उसके हाथ कुछ लगा और उसने उसे खींच लिया बाहर। हंजा का कंकाल आ बाहर गिरा। 

"हर्रर्रररsssssss..." फुफकार उठी डायन... ।

चीखते हुए झपट पड़ी फिर से शिवा पर। शिवा ने अगले ही पल अभिमंत्रित जल छिड़क दिया उन अवशेषों पर।


 इधर प्रिया की बलि चढ़ाने वाली थी। अनु उसे पैर के नीचे दबाए गंडासा हवा में उठा चुकी थी। अगले ही पल प्रिया का सर धड़ से जुदा हो जाना था। लेकिन अभिमंत्रित जल के असर से हंजा की शक्तियां नष्ट हो चुकी थी और उसकी आत्मा एक झमक के साथ अपने सफर पे चल पड़ी। वहीं अनु के हाथ से गंडासा छूट गया.. और उसका मुर्दा जिस्म लहरा के गिर पड़ा।
प्रिया हतप्रभ सी रह गयी उस वीराने में। धीरे धीरे उठी वो और डरते डरते गेस्ट हाउस की तरफ बढ़ चली।
हंजा के नष्ट होते ही अनु का जिस्म भी उसकी शक्ति से मुक्त हो गया जिसे उसने मार कर अपने वश में किया था।
 गिरिजा तब तक गेस्ट हाउस पहुंच चुकी थी। शिवा बेसमेंट से बाहर आया। गिरिजा दौड़ कर उस से लिपट गयी। दोनों एक दूसरे को संभाल रहे थे। तभी प्रिया लड़खड़ाती हुई गेस्ट हाउस की तरफ आती दिखाई दी। तीनों कुछ देर के लिए वहीं बैठ गए। प्रिया रोये जा रही थी। खुद को कोस रही थी... कि उसकी एक गलती से उसने पांच दोस्तों को खो दिया।।

भोर का उजाला अंधेरे को चीरता हुआ फैल रहा था। कोहरे की परतों में लिपटा वो शापित गेस्ट हाउस अब एकदम शांत हो चुका था। 

सुबह तीनो पुलिस स्टेशन जा पहुंचे। पुलिस ने अपनी कार्रवाही शुरू कर दी। लेकिन इस कहानी पे भरोसा करना पुलिस के लिए संभव नहीं था। 



समाप्त।।

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