Sunday, 2 August 2026

किले का शैतान (पार्ट - 2)

किले का शैतान  (पार्ट - 2)







 पिछले अंक में आपने पढ़ा... 
मैनागढ़ के किले में गए एक शोध दल ने वहां जाकर छानबीन की। अनजाने में उन्होंने एक तहखाने से ऐसे जलजले को आजाद कर दिया जिसने उन सभी को मार डाला। इतना ही नहीं अब वो संकट पूरे गांव पर मंडराने लगा। पुलिस बेबस थी। कोई क्लू हाथ नहीं आ रहा था।  आखिर इंस्पेक्टर हवासिंह ने एक नंबर डायल किया....और सामने से आवाज उभरी....

"हेलो... द्रोण हियर।"

अब आगे.....


"हेलो...

 "हेलो.. डिटेक्टिव द्रोण..... मैं इंस्पेक्टर हवासिंह।"
 

"जी कहिए।"

"मुझे आपके बारे में मेरे दोस्त इंस्पेक्टर कश्यप ने बताया था। गोरम गढ़ * वाले केस के सिलसिले में।"
(*गोरम केस के बारे में जान ने के
 लिए पढ़े एक सनसनीखेज कहानी... हत्यारा प्रयोग।")

"ओह... कहिए.. मै आपके लिए क्या कर सकता हूं?"

"एक अजीब सा केस आया है सामने... यहां  मैनागढ़ में। कहीं कोई क्लू नहीं मिल पा रहा। इसलिए इस केस में तुम्हारी मदद चाहिए। क्या तुम कुछ सहायता कर सकते हो द्रोण??"

 "जरूर... पुलिस की मदद को तो बंदा हर वक्त तैयार रहता है। आप बस इस केस की फाइल की एक कॉपी मुझे दे देना।" द्रोण ने केस के लिए हामी भर दी ।
"ठीक है द्रोण... तुम जल्दी से जल्दी  उधमपुर पहुंचो। इसी थाने के एरिया में एक गांव है मैनागढ़। मैं तुम्हे उधमपुर में मिलूंगा। वहीं से इस केस की पूरी डिटेल तुम्हे दे दूंगा और भी कोई सामान या साधन चाहिए तो मिल जाएगा।"

"ओके इंस्पेक्टर... मैं आज ही रवाना हो जाता हूं।" कहते हुए द्रोण ने रिसीवर रख दिया।
द्रोण ने ट्रेन पकड़ ली। वो नहीं जानता था कि ये केस लेकर उसने एक तरह से अपनी मौत के परवाने पर दस्तखत कर दिए थे। अगली सुबह वो उधम पुर पहुंच चुका था। उधमपुर थाने   में वो मिला इंस्पेक्टर हवासिंह से। 

"ये लो द्रोण... मैनागढ़ केस की डिटेल। एक बार फिर से सोच लो द्रोण... ये केस गौरमगढ़ केस से भी ज्यादा खतरनाक लग रहा है।"

"डिटेक्टिव द्रोण की जिंदगी ऐसे खतरों के बीच ही पनप रही है इंस्पेक्टर... कानून की मदद के लिए मेरे कदम कभी पीछे नहीं हटते।"

"गुड...तुम्हे और कुछ चाहिए??"

"बस एक जीप का इंतजाम करवा दीजिए।"

"हो जाएगा... ऑल द बेस्ट द्रोण। ईश्वर तुम्हारी सहायता करे।"
 जीप में अपना बैग और साथ लाया जरूरी सामान लेकर निकल पड़ा द्रोण। शाम होते होते द्रोण मैनागढ़ पहुंच गया। इंस्पेक्टर हवा सिंह ने उसके रुकने का इंतजाम ठाकुर साब की हवेली के गेस्ट हाउस में करवा दिया था। हवेली में पहुंचते ही ठाकुर राजबहादुर ने मुलाकात की द्रोण से।
"आइए... आइए द्रोण साहब। बहुत सुना है आपके बारे में। मैनागढ़ में आप हमारे मेहमान रहेंगे। थोड़ा आराम कर लीजिए फिर रात के खाने पर मिलते हैं।"

" शुक्रिया ठाकुर साहब।" फिर द्रोण थोड़ी देर गेस्ट हाउस में चला गया। 

रात को खाने पर जब वो ठाकुर साब से मिला तो इस केस पर बात चीत हुई। ठाकुर साब गंभीर स्वर में बोले," देखो द्रोण... इस वक्त गांव के हालात बहुत खतरनाक है। पुजारी जी ने गांव की सुरक्षा लिए कुछ नियम बनाएं है। मैं चाहूंगा कि तुम भी उनका पालन करो। तुम यहां इस केस की तहकीकात करने आए हो... पुलिस और इस गांव की मदद करने आए हो... मुझे तुम्हारी सुरक्षा की भी चिंता है। इसलिए तुम रात को कभी बाहर मत निकलना।"

"आप चिंता न करिए ठाकुर साब। मेरा पाला ऐसे ही हालातों से पड़ता रहता है।"
 फिर रात का खाना खाकर द्रोण फिर से गेस्ट हाउस में चला गया।
भयंकर सर्दी में वहां अलाव का अच्छा इंतजाम था। लालटेन की रोशनी में रात को केस की पूरी फाइल दोबारा अच्छे से पढ़ी। 
गेस्टहाऊस की खिड़की से वो क़िला साफ दिख रहा था उसे। पहाड़ी पर चांद की रोशनी में चमकता वो खतरनाक किला।
"कल गांव वालो से पूछताछ करनी पड़ेगी।"
सोचते हुए नींद ने आ घेरा उसे। अगले दिन सुबह निकल पड़ा द्रोण गांव की सैर पर। लोगों से घटनाओं की जानकारी लेता हुआ सीधा दीनू के पास पहुंचा।
"दीनू... उन चार पुरातत्ववेताओं के पास तुम ही काम करते थे। तुमने ही पहली घटना को करीब से देखा था। क्या तुम शुरू से कुछ बता सकते हो???"
"साब.... मैं बस इतना कह सकता हूं कि ये... ये सब जो कोई कर रहा है... वो... वो कोई इंसान नहीं है साब... य... ये काम किसी शैतानी ताकत का है।"

"शैतानी ताकत???" द्रोण ने आश्चर्य से पूछा।

"हां साब... जिस तरह से उन चारों को मारा गया था... ऐसे कोई इंसान या जानवर किसी को नहीं मार सकता.... ।"

"ओह... क्या तुम मुझे विस्तार से सब बता सकते हो??"

जवाब में दीनू ने पूरी कहानी द्रोण को सुना दी। 

जिसे सुन ने के बाद द्रोण बोला...
"हम्ममम... यानी पुरातत्ववेताओं के आने के 2-3 दिन बाद ही ये घटना घट गई?"
"हां साब।"
"अच्छा एक बात बताओ... उनकी हत्या से ठीक पहले उन्होंने क्या किया था???"
"वो... वो लोग तहखानों की खोज कर के आए थे साब।"
"अच्छा... ठीक है दीनू।" कहते हुए द्रोण ने दीनू से विदा ली।
 पूरे दिन गांव की खाक छान ने के बाद द्रोण गेस्ट हाउस में लौटा। कुछ खास मदद नहीं मिली उसे। बस दीनू का बयान ही अब तक सहारा था।
 "क्या कुछ पता चला द्रोण?? कोई खास जानकारी पता चली?" ठाकुर साहब ने शाम को मिलकर पूछा।

"अभी बस कुछ खास पता नहीं चल सका ठाकुर साहब। लेकिन कल बहुत कुछ पता चल जाएगा।"

"कल क्या करोगे द्रोण?"

"बस ठाकुर साहब... ये बात कल पर छोड़ देते हैं।"

"ठीक है भाई... तुम पर ही भरोसा है अब।" कहते हुए ठाकुर साब उठ कर  चले गए।
 द्रोण की आंखों से नींद कोसों दूर थी। गेस्ट हाउस के बेड पर सोए हुए खिड़की से किले को देख रहा था वो।
"कल सुबह मुझे किले के अंदर जाना होगा। लेकिन बहुत संभल कर।" सोचते सोचते नींद आ गई उसे।
अगले दिन उठ कर... अपनी तैयारी की.. और किले की तरफ निकल गया।
किले की पहाड़ी पर चढ़ते हुए दिल जोर से धड़क रहा था उसका। सर्दियों की दोपहर में एकदम सन्नाटा पसरा था वहां। बस पक्षियों के कलरव और हवा की सरसराहट के अलावा कोई आवाज नहीं थी। किले में पहुंच कर बड़ी सावधानी से जुट गया वो छान बीन में। छत पर देखा। कमरों में देखा। सब खंडहर थे। कहीं कुछ नहीं था। अब उसे तहखान की तरफ जाना था। अनजाने से डर के साथ वो तहखाने की तरफ बढ़ा।
लेकिन एकाएक उसकी छठी इन्द्री सतर्क हो गई। उसके कानों ने गहरे तहखाने से आती एक भयानक आवाज सुनी और वो फौरन वहां से निकल गया।

"किले में आने का कोई खास फायदा नहीं मिला। लेकिन एक बात पक्की हो गई कि तहखानों में कुछ छुपा है। हो सकता है शैतान वाली बात सच हो। वो आवाज किसी जानवर या इंसान की नहीं थी।"
 किले में कोई ऐसी चीज़ नहीं मिली जो इस राज़ को खोल सके। घूमते हुए द्रोण मंदिर में जा पहुंचा। 
" शायद पुजारी कुछ मदद कर सके।"

पुजारी मंदिर में ही था। शाम ढलने को थी। "राम राम पुजारी जी।"
"राम राम जी।" पुजारी  द्रोण को देख कर खुश होते हुए बोला।
"कहिये डिटेक्टिव साब... क्या पता लगाया आपने??"

"कुछ खास नहीं पुजारी जी। बहुत मुश्किल केस है। कोई क्लू नहीं मिल रहा। आप मुझे बता सकते है कि इस किले की जानकारियां कहां से मिल सकती है?? यहां की सारी चीजें कहां चली गई???"

पुजारी कुछ गहरा सोचते हुए बोला...
" बड़ा पुराना किला है डिटेक्टिव साब। हमारी कई पीढ़ियों ने इसे देखा है। मेरे पुरखे सालों से इस किले के राजपरिवार के गुरु और इस मंदिर के पुजारी रहे हैं। बदलते ज़माने के साथ जब ठाकुरो ने ये किला छोड़ा और गांव में हवेली में आकर बस गये तो साथ में सारी जरूरी चीजें लेकर आ गए.... कीमती सामान, हथियार वगैरह। पुराना साहित्य इस मंदिर के एक कमरे में रखवा दिया। जिसे देखने की फुर्सत किसी को थी नहीं। मेरे बाप दादा ने भी नहीं पढ़ा उसे और न मैने। लिखने वालों ने लिख दिया होगा और पढ़ने वालों ने पढ़ लिया होगा लेकिन अब यह सब कौन पढ़ता है मैंने तो कभी देखा भी नहीं।"

यह सुन कर द्रोण की आंखों में चमक आ गई। 

"क्या इस किले से जुड़ा हुआ साहित्य मैं देख सकता हूं बाबा।?"

"हां.... हां.. क्यों नहीं।।। बरसों से बंद पड़ा है। आज तुम आए हो देखना चाहो तो देख लो। लेकिन अभी शाम हो चुकी है। आरती की तैयारी हो रही है। समूचा गांव था एकत्रित होगा। तुम्हे व्यवधान होगा। तुम कल सवेरे आकर आराम से शांति से अब देख लेना।"

"ठीक है पुजारी जी। ऐसा ही सही।"

फिर आरती के बाद द्रोण गेस्ट हाउस में जा पहुंचा। रात होते ही गाँव सुनसान सन्नाटे में घिर चुका था। द्रोण लेटा हुआ अब सुबह होने का बेसब्री से इंतजार कर रहा था। तभी उसे ना जाने क्यों ऐसा लगा मानो दूर  किले से दो चमकती आँखे उसे घूर रही है।  उस आवाज का ख्याल उसके जहन में कौंध गया। और फिर उसने करवट ली और सो गया।
सुबह जल्दी उठ कर वो सीधा मंदिर पहुंच गया। मंदिर में पुजारी ने द्रोण को उस कमरे की चाबी दे दी जिसमें किले से जुड़ा इतिहास और साहित्य रखा था। न जाने कितने सालों बाद वो कमरा खुला था। द्रोण ने पूरे दिन एक एक किताब को टटोला। किले के इतिहास से जुड़ी एक बिखरी सी किताब में एक छोटा सा अंश उसके सारे सवालों का जवाब गया। द्रोण को अच्छी तरह समझ में आ गया कि ये सब क्या हो रहा है? !!!  2  पन्नों  की वो कहानी इस भयानक रहस्य को खोल गई।  उसने वो किताब उठाई और  कमरे से बाहर निकल गया।
 उसे बाहर आता देख पुजारी ने उत्सुकता से पूछा, "कुछ मिला डिटेक्टिव साब?"
"हां बाबा... एक भयानक कहानी सामने आई है।"
"कैसी कहानी??"

द्रोण ने बताना शुरू किया..."ये कितनी पुरानी है ये तो नहीं कहा जा सकता... लेकिन ये पन्ने और लिखावट देख कर लगता है सैकड़ों साल पहले की है। पन्ने हाथ लगाते ही बिखर रहे हैं बड़ी मुश्किल से समेट कर लाया हूँ।"
द्रोण ने आगे बताना शुरू किया... "कई साल पहले इस किले में राजा हुकुम सिंह का राज था। उसकी दुश्मनी पास के ठिकाने करमगढ़ से थी। करमगढ़ एक शक्तिशाली ठिकाना था। सीधी लड़ाई में मैनागढ़ का करम गढ़ से कोई मुकाबला नहीं था। तब मैनागढ़ के ठाकुर हुकुम सिंह ने एक भयानक दांव खेला। उसने करम गढ़  की पराजय की लालसा में अंधा होकर एक तांत्रिक को बुलावा भेजा और  उसे एक अत्यंत गुप्त और भयानक काम सौंपा। तांत्रिक ने स्पष्ट शब्दों में कहा, " ठाकुर... जो काम तुम मुझे करने के लिए कह रहे हो... वो उल्टा भी पड़ सकता है।
"मुझे बस करमगढ़ की तबाही चाहिए।"
"ठीक है ठाकुर.... तो कौन है वो सैनिक?? जो तैयार है बलिदान के लिए।??""
 "सैनिक तुम्हे मिल जाएगा। बस तुम अपनी तैयारी शुरू कर दो।"
ठाकुर ने भारी आवाज में कहा।

तांत्रिक ने अपनी क्रिया आरम्भ कर दी। एक सिपाही को जबरदस्ती घसीट कर लाया गया। वो बुरी तरह चिल्ला रहा था।
तांत्रिक के इशारे पर उसे एक ताबूत में बंद कर दिया गया। ताबूत के अंदर से उसकी घुटी घुटी चीखे गुंजने लगी। तेज मंत्रोच्चार के साथ उस ताबूत को पानी से भरे कुंड में उतार दिया गया। मंत्रोच्चार तेज होता गया। तांत्रिक ने कुंड में मानव मांस और मानव रक्त प्रवाहित करना शुरू कर दिया। भयानक माहौल था उस वक्त।
कुछ समय बाद तांत्रिक ने श्मशान से लाई भस्म उस कुंड में डाल दी।  इसी के साथ भूचाल सा आ गया उस कुंड में। भयानक ढंग से ताबूत भड़भड़ाने लगा।
थोड़ी देर बाद माहौल एकदम शांत हो गया।
 ताबूत को बाहर निकाला गया।  अंधेरी अमावस्या की रात में आसमान में कड़कती बिजलियों के बीच जंजीरो से जकड़ा वो ताबूत कुंड से बाहर खिंचा जाने लगा। ताबूत को बाहर निकाल कर जमीन पर बनाए हुए एक तंत्र आरेख पर रख दिया गया।
 चारो तरफ मशालें जल उठी। छोटे छोटे अग्नि कुण्डों में अग्नि धधक उठी। तांत्रिक के तीव्र मंत्रोच्चार से माहौल गूंजने लगा। थोड़ी देर बाद तांत्रिक ने सभी लोगों को पीछे हट जाने को कहा।
धीरे धीरे ताबूत खुला और उसमें से जो बाहर निकला... वो हर किसी का दिल दहला देने के लिए काफी था। भयानक गर्जना के साथ एक शैतानी पंजा निकला ताबूत के बाहर। और फिर सामने आया एक भयानक  शैतान जिसे देख कर अच्छे अच्छों की रूह फ़ना हो जाए। तांत्रिक के अट्टहास गूंज रहे थे। वहाँ मौजूद दूसरे सिपाही भय से जड़ खड़े थे।

एक साधारण से सैनिक का इतना वीभत्स हाल कर डाला उस तांत्रिक ने।
बाहर निकलते ही शैतान ने गर्जना के साथ सबकी तरफ देखा। तांत्रिक उसके सबसे पास खड़ा था। वह भयानक अंदाज में उसकी तरफ बढ़ने लगा। तांत्रिक ने उसे रुकने का हुक्म दिया। लेकिन वो ना रुका।  वह तांत्रिक की तरफ बढ़ता जा रहा था मानो उसका खून पी जाएगा। लेकिन तांत्रिक ने अचानक एक माला निकाल कर उस दरिंदे के आगे लहरा दी। वो शैतान ठीठक कर रुक गया।

 उस अभिमंत्रित माला ने उस शैतान के कदम रोक दिए। वह गुर्राता हुआ पीछे हट गया। तांत्रिक ने ठाकुर हुकमसिंह को वो माला सौंप दी और कहा... " ये खूनी शैतान अब तुम्हारा हुआ ठाकुर... इसे जैसे चाहो जहाँ चाहो काम में लो। लेकिन याद रखना... जब तक ये माला तुम्हारे पास रहेगी तब तक ये तुम्हारा दास रहेगा। अगर ये माला खो गई या टूट गई तो ये किसी के वश में नहीं रहेगा और फिर क़यामत तुम पर भी टूट सकती है।" 
इतना कह कर तांत्रिक चला गया।

ठाकुर हुकुम सिंह अब कहकहे लगा रहा था। उसने करम गढ़ को बर्बाद करने की तैयारी कर ली।   बस उस शैतान को अब करमगढ़ भेजना था।
 अगली अमावस्या की रात करम गढ़ पर क़हर बन के टूटने वाली थी। लेकिन उस से पहले ही एक घटना घट गई। ठाकुर हुकुम सिंह पर जान लेवा हमला हो गया। हथियार बंद हमलावरों ने उसे घेर लिया।
 उसके अंगरक्षक उसे बचाते हुए ढेर हो गए। हुक्म सिंह के प्राण तो बच गए लेकिन इस हमले में उसकी माला टूट के बिखर गई। और इसी के साथ वो भयानक शैतान हुक्म सिंह के प्रभाव से आजाद हो चुका था।

 तहखाने के अंदर कोठरी में बंद वो अमर शैतान अब मैनागढ़ के लिए ही मुसीबत बन चुका था।
 उस तांत्रिक की खोज की गई लेकिन अब वो  लापता हो चुका था। उसे ढूंढा न जा सका।
 अब एक मात्र उम्मीद राजघराने के राजगुरु शिवानंद ही थे।
जो सालों से मैनागढ़ के घने जंगल में साधना में लीन थे। संकट की इस घड़ी में उन्हें बुलावा भेजा गया।
 राजगुरु शिवानंद स्थिति की गंभीरता को समझते हुए... तुरंत मैनागढ़ पहुंच गए। सारी बात सुनकर वो तुरंत समझ गए कि खतरा कितना भयानक है। शिवानंद ठाकुर से बोले,  "ठाकुर... तुमने जिस आपदा को आमंत्रित किया है... उसकी अब कोई स्थायी काट नहीं।
उस तांत्रिक ने 'पनियाला शैतान’  को जिंदा किया है। इसे मारा नहीं जा सकता। ये अनंतकाल तक जीवित रहता है। इसे केवल रोक के रख सकते है। जिस तहखाने में इसे रखा है उसे पानी से भर दो।  बस यही एकमात्र उपाय है। जब तक ये जल में डूबा रहेगा... ये निष्क्रिय रहेगा।"
 इधर उस शैतान को तहखाने में ही रोके रखने के लिए रोज 2 अपराधियों को जेल से निकाल कर उसके पास भेजा जाने लगा ताकि वो  उत्पात न मचाए और शांत रहे। लेकिन ये कोई उचित समाधान नहीं था। ठाकुर द्वारा पैदा करवाई गई मुसीबत अब उसी के गले पड़ चुकी थी। आखिर कार शिवानंद के कहे अनुसार उस सुरंग और तहखाने को पानी से भर दिया गया। 
 वक़्त बीतता गया। जल से भरी सुरंग में पनियाला कमजोर पड़ता गया और एक लंबी नींद में सो गया। वो सुरंग हर महीने जल से भरी जाने लगी। धीरे धीरे बीते वक्त के साथ उस सुरंग को बंद कर दिया गया। पनियाला शैतान उसी तहखाने में दफन हो कर रह गया। पीढ़िया बीत गई और ये भयानक खतरा सिर्फ किताब के पन्नो में खो गया।
द्रोण और बाबा मानो किसी नींद से जागे। इस भयानक दास्तान में पूरी तरह खो गए थे दोनों।

द्रोण आगे बोला..." बाबा... लगता है पुरातात्विक दल के लोगों ने गलती से उस शैतान को जिंदा कर दिया है। वही इस वक्त मैनागढ़ में तबाही मचा रहा है।"
 " तुम शायद ठीक कह रहे हो बाबू...  लेकिन अगर ये सच है तो हम सब इस भयानक मौत के पंजे में है। इस से छुटकारा कैसे पाएंगे।?"
"सबसे पहले ये पता लगाना होगा कि अगली बार वो शैतान गांव में कब और कहां आएगा।"  द्रोण मन ही मन कुछ सोच चुका था।
गेस्ट हाउस में आ कर अब वो रात होने का इंतजार करने लगा।
 रात का सन्नाटा पसर जाने के बाद...  गेस्ट हाउस का दरवाजा धीरे से खुला। द्रोण बाहर जाने का खतरा मोल ले चुका था। उसे ये जान न जरूरी था कि पनियाला शैतान सच में ऐसी हत्याएं कर रहा है या  इनके पीछे कोई  और कारण है।
वह सबसे पहले गेस्ट हाउस की छत पे पहुंचा। वहां से गांव जा पूरा जायजा लिया। कहीं कोई हरकत या आहट नहीं सुनाई दे रही थी। पूरा गांव एकदम शांत था। कहीं कहीं से कुत्तो के भोंकने की आवाजें जरूर आ रही थी। वह एक दम शांति से बिना हिले गौर से बाहर गांव की तरफ देख रहा था। बस चाँद की रोशनी फैली थी। कही कोई हरकत न देखकर अब वो बाहर की तरफ उतरा।
 अंधेरे कोनो में छुपता हुआ वो गांव में घूम रहा था। भारी खतरे में था वो। किसी भी पल उसका सामना मौत से हो सकता था। और तभी.... किले से उतरती सड़क पर एक अमानवीय आकृति दिखाई पड़ी उसे।
 दिल धाड़ धाड़ कर के बज उठा उसका।  वह तुरंत दौड़ कर मंदिर की छत पर जा चढ़ा। गुंबद के पीछे से उस आकृति पर पैनी नजर रख रहा था वो। जैसे जैसे वो भयानक आकृति पास आई... द्रोण की साँस हलक में अटक गई। साक्षात मौत का दूसरा रूप था वो। मंदिर के बाहर जलती मशालो की रोशनी में उसका भयानक हुलिया चमक उठा। 
"उफ्फ... तो सच में ये शैतान ही जिम्मेदार है इन क्रूर हत्याओं का!!"
 शैतान गांव में आ चुका था। द्रोण उसका पीछा करना चाहता था लेकिन बिना किसी ठोस तैयारी के वो ऐसी रिस्क नहीं ले सका।
उधर गांव में एक घर के बाहर बकरियों के बाड़े  में हलचल मच गई। बकरियों में मची भगदड़ से घर में उपस्थित अकेली महिला अपने आप को रोक नहीं सकी और उन्हें नियंत्रित करने के लिए बाहर निकल आई। ये गलती उसके जीवन पर भारी पड़ गई। पनियाला उसे खींच के ले गया। उसके जिस्म से टपकता खून उस रास्ते पर बिखरता गया जहां से पनियाला शैतान उसे खींच ले गया था। मंदिर की छत पर खड़ा द्रोण विवशता से इस भयानक दृश्य को देखता रहा।


 अगली सुबह किले की पहाड़ी के पास उस औरत का बुरी तरह नुचा हुआ बिखरा हुआ शव मिला। द्रोण ने रात की घटना का जिक्र ठाकुर और गांव वालों से किया।
 गांव में दहशत छाई थी। ठाकुर राज बहादुर काफी चिंतित थे। "अब क्या करें द्रोण??? ये मुसीबत तो बढ़ती जा रही है।"

द्रोण का तेज दिमाग अब पूरी योजना तैयार कर चुका था।
उसने पूरे आत्मविश्वास के साथ कहा..." इस मुसीबत से छुटकारा पा लिया जाएगा ठाकुर साहब। बस मुझे थोड़ी मदद चाहिए।"
ठाकुर साब एकदम से खड़े होते हुए बोले, " क्या सच??? सच में तुम इस मुसीबत का अंत कर दोगे द्रोण???तुम्हे जो मदद चाहिए अब मिल जाएगी... बस इस शैतान से गांव को छुटकारा दिला दो।"
 "पूरा गांव तुम्हारे साथ है।"

"ठीक है ठाकुर साब।  मेरी जो योजना है उसमें मुझे पूरे गांव का सहयोग ही चाहिए।"

अगले दिन सुबह द्रोण गांव वालो को अपनी योजना समझाने लगा। पास बने एनीकट से एक लंबी और गहरी किंतु संकरी सी नहर खुदवाई गई। दिन भर काम चलता और रात को सभी लोगों को सुरक्षित रहने की हिदायत दी जाती। लेकिन फिर भी अप्रिय घटना घट ही जाती।
 लगभग 7 दिन में नहर पूरी तरह तैयार हो गई। उस नहर में 4 फिट व्यास के सीमेंट के पाइप उतारे गए।   अब उस नहर को एक सीमेंटेड पाइप की सुरंग का रूप दे दिया गया था। जिसका एक मुंह एनिकट से जुड़ा था लेकिन
लेकिन एक लोहे की भारी पतरेनुमा ओट से एनिकट का पानी उसमें भरने से रोक दिया गया था। दूसरा मुंह खुला छोड़ दिया गया लेकिन उसे ढक्कन से बंद किया जा सके ऐसा इंतजाम कर दिया गया। एक मुंह उस पाइपनुमा सुरंग के ऊपर की तरफ खुला छोड़ दिया गया... जिस से बाहर निकल कर लोहे के मजबूत ढक्कन से उसे बंद किया जा सके। चूहेदानी तैयार हो चुकी थी। बस अब चूहा फसना बाकी था।
किले से लेकर उस पाइप के मुंह तक पक्की संकरी सी सड़क बना दी गई। गांव वालो के सहयोग से ये सारा काम 10 दिन में पूरा हो गया। अब योजना का सबसे खतरनाक चरण शुरू होने वाला था... जिसमें दांव पर लगनी थी डिटेक्टिव द्रोण की जान। एक हल्की सी चूक का मतलब था... उस शैतान के हाथों दर्दनाक मौत ।
अगली रात डिटेक्टिव द्रोण उस किले की पहाड़ी के पास छुप गया। रात गहराते ही गुर्राहट गुंजने लगी। वो भयानक दरिंदा बाहर निकला। द्रोण उसकी पदचाप और गुर्राहट सुन पा रहा था। 

उसका ध्यान अपनी तरफ खींचने के लिए द्रोण तेजी से भागा। शैतान ने भनक पाते ही द्रोण का पीछा करना शुरू कर दिया। भयंकर गुर्राहट के साथ वो द्रोण के पीछे लपका।
 द्रोण तेजी से उस संकरी  सड़क पर जा चढ़ा और अपने साथ लाये स्पेशल स्केट शूज से तेजी से फिसलने लगा।  वो शैतान इसके बावजूद बहुत तेजी से पीछा कर रहा था। दोनों के बीच की दूरी कम होती जा रही थी 
द्रोण तेजी से फिसलता हुआ सुरंग तक आ पहुंचा। और वहीं रुक गया। पीछे देखा वो शैतान तेजी से गुर्राते हुए उसके पीछे आ चुका था। द्रोण तेजी से झुक कर पाइपनुमा सुरंग में घुस गया। पनियाला शैतान भी उसके पीछे सुरंग ने जा घुसा। द्रोण तेजी से फिसलता हुए आगे बढ़ रहा था। शैतान को इतनी संकरी जगह में पीछा करने में कठिनाई हो रही थी। इसका फायदा उठा कर द्रोण तेजी से ऊपर खुलने वाले मुंह तक जा पहुंचा। इधर गांव वालो ने उस सुरंग का वो मुंह ढक दिया  जिस से द्रोण और पनियाला ने अंदर प्रवेश किया था।
 द्रोण ने पीछे घूम कर देखा... शैतान पास आता जा रहा था। द्रोण तेजी से ऊपर चढ़ गया और ऊपर वाले मुंह से होते हुए सुरंग से बाहर आ गया। वहां मौजूद गांव के कुछ लोगों ने तुरंत भारी भरकम ढक्कन से वो मुंह बंद कर दिया । तेजी से उस  ढक्कन पर मिट्टी डाल कर सुरंग पूरी तरह से बंद कर दी गई।
 इसी के साथ एनिकट से सुरंग को जोड़ने वाले मुंह पर लगा पतरा हटा दिया गया । एनिकट का पानी तेजी से सुरंग में घुस गया। पनियाला शैतान उस पानी से भरी सुरंग में क़ैद होकर रह गया। जल के भराव में शैतान तड़प कर निष्क्रिय हो गया। उसकी अंतिम गुर्राहाटे उसी सुरंग में दफन हो के रह गई।
गांव वाले खुशी से चिल्ला उठे। वो शैतान अब हमेशा के लिए वहां कैद हो के रह गया था। एनिकट में कभी पानी की कमी नहीं होनी थी और सुरंग हमेशा जल से भरी रहनी थी। ये एक तरह से पनियाला शैतान का अंत था।
गांव वालो ने द्रोण को कंधों पे उठा लिया। पूरी रात जश्न मना। लेकिन द्रोण अभी भी शंका में था। उसने ठाकुर से कहा," ठाकुर साब, हो सकता है आगे भविष्य में फिर किसी गलती से ये शैतान दोबारा जाग जाए।  ऐसा ना हो इसके लिए मैं चाहूंगा कि इस सुरंग के ऊपर एक शिव मंदिर बना दिया जाए। और उस मंदिर के एक पत्थर पर इस पनियाला शैतान की दास्तां खुदवा कर लिख दी जाए। ताकि आने वाली पीढ़ियों सावधान रहे और ये शैतान हमेशा हमेशा के लिए दफन हो कर रह जाए।"

ठाकुर साहब और गांव वालो ने द्रोण की बात मान ली। 
वहां एक शिव मंदिर के निर्माण का कार्य शुरू करवा दिया गया। नींव का पत्थर डिटेक्टिव द्रोण के हाथों रखवाया गया।
फिर 1-2 दिन बाद पूरे आदर सहित विदा ली डिटेक्टिव द्रोण ने मैनागढ़ से। लौटते वक्त उस किले के पास से जब उसकी जीप गुजरी तो एक अजीब से रोमांच से भर गया उसका अंतर्मन। 

      समाप्त! 




Friday, 3 April 2026

किले का शैतान

 इस कहानी का वास्तविकता से कोई संबंध नहीं है। ये केवल एक कल्पना पर आधारित कहानी है। किसी घटना से इसका मिलान होना मात्र संयोग होगा।


 सन् 1981


*क़िले का शैतान*

 भाग -1


एक छोटा सा पहाड़ी गांव.... मैनागढ़। बिल्कुल अलग थलग... शांति प्रिय। इस पहाड़ी गांव में आने जाने का बस एक कच्चा रास्ता था। जिसपे ज्यादातर बैलगाड़ियां ही चलती थी। गांव से 6 किलोमीटर दूर से एक सड़क निकलती थी। ’बस’ वही पे गांव की सवारियों को उतारती और लेती थी। वहां से गांव तक आने का रास्ता या तो पैदल या बैलगाड़ी से थी। कभी कभार किसी का ट्रैक्टर मिल जाए तो बात अलग है।

 गांव में एक छोटा सा तालाब था। थोड़ी दूर एक एनीकट भी बना था। बिजली कनेक्शन सिर्फ एक सरकारी दफ्तर में था जो एनिकट की देख रेख के लिए बना था । वह दफ्तर भी बंद पड़ा रहता था। कभी कभार बारिश के मौसम कोई अफसर वहां आता और कुछ जांच के चला जाता

गांव के बीचो बीच एक मंदिर था। मंदिर के पास ठाकुर की हवेली। हवेली के आगे काफी खुला मैदान। और बाकी गांव वालों के घर।

 इन सबसे अलग पास की पहाड़ी पर बना था एक काले पत्थर से बना  शानदार क़िला। गांव में कहा जाता था कि इस क़िले का इतिहास बड़ा भव्य था।

 लेकिन अब वो क़िला उपेक्षित खंडहर सा वीराने में खड़ा था।

गांव के लोग कम ही जाते थे क़िले की तरफ। कई किंवदंतियां प्रचलित थी उस किले के बारे में।

कुछ उस किले के इतिहास की सराहना करते तो कुछ इसे भूतिया किला बताते।

 अब उस किले के दिन फिरने वाले थे। पुरातत्व विभाग की नज़र में आ गया था वो क़िला। विभाग ने उस किले के शोध और पुनरुद्धार  लिये एक चार सदस्यीय शोध दल को वहां भेजा। दल के लीडर थे करुण श्रीवास्तव। शेष तीन सदस्य महेंद्रराज, विपिनपाल और  श्याम कुमार। एक जीप में चारों सदस्य गांव पहुंच गए।

गांव वाले इन्हें कौतूहल से देख रहे थे।

 गांव वालों के सहयोग से उन्होंने पहाड़ी पर किले की चारदीवारी के अंदर अपना टेंट लगा दिया। गांव से एक आदमी को अपने रोजमर्रा के काम के लिए रख लिया। जो गांव से खाने पीने का सामान और अन्य जरूरी सामान ले आता। खाना बना देता और छोटे मोटे काम कर देता।

चारों सदस्य अपने अपने काम में माहिर थे। वहां टेंट वगैरह लग जाने के बाद करुण श्रीवास्तव ने काम शुरू कर दिया। किले का नक्शा और अन्य दस्तावेज लेकर अपनी रूप रेखा तैयार करने लगे। अगली सुबह से काम शुरू कर दिया उन्होंने। किले की छत से लेकर पूरे किले का मुआयना किया। कुछ खास सामान नहीं था वहां अब। पुराने हथियार और सामान ठाकुर हवेली में ले गए थे। कुछ पांडुलिपियां और साहित्य गांव के मंदिर में रखवा दी गई थी।

सब कुछ सामान्य चल रहा था। पहला दिन अच्छे से समाप्त हो गया। कुछ सैंपल लिए उन्होंने... ।

शाम को... जब सब थक चुके थे.. दीनू जो खाना बना रहा था... उसने पहले सबको गरमा गर्म चाय दी। पहाड़ी गांव... शाम का वक्त... कड़ाके की ठंड... अलाव... और गर्म चाय... । 

"वाह दीनू... क्या चाय बनाई है।! तबियत खुश कर दी तूने तो!!" करुण श्रीवास्तव ने चाय की चुस्की लेते हुए कहा। बाकी सब ने भी समर्थन में सर हिला दिए। दीनू मुस्करा दिया।

"अच्छा दीनू... अपने गांव के बारे में तो बताओ।" विपिनपाल ने ऐसे ही टाइम पास के लिए पूछ लिया।

 "गांव तो हमारा छोटा सा है साब... लेकिन पहाड़ी गांव है... यहां जंगली जानवर भी घूमते है। रात को कभी कभी गांव की तरफ भी आ जाते हैं।   बघेरों और भालुओं का ज्यादा आना जाना होता है। आप लोग ध्यान रखना साब। रात को बाहर मत निकलना टेंट से और आग हमेशा जलाए रखना।"

बाते करते करते दीनू बोला.." लो साहब.. खाना तैयार है।

 आप लोग भोजन कर लो तो मेरा काम भी पूरा हो। फिर में भी टाइम से घर चला जाऊं। सुबह जल्दी आ जाऊंगा। अलाव में लकड़ियां भी डाल दी है। रात भर जलता रहेगा।"

 चारों एक साथ उठे..." ठीक है भाई दीनू... लगा दे खाना।"

 खाना खाने के बाद चारों टेंट में चले गए। अंदर से पूरा पैक था टेंट। बाहर आग जल रही थी। लेकिन करुण श्रीवास्तव थोड़ा सावधानी से काम लेना चाहते थे। दीनू की जंगली जानवरों वाली बात से वो थोड़ा घबरा गए थे। तो उन्होंने कहा...

"हम में से किसी को जाग कर थोड़ा पहरा देना चाहिए। क्या पता रात को कोई जानवर हमला कर दे।? हमे इस तरह असावधान होकर नहीं सोना चाहिए।"

"अरे श्रीवास्तव साब... आप भी ना.... कुछ ज्यादा ही सोचने लग जाते है। रात भर आग जलेगी तो कोई जानवर नहीं आएगा इधर। और फिर अपने टेंट भी तो सुरक्षित है। फायर गन भी है साथ में। आप चिंता न करें।" महेंद्र राज ने बेफिक्री दिखाते हुए कहा।

लेकिन करुण श्रीवास्तव ने वो रात जाग कर ही बिताई। रात को टेंट को हल्का सा खोल कर बाहर का मुआयना करते रहते। हर आहट पर सचेत हो जाते। रात को सन्नाटे में वो क़िला किसी विशाल काले दैत्य के समान प्रतीत हो रहा था उनको। एक अंजना सा डर लगने लगा श्रीवास्तव को... उस माहौल को देख कर।

 जैसे तैसे सुबह हुई। दीनू जल्दी आ गया था। उसने आवाज लगा कर उठाया सबको। 

"साब चाय बना दूं???"

 चाय पीकर सब तैयार हो गए। आज किले के तहखानों का निरीक्षण करना था उनको। काम पर लग गए चारों। सारे तहखाने टटोल डाले। गांव वाले वहां तक नहीं पहुंचे थे कभी। सालों से बंद पड़े वो तहखाने  इन चारों ने ही खोले थे। ताले तोड़ने पड़े उनके। हर तहखाने में चमगादड़ भरे पड़े थे। पुराने बक्से... पड़े थे उनमें... सब खाली। कुछ पुराने कपड़े जरूर मिले। वो भी बिल्कुल गल चुके थे। हाथ लगते ही फट रहे थे। इसी छानबीन में एक तहखाने के अंदर एक छोटा सा संकरा सा गड्ढा जैसा कुछ दिखा। टॉर्च की रोशनी उस गड्ढे पर डाल दी गई। आश्चर्य से भर गए वो चारों।

"इ.. इसमें क्या हो सकता है सर???" विपिनपाल ने धीमे से पूछा।

"कोई गुप्त रास्ता लगता है। या तहखाने में कोई और तहखाना लगता है।" करुण श्रीवास्तव ने कयास लगाते हुए कहा

टॉर्च की रोशनी डाली गड्ढे के अंदर। कुछ साफ साफ नहीं दिखाई दे रहा था। 

"हमे इसमें उतर कर देखना चाहिए। क्या पता कोई खास चीज मिल जाए।" महेंद्र राज ने उत्सुकता से कहा।

 "तो फिर तुम ही उतर जाओ सबसे पहले।" श्याम कुमार ने हंसते हुए कहा ।


इतना सुनते ही महेंद्र उस गड्ढे में सरक गया। संकरे गड्ढे से नीचे कूदते ही उसने अपने आप को एक अंधेरी सुरंग में पाया। 

"यहां तो बहुत अंधेरा है सर... कोई सुरंग सी लगती है। आप भी आ जाइए।"

पीछे पीछे उतर गए चारों। सुरंग में देखा तो सामने एक बड़ा सा दरवाजा नजर आ रहा था। टॉर्च की रोशनी में बढ़े जा रहे थे वो दरवाजे की तरफ।

 पास जाकर श्रीवास्तव बोल पड़े," ये तो किसी तरह की जेल लगती है।" "इतनी खतरनाक जेल??" श्याम कुमार ने आश्चर्य से पूछा।

"हां... पुराने जमाने में कई खूंख्वार कैदियों को अमानवीय यातनाएं देने के लिए  यह जेले बनाई जाती थी। जहां से भागना नामुमकिन होता था।" श्रीवास्तव ने कहा।

"तो ये दरवाजा खोले?" विपिनपाल ने पूछा।

"हां... इसे खोल कर देखते हैं।"

"भारी भरकम अजीब सा ताला लगा है इसके तो।"

"हम्ममम... ताला तोड़ना पड़ेगा।"


सबने प्रयास कर के वो ताला तोड़ दिया... और एक जोरदार आवाज के साथ वो भारी भरकम दरवाजा खुला। सीलन भरी बदबू फैल गई वहां।  

"उफ्फ... यहां तो सांस लेना दूभर हो रहा है।"


"हे भगवान!!!!!" टॉर्च की रोशनी में अंदर का दृश्य देख कर रोंगटे खड़े हो गए सबके।

वह कैदखाना एक बहुत बड़ा हॉल था। जिसमें अनगिनत कंकाल बिखरे पड़े थे। अजीब सी बदबू और ऐसा भयानक दृश्य देख कर जी मितलाने लगे चारों के।

उसी हॉल में एक छोटी सी काल कोठरी और बनी थी। जिसके लोहे का जालीदार दरवाजा भी लगा था।  लेकिन वो लोग बस वहां से तुरंत निकल जाना चाहते थे। 

"ये... ये सब क्या है यहां?? इतने कंकाल क्यों बिखरे पड़े है???"

"ये वो कैदी होंगे... जिन्हें यहां बंद कर दिया गया होगा... आजीवन।"


"अब यहां से चलें... और रिपोर्ट तैयार करें आगे की। यहां। की सफाई करवाने का सुझाव भी लिखना पड़ेगा।" श्रीवास्तव ने बाहर निकलने का इशारा करते हुए कहा।

 चारों जल्दी जल्दी वहां से बाहर निकल आए। तहखानों से बाहर आते आते शाम ढल गई थीं दीनू बाहर खाने की तैयारी कर रहा था। "आ गए साब? चाय बना दूं??"

जी खराब हो रहा था सबका। 

श्रीवास्तव साब बोले.." दीनू पहले पानी गरम कर दे। आज सब नहाएंगे उसके बाद चाय पियेंगे।"

"ठीक है साब।"


सब नहा लिए। अब अंधेरा सा ढलने वाला था। दीनू ने अलाव जला दिया। चाय की चुस्कियां लेते हुए अलाव के पास बैठे चारों आज की तहखाने की बात करने लगे।

"कितना भयानक माहौल था वहां।!!"

 "हम्ममम... अपने इतने साल के अनुभव में मैंने ऐसा दृश्य कभी नहीं देखा था।" श्रीवास्तव ने ठंडे स्वर में कहा।

रात गहराने लगी। दीनू ने खाना लगा दिया। खाना खा कर जैसे ही उठे वो कि पूरा माहौल सियारो के रुदन से गूंज उठा।


"ऊ ऊऊऊऊ sssssss......."


दीनू का चेहरा सफेद पड़ गया। "सा... साब... आज ये... ये... सियार एक साथ रो रहे है... कोई बड़ा खतरा मंडरा रहा है। म... मैं अब चलता हूं। जल्दी घर जाना है। आ...आप भी जल्दी टेंट में चले जाओ। अलाव में भरपूर लकड़ियां डाल दी हैं। मशालें जला कर रख लीजिए। बाहर अकेले कहीं मत जाना साब। आज की रात बड़ी मनहूस लग रही है।"

ये बड़बड़ाते हुए दीनू वहां से चला गया।

श्रीवास्तव का दिल जोर से धड़कने लगा। दीनू की बातें चारों के दिमाग में घूमने लगीं

टेंट में पैक हो गए वो सब। चारों ओर मशालें जला रखी थी। अलाव की लपटें ऊपर तक जल रही थी। आज चारों ने फैसला किया कि 2-2 घंटे के लिए हर आदमी जागेगा और पहरा देगा। कोई जंगली जानवर दिखते ही सबको जगाकर फायर गन से अटैक करना है।

सबसे पहले श्रीवास्तव ही जग कर पहरा देने लगे। बाकी सब भी लेटे हुए तो थे लेकिन नींद आंखों से कोसों दूर थी ।

कुछ ही देर में नींद ने आ घेरा उन तीनों को। श्रीवास्तव अब अकेले जग रहे थे। रात का सन्नाटा पसरा था। श्रीवास्तव टेंट को थोड़ा सा खोल के बाहर का जायजा लेने लगे। सन्नाटा पसरा था.... ठंडी हवा के झोंके खून जमा रहे थे.... पूरा चांद आसमान के बीचों बीच चमक रहा था। झिंगुरों का शोर बिखरा पड़ा था चहुं ओर। सीटियां बजाती तेज हवा पेड़ों को झकझोर रही थी।  उल्लुओं की आवाजें गूंज रही थी। सियारों के रोने की आवाजें रोंगटे खड़े कर देने वाला माहौल बना रही थी। सिहरन भरा माहौल था। 

श्रीवास्तव को पहली बार किसी जगह पर इतना डर लग रहा था। 

मन ही मन सोचने लगा वो...

"अपने इतने सालों के अनुभव में मैंने कई खंडहरों का निरीक्षण किया है... लेकिन आज की रात जो मनहूसियत फैली है यहां ऐसी मनहूसियत कही महसूस नहीं की थी।"

श्रीवास्तव बाहर झांकते हुए ये सोच ही रहे थे कि एक आहट सी हुई और उनका ध्यान इस तरफ चला गया। किसी के चलने की आहट थी वो। श्रीवास्तव ने फायर गन संभाल ली। उन्हें लगा कोई सियार या छोटा मोटा जानवर होगा। आहट पास आती जा रही थी। अंधेरे में एक साया उभरा... एक आदमकद साया। श्रीवास्तव हैरान रह गए। समझ में नहीं आ रहा था कि वो क्या है। उन्होंने बाकी तीनों को फुर्ती से जगाया। तब तक वो साया काफी पास आ चुका था। अलाव और मशालों की रोशनी में जब वो साया स्पष्ट हुआ तो उन चारों की आंखे फट पड़ी। आवाज गले से नहीं निकली। चीख गले में ही घुट के रह गई। सामने आने वाली वो आदम कद आकृति कल्पना से परे भयानक थी।

वीभत्स चेहरा... शरीर पर जगह जगह चमड़ी लटक सी रही थी... खूनी पंजे... टेढ़े मेढे पैर...और मुंह से निकल रही भयानक गुर्राहट.... किसी के भी होश उड़ाने के लिए काफी था वो दृश्य।


चारों टेंट से निकल भागे। भागते हुए श्रीवास्तव ने फायर गन से फायर कर दिया उस पर। लेकिन कोई असर नहीं हुआ। वो भयानक शैतान गुर्राते हुए तेजी से उनके पीछे लपका।

और अगली सुबह..... जब दीनू टेंट के पास आया.. तो देखा टेंट बिखरा हुआ था। दीनू के हाथ पैर फूल गए।  उसने आवाजें लगाई पर कोई उत्तर नहीं मिला। दीनू उन्हें खोजने के लिए इधर उधर घूमने लगा। तभी उसे थोड़ी दूर कुछ नजर आया। वो धीरे धीरे उस तरफ बढ़ने लगा। पास जाकर देखा तो एक पल के लिए उसका दिमाग गश खा गया। जो उसने देखा वो उन चारों में से किसी का उखड़ा हुआ हाथ था। वही से थोड़ी दूर विपिनपाल का क्षत विक्षत शरीर पड़ा था। ऐसा लग रहा था मानो किसी ने उसके जिस्म से खून की एक एक बूंद चूस ली हो। चीख निकल गई दीनू की। पागलों की तरह चिल्लाने लगा वो। चिल्लाते हुए गांव की तरफ भागा.... गांव पहुंच कर घबराई आवाज में पूरी घटना बताई गांव वालों को।

आनन फानन में गांव के ठाकुर राजबहादुर सिंह कई गांव वालो के साथ पहुंचे किले के पास। वहां सच में चारों के बिखरे टुकड़े और नुचे हुए जिस्म मिले उन्हें। 

"ओह... इतनी बेरहमी से इनका कत्ल कौन कर सकता है।?? ऐसे तो कोई जानवर भी नहीं मारता।"

ठाकुर साब ने चिंतित स्वर में कहा।

"अब क्या करे ठाकुर साब।??" गांव के लोगों ने पूछा।

"ये काम किसी शैतानी ताकत का लगता है ठाकुर साब। ये लक्षण किसी बड़ी विपत्ति के लग रहे है। कोई भयानक संकट मंडराने वाला है गांव पर।" गांव के पुजारी बाबा गंभीरता से बोले ।

 फिलहाल इस घटना की सूचना हमे पुलिस को देनी होगी। पास के गांव में  पुलिस चौकी थी।

चार सिपाही नियुक्त थे। घटना हत्या की थी तो चौकी से सूचना थाने तक पहुंचाई गई। पुलिस दल आ पहुंचा गांव। दीनू से पूछताछ की गई। किले का मुआयना किया। पहाड़ी इलाका पूरा छान मारा। लेकिन कहीं कोई ठोस सुराग नहीं मिल पाया । अपनी छानबीन कर के पुलिस लौट गई। रिपोर्ट में जंगली जानवरों के झुंड द्वारा हमले की घटना दर्शा दी गई।

 इस भयानक घटना के कुछ दिन बाद... अमावस्या की काली रात अपने पूरे शबाब पर छा चुकी थी। मैनागढ़ की गलियों में सन्नाटा पसरा था। एकाएक गलियों के कुत्ते एकसाथ रोने लगे। गांव से बाहर जंगल में सियारो के रोने की आवाजें गूंज उठी। पूरे माहौल में मनहूसियत घुल गई। कुत्तों के रोने से परेशान होकर एक आदमी ने दरवाजा खोला और लाठी लेकर कुत्तों को भगाने निकला।  कुत्ते भाग गए... लेकिन उस आदमी के पैर वहीं ठिठक गए...वहां पड़े भूसे के ढेर के पीछे से  एक भयानक आकृति उभरी.... 



"कौ.... कौन है वहां???" घबराई आवाज में बोला वो।

उसके बाद उसे मौका नहीं मिला।।।


अगली सुबह ठीक वैसी ही बिखरी सी लाश मिली उसकी। गांव में तहलका मच गया।

 ठाकुर राजबहादुर और सभी गांव वाले पुजारी के पास पहुंचे। 

"मैने आपको पहले ही कहा था ठाकुर साब... इस शैतानियत को मैं महसूस कर रहा हूं। इस वक्त गांव पर भयानक संकट छाया है। इस वक्त हमें बेहद सावधान रहना होगा।"

"तो हम क्या करें बाबा??" ठाकुर ने गंभीरता से पूछा 


"बस अभी गांव में कुछ नियम बना लेने चाहिए.... रात को कोई घर से बाहर न निकले। अकेले किसी बाहरी जगह पर ना जाए। जंगल में लकड़ी काटने अकेले न जाए। किले की पहाड़ी पर किसी हालत में ना जाए। गांव के मंदिर में शाम की पूजा में पूरा गांव शामिल हो।"


ठाकुर साब ने ऐलान कर दिया, "पूरे गांव में पुजारी बाबा के नियम बता दिए जाए और उनका पूरा पूरा पालन किया जाए।"

 पुलिस को फिर से इत्तिला कर दी गई। थानेदार हवासिंह राठौड़ पुलिस जाब्ते के साथ वहां पहुंच गया। चक्करघिन्नी सी हो के रह गई पुलिस। गांव वालों के आक्रोश का भी सामना करना पड़ा उन्हें। बड़ी मुश्किल से गांव वालो से समझाइश कर के थाने पहुंचा। 

"उफ्फ...  केस तो गले की घंटी बन गया है। आखिर इतनी वीभत्सता से कौन मार रहा है लोगों को??। जंगली जानवर भी इस तरह शिकार नहीं करते।" कुर्सी पर बैठे बैठे सोचे जा रहा था वो।

तभी एक ख्याल कौंधा उसके मन में, "अरे... हां... ये केस एक आदमी सॉल्व कर सकता है।"

उसने एक नंबर डायल किया।


सामने से आवाज उभरी....

"हेलो... द्रोण हियर।" ....



अगले अंक में जारी............



क्या द्रोण इंस्पेक्टर हवा सिंह की मदद कर सका।??? क्या मैनागढ़ का वो खौफनाक केस सॉल्व हो सका?? या द्रोण भी शिकार बन गया उस रहस्यमय शैतान का??? 

जान ने के लिए इंतजार कीजिए रोमांच और  खौफ की स्याही से लिखे अगले भाग का...

Monday, 16 February 2026

एक भयानक दास्तान

इस कहानी का किसी व्यक्ति, स्थान से संबंध नहीं है। यह पूर्णतया काल्पनिक है। 

                          भाग -1

सन् 1986...

राजस्थान के ग्रामीण अंचल में दूर दराज में स्थित.... शहरी जीवन से परे... एक शांत गांव... भौंरा गढ़। जहां सर्दियों की ठंडी रातों में जलते अलाव  के पास बैठे लोग किस्से - कहानियों से अपना मन बहलाते हैं।
अक्सर ये मन बहलाते किस्से पुराने राजा - रजवाड़ों से ताल्लुक रखते हैं... या गांव की खास घटनाओं से जुड़े होते हैं.... या फिर सबसे रोमांचक विषय होता है भूत प्रेत !

ऐसे ही किस्सों में मशहूर है ....
             
              ’एक भयानक दास्तान’

                
 भौंरा गढ़ के एक सामान्य किसान की बेटी 'पतिया'। यौवन की दहलीज पर खड़ी 17 साल की एकदम अल्हड़ सी मासूम सी लड़की।
 पास के गांव के मुखिया का बेटा चंदू शहर में कुछ काम करता था। वो कुछ दिनों के लिए गांव आया था। गांव के मेले में उसने पहली बार देखा पतिया को। पतिया उसे पहली नजर में भा गई थी। धीरे  धीरे दोनों में जान पहचान हो गई। मिलना जुलना हुआ और प्रेम परवान चढ़ गया । लेकिन पतिया और चंदू के परिवार दोनों इस रिश्ते के खिलाफ थे। ये बात पतिया और चंदू भी जानते थे कि उनके इस रिश्ते को कभी मंजूरी नहीं मिल सकेगी। एक दिन चंदू ने पतिया को उसके साथ भाग जाने को कहा। पतिया उसकी बातों में आ गई। चंदू के कहे अनुसार घर से सारे गहने और नकदी लेकर वो रात को भाग निकली। गांव के बाहर चंदू तैयार खड़ा था।
 "आ गई???"
"हां, बड़ी मुश्किल से आई हूं। सबसे छुपते छुपाते।"
"जो बोला वो सब लाई हो ना?"
"हां.. हां... सब लाई हूं।"
"बस... अब हम शहर में जाकर आराम से रहेंगे। तुझे रानी बनाकर रखूंगा मैं!"
ये सुन कर पतिया के चेहरे पे मुस्कान छा गई।
चंदू उसे लेकर खेतों के रास्ते जाने लगा। पतिया उसके पीछे पीछे चल दी।
अचानक चंदू रुक गया। 
"क्या हुआ? रुक क्यों गया चंदू???" पतिया ने पूछा।

"बस... यहां तेरा सफर खत्म।" चंदू कुटिल मुस्कान के साथ बोला।

"क्या मतलब??" पतिया घबराई आवाज में बोली।

"मतलब अब अगले जनम में समझ लेना।" कहते हुए चंदू ने उसका गला दबा दिया।
पतिया छटपटाने लगी। उसे यकीन नहीं हो रहा था। चंदू ऐसा करेगा। मरने से ज्यादा उसे अपने प्यार पे अफसोस हो था था। वो इस बात पे ज्यादा दुखी थी कि चंदू ऐसा निकला। जिस पर उसने अपना सब कुछ लुटा दिया। तन मन धन... खानदान की इज्जत। सब कुछ जिसके लिए दांव पर लगा दिया उसने उसे इस तरह धोखा दिया।

पतिया के मुंह से कोई शब्द नहीं निकला पा रहा था। बस आंखों से आंसू बह रहे थे। छटपटाहट तेज होती गई और फिर सब कुछ शांत हो गया। पतिया मर गई। चंदू ने उसकी लाश पास बने कुएं में डाल दी और फरार हो गया।

दरअसल चंदू एक नशेबाज सट्टे बाज लड़का था। शहर में बुरी लत लग चुकी थी। सब कुछ बर्बाद कर के गांव आया था। पतिया को देख कर उसने ये सारी योजना बना ली थी। पतिया को फसाकर सारा जेवर और नकदी लेकर वो शहर भाग गया।
इधर कुछ दिनों से पतिया का कोई अता पता नहीं था। पतिया के बाप ने पुलिस में जाना उचित नहीं समझा। घर से जेवर गायब थे। लड़की खुद घर से भागी है... समाज में इज्जत जाने का डर था। इसलिए सब चुप थे।
उस सूने कुएं की तरफ  आवागमन बहुत ही कम होता था।  काफी दिनों बाद एक शाम एक गडरिया भेड़ों को चराते चराते उस तरफ गया। कुएं पर मंडराते कौवों और दुर्गंध ने उसका ध्यान उस तरफ खींचा। उसने कुएं में झांक कर देखा तो उसके होश उड़ गए। बुरी तरह सड़ी गली लाश देख कर और दुर्गंध से उसको मितली आने लगी। वह तेजी से गांव की तरफ भागा। लेकिन रास्ते में ही सदमे से अचेत होकर गिर पड़ा।
 जब उसे होश आया... अंधेरा घिर चुका था। वह उठा.... गिरते पड़ते गांव तक पहुंचा।।
 गांव पहुंच कर गडरिया जोर से चीखा। ठीक से बोल भी नहीं पा रहा था। घबराहट के मारे शब्द नहीं निकल रहे थे। बड़ी मुश्किल से बोला.... "ल... ल... लाश... कुएं में लाश...।।"
गांव वाले चौंक पड़े। उसे थोड़ा संयत किया गया। थोड़ी देर में गडरिया थोड़ा ठीक हुआ। जो कुछ उसने बताया उसे सुन कर गांव वाले बुरी तरह हैरान हो उठे। सब के सब... जिसने भी सुना सब के सब उस तरफ दौड़ पड़े। हाथों में मशालें... टॉर्च... लालटेन लिए। कुएं के पास जा के देखा।।। भयानक दुर्गंध उठ रही थी वहां। लेकिन अंधेरे में कुएं के अंदर कुछ नहीं दिख रहा था।
सबने सुबह तक वहीं इंतजार करने की ठानी। कुछ दूरी पे जाकर सुबह होने का इंतजार करने लगे वो। सबने कुएं को घेर रखा था। कोई बाहरी आदमी कुएं तक नहीं पहुंच सकता था। आखिर सुबह हुई। सबने एक साथ जाकर देखा। भयंकर झटका लगा उन्हें।  कुएं में कोई लाश नहीं थी। 
सबने गड़रिए को पकड़ा। 
"क्यों रे!!! तू तो बोल रहा था कुएं में लाश है! कहां हैं लाश??"

"म... म... मैंने अपनी आंखों से देखी है। रात को भयानक बदबू भी तो आ रही थी।"

"तो फिर कहां चली गई लाश। रात से कोई आया भी तो नहीं कुएं के पास???"

गांव वाले हैरान परेशान हो गए। गडरिया गांव का ’ठीमर’ आदमी था। उस पर कोई संदेह नहीं कर सकता था। आखिर गांव वाले वापस लौट आए। कई दिनों तक ये चर्चा का विषय बना रहा।



पूरा गांव हतप्रभ था। रातों रात लाश कहां गायब हो गई।
 गांव वाले लौट गए। कुछ दिनों तक यही चर्चा होती रही। गांव से पतिया गायब थी। लोगों ने इस घटना को पतिया से जोड़ दिया। उनका अंदाजा सही भी था।

 एक दिन शाम को गांव का एक लकड़हारा मंगलू लकड़ियां काटते हुए उसी कुएं की तरफ गया। शाम तक काफी थक चुका था। बड़ा सा गट्ठर बांध लिया था उसने। थका हारा थोड़ी देर वहीं बैठ गया। शाम का धुंधलका गहराने लगा। पर ठंडी ठंडी हवा में उसका उठने का मन नहीं कर रहा था। तभी... उसने कुछ आहट सुनी। एक हल्की सी आहट... किसी के पायल खनकने की। उसने पीछे घूम के देखा। पर कोई नहीं दिख रहा था। आवाज आती जा रही थी। मानो कोई उसी की तरफ बढ़ रहा हो। तभी वहां बरगद के पेड़ के पीछे से एक सांया उभरा। मंगलू को लगा गांव की कोई औरत है। उसने आवाज लगाई।
"कौन है उधर?"
"गांव चलना है क्या?"

सांया धीरे धीरे उसकी तरफ बढ़ा। मंगलू अपनी जगह पर खड़ा रहा। उसे साफ साफ नहीं दिख रहा था। सोचा पास आएगी तब पूछ लेगा कि कौन है?! 
साया बहुत धीरे धीरे बढ़ता आ रहा था। लड़खडाते हुए। मंगलू खुद उसके पास चला गया। और बोला 
"कौन हो...बाई ??? इस वक्त यहां क्या कर हो??? गांव चलना है क्या??"

जवाब में बस एक गुर्राहट उभरी। और एक भयानक पंजा मंगलू की गर्दन पर कस गया। मंगलू चिल्लाने लगा। उस साए की सूरत से घूंघट हटा... और मंगलू की आत्मा कांप उठी। बेहद भयानक शक्ल लिए... एक प्रेतनी गुर्रा रही थी। उसके लंबे नाखून मंगलू की गर्दन में धंस गए और मंगलू की जीवन लीला वही समाप्त हो गई। अगले दिन मंगलू की लाश मिली। पूरे गांव में हंगामा मच गया। मंगलू की लाश देख कर कई तरह के कयास लगाए जा रहे थे। 
 पुलिस बुला ली गई। 
लेकिन कोई सुराग नहीं मिला।
 पुलिस पूछ ताछ कर के लौट गई। घटना को किसी जंगली जानवर का हमला नाम दे दिया गया। 


दरअसल वो सुनसान रास्ता सड़क तक जाने का पगडंडी नुमा छोटा रास्ता था। शहर से आने जाने वाली ’बस’ गांव में नहीं आती थी। सड़क पर उतार देती और गांव वाले उस छोटे रास्ते से ही गांव से बस तक पैदल आना जाना करते थे। 


 कुछ ही दिनों बाद गांव का एक लड़का सोहन रात को शहर से आया। किसी ट्रैक्टर वाले ने उसे सड़क पर छोड़ दिया था। वहां से वो पैदल रवाना होकर उसी छोटे रास्ते से गांव की तरफ बढ़ रहा था। रात के 10 बज चुके थे। चलते चलते कुएं तक पहुंचा वो। तभी किसी ने उसका नाम लेकर पुकारा.... "सोहन.... सोहन...... " और एक खनकदार हंसी गूंज उठी।
सोहन चौंक गया। रात के वक्त इस जगह पर कौन उसे पुकार सकती है। उसने ध्यान लगाया। आवाज कुएं से आती प्रतीत हुई उसे??गांव में कुछ भूतिया किस्से पहले से सुन रखे थे उसने। वो भांप गया कि आज कोई डायन उसके पीछे लगी है। वो भागा... तेजी से भागा। लेकिन वो आवाज उसके कानो में सुनाई देती जा रही थी। मानो उसके एकदम पास से उसे कोई बुला रहा हो।
वो हांफने लगा। थक कर उसे रुकना पड़ा। हंसी की आवाज फिर से गूंजी। उसने पीछे मुड के देखा। वही भयानक प्रेतनी ठीक उसके पीछे खड़ी थी। वो कुछ बोल पाता उस से पहले ही वो उसे खींच ले गई कुएं में। अगले दिन गांव में फिर हंगामा मच गया। सोहन की लाश कुएं में मिल गई थी। गांव वाले सहम उठे। पुलिस कुछ कर नहीं पा रही थी । गांव वालों ने कुएं की तरफ जाना प्रतिबंधित कर दिया।
इसके बावजूद कोई अभागा अंजान आदमी उस प्रेतनी का शिकार हो ही जाता।
गांव में हवा फैल गई। उस रस्ते पर ’पतिया’ घूमती है। लोगों को मार देती है।
इस केस से पुलिस भी बुरी तरह परेशान थी।
 पुलिस के लिए बहुत बड़ा सरदर्द बन चुका था ये केस। आखिर पुलिस का एक स्पेशल जवान इंस्पेक्टर कपिल को तैनात किया गया उस गांव में। उसकी ड्यूटी थी गांव में हो रही हत्याओं का सबूत सहित पता लगाना और ऐसी घटनाओं के रोकना। कड़क स्वभाव और गजब का बहादुर इंस्पेक्टर था कपिल। 2-3 दिन गांव में रह कर जानकारी ली उसने। जो कुछ जानकारी ले रहा था उसे नोट करता गया। एक फाइल बना ली उसने।  बस अब उसने उस सुनसान रस्ते वाले  कुएं के पास छन बीन करने की सोच ली। एक रात वो उस कुएं के पास जा पहुंचा। ये देखने कि आखिर माजरा क्या है? छुपते छुपाते गया था वो। बिना किसी को कुछ बताए।
 जैसे ही वो वह पहुंचा। उसे भी उसी तरह आवाज आने लगी। पायल की। खनक दार हंसी। उसका नाम लेकर पुकारा जाने लगा उसे। वो अचंभित रह गया। तभी उसे लगा कोई उसके पीछे खड़ा है। जैसे ही वो पलटा... वो भयानक डायन उसके पीछे खड़ी मुस्कुरा रही थी। कपिल घबरा गया उसे देखकर... और अगले ही पल उस डायन ने उसका गला दबा दिया। अगले दिन गांव वालों को कपिल की लाश मिली। पुलिस में हड़कंप मच गया। इंस्पेक्टर की हत्या हो जाना कोई मामूली घटना नहीं थी।
अब कोई पुलिस वाला इस केस में हाथ डालने को तैयार नहीं था।
3 साल बीत गए। ये केस फाइलों में दब गया। गांव वालों को उनके भाग्य भरोसे छोड़ दिया गया। अब भी उस गांव में भयानक हत्याएं होती रहती। उस रस्ते पर जो भी जाता... वापस नहीं आता। कोई न कोई अंजान आदमी वहां शिकार हो ही जाता।
 पुलिस बस मूक दर्शक बनी बैठी थी। केवल पंचनामा कर के खानापूर्ति कर देती। लेकिन इस केस को सॉल्व करने का साहस किसी में नहीं था। 

आखिर 3 साल बाद.... उस इलाके के थाने में नियुक्त हुई एक नई लेडी इंस्पेक्टर रजनी। जब उसके सामने ये केस आया तो उसने ये केस हाथ में लेने की ठान ली। फर्स्ट पोस्टिंग... नया जोश.... पूरे पक्के इरादे के साथ भौंरा गढ़ पहुंच गई वो।

भौंरा गढ़ में ही रहने का ठिकाना कर लिया । इस केस के सिलसिले में ऑन ड्यूटी यहीं रहने की परमिशन मिल गई थी उसे। कई दिनों तक गांव में लोगों से मिली। काफी मदद उसे इंस्पेक्टर कपिल की फाइल से मिल गई थी। बाकी जानकारी गांव में रह के जुटाई। दिन में उस सुनसान रस्ते का मुआयना किया। कुएं का जायजा लिया। लेकिन अभी भी गुत्थी सुलझ नहीं पा रही थी।

उसने भी ठान ही ली कि अगर ये केस सॉल्व करना है तो रात को कुएं के पास आना ही पड़ेगा।


 कौन मार रहा है लोगों को?? आखिर इस रस्ते पर क्यों हो रही है मौतें?? क्या रहस्य है इस खूनी रस्ते का???   ये सब जान ने के लिए रात में  यहां  आना जरूरी है।। क्योंकि सारी मौतें यहां रात को हुई है।
 क्या इंस्पेक्टर रजनी इस केस को सॉल्व कर सकी??? क्या वो खूनी चुडैल के पंजे से बच सकी?? क्या  भौंरा गढ़ गांव  इस भयानक मुसीबत से मुक्त हो सका।??? जान ने के लिए इंतजार कीजिए अगले अंक का......

                              भाग - 2

पिछले अंक में अपने पढ़ा.....

 जांबाज लेडी इंस्पेक्टर रजनी राठौड़ भौंरा गढ़ केस के सिलसिले में अपनी जांच पड़ताल शुरू कर चुकी थी  और रात उस भयानक कुएं के पास जाने की सोच चुकी थी।

अब आगे....

दिन भर इंतजार करने के बाद... जब शाम का धुंधलका गहराने लगा... तब... इंस्पेक्टर रजनी अपनी जीप लेकर निकल पड़ी उस रस्ते पर... जहां से वापसी शायद नामुमकिन थी। दिल धाड़ धाड़ बज रहा था उसका। गजब की ठंड थी लेकिन उसके माथे पर पसीना छलक रहा था। उस कच्चे रास्ते पर  रेंगती जीप के ब्रेक लग गए... उस कुएं के पास आकर। हल्की सी घबराहट के साथ जमीन पर पैर टिके इंस्पेक्टर रजनी के। अपने भय और आशंकाओं पर गजब का काबू किए हुए थी वो। मन में ठान चुकी थी कि जो होगा देखा जाएगा। हाथ में रिवॉल्वर चमक उठा उसके। जीप की हैडलाइट में कुएं का एरिया देखा जा सकता था।
तभी रजनी को एक आहट सुनाई दी। वो चौकन्नी हो गई। कुएं से कुछ आवाज उभरी। एक भयानक गुर्राहट ... पायल खनकने की आवाज... और कुएं के बाहर एक हाथ निकला... भयानक लंबे नाखून वाला वीभत्स पंजा। रजनी की आंखे फैलती गई और फिर निकली वो भयानक सूरत जिसने पूरे गांव ने दहशत मचा रखी थी। रजनी भय से जड़ हो के रह गई। उसक मुंह से स्वर तक नहीं निकल पा रहा था। साक्षात मौत उसके सामन खड़ी थी। लेकिन आश्चर्य.... वो डायन आगे नहीं बढ़ी... बस रजनी को देखती रही।अचानक उसका पंजा रजनी के गले पर कस गया.. और... एक भयानक गुर्राहट भरी आवाज में बोली.... "शुक्र कर... तू औरत जात है... जो मर्द होती तो तेरा खून पी जाती... हाsssss"

रजनी ने खुद को संभाला।  हिम्मत कर के बोली... " क... क.. कौन हो तुम?? यहां से निकलने वाले राहगीरों को क्यों मार रही हो?? क्या गांव में मैंने जो कुछ सुना वो सच है??? "चुडैल का पंजा हट गया... वो बोली...." हां... जब तक एक एक मर्द जात का खून न पी जाऊं... मुझे शांति नहीं मिलेगी।"
"लेकिन क्यूं?? क्यूं कर रही हो ये सब???" रजनी ने हल्के से पूछा।
 रजनी ने फिर से हिम्मत जुटाई ..." देखो मुझे बताओ... क्या हुआ ऐसा जो तुम्हारी ये हालत हो गई??
 मुझे बताओ बहन। मैं भी एक औरत हूं। मुझे बता दो। मैं पुलिस ऑफिसर भी हूं... मैं वादा करती हूं... तुम्हे इंसाफ दिलाऊंगी।"



चुडैल फिर से गुर्राई और फिर उसकी आवाज में दर्द झलक उठा....

और उसने फ्लैशबैक में अपने साथ हुई बेवफाई की कहानी रजनी को सुनाई।
" जब तक मैं एक एक मर्द जात का खून न पी जाऊं मेरी आत्मा को शांति नहीं मिलेगी.... हार्ररररररररर sssss"

"किसी एक दुष्ट का दंड पूरी मर्द जात को देना तो गलत है बहन... मैं वादा करती हूँ... तुम्हे मुक्ति दिलाऊंगी। तुम्हे इंसाफ दिलाऊंगी। चाहे कुछ भी करना पड़े। सारी हदें तोड़नी पड़े।"
उस से वादा कर के रजनी लौट आई गांव। जो कुछ हुआ सब सपना सा लग रहा था। मन अभी भी विश्वास नहीं कर रहा था कि कोई मर के भी इस दशा में रह सकता है.... भूत प्रेत जैसी चीजें सच में है??? लेकिन जो कुछ उसने देखा .... सुना... वो भी तो गलत नहीं था
 अगले दिन रजनी शहर की तरफ रवाना हो गई। विभाग से कुछ दिनों की छुट्टी लेकर गई वो। उसका ऑफिशियल केस अब अनऑफिशियल हो चुका था।

शहर जा कर उसने चंदू की तलाश शुरू कर दी। गांव से उसका पता लेकर निकली थी वो लेकिन शहर में वो उस पते पर नहीं मिला। शायद रहने की जगह बदल ली थी उसने। पूछ ताछ करते करते आखिर उस तक पहुंच ही गई रजनी। चंदू पतिया के गहने - पैसे सब कुछ शराब और जुए में उड़ा कर किसी गंदी बस्ती में रह रहा था। जब रजनी उसके पास पहुंची तो वो शराब के नशे में धुत होकर ठेके पर पड़ा था।रजनी ने उसे पकड़ा और जीप में डाल दिया। नशे की हालत में उसने हाथ पैर मारे लेकिन रजनी ने उसकी बुरी तरह पिटाई कर के सारा नशा उतार दिया। इस घटना का उस शहर पर कोई असर नहीं पड़ा। चंदू जैसे जाने कितने लोग गायब होते थे शहर से। रात होते होते रजनी उसे गांव के उसी रास्ते पर ले आई। चंदू का सारा नशा अब उतर चुका था। रजनी ने उसे धक्का देकर जीप से गिरा दिया और जोर से आवाज लगाई... "तुम्हारा अपराधी तुम्हारे सामने है पतिया .... जो सजा देनी है आज दे दो इसे... और विनती है तुम से कि आज के बाद इस गांव में ... इस रास्ते पर... इस कुएं के पास... अब कोई निर्दोष ना मारा जाए।" हाथ जोड़ते हुए रजनी ने जीप स्टार्ट कर दी।

चंदू हतप्रभ था। वो चिल्लाने लगा.... "अरे मुझे यहां छोड़ कर कहां जा रही हो.... यहां क्यों लाकर पटका मुझे????"

तभी चंदू खामोश हो गया....  उसके पीछे आहट सुन कर।

वो भयानक चुडैल आंखों में अंगारे लिए खड़ी थी। चंदू उसका रूप देख कर सहम उठा। उसके मुंह से घिघियाया हुआ स्वर निकला। 
चुडैल के मुंह से गुर्राहट निकली..."चंदू??? आखिर तू आ ही गया.... ही ही ही.... मैंने तो तुझसे प्रेम किया था ना??? तूने तो मुझे पहचान लिया होगा ??? ही ही ही.... मैं वही पतिया हूँ.... जिसके प्रेम का तूने गला घोंट दिया था। आज तुझे ऐसी मौत मिलेगी कि कोई किसी के साथ विश्वासघात नहीं करेगा। ही ही ही.....
 चंदू की आंखों के आगे अंधेरा छा गया.... उसके होश फाख्ता थे...
"प... प.... पतिया??? तू...तू... वापस कैसे आई??? नहीं...  ये नहीं हो सकता...."

बुरी तरह गुर्राती वो भयानक चुडैल उसकी तरफ बढ़ने लगी। चंदू जमीन पे गिरा हुआ रेंगने लगा। पतिया ने उसका पैर पकड़ लिया। चंदू भय से चिल्ला उठा... "नहीं ssss... पतिया मुझे माफ कर दे। मुझे माफ कर दे।" बुरी तरह रुलाई छूट रही थी उसकी।

लेकिन पतिया ने उसे नहीं छोड़ा। वो सूना रास्ता चंदू की चीखों से गूंज उठा। 

अगले दिन गांव वाले रजनी के साथ कुएं के पास आए। कुएं में चंदू की क्षत विक्षत लाश तैर रही थी। उसे बुरी तरह नोच दिया गया था। हड्डियां तका तक पूरे शरीर में इधर से उधर कर दी गई थी।
रजनी ने गांव वालों को सारी हकीकत बता दी। हर गांव वाले की आंख में आंसू था। डर अब हमदर्दी में बदल चुका था। चंदू की लाश का अंतिम संस्कार कर गांव वाले लौट गए। 

अगली रात जब रजनी उस कुएं के पास पहुंची... तो वहां शांति छाई हुई थी। किसी तरह का कोई डर नहीं... कोई आहट नहीं.... बस एक दम शांति।।।

अब उस रस्ते पर छाया अभिशाप हमेशा के लिए हट चुका था। पतिया की तड़पती आत्मा को शांति मिल चुकी थी। 

पूरा गांव इंस्पेक्टर रजनी का एहसान मंद था। चंदू गांव कैसे पहुंचा ये राज राज ही रहा। पूरे गांव ने अपने होंठ सी लिए। आंखों में नमी लिए उस गांव से विदा हुई इंस्पेक्टर रजनी.... उसकी जीप जब उसी रास्ते से गुजर रही थी तो उसे लगा मानो पतिया मुस्करा के देख रही थी उसे।

अब फिर से खुल गया वो रास्ता.... बिना किसी डर के....


समाप्त।

Sunday, 5 November 2023

तेरहवीं बलि (पार्ट-2)





अब तक आपने पढ़ा...
कॉलेज के आठ दोस्त अरुण ,सुमन, रोशन, प्रिया, विवेक ,अनु शिवा और गिरजा मोहर गढ़ छुट्टियां बिताने आये। लेकिन उस जगह पर कोई भयानक रहस्य उनकी राह देख रहा था। इस बात से बेखबर वो लोग मौज मस्ती करते हुए अपने अपने कमरे में सो गए। उसी रात उनके साथ शुरू हुआ एक शैतानी खेल। अनु का भयानक रूप देख कर सुमन अपने कमरे की तरफ दौड़ी....

अब आगे......


चीखते हुए अपने कमरे की तरफ दौड़ने लगी सुमन। लेकिन पहुंच नहीं पाई। अनु का भयानक हाथ लंबा होकर सुमन की गर्दन पर कस गया। 

चीख सुन कर सब जाग उठे। लाईटें जल उठी। सब दौड़ कर बाहर आये। लेकिन वहाँ कोई नहीं था। सुमन के कमरे का दरवाजा खुला था।

 "सुमन कहाँ चली गयी?? उसके चीखने की आवाज सुनी थी।" अरुण  घबराते हुए बोला।

"और... और... ये अनु कहाँ है?? रात को मेरे कमरे में सोई थी। वो भी गायब है।" प्रिया बदहवास हुई सी बोली। सब लोग मिलकर अनु और सुमन को ढूंढने लगे। बूढ़ा अपने कमरे में ही दुबका था। सारी लाइट्स ऑन कर दी गयी।

"अरे देखो... बड़ी फाटक तो खुली पड़ी है।" विवेक चीखते हुए बोला। सब लोग गेस्ट हाउस से बाहर की तरफ भागे।

शिवा - "लगता है दोनों को किसी ने किडनेप कर लिया।" 

सब बुरी तरह घबरा गए थे। दौड़ के गेस्ट हाउस के बाहर निकल गए सभी। 

सुमन और अनु को आवाज लगाते हुए गेस्ट हाउस के आस पास ढूंढने लगे अनु और सुमन को। तभी एक पेड़ से टपकती खून के बूंदे गिरी गिरिजा के कंधे पर। इसी के साथ नज़र उपर उठ गई उसकी और हलक फाड़ कर चीख पड़ी वो... 

ऊपर सुमन की लाश लटक रही थी। गर्दन की हड्डी टूटी हुई... बुरी तरह नोच डाली गई लाश....।

सब चिल्लाते हुए गेस्ट हाउस की तरफ भागे। 
"बाबाssss.... बाबाssss.... दरवाजा खोलो।।।" बूढ़े के कमरे का दरवाजा जोर से भड़भड़ा दिया उन लोगों ने।
चेहरे पर दहशत लिए बूढ़े ने दरवाजा खोला।
 दरवाजा खोलते ही बूढा भय से बड़बड़ा उठा... "वो... वो आ गयी... वो आ गयी।"




"कौन आ गयी??... कौन आ गयी बाबा????" रोशन बूढ़े को झकझोरते हुए बोला।
 "वो... वो अब सबको मार डालेगी। किसी को नहीं छोड़ेगी!!"
इस से पहले की बूढा कोई जवाब दे पाता गेस्ट हॉउस की वो बड़ी फाटक तेज आवाज के साथ बन्द हो गयी। वहां कोई नज़र नहीं आ रहा था। सब के होश उड़ गए । सनसनी सी मच गई। सब बूढ़े के कमरे में जा घुसे। 

"ये... ये सब क्या हो रहा है बाबा...???" प्रिया रोते हुए बोली।

"तुझे यहां नहीं आना चाहिए था बेटी... तुझे यहां नहीं आना चाहिए था.... वो डायन तुझे छोड़ेगी नहीं... और तेरे साथ - साथ इन सबको भी मार डालेगी वो।"

"लेकिन ये है कौन? और.... मैंने इसका क्या बिगाड़ा है??" प्रिया सुबकते हुए बोली।

"अब तक मैं उसके खौफ से चुप था बेटी... लेकिन अब मैं तुझे बता के रहूंगा...
"आज से 40 बरस पहले....
(फ़्लैश बैक).... तुम्हारे दादाजी पहली बार यहां आए थे। उन्हें ये जगह इतनी भा गयी कि उन्होंने यहां एक गेस्ट हाउस बनाने की ठान ली। गांव से हटकर जंगल के बीच... इस छोटी सी पहाड़ी पर  ये जगह उन्हें सबसे ज्यादा अच्छी लगी थी। उन्होंने पैसा पानी की तरह बहाकर ये जगह खरीद ली। लेकिन... जिस जगह ये गेस्ट हाउस बना है... उस जगह उस वक़्त यहाँ एक छोटी सी झोंपड़ी हुआ करती थी। यहाँ रहती थी  एक बूढ़ी औरत.. 'हंजा'! लोगों को शक था कि वो एक डायन है। वो ना जाने कहाँ से आई थी... उसके बारे में किसी को ज्यादा कुछ नहीं पता था। वो बस अकेली इस वीरान जंगल में भटकती रहती। लोग उसके पास आना जाना पसंद नहीं करते थे। एक अफवाह भी थी... कि इस जंगल में अगर हंजा का बनाया टोटका कोई देख लेता तो वो ज़िन्दा नहीं बचता।
जब तुम्हारे दादाजी ने यहां काम शुरू करवाना चाहा तो हंजा की झोंपड़ी बीच में आ गयी। तब तुम्हारे दादाजी ने हंजा को झोपड़ी हटाने को कहा। लेकिन हंजा नहीं मानी। उसने साफ इंकार कर दिया। तब तुम्हारे दादाजी ने उसे जबरदस्ती हटाने जा फैसला किया। उन्होंने हंजा की झोपड़ी तुड़वा दी। हंजा आग बबूला हो उठी। उसे मजबूर हो के वहां से हटना पड़ा। लेकिन वो चेतावनी देकर गयी... वो फुफकारते हुए बोली ""सेठ... तूने मेरा ठिकाना छीन लिया... लेकिन तू भी यहां बस नहीं सकेगा। मैं तुझे यहां टिकने नहीं दूंगी।""

तुम्हारे दादाजी ने हंजा को गम्भीरता से नहीं लिया और वहां काम शुरू करवा दिया। लेकिन... कुछ दिनों बाद ही.. रहस्यमयी तरीके से ठेकेदार की मौत हो गयी।... फिर काम दूसरे ठेकेदार को दिया गया... लेकिन वो भी उसी तरीके से मारा गया। गांव में बात फैल गयी... लोग दहशत में आ गए। अब कोई ठेकेदार वहां काम करने को तैयार नहीं था। काम रुक गया। तुम्हारे दादाजी का बड़ा नुकसान हो रहा था। तब... वो एक बार फिर से हंजा से मिलने गए। उन्हें देखते ही हंजा बिफर पड़ी...
""यहां क्यों आया है सेठ...?? चला जा यहां से फौरन।।।""
तुम्हारे दादाजी अब थोड़ा नरम पड़ गए।
""हंजा... मुझसे गलती हो गयी... मैंने तुम्हारी झोपड़ी तोड़ दी।। मुझे माफ़ कर दो। लेकिन मेरे लिए ये ज़रूरी था। कानूनन हक़ था मुझे वहां काम करवाने का। इसलिए अब तुम गुस्सा छोड़ दो... और वहां काम चलने दो।""

हंजा चीखते हुए बोली ""कभी नहींsss... मैं तुझे कभी माफ नहीं कर सकती। तू ज़िंदगी भर तरसेगा उस जमीन के लिए...""

""देखो हंजा... तुम चाहो तो कोई हर्जाना ले लो। लेकिन वहां काम चलने दो.. मेरा बड़ा नुकसान हो जाएगा।"
 ""हर्जाना देने के लिए कलेजा लोहे के कर ले सेठ... क्योंकि मुझे जो हर्जाना चाहिए वो तू दे नहीं पायेगा।""
""क्या चाहिए तुझे??""  मैं हर कीमत चुकाने को तैयार हूं। 

"तो फिर ठीक है। सुन मेरा ठिकाना छीनने की कीमत .... अगर तू वहां अपना घर बनाना चाहता है तो तेरा काम पूरा होते ही मुझे एक साल तक हर अमावस्या को एक इंसान की बलि दे देना। ही ही ही..... और...."

हंजा की बात पूरी हो पाने से पहले ही बुरी तरह घबरा गए सेठ जी..""ये .... ये तुम क्या कह रही हो??? मैं... मैं ऐसा काम कैसे कर सकता हूँ??? नहीं.... मैं ये नहीं कर सकता।।""

""तो फिर भूल जा उस जमीन को... और चला जा ये गांव छोड़ के... वरना तेरी मौत भी ज्यादा दूर नहीं...""

सेठ जी वापस आ गए। इस जमीन पर बहुत पैसा लगा चुके थे। अगर यहाँ गेस्ट हाउस नहीं बनता तो बहुत बड़ा नुकसान हो सकता था। गहरी सोच में पड़ गए सेठ शिवनाथ। आखिर हंजा की बात मान ने के अलावा कोई चारा नहीं बचा था।

अगले दिन सेठ वापस जा पहुंचे हंजा के पास और बोले ""हंजा मुझे तेरी शर्त मंजूर है। मैं एक साल तक तुझे हर अमावस्या को एक इंसानी बलि दे दूंगा।""

""हाssssss... तूने पूरी बात नही  सुनी सेठ... मुझे कुछ और भी चाहिए।""

""और ... और क्या चाहिए तुझे??"" सेठ ने चौंकते हुए पूछा।
 ""इन बारह बलियों के बाद मुझे तेरहवीं बलि तेरी खानदान की लड़की की चाहिए। जब भी तेरे घर मे लड़की होगी... उसके 19 साल पूरे होते ही उस पर मेरा हक़ होगा... सोच ले।।""

सेठ शिवनाथ का दिल मानो धक्क से बैठ गया। काटो तो खून नहीं। कनपटी सनसना उठी।
शिवनाथ मन ही मन फैसला ले चुके थे। उन्होंने कहा, ""मुझे मंजूर है... बस अब काम में कोई रुकावट नहीं आनी चाहिए।""

""हाssssss.... नहीं आएगी... कोई रुकावट .... ही ही ही...""

गेस्ट हाउस का काम शुरू हो गया। तेजी से काम चल रहा था... शिवनाथ के मन में हलचल थम नहीं रही थी। एक साल में गेस्ट हाउस का काम पूरा हो गया। ख़ूबसूरत लोकेशन पर बना शानदार गेस्ट हाउस लोगों को लुभाने लगा। फुल बुकिंग होने लगी।
 सेठ शिवनाथ बहुत खुश थे।
लेकिन एक दिन... गेस्ट हाउस में हड़कंप मच गया। वहां ठहरे टूरिस्ट दल में से एक सदस्य रहस्यमय ढंग से गायब हो गया। छानबीन की गई तो पता चला शाम को पास ही के जंगल में आखिरी बार देखा गया था वो। 
पुलिस बुला ली गयी। लेकिन वो नहीं मिला। लोगों ने कयास लगाने शुरू कर दिए..."" कहीं किसी जंगली जानवर का शिकार तो नहीं हो गया ।""

""कहीं किसी खाई में ना गिर गया हो।""

पुलिस भी खाली हाथ लौट गई। 


असल में शिवनाथ ने अमावस्या की रात हंजा को पहली बलि दे दी थी उस आदमी की। रात को ठीक बारह बजे गंडासे से उसकी गर्दन धड़ से अलग करते हुए अट्टहास लगा उठी वो डायन।
"ही ही ही ssssss..." हंजा की भयानक हंसी से जंगल थर्रा उठा। 


जैसे तैसे मामला ठंडा हुआ। गेस्ट हाउस में आवक लगातार बनी हुई थी। शिवनाथ खूब पैसा कूट रहे थे। 





 लेकिन अगली अमावस्या को फिर से एक आदमी गायब हो गया। लोगों में भय व्याप्त हो गया। खबर गांव में आग की तरह फैल गयी। शिवनाथ ने जैसे तैसे बात दबाई। लेकिन ये सिलसिला नही रुका।

अब तक 5 महीनों में 5 लोग गायब हो चुके थे। गेस्ट हाउस की रेपुटेशन खराब होने लगी। पुलिस की आंखों में भी शिवनाथ और गेस्ट हाउस चढ़ चुके थे। 
लोगों को गेस्ट हाउस की तरफ जाने में डर लगने लगा। टूरिस्टों का आना एकदम से कम हो गया। शिवनाथ परेशान हो गए। आखिर उन्होंने मन ही मन एक खतरनाक फैसला ले लिया... एक रात हंजा की झोपड़ी की तरफ  कुछ सांये धीरे धीरे बढ़ रहे थे। फूस की बनी झोपड़ी को आग लगा दी गयी। धधक उठी झोपड़ी।
उन लोगों ने सोचा झोपड़ी के साथ ही हंजा भी जल मरी होगी। लेकिन वो गलत थे। चीत्कार करती हुई जंगल की तरफ से दौड़ती हुई आई वो। जलती झोपड़ी की रोशनी में उसने शिवनाथ को पहचान लिया। 
""सेठ ... तूने मेरे साथ धोखा कियाssss... इसका अंजाम तू भुगतेगा... हाsssssss""

शिवनाथ के इशारे पर एक गुंडे ने बुढ़िया के सर पर सरिया दे मारा। फिर सब मिलकर टूट पड़े । किसी ने कुल्हाड़ी... किसी ने सरिया... किसी ने लाठियों से मार मार कर अधमरी कर दिया उसे। हंजा के मुंह से फुफकार और कराह निकल रही थी। 

""सेठ... तू भुगतेगा.... हर्रररsss.... तुझे भुगतना पड़ेगा..... हा ssss""

""इसे उठाकर जलती झोपड़ी में फेंक दो।"" शिवनाथ ने सख्ती से कहा।

हंजा को उठाकर जलती झोपड़ी में फेंक दिया गया। उसकी चीखें गूंज उठी। 

जंगल मे घटी यह घटना दबा दी गयी।
शिवनाथ के सर से बहुत बड़ा बोझ हट गया था। गेस्ट हाउस में काम शांति से चलता रहा। अभी भी टूरिस्ट बहुत कम आ रहे थे। शिवनाथ को भरोसा था कि समय के साथ सब ठीक हो जाएगा। 
छठे मास की अमावस्या आ गयी। गेस्ट हॉउस खाली पड़ा था। शिवनाथ रेस्टरूम में बैठे थे। मैं अपने क्वार्टर में था। मुझे नौकरी पर लगे दस दिन ही हुए थे। तुम्हारे पापा भी यहीं थे।
स्टाफ उस दिन छुट्टी पर था। रात के 10 बजे एकाएक माहौल में जैसे शैतानियत छा गयी। पास जंगल मे सियारों के रोने का शोर गूंज उठा।
 उस दिन पहली बार मुझे डर का एहसास हुआ था। मैंने मेरे कमरे का दरवाजा खोला।
 जाड़े की तेज ठंड थी। बाहर गेस्ट हाउस की एक बत्ती जल रही थी। तभी  एक चरमराहट के साथ गेस्ट हाउस की बड़ी फाटक खुली। अंधेरे में मुझे बस एक साया दिखा.... जो धीरे धीरे गेस्ट हाउस की तरफ बढ़ रहा था। मैं कांप उठा। हिम्मत कर के मैंने आवाज लगाई...""कौन है वहां??""
वो साँया ठिठका... और फिर से धीमी चाल से आगे बढ़ने लगा। मैं लाठी लेकर उसकी तरफ बढ़ा। वो साँया गेस्ट हाउस की लाइट की रोशनी में आ चुका था... मेरे होश उड़ गए... उसे देखकर.... ऐसा भयानक रूप मैंने किसी का नहीं देखा।।"

कहते हुए बूढ़े का गला सूख गया। आंखे डर से भर गई। ज़ुबान लड़खड़ाने लगी। 

"बिखरे सफेद बाल। जला हुआ सूखा चेहरा... जिस पर मानो दरारे चली हो... सफेद होठ... मुड़े हुए से हाथ - पैर...  लंबे नाखून... हाथों में एक लंबी सी लकड़ी।

जब मेरी नज़र उसके पैरों पर गयी तो मेरा खून सुख गया। उसके पैर बिल्कुल उलटे थे।

मेरे मुंह से चीख निकल गयी। मैं उसे पहचान गया... वो हंजा थी... वो अपना बदला लेने आई थी।

मैं उस से 10 हाथ दूर खड़ा था। लेकिन उसने वहीं खड़े खड़े अपने हाथ लम्बा कर के एक थप्पड़ जड़ा मेरे गाल पर... मैं उछल कर दूर जा गिरा और होश खो बैठा।चीख सुनकर सेठ शिवनाथ और तुम्हारे पापा दौड़ कर बाहर आये।
 बाहर गहरा सन्नाटा था। ठंडी हवा चीखती हुई बह रही थी। झींगुरों का शोर बिखरा था। दोनों धीरे धीरे मेरे क्वार्टर की तरफ बढ़े। मेरा कमरा खुला था। वो आगे बढ़े... मैं बेहोश पड़ा उन्हें दिख गया। शिवनाथ ने तुम्हारे पिताजी को पानी लाने को कहा। वो पानी लाने दौड़े। शिवनाथ मुझे होश लाने की कोशिश कर ही रहे थे कि पीछे से उनकी गर्दन पर एक शिकंजा से कस गया.....
वो चीख उठे। तुम्हारे पापा पानी लेकर दौड़े आये। लेकिन वो भयानक दृश्य देखकर वही जड़ हो गए। हंजा शिवनाथ को खींचते हुए गेस्ट हाउस से बाहर ले जा रही थी। मैं तब तक थोड़ा होश में आ गया था। तुम्हारे पिताजी सदमे में खड़े थे। फाटक के पास पहुंच कर हंजा ने मुड़ के देखा। उसके चेहरे पर एक भयानक हंसी थी। शिवनाथ को लेकर वो जंगलों में खो गयी। अगले दिन शिवनाथ की गर्दन कटी क्षत विक्षत लाश जंगल में मिली। उनका अंतिम संस्कार कर के तुम्हारे पिताजी गेस्ट हॉउस छोड़ कर शहर चले गए।
तब से ये गेस्ट हाउस मैं ही संभाल रहा हूँ। तुम्हारे पिताजी हर महीने मनी आर्डर कर देते हैं। गेस्ट हाउस हमेशा के लिए पूरी तरह बंद कर दिया गया। हंजा आज भी गुर्राती हुई इन जंगलों में भटक रही है। तुम्हारे इंतज़ार में। शिवनाथ सहित छः बलि वो ले चुकी थी। धीरे धीरे वो गेस्ट हाउस के आस पास आने वाले लोगों को शिकार बनाने लगी।  पहले बारह लोग बलि के लिए मार दिए उसने। फिर गुस्से और प्रतिशोध के लिए मारने 
लगी।"

कहते कहते बूढ़े का स्वर ठंडा पड़ने लगा। 
 

" हंजा आज भी यहीं जंगलों में गुर्राती हुई भटकती है..... बारह बलियों के बाद तेरहवीं बलि के इंतज़ार में।... और वो तेरहवीं बलि.... तुम हो। जब तक वो तुम्हारी बलि नहीं ले लेती उसका अनुष्ठान पूरा नहीं होगा।"
 सब को जैसे करंट लग गया हो 440 वाल्ट का। 

"ओह... तो इस लिए पापा मुझे मन कर रहे थे यहां आने से... काश मैंने उनकी बात मान ली होती।" प्रिया रोते हुए बोली। "लेकिन एक बात बताओ... तुम यहाँ इतने सालों से बचे हुए कैसे हो??? हंजा ने तुम्हे क्यों नहीं मारा बाबा???"
अरुण ने गंभीर स्वर में पूछा।


"क्योंकि......... मैं हंजा का बेटा हूँ। जब तक मैं उसका नुकसान ना करूँ... वो मुझे नहीं मारेगी।" बूढ़ा रुआंसी आवाज में बोल।

"क्या????? तुम हंजा के बेटे हो??!!" एक और झटका लगा सभी को। चोंकते हुए बोले सभी।

"हां... मैं हंजा का बेटा हूँ। शिवनाथ ने हंजा को मारने के बाद मुझे सहारा दिया। अपने उस पाप का प्रायश्चित वो अभी तक कर रहे हैं... मरने के बाद भी। उनकी इच्छानुसार ही तुम्हारे पापा अब तक मुझे मनी आर्डर करते रहे हैं।
 "लेकिन तुमने यहां आते ही हमे क्यों नहीं बता दी ये बात?? और अब अचानक इस वक़्त क्यों बता रहे हो?? इस डायन को रोकने का कोई तरीका नहीं है??" शिवा ने आतुरता से पूछा।


बूढा आगे बोला," तुम्हारे यहां आते ही मैंने तुम्हें ये सब बताना चाहा था। लेकिन हंजा की झलक ने मेरे होंठ सी दिए। मेरी जबान रोक दी उसने। लेकिन अब मैं उस से नहीं डरता। अब तक मैं उसे मां समझ कर सब कुछ सहता रहा। मैं उसे मां समझ कर उसके सभी अत्याचारों के प्रति आंखे बंद करके बैठा रहा। लेकिन तुम जैसी फूल सी बच्ची को मैं मेरी आँखों के सामने मरने नहीं दे सकता। शिवनाथ के कई एहसान है मुझ पर।
" मैं तुम्हे बताता हूँ... इस डायन जो कैसे रोका जा सकता है। लेकिन उसके लिए मौत के मुंह में जाना पड़ेगा।"

"अरे... मौत के मुंह में तो अभी भी खड़े हैं। तुम जल्दी बताओ। क्या करना होगा??" विवेक उत्तेजना में बोला।


"इस गेस्ट हाउस के बेसमेंट में हंजा के अवशेष गढ़े हैं। शिवनाथ ने अगले दिन उस जलती झोपड़ी से अधजली हंजा के अवशेष इस गेस्ट हाउस के बेसमेंट में गाड़ कर ठिकाने लगवा दिया। उन्हें निकाल कर उन पर ये अभिमंत्रित जल छिड़क देना। ये जल मैंने बड़ी मुश्किल से काशी जाकर कई प्रयासों के बाद एक सिद्ध तांत्रिक से प्राप्त किया था। लेकिन ये काम इतना आसान नहीं होगा।  हंजा तुम्हे ऐसा करने नहीं देगी... एक बार मैंने कोशिश की थी... अपनी माँ को मुक्ति दिलाने की। लेकिन उसने मेरा वो हाल किया कि मैं दोबारा ऐसी हिम्मत नहीं कर सका।" बोलते बोलते अचानक बूढ़े के मुंह नाक और कान से खून बहने लगा।

"आह... अब.... वो मुझे .... आह... नहीं छोड़ेगी... ! सच में डायन ही है वो... आह..."

खून की एक तेज उल्टी के साथ बूढा मर गया।


इसी के साथ गेस्ट हाउस में मानो भूचाल सा आ गया। कांच के दरवाजे खन खना के टूटने लगे। वो लोग कमरे से बाहर आ गए। फाटक खुली थी। शिवा ने सबको बाहर भाग जाने को कहा और खुद बूढ़े का दिया जल लेकर बेसमेंट की और भागा। बाकी सब बाहर भागने लगे। तभी फाटक पर भयानक रूप लिए अनु प्रकट हो गयी। उसकी दहकती लाल आंखे और भयानक शक्ल ने सबके पांव रोक दिए। डरावनी हंसी हंस रही थी अनु। 
अचानक तेजी से उड़ती हुई आई अनु उनकी तरफ... और अरुण को दबोच लिया। बाकी सब भाग छूटे। अरुण ने प्रतिरोध किया लेकिन उस भयानक चुड़ैल के आगे उसकी क्या चलती!!?? नोंच डाला उसने अरुण को। अब वो उन सबकी तरफ पलटी। सब लोग फाटक से बाहर भाग गए थे। लेकिन जंगल में उन पर खतरा और ज्यादा मंडरा रहा था।
विवेक, रोशन, प्रिया और गिरिजा अब जंगल में दौड़े जा रहे थे।

"हे भगवान... बस एक बार यहां से निकल जाए... बस एक बार यहां से निकल जाएं..." 

लेकिन वहां से निकल पाना नामुमकिन था। चारों थक कर एक जगह कुछ देर के लिए रुके। घोर अंधेरा फैला था चारों ओर। विवेक के पास माचिस थी। उसने तीली जलाई। अचानक उस तीली की रोशनी में उसे अनु की भयानक शक्ल दिखी। एकदम चेहरे के सामने। उसके आस पास कोई नहीं था। वो अकेला था। दिमाग भन्ना गया उसका.."इतनी देर से मैं किसका हाथ पकड़े दौड़ रहा था???... बाकी तीनों कहाँ चले गए??" बस इतना ही सोच पाया वो। फिर अनु ने उसको मौका नहीं दिया। जंगल में उसकी चीख गूंज उठी। इधर वो तीनों भी हैरान थे.."ये.. ये विवेक कहाँ चला गया। अभी तो अपने साथ ही दौड़ रहा था। कहीं भटक तो नहीं गया। हे भगवान अब क्या होगा??"
इधर शिवा अपनी जान दांव पर लगा कर बेसमेंट की तरफ बढ़ रहा था। डायन हंजा को इसकी भनक लग चुकी थी। 

उधर जंगल में रोशन, प्रिया और गिरिजा बदहवास से खड़े थे। तभी विवेक की गर्दन पर दो भयानक पंजे कस गए। उसके मुंह से घुटी हुई सी चीख निकली। नाखून उसकी गर्दन में पैवस्त हो गए। 

"ही ही ही ssssss...." भयानक हंसी के साथ अनु ने एक झटके में रोशन की गर्दन तोड़ दी। ये दृश्य देख कर चीख पड़ी प्रिया और गिरिजा। अगले ही पल अनु ने प्रिया को दबोच लिया। वो उसे घसीट कर जंगल में बने बड़े टोटके की तरफ घसीटने लगी। उसके मुंह से भयानक गुर्राहटें निकल रही थी। गिरिजा चिल्लाते हुए  वापस गेस्ट हॉउस की तरफ भागी। 

इधर शिवा बेसमेंट में जा पहुंचा । उसके पीछे पीछे दो भयावह उल्टे पैर भी गेस्ट हाउस के बेस मेन्ट की तरफ बढ़ रहे थे। अब उसे ये देखना था कि हंजा कहाँ दफन थी। बेसमेंट में पड़ी एक कुदाल लेकर बूढ़े के बताई जगह पर खोदने लगा वो। तभी एक खतरनाक गुर्राहट ने उसके हाथ रोक दिए। हंजा वहां पहुंच चुकी थी। ठीक शिवा के पीछे। शिवा भय से जड़ हो गया। 





"ही ही ही ही हीssss..." भयानक हंसी के साथ हंजा शिवा की तरफ बढ़ी। डर के मारे शिवा ने उस पर कुदाल फेंक मारी। कुदाल हंजा की छाती में जा धंसी। लेकिन वो नहीं रुकी। उसके पंजे शिवा की गर्दन की तरफ बढ़ने लगे। जैसे ही हंजा के भयानक पंजे शिवा के गले से टकराए एक झटका खा कर पीछे जा उछली हंजा। 
"गुर्रर्रर्ररsss..... " तेज गुर्राहट के साथ उठ खड़ी हुई वो।
 शिवा भी आश्चर्य सेआंखे फाड़े वो दृश्य देखता रह गया। उसे अचानक ध्यान आया कि उसके शर्ट के नीचे गले में हनुमान
 लॉकेट डाला हुआ है। उसकी हिम्मत बंध गयी। आज उसकी भक्ति उसकी रक्षक बन गयी थी।


इधर अनु प्रिया को घसीटते हुए बलि स्थल पर ले आई थी।
 बेसमेंट में शिवा अब गड्ढे में टटोल रहा था। तभी उसके हाथ कुछ लगा और उसने उसे खींच लिया बाहर। हंजा का कंकाल आ बाहर गिरा। 

"हर्रर्रररsssssss..." फुफकार उठी डायन... ।

चीखते हुए झपट पड़ी फिर से शिवा पर। शिवा ने अगले ही पल अभिमंत्रित जल छिड़क दिया उन अवशेषों पर।


 इधर प्रिया की बलि चढ़ाने वाली थी। अनु उसे पैर के नीचे दबाए गंडासा हवा में उठा चुकी थी। अगले ही पल प्रिया का सर धड़ से जुदा हो जाना था। लेकिन अभिमंत्रित जल के असर से हंजा की शक्तियां नष्ट हो चुकी थी और उसकी आत्मा एक झमक के साथ अपने सफर पे चल पड़ी। वहीं अनु के हाथ से गंडासा छूट गया.. और उसका मुर्दा जिस्म लहरा के गिर पड़ा।
प्रिया हतप्रभ सी रह गयी उस वीराने में। धीरे धीरे उठी वो और डरते डरते गेस्ट हाउस की तरफ बढ़ चली।
हंजा के नष्ट होते ही अनु का जिस्म भी उसकी शक्ति से मुक्त हो गया जिसे उसने मार कर अपने वश में किया था।
 गिरिजा तब तक गेस्ट हाउस पहुंच चुकी थी। शिवा बेसमेंट से बाहर आया। गिरिजा दौड़ कर उस से लिपट गयी। दोनों एक दूसरे को संभाल रहे थे। तभी प्रिया लड़खड़ाती हुई गेस्ट हाउस की तरफ आती दिखाई दी। तीनों कुछ देर के लिए वहीं बैठ गए। प्रिया रोये जा रही थी। खुद को कोस रही थी... कि उसकी एक गलती से उसने पांच दोस्तों को खो दिया।।

भोर का उजाला अंधेरे को चीरता हुआ फैल रहा था। कोहरे की परतों में लिपटा वो शापित गेस्ट हाउस अब एकदम शांत हो चुका था। 

सुबह तीनो पुलिस स्टेशन जा पहुंचे। पुलिस ने अपनी कार्रवाही शुरू कर दी। लेकिन इस कहानी पे भरोसा करना पुलिस के लिए संभव नहीं था। 



समाप्त।।

Tuesday, 31 October 2023

तेरहवीं बलि




कहानी में दिए गए नाम और जगह का वास्तविकता से कोई सम्बन्ध नहीं है। यदि ऐसा होता है तो केवल संयोग होगा।




सन 1990





राधानगर की नामी 'विद्याधर कॉलेज' की शानदार केंटीन में बैठे फाइनल ईयर के 8 दोस्त... अरुण, सुमन, विवेक, अनु, रोशन, प्रिया, शिवा और गिरिजा। मस्ती का माहौल था। तभी विवेक बोला... "दोस्तों.... परसों से अपनी सर्दियों की छुट्टियां होने वाली है.. क्यों न इस बार कहीं घूमने का प्रोग्राम बना लिया जाए??"

सभी चहक पड़े। "अरे हां यार... विचार तो अच्छा है।"

"लेकिन चले कहाँ??" अनु ने पूछा।

विवेक - "सर्दियों का मौसम है। किसी हिल स्टेशन पे तो चलना बेकार है।"
"मेरे पास एक आईडिया है। क्यों न हम मोहर गढ़ चलें। वहां हमारा एक गेस्ट हाउस भी है। मजे से रहेंगे कुछ दिन।" प्रिया बोली।

अरुण- " लेकिन ये मोहर गढ़ है कहाँ??"

प्रिया - " राजस्थान में । प्रकृति की गोद में बसा एक प्यारा सा गांव। अच्छा टूरिस्ट प्लेस है। दादाजी ने कभी गेस्ट हाउस बनवाया था...पहले अच्छा चलता था। फिर अचानक न जाने क्यूँ... बन्द हो गया। पापा को अपने बिज़नस के आगे फुर्सत ही नहीं उसे संभालने की।

एक आदमी रखा हुआ है जो उसकी देखभाल करता है। मैं भी कभी गयी नहीं लेकिन सुना है बहुत खूबसूरत जगह है। इस बार चलते हैं। अच्छा लगेगा।"

 सुमन- " ठीक है .. तू इतना कह रही है तो चलते हैं। देखते हैं... कैसा है तेरा मोहर गढ़।"

प्रिया - "तो फिर डन... 4 दिन का टूर बना लेते हैं।"

"डन" सबने एक साथ बोल दिया।
"मैं आज ही पापा से बात करती हूँ।" प्रिया उत्साह के साथ बोली।

प्रिया के घर.... "पापा आपसे कुछ बात करनी है।" 

"क्या बात है बेटे?? बोलो ना।"

"हम कुछ दोस्त 3-4 दिन के लिए घूमने जाना चाहते हैं।"

"तो जा आओ ना। वैसे भी  तुम्हारे अब  छुट्टियां होने वाली है। घूम आओ। वैसे कहाँ जाने का प्रोग्राम बना है??"

"मोहर गढ़ जाने का। अपना गेस्ट हाउस भी है ना वहां!!? वहीं रह लेंगे कुछ दिन।"

"मोहर गढ़??...." प्रिया के पिताजी के चेहरे पर खौफ से छा गया।

"क्या हुआ पापा??"

"अरे कुछ नहीं बेटे... तू वहां जा के क्या करेगी?? कहीं और अच्छी जगह घूम आओ। वैसे भी अब उस गेस्ट हाउस में कुछ नहीं रखा।"

"लेकिन पापा ... मैंने तो अपने दोस्तों से वादा भी कर लिया।।" प्रिया उदास हो के बोली।

"मैंने बोल दिया ना... वहां नहीं जाना बस..."

"आखिर क्यों???... क्या हो जाएगा वहां जाने से???"
"तू नहीं समझती बेटी... कुछ बातें बिना सवाल किए मान लेनी चाहिए।"

"ठीक है पापा..." प्रिया बुझे मन से वहां से चली गयी।

"मालिक.... आप प्रिया बेटी को सब कुछ बता क्यों नहीं देते??" हरखू काका ने पूछा।

हरखू काका प्रिया के दादा के वक़्त से इस घर का ईमानदार नौकर था। 

"नहीं काका... प्रिया को मैं वो सब बता के परेशान नहीं करना चाहता। मैं खुद उस भयानक रात को नहीं भूल पा रहा। जब भी मोहर गढ़ का नाम सुन लेता हूँ तो वो भयानक मंजर आंखों के सामने आ जाता है... और मैं दहल जाता हूँ।" प्रिया के पिताजी विचारों में खोते हुए बोले।

"लेकिन मालिक.... अचानक प्रिया बेटी की ज़बान पर मोहर गढ़  का नाम आया कैसे?? वो तो कभी गयी ही नहीं वहां???"

"यही बात तो मुझे परेशान कर रही है। इसको बस इतना पता है कि वहां हमारा एक पुराना सा गेस्ट हाउस है... न वो कभी वहां गयी... और ना ही उसके सामने कभी इसका ज्यादा जिक्र हुआ... फिर अचानक इसके मन में ये बात आई कैसे??"



"कहीं 'वो' उसे बुला तो नहीं रही मालिक... आपके पिताजी का किया सौदा आज भी 'उसको' याद होगा शायद।"

"नहीं नहीं काका... ऐसी बातें मत बोलो... मैं प्रिया को नहीं जाने दूंगा। मोहर गढ़ का नाम भी नहीं लिया जाएगा अब इस घर में ।
प्रिया के पिताजी बहुत ज्यादा चिंता में पड़ गए। रात दस बजे उन्होंने प्रिया के कमरे में झांक कर देखा। वो सो रही थी। उन्होंने दरवाजा बन्द किया और जाकर सो गए। लेकिन आंखों में बेचैनी साफ झलक रही थी।
अगले दिन प्रिया उठी.... कॉलेज गयी।  
कॉलेज में....
"प्रिया कल का प्रोग्राम फिक्स है ना... मैंने तो परमिशन ले ली है।" सुमन चहकते हुए बोली।

प्रिया - " हाँ.. हाँ... फिक्स ही समझो।" प्रिया ने सोचा घर जा के एक बार फिर से पापा से बात कर लेगी... और उन्हें मना लेगी।

सब बहुत खुश थे। अगले दिन से छुट्टियां शुरू हो रही थी। 

प्रिया घर लौटी... उसके पिताजी घर पे नहीं थे।
"हरखू काका... पापा कहाँ है?" प्रिया ने घर आते ही पूछा।
 "बेटी वो तो आज सुबह ही कलकत्ता चले गए।  अचानक कोई बिजनस मीटिंग आ गयी।"

" ओह.... कब तक आएंगे वापस??"

"पता नहीं बेटी... 4-5 दिन का कह कर गए थे।"

'अरे वाह... फिर तो मैं 2-3 दिन टूर बना ही लेती हूँ मोहर गढ़ का।' प्रिया ने मन ही मन सोचा।

तभी हरखू काका बोल पड़ा '" लेकिन बेटा...मालिक ने आपके लिए साफ कहा है कि आपको मोहर गढ़ ना जाने देना है।"

"अरे काका मैं नहीं जाऊंगी मोहरगढ़...  मैंने अपने दोस्तों के साथ कहीं और जाने का प्लान बना लिया है।"

हरखू काका ने भी चैन की सांस ली।

अगले दिन प्रिया ने अपना बैग पैक किया और निकल गयी रोशन के घर की तरफ।

सबको रोशन के घर ही पहुँचना था । सब समय पर पहुंच गए थे लेकिन शिवा नहीं आया। 
"ओफ्फो... अब ये शिवा कहाँ रह गया।??" रोशन झल्लाते हुए बोला।
"अरे भाई वो बजरंग बली का भक्त है। मंदिर जा के आएगा।" विवेक हंसते हुए बोला।
तभी शिवा आता दिखाई दिया।
"आ गए भक्त महाराज?? अब चलें??" अरुण बोला।
"हां.. हां.. चलो।" शिवा गाड़ी में बैग रखते हुए बोला।

सभी रोशन की हंटर जीप में मोहर गढ़ की तरफ रवाना हो गए सब। 
"पापा की इजाज़त लिए बिना जाना अच्छा नहीं लग रहा। लेकिन दोस्तों कर सामने बोल कर मुकरना भी मुश्किल था। वैसे भी 3 दिन में वापस आ जाएंगे। पापा को पता भी नहीं चलेगा... और बाद में कभी पता चल भी जाएगा तो मना लुंगी।" इन्हीं विचारों में खोई थी प्रिया कि तभी.. अनु उसे झकझोरते हुए बोली..."लो... टूर की प्लानिंग करने वाली ही गुमसुम बैठी है... ऐसे कैसे चलेगा??!!"

प्रिया मुस्कुरा दी।

8 घंटे का सफर तय कर मोहर गढ़ पहुंच गए सभी। 

"वाहssss... क्या नज़ारा है।


"कितनी प्यारी जगह है।"

"गेस्ट हाउस कहाँ है प्रिया?? वहां जाने का रास्ता कौनसा है??"
 "ये तो मुझे भी नहीं पता। किसी से पूछ लेते हैं।"

सड़क पर चलते एक बुजुर्ग गड़रिये से उन्होंने गेस्ट हाउस का पता पूछा।
"काका जी .. यहां 'मिलन गेस्ट हाउस' जाने का रास्ता कौनसा है?"

'मिलन गेस्ट हाउस' नाम सुनते ही गड़रिये के चेहरे पर भाव बदल गए। उसने कुछ नहीं पूछा। शायद कुछ पूछना चाहता था। मगर जबान बन्द हो गयी। आंखे पथरा गयी। मानो किसी के वशीभूत हो गया हो। बस अंगुली उठी एक पहाड़ी की ओर।
 "ओह.. धन्यवाद काका...!" कहते हुए रोशन ने जीप को पहाड़ी वाली सड़क पर डाल दिया। 
रोमांचक पहाड़ी रास्ता था.... बल खाती सड़क...पेड़ों के झुरमटो से ढका... मनमोहक। 
पहाड़ी पर पहुंचते पहुँचते गेस्ट हाउस नज़र आने लगा था। गांव से बाहर... एकांत में प्रकृति के बीच... बहुत सुहाना लग रहा था।"
गेस्ट हाउस के बाहर जीप रुकी। सब नीचे उतरे। सालों से बंद पड़ा गेस्ट हाउस मानों मुस्कुरा उठा। लोहे की सफेद रंग की जंग लगी भारी भरकम फाटक बंद पड़ी थी... छोटे छोटे पौधों और बेलों से जाम।
"यहां कोई है?? प्रिया तुमने तो कहा था कि एक आदमी इसकी देखभाल के लिए रखा है!! कहाँ है वो??" गिरिजा ने पूछा।

प्रिया - "आवाज लगा के देखो ना। शायद आ जायेगा।" 

 अरुण ने पास में लगी छोटी फाटक के पास जाकर फाटक बजाते हुए तेज आवाज लगाई... 
"कोई हैssssss...??"

आवाज सुन कर गेस्ट हाउस के एक सर्वेंट क्वार्टर का दरवाजा खुला। एक बूढ़ा आदमी कंबल डाले बाहर निकला। लंबी दाढ़ी... पतला दुबला... कमजोर सा.. ।

"कौन???" फाटक के पास आकर उसने धीमे से पूछा।

बूढा उन्हें ऐसे देख रहा था मानो इंसान पहली बार देख रहा हो।

"फाटक खोलो बाबा... मैं राधानगर वाले शिवनाथ जी की पोती हूं।" प्रिया आगे आते हुए बोली।

"ओह... शिवनाथ जी.... " बूढा बुरी तरह चोंकते हुए बड़बड़ाया।

"हाँ... हम कुछ दिन यहां ठहरने के लिए आये हैं। 2-3 दिन रहेंगे। फिर लौट जाएंगे।"

"तुम्हें यहां... नहीं आना चाहिए था... बेटी..." बूढा फाटक खोलते हुए खरखराती आवाज में बोला।

"क्यों... यहाँ कोई कर्फ्यू लगा है??" अनु हंसते हुए बोली।
सब अंदर चले गए।

गिरिजा - "वाह... गेस्ट हाउस तो बहुत अच्छा है प्रिया... बाबा ने देखभाल तो बड़ी अच्छी की है। गार्डन.. लॉन.... सबकी बढ़िया केअर की है।"


बूढ़े ने सबको रेस्ट रूम में बिठाया।

"सालों बाद कोई इस गेस्ट हाउस में आया है। आपको किसी ने रोका नहीं यहां आने से??" बूढा फिर से धीमे स्वर में बोला।

"नहीं... हमे कोई क्यों रोकेगा। वैसे बाबा .. इतनी बढ़िया लोकेशन पर बना ये खूबसूरत गेस्ट हाउस वीरान क्यों पड़ा है??" प्रिया ने हैरानी से पूछा।"


 बूढ़े ने कोई जवाब नहीं दिया। उनके लिए चाय नाश्ते की व्यवस्था करने चला गया। थोड़ी देर बाद चाय पीते पीते सब बतिया रहे थे। तब बूढा बोल पड़ा... "बिटिया... दिन ढलने से पहले आप लोग वापस लौट जाइये। आपका यहां रहना ठीक नहीं। इस से पहले कि आप पर कोई मुसीबत आये... फौरन लौट जाइये।"

विवेक चिढ़ कर बोला - "अरे... ये क्या बात हुई यार... लौट जाएं??? अभी तो आये हैं।... प्रिया... ये क्या बोल रहा है??। लगता है इसको अपना यहां आना पसंद नहीं आया। इसके आराम में खलल जो पड़ गया।"
प्रिया का माथा ठनका... "घर पे पापा बोल रहे थे कि यहां नहीं आना... अब ये बूढा बोल रहा है कि यहां नहीं आना चाहिए था... आखिर कैसी मुसीबत आ सकती है मुझ पर... कहीं दादाजी और पापा का कोई दुश्मन तो नहीं है इस गांव में??!!" प्रिया अब गंभीरता से सोचने लगी।

उसने बूढ़े से पूछा - "बाबा आखिर यहां ऐसा क्या है?? क्या मुसीबत आ सकती है यहां?? इतना सुहाना शांत गेस्ट हाउस है। कोई जानता भी नहीं मुझे यहाँ। फिर आप ऐसी बातें क्यों कर रहे हैं??"

बूढा कुछ बोलने वाला था... लेकिन एकाएक उसके भी चेहरे के भाव बदल गए...जबान बन्द हो गयी... आंखे पथरा  गयी.... मानो वशीभूत हो गया..   ठीक उस गड़रिये की तरह। वो चुपचाप उठा और सधे कदमों से सर्वेंट क्वार्टर में चला गया।
सब अचरज में पड़ गए बूढ़े का ये व्यवहार देख कर।
शिवा - "यार ये बूढा बड़ा अजीब है...???"

"अरे ... छोड़ो इस बात को। चलो अपने-अपने रूम पर कब्ज़ा कर लो। बहुत थक चुके है सब। थोड़ा आराम कर के फिर डिसाइड करते है कि 3 दिन क्या करना है??"

"ओ के... मैं तो लॉन के सामने वाला रूम लुंगी... बड़ी पसंद आई है ये जगह मुझे।" कहते हुए सुमन उस रूम की तरफ दौड़ पड़ी।

सब आराम करने चले गए। सीधे शाम को उठे। बूढ़े ने तब तक फिर से चाय नाश्ता तैयार कर रखा था।

बाहर लॉन में टेबल लगवा दी गई। शाम की चाय पीते हुए प्रिया ने बूढ़े से पूछा - "बाबा आप यहां कब से हैं??"


"बेटी......  जब से ये गेस्ट हाउस बना तब से मैं यहीं हूँ। 40 साल हो गए इसको संभालते संभालते।"

अनु - "ये गेस्ट हाउस इतना वीरान क्यों पड़ा रहता है बाबा?? यहां कोई आता जाता क्यों नहीं??"

"पहले बड़ी चहल पहल रहती थी यहां.. लोगों को कमरे तक नहीं मिलते थे रहने को। सब बुक हो जाते थे। लेकिन...."

"लेकिन क्या बाबा??"

बूढा एकाएक फिर जड़वत हो गया। बिना कोई जवाब दिए सम्मोहित सा एक ओर चला गया। 

"ये बूढा सच में सनकी सा हैं बोलते बोलते कहाँ खो जाता है?" अरुण ने मजाक उड़ाते हुए बोला।
गिरिजा - "अरे प्रिया... आज डिनर का क्या प्रोग्राम है??" 

सुमन- "क्यों न खाना हम सब मिलकर बनाएं??!!... मजा आएगा।"

अरुण - "हाँ... ठीक है... यही करते हैं। आज खाना हम ही बना लेंगे।"

"इसके लिए तैयारी करनी पड़ेगी। खाना आज बाहर चूल्हा बनाकर बनाएंगे। लकड़ियां चाहिए होंगी। बाकी सामान बाबा से ले लेंगे।" प्रिया चहकते हुए बोली।

अरुण और विवेक लकड़ियां इकठ्ठी करने चले गए। शिवा और रोशन चूल्हा तैयार करने में लग गए और लड़कियां खाने की तैयारी में लग गयी।
 अरुण और विवेक बाहर जंगल में....

"यार अरुण... कुछ भी कहो ये जगह है बड़ी खूबसूरत। गांव से बाहर जंगल में... एक दम शांत वातावरण... और प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर।"

"हां यार... जगह तो अच्छी है.. लेकिन इतनी बढ़िया जगह पे बना गेस्ट हाउस भी वीरान पड़ा है... ये बात समझ में नहीं आई।"
सुखी लकड़ियों की तलाश में दोनों थोड़ा दूर निकल आये थे। तभी विवेक की नज़र एक आश्चर्यजनक चीज़ पर पड़ी।  एक पेड़ के नीचे कुछ अजीब आकृति बनी थी। छोटे - छोटे पत्थरों से बना एक घेरा... उस पर बिखरे काले तिल.... कौव्वे के पंख... और उस पर छिड़के हुए खून के छींटे.... पसीने छूट गए विवेक के... ये दृश्य देख कर।
उसने अरुण को जोर से आवाज लगाई...
" अरुणssss... ये देखो यहाँ क्या बना है???"

अरुण दौड़ते हुए आया-" हाँ यार.. ये तो कोई टोटका या तांत्रिक अनुष्ठान जैसा कुछ लगता है।"

विवेक - " यहाँ ज्यादा रुकना ठीक नहीं अरुण... चलो यहाँ से चलते हैं।"


दोनों फटाफट वहाँ से निकल लिए। गेस्ट हाउस पहुंचे तब तक तैयारी हो चुकी थी। सर्दियों की ठंडी शाम शुरू हो चुकी थी। हल्का अंधेरा फैल चुका था। आग जला कर सब अलाव तापते हुए मजे से खाना बना रहे थे। ।

वो बूढ़ा भी वहीं बैठा था और उनका सहयोग कर रहा था। 

सभी लोग आग के चारों ओर बैठ कर खाना खाने लगे। तब विवेक ने बूढ़े से उस चीज़ के बारे में पूछ लिया... जो उसने जंगल में देखी थी।

बूढ़ा एकाएक भयभीत हो कर बोला... "आपने जंगल में वो टोटका देखा??" 

विवेक - "हां बाबा लगता है किसी सरफिरे की हरकत है।"

"नहीं नहीं.... ये तो..." कहते कहते बूढा फिर से चुप हो गया। किसी पुतले की तरह उठा वो... और खाना बीच में ही छोड़ कर अपने कमरे में चला गया।

"अरे यार इसकी बीमारी क्या है?? ये बोलते बोलते कहाँ चला जाता है .. बात अधूरी छोड़ के??" शिवा हैरानी से बोला।

रोशन - "छोड़ो यार... खाने पे ध्यान दो... क्या टेस्टी खाना बना है।"
खाना खा कर थोड़ी देर बाद सब अपने अपने कमरे में सोने चले गए। ठंड कड़ाके की थी। 

तभी प्रिया के कमरे के बाहर दस्तक हुई। 

"कौन??" प्रिया ने अंदर से पूछा।

"मैं हूं... अनु.."

प्रिया ने उठकर दरवाजा खोला। 
"क्या हुआ अनु??"
"यार प्रिया मुझे अकेले सोने में डर लगता है.. मैं तेरे कमरे में सो जाऊँ??"

"ठीक है... सो जा... डरपोक कहीं की!!" प्रिया हंसते हुए बोली।
गेस्ट हाउस की बत्तियां बुझ चुकी थी। गहरा अंधेरा छाया हुआ था चारों ओर। सुनसान इलाके में अंधेरे डूबा वो गेस्ट हाउस दिन में जितना सुहावना लग रहा था... उतना ही डरावना और भुतहा लग रहा रहा था। बूढा अभी भी आग के पास बैठा था। आज की रात वो सो नहीं पा रहा था... मानो किसी अनहोनी का इंतज़ार था उसे।
घड़ी की सुइयां दौड़ती हुई 11:30 तक पहुंच चुकी थी। बूढा उठा... गेस्ट हाउस का एक चक्कर लगाया... और अपने कमरे में चला गया।

गेस्ट हाउस पूरी तरह शांत हो चुका था। रेस्ट रूम में घड़ी की टिक टिक साफ सुनाई पड़ रही थी। ठीक बारह बजे.... थोड़ी दूर बने घंटाघर में बारह घंटे बजने का स्वर गूंज उठा। हर एक घंटे के साथ गेस्ट हाउस की तरफ आफत बढ़ी आ रही थी। बारहवें घंटे की आवाज थमते ही... गेस्ट हाउस की  जाम हुई बड़ी फाटक एक चरमराहट के साथ खुल गयी। सब नींद में डूबे थे।सिर्फ रेस्ट रूम के बाहर एक छोटी बत्ती जल रही थी। सन्नाटे में डूबे गेस्ट हाउस में लकड़ी के सहारे चलती पदचाप गूंजने लगी। तभी सुमन की नींद खुल गयी। 

बाहर हुई आहट सुनकर वो चौंक गई।
 उसने सधे कदमों से चलते हुए धीरे से दरवाजा खोला। बाहर झांक के देखा...  दूर बरामदे में सीढ़ियों में बैठी अनु रो रही थी।





वो बाहर आई...
"अनु.... तू यहां क्या कर रही है... और ... और ... रो क्यों रही है।??.. इधर देख... मेरे सामने।"
अनु ने जैसे ही सर उठाया... सुमन की चीख निकल गयी। भयानक शक्ल लिए अनु धीरे धीरे उठने लगी.... उसका हुलिया देख कर सुमन के होश उड़ गए.... कटा फटा चेहरा... नुकीले दांत... लंबे नाखून... मानो कोई शैतानी ताक़त उस पर हावी हो चुकी थी....

सुमन चीखते हुए अपने कमरे की तरफ दौड़ी....




                               आगे जारी है....


अनु को क्या हुआ था???
क्या सुमन उसके हाथों से बच सकी???
क्या गेस्ट हाउस में आये लोग इस मुसीबत से बच सकेंगे??
आखिर क्या रहस्य था उस गेस्ट हाउस का??

सभी रहस्यों से पर्दा उठेगा अगले अंक में।

तब तक के लिए विदा.....













Tuesday, 12 September 2023

गढ़ी का रहस्य

                          गढ़ी का रहस्य


इस कहानी का किसी जीवित या मृत व्यक्ति से कोई सबन्ध नहीं है। अगर ऐसा होता है तो केवल संयोग माना जायेगा।

सन 1989..

गगन और राजन दोनों पक्के दोस्त थे।दोनों ने 12 वीं कक्षा की परीक्षा दे दी। अब गर्मी की छुट्टियों का प्लान तय कर रहे थे। 
गगन - " मैं तो इस बार पापा से ज़िद कर रहा हूँ कि मुझे किसी हिल स्टेशन पे जाने की अनुमति दे दें। गर्मियों से राहत पाकर सुकून से कुछ दिन ठंडे इलाके में घूमना चाहता हूँ। वैसे तू क्या सोच रहा है इस बार???"
राजन - "यार मैं तो हर बार कहीं न कहीं जाता ही रहा हूँ घूमने। इस बार नानी के गांव जाने का मन कर रहा है। कई साल हो गए गांव गए हुए।" 

"अच्छा ... वैसे तेरा ननिहाल है कहाँ?" गगन ने पूछा।

"चन्दनगढ़.... पहाड़ों की तलहटी में बसा दुनियां से कटा एक सुंदर सा शांत पहाड़ी गांव।" राजन ने जैसे गांव की यादों  में खोते हुए कहा।

फिर अचानक बोल पड़ा राजन "यार गगन... तू भी मेरे साथ ही चल न इस बार। बड़ा मजा आएगा। मेरे नाना गांव के जमींदार हैं। रहने को बढ़िया सी गढ़ी (गढ़ का छोटा रूप)  है। खेत हैं। 20-25 दिन मजे से रहेंगे। नानी बहुत लाड़ प्यार से रखेगी।"

गगन - " तेरी बातों ने तो मुझे भी मोह लिया यार... तू एक बार अपने पिताजी से अनुमति ले ले। मैं चलने को तैयार हूं।"

दोनों को जाने की अनुमति मिल गयी। दोनों को लिए ट्रेन चल पड़ी चन्दनगढ़ की ओर। 
रात को 9 बजे  राजपुर स्टेशन पर उतरे दोनों। यहां से चन्दनगढ़ के लिए कोई तय साधन नहीं था। किसी की बैलगाड़ी, घोड़ागाड़ी से ही मदद मिल सकती थी। 
उन्हें वहां कोई साधन नहीं दिख रहा था। 
"अरे यार.. तुमने अपने नाना को आने की खबर नहीं दी थी क्या? कम से कम कोई बग्घी ही भेज देते हमे लेने के लिए" गगन परेशान स्वर में बोला।

राजन मुस्कराते हुए बोला- " मैं नाना नानी को सरप्राइज  देना चाहता हूँ गगन। इतने सालों बाद वो मुझे अचानक सामने देखकर पहचानेंगे या नहीं!!? ये भी देखना है मुझे।"

गगन (मुंह बनाते हुए) -" तुम्हारे सरप्राइज के चक्कर में परेशानी में पड़ गए न अब!!?" 

पास ही लगी एक छोटी सी चाय की थड़ी पर बैठे एक बूढ़े से उन्होंने चन्दनगढ़ के लिए साधन का पूछा। चन्दनगढ़ का नाम सुनते ही चाय वाले बूढ़े के मुंह पर सफेदी छा गयी। गंभीर स्वर में बोल पड़ा वो बूढा " बाबूजी... इस वक़्त आपको चन्दनगढ़ जाने की क्या सूझ गयी?? कहाँ से आये हो आप लोग?? किसके यहां जाना है???"
दोनों को बूढ़े का व्यवहार और सवाल अजीब से लगे। इस से पहले कि दोनों कोई जवाब दे पाते ... पीछे से किसी ने आवाज लगाई उन्हें।
" कहाँ जाना है बाबूजी??" एक तांगे वाला खड़ा था।
दोनों बूढ़े को छोड़ कर उसकी तरफ चले गए।
"चंदनगढ़ जाना है भैया.. चलोगे??" दोनों एक स्वर में बोल पड़े।



"तांगे वाला चन्दनगढ़ का नाम सुन कर सकपका गया लेकिन सवारी नहीं छोड़ना चाहता था। वो बोला " बाबूजी, इस वक़्त आपको चन्दनगढ़ का कोई साधन नहीं मिलेगा। आपको रात को यहीं रुकना पड़ेगा। कहीं रुकने का इंतज़ाम न हो तो मैं करवा सकता हूँ।"

दोनों काफी निराश हो चुके थे। लेकिन तांगे वाले पर भरोसा करना ठीक नहीं लगा उन्हें। रात स्टेशन पर बिताना ही ठीक समझा उन्होंने। जैसे तैसे रात बिताई दोनों ने। सुबह की चहल पहल ने उन्हें जगा दिया। दोनों को चंदन गढ़ के लिए एक बैलगाड़ी मिल गयी। पीछे बैठे दोनों बतियाते हुए सफर काटने लगे। 
गगन - " राजन तुमने गौर किया?? लोग चन्दनगढ़ का नाम सुनकर थोड़ा घबरा रहे थे।!?"
राजन - " हां यार.. पता नहीं क्या वजह हो सकती है!?"
"ये तो चन्दनगढ़ जाकर ही पता लगेगा अब" गगन बोला।

बातों बातों में 8 किलोमीटर का सफर कब कट गया पता ही नहीं चला।

" लो बाबूजी आ गया चन्दनगढ़।" बैलगाड़ी वाला बोला।

दोनों अपना सामान लेकर गढ़ी की तरफ जाने वाले रास्ते पर उतर गए।
गढ़ी गांव से थोड़ा बाहर छोटी सी पहाड़ी नुमा टेकरी पर बनी थी।
चढ़ने के लिए बड़े बड़े पत्थरों की सीढ़ियां बनी थी। लेकिन सड़क से देखने से लग रहा था जैसे गढ़ी एकदम सुनसान, वीरान पड़ी हो। ना कोई चहल पहल... ना कोई आवाज।। एकदम सन्नाटा। 
गगन - " यहां कोई रहता भी है??"
राजन आश्चर्य चकित था  -" यार.. कोई दिख ही नहीं रहा। वरना यहां तो बड़ी चहल पहल रहती है।"
गगन राजन को चिढ़ाते हुए बोला -"अरे भाई तू अपने नाना नानी को सरप्राइज देने आया है या मुझे??"

राजन - "यार बड़ी गलती हो गयी। कम से कम एक चिट्ठी डाल देनी चाहिए थी। इतने सालों बाद आया हूँ। सब काफी बदल गया है। माँ ने भी कभी कुछ बताया नहीं। चलो गांव में चलते हैं वहीं पूछ लेंगे।"

दोनों पैदल ही गांव की तरफ बढ़ गए। थोड़ी ही देर में गांव में पहुंच गए वो।

गांव में किसी से पूछा "जमींदार साब कहाँ रहते हैं?"
उसके बताए पते पर पहुंच गए दोनों। गांव का सबसे आलीशान मकान था वो। बड़ी सी कोठीनुमा हवेली । 
जमींदार  महेन्द्र प्रताप सिंह की हवेली। राजन को देखकर बड़े आश्चर्यचकित हो गए उसके नाना और नानी। खूब प्यार से आवभगत हुई दोनों की। फिर राजन ने अपनी नानी से पूछा "नानी यहां कब से रहने लगे गए। गढ़ी क्यों छोड़ दी??। कितना अच्छा लगता था वहाँ!!!"
नानी बड़े प्यार से बोली- "ये सब छोड़। ये बता तू अचानक इतने सालों बाद कैसे आ गया। कम से कम एक कागज तो दे देता। हम तुझे लेने राजपुर आ जाते।"

गगन बोला- " हां नानी... इसकी अच्छे से खबर लो। इसने आपको सरप्राइज देने के चक्कर में बहुत तंग कर दिया मुझे।"

फिर उसने राजपुर में रात बिताने वाली बात से लेकर सुबह गढ़ी के आगे उतरने वाली सारी बातें बता दी।

सुनकर नानी का चेहरा पीला पड़ गया।
राजन बोला - " नानी बताओ ना... वो गढ़ी छोड़कर यहां कब से आ गए?? क्यों आ गए??"

नानी गंभीर हो के बोली - " देखो बेटा... उस गढ़ी का नाम मत लेना अब। बस अब यहीं रहना है और उस गढ़ी की तरफ कभी मत जाना।"

राजन - "ठीक है नानी। लेकिन मेरे दोस्त को अपना गांव तो दिखा लाऊँ ना??"
"हां शाम को घुमा लाना.. लेकिन अंधेरा होने से पहले वापस घर आ जाना। आजकल रात को यहां कोई बाहर नहीं निकलता।" नानी ने मानो चेतावनी देते हुए कहा।

राजन -"क्यों नानी?" 

"अरे बस बात मान लिया कर ना... इतने सवाल क्यों करता है?" नानी ने हल्का गर्म होकर कहा।

"ठीक है, ठीक है नानी... हम जल्दी ही घर आ जाएंगे।" राजन हाथ जोड़ते हुए बोला।
"यार राजन... यहां ज़रूर कुछ गड़बड़ है। पहले गढ़ी की तरफ जाने से सख्ती से मना किया। फिर रात को बाहर ना रहने का भी जोर देकर बोला।" गगन धीमे से बोला।

राजन -" हम्म... मुझे भी बहुत अजीब लग रहा है गगन... नाना ने गढ़ी छोड़ कर यहां रहने का फैसला क्यों लिया... इसका जवाब नहीं अभी तक नहीं मिला।"

दोपहर में आराम कर के शाम को दोनों निकल गए गांव में । राजन ने गगन को अपने खेत ज़मीन दिखाए। गगन हैरान था..."इतनी बड़ी ज़मीन है तुम्हारे नाना  की??!!... और इतने खेत???!!"
राजन - " हां नाना को खुद नहीं पता कि कितनी ज़मीन, खेत है उनके।"
घूमते - घामते शाम गहराने लगी थी। गांव वाले बड़े स्नेह से मिल रहे थे उनसे। एकाएक गांव में सन्नाटा पसरने लगा। सब लोग अपना काम - धाम छोड़ कर घर जाने लगे। 
"बाबू अब तुम भी घर जाओ जल्दी से। रात को बाहर नहीं रहना।" एक गांव वाले ने राजन से कहा।
राजन का माथा फिर ठनका। उसने गांव वाले से पूछ लिया - "मामा क्या बात है?? पहले तो रात को चौपाल लगती थी... सब लोग बाहर बैठ कर बतियाते थे। आजकल ये क्या हो रहा है?"

गांव वाला भय युक्त आवाज में बोला - " तुम काफी सालों बाद आये हो बाबू... तुम्हे शायद पता नहीं। गांव पर आफत का साँया मंडरा रहा है। अब देर मत करो बाबू। जल्दी घर चले जाओ।" कह कर गांव वाला सरपट दौड़ लगा गया।
राजन और गगन भी जल्दी घर आ गए। दोनों के दिमाग मे हज़ारों सवाल घुमड़ रहे थे। 
राजन एकदम  गम्भीरता के साथ बोला - " गगन मैं नानी से पूछ कर रहूंगा कि वो लोग क्या छुपा रहे हैं मुझसे!!? आखिर यहां चल क्या रहा है??"

दोनों नानी के पास पहुंच गए। 
"नानी... आपको बताना ही होगा कि गांव में क्या समस्या चल रही है। आप क्या छुपा रहे हो हमसे।?? जब तक पूरी बात नहीं बताओगी मैं खाना ही नहीं खाऊंगा।" राजन ज़िद पर अड़ गया।

नानी ने फिर टालना चाहा..- "अरे तू कितने सालों बाद आया है। कुछ दिन आराम से रह यहां। क्यों फालतू बातों में उलझता है।??"
"नहीं नहीं नहीं ... आपको बताना पड़ेगा बस।" राजन अब नहीं मान ने वाला था।
"अच्छा क्या जान ना है तुझे?" नानी मानो हारते हुए स्वर में बोली।

"सब कुछ... गढ़ी छोड़ कर यहां क्यों रहने आये? गढ़ी की तरफ क्यों नहीं जाना?? गांव पे क्या आफत आई है?? क्यों लोग रात को घरों से बाहर नहीं निकल रहे?? यहां तक कि रात को राजपुर से हमें कोई यहां लाने तक को तैयार नहीं हुआ ?? इसका क्या कारण है?? ये सब कुछ जानना है मुझे।।" राजन बेचैनी से बोला।

"अच्छा - अच्छा... इतने सवाल???!!! 
तेरे नाना ने मुझे मना किया था कुछ भी बताने से...वो चाहते थे कि तू कुछ दिनों के लिए आया है.. फालतू में परेशान होगा। लेकिन तेरी ज़िद है तो बताना पड़ेगा। सुन..." 

नानी डरी सहमी और थकी हुई आवाज में आगे बोली.." तुझे तो पता ही है कि हम पहले अपने पुरखों की उस भव्य गढ़ी में बड़े आराम से रहते थे। तेरा भी काफी बचपन भी वहां बीता है। हम सब बड़े चैन से वहां रह रहे थे। नौकर - चाकर, धन - धान्य, किसी चीज़ की कोई कमी नहीं थी। लेकिन एक दिन न जाने किस ज़माने का शाप उजागर हुआ..." नानी का स्वर और भय युक्त हो गया....
(फ्लैशबैक)....."एक रात को एक नौकर रहस्यमयी ढंग से गायब हो गया। हमने पूछताछ की लेकिन कोई पक्का जवाब नहीं मिला। हमने सोचा कुछ चुरा के भाग गया होगा।.... दो दिन बाद एक अन्य नौकर की लाश गढ़ी की छत पर मिली। मैंने खुद अपनी आंखों से उसकी लाश देखी थी। ऐसा लग रहा था मानो हड्डियां भींच कर तोड़ दी गयी हो। किसी इंसान का ये काम नहीं हो सकता।" हवाइयां उड़ने लगी नानी के चेहरे पर ये वाकया याद करते हुए।

"तेरे नाना ने इस घटना को मामूली तौर पर लिया। पुलिस आई और तफ्तीश कर के चली गयी। कोई सुराग नहीं मिला। 3-4 दिन बाद ही एक और नौकर घुड़साल में मृत पाया गया। उसकी मौत भी उसी तरह हुई थी। तेरे नाना ने पुलिस को खबर नहीं करवाई। चुपचाप उसका अंतिम संस्कार करवा दिया । वो बार बार पुलिस नहीं बुलाना चाहते थे।"

राजन और गगन सांस रोके सुन रहे थे।

नानी आगे बोली " मैंने तेरे नाना को कहा कि 3 नौकर हादसों का शिकार हो गए हैं... कुछ तो कारण है। लेकिन तेरे नाना अभी भी गंभीरता से नहीं ले रहे थे इन घटनाओं को। धीरे धीरे नौकर कम होते गए। गांव वाले गढ़ी में काम करने से कतराने लगे। बाकी बचे नौकर भी भाग गए। बस कुछ लठैत और हम दो ही रह गए थे।"
नानी भरे कंठ से बोली, "वो मनहूस रात आज भी अच्छी तरह याद है मुझे। उस रात... ठीक 1 बजे... हमने लठैतों के चीखने की आवाजें सुनी। नींद एक झटके से  खुल गयी  हमारी। लठैत ऐसे चीख रहे थे मानों हलाल किये जा रहे हों। मैं बुरी तरह घबरा गई। तेरे नाना ने अपनी बंदूक उठाई और बाहर की तरफ भागे। तभी 2 लठैत उन्हीं की तरफ दौड़े आ रहे थे। लठैत तेरे नाना को लगभग खींचते हुए वापस अंदर की तरफ ले आये।" 
नानी की सांस तेज हो गयी। वो संयत होकर बोली। "तेरे नाना ने चिल्ला कर कहा ' ये क्या कर रहे हो भूर सिंह। मुझे अंदर क्यों ले आये।' 
'हुज़ूर... बाहर मौत नाच रही है... हमारे लठैतों को एक भयानक शैतान ने नोच डाला है।' भूर सिंह ने डरती हुई आवाज में कहा। 
मैं बुरी तरह दहशत में थी। तेरे नाना की आंखों में भी खौफ छा गया उस वक़्त। 'कैसा शैतान... क्या बक रहे हो तुम...???' ठाकुर साहब चीख पड़े।

'हुज़ूर यकीन कीजिये... एक भयानक शैतान है बाहर... सिरकटा... केवल धड़ है उसका... बड़ा खौफनाक है हुज़ूर। उस से मुकाबला असंभव है। बस अब किसी तरह अपनी रक्षा की सोचिए। जब तक  मैं ज़िंदा हूं तब तक तो आप पर आंच नहीं दूंगा.. बाकी ईश्वर जाने मालिक।' भूरसिंह भर्राई आवाज में बोला।
ठाकुर महेंद्र प्रताप चौंक उठे "क्या??... क्या कहा तुमने??... सिरकटा है वो!!??.... यानी... यानी... वो शाप की कहानी सच थी।।। उफ्फ... यानी वो अनहोनी घट ही गयी... गज़ब हो गया।"
मैंने चीखते हुए पूछा " क्या बड़बड़ा रहे हो आप?? कैसी अनहोनी??" 

वो कोई जवाब देते उस से पहले ही दरवाजा भड़भड़ा उठा। दरवाजे पर बुरी तरह पर चोट पड़ रही थी। तभी चरमरा कर गिर पड़ा वो मजबूत दरवाजा... और... सामने नज़र आया वो भयानक शैतान जिसे देखकर रूह फना हो गयी हम चारों की। इतना भयानक शैतान ... कल्पना से परे... गला सड़ा शरीर... लंबे नुकीले नाखून... नीला पड़ चुका जिस्म... अजीब सी फुफकार भरी गुर्राहट निकल रही थी उसके शरीर से.... धीरे धीरे लड़खड़ाते हुए हमारी तरफ बढ़ रहा था। दहशत के मारे मेरे पैर जाम हो गए।"
' सुशीला जल्दी भागो यहां से' तेरे नाना की पुकार सुन कर मैं जैसे होश में आई।'
हम दोनों तुरंत दूसरे दरवाजे से बाहर की तरफ भागने लगे। वो शैतान हमारी तरफ लपका। उसका मुख्य शिकार शायद हम ही थे। लेकिन भूर सिंह और  उसका साथी उस शैतान पर टूट पड़े। 
तब तक हम तेरे नाना की बग्घी तक पहुंच गए थे। घोड़ों को ऐड़ लगाई और घोड़े तेजी से गांव की तरफ दौड़ लगा गए।

भूर सिंह बखूबी नमक का हक़ अदा कर गया था। मरते - मरते भी उसने अपने मालिक का जीवन बचा लिया।
हम जैसे तैसे गांव तक पहुंचे। बार - बार मुझे पीछा करता वो शैतान दिख रहा था। गांव के अंदर की ये हवेली तेरे नाना के छोटे भाई के लिए बनवाई गई थी। लेकिन वो कम उम्र में ही चल बसा।तब से ये खाली ही पड़ी थी। हमने यहीं आ कर शरण ली। रात आंखों में काटी हमने। सुबह होने पर जी मे जी आया।

बीती रात की घटना का इतना गहरा असर था हम पर कि कुछ ठीक से बोला भी नहीं जा रहा था। ठाकुर साहब ने सुबह गांव के कुछ विश्वस्त लोगों को बुलवाया और उनको रात की घटना विस्तार से सुना दी। "ठाकुर साब.. हमें तो पहले से ही कुछ शक था.. जिस तरह की घटनाएं गढ़ी में घट रही थी... हमें तो अंदेशा हो गया था कि ये किसी काली शक्ति का ही काम है।" गाँव के एक बुजुर्ग ने कहा।

"तो अब क्या करें काका?" ठाकुर साहब बड़े चिंतित स्वर में बोले।

"अब जल्दी से जल्दी आपकी और गांव की सुरक्षा का उपाय कीजिये मालिक। क्योंकि आपके गढ़ी छोड़ देने के बाद अब वो गांव को निशाना बनाएगा। आपकी तलाश में वो गांव का रुख ज़रूर करेगा हुकुम।"

"हमें अभी के अभी अघोरी तांत्रिक 'मारक' को बुला लेना चाहिए।" गांव का एक अनुभवी वृद्ध बोला। 
"हां हां... अघोरी मारक ज़रूर इस मुसीबत से छुटकारा दिला सकता है।" गांव वाले एक स्वर में बोले।
उसी वक़्त 2 आदमी 'अघोरी मारक' को लाने रवाना कर दिए गए।
कुछ ही घंटों में मारक ठाकुर साहब के सामने  उपस्थित था। 

"ठाकुर साहब.... आप पर जो मुसीबत टूट पड़ी है उसका समाधान बहुत कठिन है। अगर आप इस बारे में  कुछ और बताएं तो शायद में कुछ प्रभावी उपाय कर सकूंगा।" अघोरी मारक ध्यान लगाते हुए बोला।
ठाकुर साहब धीमे स्वर में बोले "अघोरी महाराज ! पीढ़ियों से हमारे वंश में एक  लिखित सन्देश आगे से आगे दिया जाता रहा है। कपड़े पर लिखा वो संदेश आज भी गढ़ी के तहखाने में सुरक्षित पड़ा है। उसकी एक एक लाइन हमें याद है।

तेरे नाना तांत्रिक मारक को विस्तार से सब कुछ बताने लगे... 

" सुनो...300 साल पहले जब हमारे पुरखों ने इस गढ़ी की नींव रखी थी तब परम्परा के अनुसार इस गढ़ी और इस ठिकाने की रक्षा के लिए 'मेहला' नाम के आदमी को इसकी नींव में जीवित चुनवाया था। मेहला ने स्वेच्छा से अपना बलिदान दिया था। लेकिन उसकी पत्नी इस बात से रुष्ट थी। उसने अपने बेटे को गोद में लिए गढ़ी के आगे उस वक़्त के ठाकुर साहब भैरव  प्रताप सिंह जी को कोसते हुए कहीं चली गयी थी। सालों बाद मेहला का बेटा एक सिद्ध तांत्रिक बन कर अपने पिता की मौत का बदला लेने आया। वह भयानक काली विद्या का ज्ञाता और रक्तपिपासु था। आते ही ठिकाने में उत्पात मचाने शुरू कर दिया उसने। ठाकुर परिवार पर कई जानलेवा हमले किये उसने। कई बार शैतानी शक्तियों, भयानक प्रेत और कृत्या सिद्ध कर के हमारे वंश विनाश के लिए भेजा। लेकिन ठाकुर खानदान के गुरु सिद्ध पुरुष श्री सर्वानंद जी के कारण वो हमेशा विफल रहा। आखिर कई प्रयासों के बाद ठाकुर साहब और गुरुदेव ने उस दुष्ट को गिरफ्तार कर लिया।

जब उसे मांत्रिक रस्सियों से बांध कर ठाकुर साहब के सामने लाया गया तो वो बुरी तरह फुफकार रहा था। 
ठाकुर भैरव प्रताप बोले - "इस वहशी दरिंदे को एक ही सज़ा दी जानी चाहिये... मौत की सज़ा।"

गुर्रा उठा वो शैतान "ठाकुर... तू मुझे कभी नहीं मार सकेगा ... तू बस मेरा शरीर नष्ट कर सकता है... लेकिन मैं फिर लौट के आऊंगा... और तेरे वंश के एक - एक चिराग को बुझा दूंगा। हा हा हा हा हा हा....."

गुरु सर्वानंद बोल उठे - "ये सही कह रहा है ठाकुर, इसे मार के भी रोक नहीं सकेंगे हम। मार देने से तो इसकी शैतानी रूह आजाद हो जाएगी और ये और खतरनाक हो जाएगा।"

"ओह... तो क्या करना चाहिए गुरुदेव?" भैरव प्रताप चिंतित स्वर में बोले।

"इसकी रूह को हमेशा के लिए इसके जिस्म में ही कैद करके रखना पड़ेगा ठाकुर। इस नामुराद का सर काट कर इसके जिस्म को बेकार कर दिया जाए। सर गढ़ी के कंगूरे में दफन कर दिया जाए और इसका धड़ ताबूत में बंद कर के गढ़ी के तहखाने में हमेशा के लिए दफन कर दिया जाए।" गुरु सर्वानंद ने भारी आवाज में कहा।

ये सुनते ही चीख पड़ा वो शैतान , 
"नहींsss...नहींsss..... सर्वानंद मैं तेरा खून पी जाऊंगा। ठाकुर sss... तू कुछ भी कर ले ssss... मेरे हाथों तेरे सर्वनाश को नहीं टाल सकेगा तू।"

ठाकुर साहब चिल्ला उठे, "हुक्म की तामील हो।"

उस शैतान का सर काट दिया गया और गढ़ी के कंगूरे में चुन दिया गया। फिर धड़ को कई विधान के साथ तहखाने में गड्डा खोदकर ताबूत में रखकर के जंजीरों से बांध कर दफना दिया गया। तांकि उसकी शैतानी रूह उसके जिस्म में उसी ताबूत में कैद रहे हमेशा के लिए।" नानी कुछ पल के लिए रुकी।

दोनों हैरत और भय से भर चुके थे।
दोनों एक साथ बोले, " फिर क्या हुआ नानी?"

नानी ने नौकरानी को आवाज दी... "बिंदिया... देख अंधेरा हो गया है... लालटेन जला दे और खाना तैयार हुआ क्या?"

नौकरानी बोली," जी माताजी... बस थोड़ी देर में तैयार हो जाएगा।" ये कहकर वो हवेली में लालटेनें जलाने चली गयी।

"नानी बताओ ना फिर क्या हुआ?" राजन ने सहमी आवाज में पूछा।

नानी आगे बोली...

"ये कहानी सुनकर तांत्रिक मारक बोला..."बस... ठाकुर साहब... मैं सब समझ गया। आप इस वक़्त बहुत बड़े खतरे में है। आप पर हर पल मौत मंडरा रही है। अभी इसी वक्त मैं जो कहता ही वो करिए। अब उस शैतान को नष्ट करना बहुत कठिन है। मैं बस आपको सुरक्षित रखने का उपाय कर सकता हूँ।"
"तो जल्दी उपाय करिए" ठाकुर साहब ने व्यग्रता से कहा।

कुछ ही देर बाद मारक ने चार खूंटे सिद्ध कर के ठाकुर साहब को दे दिए। हवेली के सामने एक छोटा शिव मंदिर स्थापित करवाया। और बोला...
"ठाकुर साहब ये खूंटे हवेली के चारों तरफ ज़मीन में ठुकवा दीजिये फिर कोई बला कभी आपकी हवेली में प्रवेश नहीं कर सकेगी और इस शिव मंदिर में रोजाना पूजा होनी चाहिए एक दिन भी चूक ना हो। जब तक इस शिव मंदिर में रोज पूजा होती रहेगी इसके आस पास का क्षेत्र सुरक्षित रहेगा।"

"फिर मारक चला गया। तब से हम यहीं रह रहे हैं। गांव में 
आस - पास रात को गुर्राहटों के स्वर गूंजते है। कुछ लोगों ने उस सिरकटे शैतान को गांव में मँडराते देखने का दावा भी किया है। रात को जो भी गढ़ी की तरफ गया वो मृत पाया गया। बुरी तरह नोची, टूटी हड्डियों वाली लाश मिली उन लोगों की। अब तो लोग दिन में भी गढ़ी की तरफ जाने से डरते हैं।"

"लेकिन वो शैतान आज़ाद कैसे हुआ नानी?" गगन ने पूछा।

नानी आगे जवाब देते हुए बोली...
"बाद में हमें पता चला । एक पुराना नौकर, जो पहले गढ़ी में काम करता था और भाग गया था , हमारे पास आया और बोला - 'ठाकुर साहब... गुनाह माफ कर दें मालिक तो एक बात  बताऊँ... बड़े दिनों से मन पर बोझ की तरह है ये बात।"

"जो भी कहना है कह दो शामू'' ठाकुर ने नरमी से कहा।

"हुज़ूर गढ़ी में काम करते वक़्त  दो नौकर हीरा और लालू का मन काला हो गया था। उन्हें अंदेशा हुआ कि गढ़ी के तहखाने में आपके पुरखों का पुराना धन गड़ा है। उन्होंने मेरे मन मे भी कालख भर दी मालिक..." कहते हुए शामू बिलखने लगा। 

ठाकुर साहब ने थोड़ा सख्ती से कहा, "रोना बन्द कर और आगे बोल... क्या हुआ था।?"

शामू संयत होते हुए बोला, "मालिक... वो दोनों रात को तहखाने में उतर गए.. और... मुझे बाहर निगरानी पे रख छोड़ा। काफी देर बाद मुझे तहखाने से एक भयानक गुर्राहट सुनाई दी। मैं वहां से तुरंत भाग गया मालिक। उसके कई दिन बाद मैंने गढ़ी में शैतान होने की बात सुनी तो सीधा आपके पास आ गया। मुझे माफ़ कर दीजिए मालिक।"शामू फिर से बिलखने लगा। 
"मन तो कर रहा है तुझे गोली से उड़ा दूं। तूने उन कमीनों का साथ देकर मेरे खानदान के साथ - साथ पूरे गांव को भयानक खतरे में डाल दिया है शामू। अब तेरा फैसला में गांव की पंचायत को सौंपता हूँ।" ठाकुर साहब ने दांत पीसते हुए कहा।

पंचायत ने शामू को शाम के वक़्त गांव निकाला दे दिया और उसी पल गांव छोड़ने को कह दिया। अगले दिन शामू गढ़ी के पास मृत पाया गया।

नानी जैसे उन भयानक यादों से बाहर आते हुए बोली...

"तब से हम और ये पूरा गांव उस सिरकटे शैतान की दहशत के साये में जी रहे हैं। जब तू अचानक आया तो हमारा जी सूख गया। जितनी खुशी तुझे देखकर हुई उतना ही डर बैठ गया तुझे लेकर। हम तुझे और तेरी माँ को ये सब बताकर चिंता में नहीं डालना चाहते थे। अब तुझे सब बता दिया है। बस दोनों यहां आराम से गांव में रहो... कहीं बाहर मत जाना.. और रात को बिल्कुल बाहर मत निकलना।"

"लेकिन नानी आप लोगों ने पुलिस की मदद क्यों नहीं ली??" राजन ने हैरत से पूछा।

नानी थकी मुस्कान से बोली, " अरे बेटा... एक तो थाना यहां से कोसो दूर बड़े शहर में है। कितनी बार आएगी पुलिस। एक बार तेरे नाना गए भी थे थाने में। वहां के इंस्पेक्टर दोस्त थे उनके। तफ्तीश के लिए आये थे ठाकुर साहब के साथ। लेकिन कहीं कोई सबूत, सुराग नहीं मिला तो मजाक में ये कहते हुए लौट गए कि "ठाकुर... चाय पे ही बुलाना था तो साफ कह देते ये बेसिरपैर की कहानी सुना के क्यों लाये यहां तक .. हा हा हा।"
पुलिस को ऐसी बातों पर कोई यकीन नहीं इसलिए बस अब नसीब के भरोसे बैठे हैं।
"अब तो तू समझ गया होगा कि हम तुझे क्यों रोक रहे थे।!" नानी एकाएक रुआंसी सी हो गयी।
"हम समझ गए नानी। अब हम पूरा ध्यान रखेंगे। आप चिंता मत करो।" राजन ने नानी को तसल्ली देते हुए कहा।

"ठीक है। अब तुम दोनों खाना खा लो, तैयार हो गया है।" नानी ने प्यार से कहा और खाना परोसने की तैयारी में लग गयी।

खाना खाकर सोने चले गए दोनों। ऊपर का एक शानदार कमरा उनको सोने के लिए दे दिया था। लेकिन नींद कोसो दूर थी उनकी आंखों के।
"यार ये सब स्वप्नलोक की बातें नहीं लग रही तुझे?" गगन ने चुप्पी तोड़ते हुए कहा।
"यकीन करना तो मुश्किल है गगन। लेकिन नाना नानी और इतने गांव वालों को झुठलाया भी नहीं जा सकता।" राजन बोला।

"मैं तो ये सोच सोच कर घबरा रहा हूँ कि सुबह हम गढ़ी के कितने पास उतरे थे।" गगन भयभीत आवाज में बोला।
राजन - "गगन..... आज मुझे तो नींद आनी मुश्किल है। क्यों न आज हम बाहर नज़र रखें!!? क्या पता कुछ दिख जाए।"

गगन रोमांच के साथ बोला।- " हां यार... मन तो मेरा भी कर रहा है। चलो आज रात को हम हवेली के बाहर नज़र रखेंगे।"

राजन ने कमरे की लालटेन बुझा दी और दोनों खिड़की के पास आकर बैठ गए। बाहर केवल चांद की रोशनी फैली थी। बहुत ध्यान से देखने पर ही कुछ नज़र आ रहा था। उन्हें इधर-उधर भागते कुत्ते नज़र आ रहे थे। कभी-कभी कुत्तो का रोना उनमें झुरझुरी भर देता था।रात के 10 बजे होंगे... तभी उनके कमरे के दरवाजे पर दस्तक हुई। दोनों भय से उछल पड़े।

तेजी से भाग कर अपने अपने बिस्तर पर दुबक गए। बाहर से आवाज आई... " बच्चों सो गए क्या??" तब जी मे जी आया। उठकर दरवाजा खोला तो सामने ठाकुर साहब खड़े थे। 
"बस हाल चाल पूछने आ गया था बच्चों। कोई तकलीफ तो नहीं है ना यहां? नींद आ जायेगी??" ठाकुर साहब ने प्यार से पूछा।

"हां हां नानाजी... हम एकदम आराम से हैं । आप भी सो जाइये।"

"ठीक है बच्चों.. सो जाओ।" कहकर नानाजी चले गए।

"यार राजन... मेरी तो जान ही निकल गयी थी दस्तक सुनकर।" गगन दबी आवाज में बोला।
हालत तो राजन की भी खराब हो चुकी थी लेकिन डर छुपाकर बोला, "यार गगन तुम बड़े डरपोक हो। चलो फिर से खिड़की के पास चलते हैं।" दोनों फिर से आ जमे खिड़की के पास।

सन्नाटा छा चुका था गांव में। शांत वातावरण में बाहर जंगल के रोते सियारों की आवाज भी साफ सुनाई पड़ रही थी। 12 बज चुके थे। दोनों की आंखे अब थकने लगी। तभी एक हल्की गुर्राहट भरी आवाज उभरी। दोनों ने कान लगा कर सुनने का प्रयास किया। गुर्राहट फिर से उभरी। खून जम गया दोनों का। गांव के कुछ घरों के बाहर मशाल लगाई हुई थी। दूर मशाल की रोशनी में एक हल्का सा साँया नज़र आया उनको। भय से जड़ हो उठे दोनों। 
"र... र... राजन... इतनी रात गए कोई गांव वाला तो नहीं हो सकता वो।?" गगन घिघियाये स्वर में बोला।

"ह..हां यार... वो ज़रूर सिरकटा ही होगा। गांव में भटक रहा है।।।" राजन की ज़बान भी अटकने लगी।
राजन नम आंखों से बोल पड़ा.."यार गगन... मैं अपने नाना और नानी की कोई मदद नहीं कर सकता.. बहुत दुख हो रहा है... हमारी खानदानी गढ़ी छोड़नी पड़ गयी....।"

गगन हिम्मत के साथ बोला, "दोस्त... दुनिया मे ऐसी कोई मुसीबत नहीं.. जिसका कोई हल ना हो। इस सिरकटे का भी कोई न कोई इलाज ज़रूर होगा। कल दिन में इस बारे में पूछताछ करते हैं। चल अब सोने की कोशिश करते हैं।"

राजन - "उसकी झलक दिखने के बाद तुझे लगता है हम सो पाएंगे??" 

गगन - "जानता हूँ यार... लेकिन हम यहां सुरक्षित है। वो यहां नहीं आ सकता। इसलिये अभी बेफिक्र हो के सो जाओ। कल कुछ सोचते है इस बारे  में।"

राजन "हम्म.. ठीक है।" 
थोड़ी देर ख्यालों में खोए रहने के बाद नींद ने आ घेरा उन्हें।
अगले दिन सुबह नाश्ता करने के बाद दोनों निकल गए गांव में। 
गगन "क्यों न एक चक्कर गढ़ी की तरफ लगा आएं??"
राजन, "मेरे ख्याल से दिन में तो इतना खतरा नहीं होगा।!"

"अगर खतरा दिखा तो  तुरन्त भाग आएंगे।" गगन ने इशारा करते हुए कहा।

दोनों गांव वालों की नज़रे बचाते हुए गढ़ी की तरफ निकल पड़े। गांव से बाहर आते ही एक अंजान डर हावी होने लगा उन पर।
"राजन... आगे जाना चाहिए क्या?... म... मेरे मन में घबराहट सी हो रही है।" गगन धीरे से बोला।

"हम बस गढ़ी दूर से देख के आ जाएंगे गगन... अगर मामला ठीक लगा तो ही पास जाएंगे।" राजन समझाते हुए बोला।
दोनों आगे बढ़ते गए। गढ़ी नज़र आने लगी थी। सुनसान रास्ता... दिन का सन्नाटा... तेज धूप...चारों तरफ़ केवल झाड़ियां ... नागफनी के पौधे...  एक अजीब सा सूनापन फैला था गढ़ी के चारों ओर। वे गढ़ी की सीढ़ियों तक जा पहुंचे थे।  दिल धाड़ धाड़ बज रहा था उनका।  उन्होंने एक नज़र गढ़ी की तरफ देखा.... राजन की आंखे भीग गयी। "गगन इस गढ़ी मैं खूब खेला हूँ मैं। मेरे बचपन की कई यादें जुड़ी है इस से। इस गढ़ी के सुहाने पल आज तक याद है मुझे।" राजन भावुक हो गया।
"मैं ये समझ सकता हूँ राजन। लेकिन
ऐसे हालात में क्या हो सकता है??" गगन ने राजन के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा।

"मैं किसी दुष्ट शैतान की वजह से मेरे नाना की गढ़ी इस तरह नहीं छोड़ सकता गगन। कुछ तो करना पड़ेगा। कोई तो रास्ता ज़रूर होगा उस शैतान से छुटकारा पाने का??!!" राजन आक्रोश के साथ बोला।
गगन - "क्यों न हम उस तांत्रिक से मिलें?? जिसने नाना की हवेली सुरक्षित की थी!!" 
राजन - "हम्म... अच्छा विचार है। उसी से मिलते है। शायद कोई उपाय मिल जाये!"

दोनों सीढ़ियों पर खड़े बतिया ही रहे थे... कि अचानक गढ़ी से एक हल्का गुर्राहट का स्वर उभरा। दोनों चौकन्ने हो गए।
 "तुमने सुना गगन??"
"हां राजन... हमें यहां से फौरन निकल जाना चाहिए।"

तुरंत गांव की तरफ दौड़ लगा गए। लेकिन काफी दौड़ने के बावजूद गांव का रास्ता नहीं मिल पा रहा था। घूम कर पीछे देखा तो होश संभालने मुश्किल हो गए... अभी भी गढ़ी की सीढ़ियों के पास ही खड़े थे वो...
"उफ्फ... राजन... लगता है हम उस शैतान के जाल में फंस गए हैं..."

"हे भगवान अब क्या होगा...??"राजन  भी बुरी तरह घबरा गया।

"घड़ी में दोपहर के 12 बजे हैं .... ये वक़्त इनके हावी होने का होता है। बचना मुश्किल है राजन...!!!" गगन चिल्ला के बोला। 

गुर्राहट और तेज होने लगी। 

उल्टे पांव सीढ़ियों की तरफ खिंचने लगे दोनों। मौत का खौफ झलक उठा चेहरों पर।

प्रतिरोध के बावजूद दोनों एक एक सीढ़ी चढ़ते जा रहे थे। गढ़ी उन्हें ऐसे खींच रही थी मानों लोहे को चुम्बक। 

"आज तो मौत पक्की है राजन"

"बुरे फंसे" ।

अचानक उन्होंने देखा गांव के कई लोग ठाकुर साहब के साथ दौड़े चले आ रहे थे गढ़ी की तरफ। तेज शोर के साथ पूरा हुजूम उमड़ पड़ा वहां। लाठियां , सरिए... जिसको जो मिला उठा लाया था।

तभी सीढ़ियों से लुढ़क पड़े दोनों और अपने होश खो बैठे। कुछ देर बाद जब आंखे खुली तो अपने आप को हवेली के पलंग पर पाया। गांव के कुछ खास लोग और वैद्य जी से घिरे हुए। नानी सुबक रही थी। ठाकुर साहब कुर्सी पर बैठे थे। 

"अब कैसा लग रहा है बच्चों?" ठाकुर साहब ने प्यार से सर सहलाते हुए पूछा।

दोनों दुख, भय और शर्म से  भरे... उठकर बैठ गए। सर झुकाए बैठे थे दोनों। तभी नानी डांटते हुए बोली..."इन दोनों को प्यार की नहीं मार की ज़रूरत है। इनकी ऐसी पिटाई कीजिये कि सात जन्म तक याद रखे। कितना समझाया था कि गढ़ी की तरफ नहीं जाना है... फिर भी ना जाने कौनसा खज़ाना ढूंढने गए उधर..." कहते हुए नानी सुबकने लगी।

कुछ देर बाद सामान्य हुए दोनों। सबसे माफी मांगते हुए दोबारा ऐसी गलती न दोहराने की बात मानी।
"अब से तुम दोनों हवेली से बाहर नहीं जाओगे।" नानी ने कड़क कर कहा। 
"तुम दोनों के साथ अब हर पल 'धीरू' रहेगा।" कहीं भी आना जाना हो इसको साथ लिए बिना कहीं नहीं जाओगे।" नाना ने भी सख्ती के साथ बोल दिया।

धीरू एक मजबूत लठैत था। ठाकुर साहब ने उसे मुस्तैद रहने को कह दिया।

अब दोनों कैद होकर रह गए हवेली में। कहीं आस - पास आना जाना भी हो तो धीरू की निगरानी में।

"यार गगन... आज तो मर ही गए थे।" राजन ने उस भयानक वाकये को याद करते हुए कहा।

"हां राजन.. मौत सामने नज़र आ गयी थी। यकीन नहीं हो रहा कि हमारे साथ ऐसा हुआ है!! अब तक तो मैं सुनी सुनाई बाते ही मान रहा था ये सब... लेकिन आज असल मे महसूस किया... बहुत डरावना एहसास था यार... अभी तक सिहरन उठ रही है.." गगन भयभीत स्वर में बोला।

"लेकिन मेंरी वजह से तू भी मौत के मुंह मे चला जाता यार... गढ़ी और मेरे परिवार के सर से वो साँया हटाने का जुनून मेरा है... उसमे तुझे बेवजह घसीट लिया मैंने।" राजन दुखी मन से बोला।

गगन - "अब फालतू बातें बन्द कर... और ये बता कि गढ़ी का भूत उतर गया या नहीं???"

राजन - " सच बताऊं गगन... अभी भी मैं गढ़ी छोड़ने को तैयार नहीं। मैं उस दुष्ट से हमारी गढ़ी वापस छीन के रहूंगा।"

गगन - " लेकिन अब तो हमारा कहीं  आना जाना भी धीरू के रहमो करम  पर है। हम ये अब करेंगे कैसे।??"

राजन-" हमें किसी तरह तांत्रिक मारक से मिलना पड़ेगा। वो ही हमें कुछ उपाय बता सकता है।"

गगन - "हम्म... ठीक है। पहले उसके ठिकाने का कुछ पता लगाते हैं। ये धीरू हमें कुछ बता सकता है मारक के बारे में।"

रात को दोनों सोने के लिए ऊपर कमरे में चले गए। धीरू कमरे के बाहर पहरा लगा के सोने लगा। दोनों ने अंदर से दरवाजा खटखटाया...  धीरू ने धीरे से दरवाजा खोला। 

"क्या बात है बाबू? कुछ चाहिए???" धीरु ने हौले से पूछा।

"नींद नहीं आ रही धीरू। कुछ देर बाहर बैठना चाहते हैं।"

"हां.. हां... बैठो ना। " कहकर धीरू ने बाहर 2 कुर्सियां लगा दी। लालटेन की रोशनी में बैठे तीनों इधर उधर की बातें करने लगे।

"अच्छा धीरू ये तो बताओ... ये तांत्रिक महाराज ने जो उपाय किया है उसके बाद तो वो शैतान कभी इधर तो नहीं आया ना???" गगन ने बात को मुद्दे पर लाने के लिए तपाक से पूछ लिया।

"ओह... तो बाबू तुम अभी तक डर रहे हो??? चिंता मत करो वो शैतान यहां कभी नहीं आ सकता। तान्त्रिक मारक बड़ा पहुँचवान तांत्रिक है। उसने बड़ा सुरक्षित उपाय किया है हवेली के लिए।"

"अच्छा... ये तांत्रिक महाराज रहते कहाँ है??" गगन ने पूछा।

धीरू - "पास ही के गांव तारागढ़ के बाहर जंगल की तरफ उनका मठ है। वहीं अकेले रहते हैं।"
"ओह.... ठीक है धीरू... अब सोना है.. नींद आ ही है।" राजन आंखे मलते हुए बोला।
"हां.. बाबू... ठीक है अब सो जाओ।" 

दोनों उठकर अंदर चले गए। 

खिड़की खोलकर बैठ गए और बतियाने लगे। 

"पास ही के गांव तारागढ़ में रहता है मारक।"
राजन गंभीरता से बोला।

गगन,- "हम्म... तो क्या सोचा है अब?"

"सोचना क्या है... बस मिलना है अब मारक से।" राजन मुस्करा के बोला।

गगन - "लेकिन कैसे??" 

राजन - "हमें रात को यहां से निकलना पड़ेगा।"

गगन - " क्या sss?? लेकिन... लेकिन ये असंभव है राजन। हम रात को हवेली से किसी तरह निकल भी गए तो उस खूंखार शैतान से बच कर निकलेंगे कैसे??"

"जानता हूं गगन... ये काम बहुत मुश्किल है। लेकिन तूने नागराज की कॉमिक्स पढ़ी है ना??? जिसका सुपर हीरो नागराज हो वो भला मुसीबत से हार कैसे मान सकता है??!!"

"हम्म.. ये तो तूने ठीक कहा राजन.. तो  फिर तैयार हो जाओ। साक्षात मौत से सामना होगा हमारा।" गगन का स्वर कठोर हो उठा।

राजन - "तो अब पहले पूरी तैयारी करते हैं। कल रात को हर हाल में मारक तक पहुंच जाना है।"

अगली सुबह दोनों अपनी तैयारी में लग गए। धीरू साये की तरह साथ लगा था दोनों के। सबसे पहले धीरू की नज़रे बचा के मशाल का इंतज़ाम किया। फिर शिव मंदिर में जा के शिवलिंग का पवित्र जल एक कलश में लिया।

"बस इस मशाल और पवित्र जल का ही सहारा है गगन। अगर ये बेअसर रहे तो हम गए काम से।" राजन ने गगन की ओर देखते हुए कहा।

गगन दृढ़ता से बोला- " जब ठान ली है तो अब पीछे नही हटना राजन।"

रात घिरने का इंतज़ार करने लगे दोनों।

रात के ठीक 11 बजे... पूरे गांव में सन्नाटा छा गया था... हवेली अब खर्राटों से गूंज रही थी... धीरू ऊंघते हुए सो चुका था... 

दोनों ने बिना आवाज किये बालकॉनी वाला दरवाजा खोला और बालकॉनी में आ गए। कुछ देर वहीं खड़े रहे दोनों। गांव में कहीं कोई हलचल नहीं हो रही थी। पाइप के सहारे धीरे धीरे नीचे उतरने लगे। अब तक सब कुछ ठीक चल रहा था। तारागढ़ का रास्ता धीरू से पता  कर ही लिया था। गांव की सुनसान गलियों से गुजरते हुए काफी बाहर तक आ चुके थे । तभी उनके कानों में वही गुर्राहट पड़ी। खून जम गया दोनों का। फुफकार भरी गुर्राहट उनके पास आने लगी। 

"उफ... वो शैतान यहीं कहीं है राजन।" गगन सहमी आवाज में बोला।

"आज या तो उस सिरकटे की मौत के सामान का इंतज़ाम होगा गगन... या हमारी मौत तय है।" राजन धीमे से बोला।

दोनों एक बैलगाड़ी के पीछे छुप गए। सिरकटा गांव के बाहरी इलाके में मंडरा रहा था... हवेली की तरफ ना जा पाने से क्रोध में फुफकारता हुआ.... ।
गगन और राजन सांस रोके दुबके थे । सिरकटा बैलगाड़ी तक आ चुका था। दोनों बैलगाड़ी के नीचे दुबके हुए... सिरकटा के पैर देख रहे थे।


पैर घिसटता सिरकटा बैलगाड़ी के पास आ के रुक गया। जैसे उसे पता हो कि यहां कोई छुपा है। अगले ही पल बैलगाड़ी पीछे सरक गयी। गगन और राजन की ओट हट चुकी थी। दोनों की चीख निकल गयी। एक झटके से मशाल जला ली उन्होंने। 

"उफ्फ... आज तो गए काम से।" गगन चिल्ला उठा। 
राजन ने हाथ मे पकड़ी मशाल दे मारी सिरकटा पर। फुफकार उठा शैतान। दोनों भागने लगे। लेकिन उस भयानक शैतान से बचकर भागना संभव नहीं था। शैतानी शक्तियों से युक्त उस ज़िंदा मुर्दे से भला दो साधारण लड़के क्या टक्कर लेते। लेकिन उनके पास अभी भी भोलेनाथ का पवित्र जल था जो उनका आखिरी भरोसा था। सिरकटे ने दबोच लिया राजन को। राजन के हाथ मे मशाल थी। वो जलती मशाल मारे जा रहा था उस शैतान पर।

तभी गगन ने कलश का जल छिड़क दिया सिरकटे पर ... एकाएक तड़प उठा शैतान। राजन को  छोड़कर पीछे हट गया।

अब गगन और राजन को थोड़ी हिम्मत मिल गयी। दोनों तेजी से दौड़ पड़े तारागढ़ की तरफ। 3 किलोमीटर की दूरी पर ही था तांत्रिक मारक का मठ। कुछ दूरी तक पीछा करता नजर आया सिरकटा। धीरे धीरे पीछे छूट गया। हांफते हुए मारक के मठ तक जा पहुंचे गगन और राजन। 
दनदनाते हुए मठ में प्रवेश कर गए दोनों। नींद से अचानक जग गया मारक उन दोनों की हलचल सुन कर।
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"कौन हो तुम दोनों?... और इतनी रात गए यहां क्या कर रहे हो??" मारक हैरान था।
दोनों एक सांस में बता गए सारा किस्सा। जिसे सुनकर आश्चर्य से भर गया मारक...फिर बोला- "ओह... तो तुम दोनों चन्दनगढ़ से आए आये हो... साक्षात मौत से बचकर आ गए हो बच्चों। वाकई में बहुत बहादुर हो तुम।" 

"हम यहां उस शैतान सिरकटे से हमेशा के लिए मुक्ति का मार्ग जानने आये हैं महाराज। मैं उस शैतान को हमारी गढ़ी  नहीं लेने दूंगा और ना ही मेरे खानदान पर उस शैतान का साँया हर पल मौत बनकर मंडराने दूंगा।" राजन बहुत गुस्से में था।

"तुम्हारी हिम्मत की दाद देनी पड़ेगी बेटे... लेकिन याद रखो... वो कोई मामूली शैतान नहीं है। सदियों से सो के जगा है वो... इन्तेक़ाम की आग में जलता हुआ... काली शक्तियों का राजा... । उस से टकराने की तो मैं भी नहीं सोच सकता।" मारक उनको सावधान करते हुए बोला। 

"तो क्या आप हमारी कोई मदद नहीं कर सकते??" गगन ने निराशा के साथ पूछा।

"मैं तुम लोगों को उस भयानक प्रेत को नष्ट करने का उपाय बता सकता हूँ बच्चों... लेकिन वो कार्य असंभव सा है। बिल्कुल मौत से दो दो हाथ होंगे। जिस हिम्मत से तुम दोनों उस प्रेत से टकरा कर यहां तक पहुंचे हो... उसे देखकर मैं तुम्हें वो उपाय ज़रूर बताऊंगा।" मारक उनकी बहादुरी से काफी प्रभावित हो चुका था।

"आप बस हमे रास्ता बता दीजिए महाराज... बाकी हम कर लेंगे।" गगन दृढ़ता से बोला।

तो सुनो.. "तुम्हारे नाना ठाकुर महेंद्र प्रताप ने उस शैतान के बारे में जो कुछ मुझे बताया... उस से मेरा निष्कर्ष यही निकलता है कि अब गढ़ी के कंगूरे में लगा उसका सर उसके धड़ से मिला देने से वो नष्ट होने के योग्य हो जाएगा। उसकी आत्मा को उसके धड़ में कैद कर के रखा गया था और सर जुदा कर दिया गया था । लेकिन अब अगर उसको नष्ट करना है तो सर और धड़ को फिर से मिलाकर उसे पूर्ण करना पड़ेगा। उसके बाद ही उस पर कोई उपाय कारगर साबित हो सकेगा। अगर तुम ये करने में कामयाब हो गए तो उसे नष्ट करना आसान हो जाएगा।" 

राजन - "लेकिन उसके बाद हम उसे दोबारा मारेंगे कैसे??" 

" चिंता मत करो बच्चों... अब से 7 दिन तक मैं एक तांत्रिक अनुष्ठान करूंगा.. और भगवान शंकर का एक छोटा सा त्रिशूल सिद्ध कर के तुम्हें दूंगा। जैसे ही उसका जिस्म पूरा हो .. उसी वक़्त ये त्रिशूल उसके सीने में पैवस्त कर देना। त्रिशूल लगते ही वो पंगु हो जाएगा। उसके आगे का काम मैं कर लूंगा।"
"ठीक है मारक महाराज... हम भी 7 दिन में हमारी तैयारी कर लेंगे।" गगन मुस्कुरा कर बोला।

"आज रात मेरे मठ में ही रुक जाओ बच्चों। यहां तुम पूरी तरह सुरक्षित हो। सुबह होते ही चले जाना।"

दोनों ने मारक की बात मान ली। 

अगले दिन सुबह 4 बजे उठकर सीधे जा पहुंचे चंदनगढ़।। छुपते छुपाते हवेली तक जा पहुंचे हवेली तक। पाइप से चढ़ कर बालकॉनी से होते हुए कमरे जाकर ऐसे सो गए जैसे कुछ हुआ ही न हो।

अगले सात दिन काटने बहुत भारी लग रहे थे दोनों को। हर दिन विचारों का तूफान से उमड़ पड़ता। भय हावी होता .... खुद से लड़ते... खुद को तैयार करते...।

सातवें दिन मारक आ पहुंचा चन्दनगढ़। ठाकुर साहब ने बड़े आदर से बिठाया उसे। 
"ठाकुर साहब सुना है आपके ये दोनों बच्चे उस गढ़ी के शैतान का शिकार बनते बनते बच गए।!" मारक ने विस्मय के साथ पूछा।

"हां महाराज... नादानी में उस तरफ चले गए थे। लेकिन भोलेनाथ की कृपा से बच गए।" 

मारक - "मैं इन दोनों बच्चों से अकेले में कुछ पूछना चाहूंगा ठाकुर साहब।" 

"जी ज़रूर पूछिये।"

मारक गगन और राजन के साथ ऊपर वाले कमरे में चला गया। उन्हें सब कुछ दोबारा समझाते हुए एक छोटा सा चमचमाता त्रिशूल उन्हें देते हुए बोला... 
"ये लो बच्चों.. अब सब तुम्हारे हाथ में है। भोलेनाथ तुम्हारी रक्षा करेंगे।"

आगे बोला मारक...और सुनो..."मेरा आशीर्वाद तुम लोगों के साथ है.... अब मेरे शरीर मे फुर्ती नहीं रही बच्चों .. वरना मैं भी गढ़ी में तुम्हारे साथ चलता।"

"हम पूरा ध्यान रखेंगे महाराज... कल उस गढ़ी और गांव को उस दुष्ट के पंजों से मुक्त करवा देंगे हम।" दोनों एक साथ बोल पड़े।

मारक चला गया। अगली रात बहुत भयानक होने वाली थी। दोनों के दिल दहल रहे थे। राजन ने हौले से गगन से कहा, "गगन ... गढ़ी का ये किस्सा मुझसे जुड़ा है... ये लड़ाई भी मेरी और मेरे खानदान से जुड़ी है... तुम्हें बेवजह ही इस खतरे में डालना अच्छा नही लग रहा मुझे।

गगन बोला "मैं जानता हूं राजन... मैं मां और पिताजी के बारे में भी सोचता हूं। लेकिन अब तुझे अकेला छोड़ के मैं पीछे नहीं हट सकता और फिर हमारे साथ भगवान शंकर का आशीर्वाद और शक्ति है। मुझे पूरा विश्वास है हम ही जीतेंगे।"

अगली रात दोनों पुरी तैयारी के साथ चुपके से निकल पड़े उस गढ़ी की ओर। पूनम का चांद आकाश पर चढ़ चुका था। मद्धिम सी चांदनी बिखरी थी। सियार अपना राग अलापना शुरू कर चुके थे। रास्ता एकदम साफ था। शायद सिरकटा भी जानता था कि दिन में भी लोग गढ़ी की तरफ नहीं जाना चाहते तो रात में कौन जाएगा!!?? इसलिए वो गांव के दूसरी तरफ ही विचरण कर रहा था। गगन और राजन गांव से बाहर तक सही सलामत पहुंच गए थे। अब सुनसान बियाबान रास्ता शुरू होने वाला था।

हर एक झाड़ी के पीछे सिरकटा छुपा हुआ सा नज़र आ रहा था उन्हें। दिल किसी रेल इंजन की तरह तेजी से धड़कने लगा था। वो लोग अब गढ़ी तक आ पहुंचे थे। रात के भयानक सन्नाटे में सियारों के रोने की डरावनी आवाज गूंज रही थी। हवा से सरसराते पत्ते... फड़फड़ाते चमगादड़ ... ऊंचे सूखे ठूंठ की सूखी टहनियों के पीछे से झांकता चांद... और उस चांद की रोशनी में नहाई वो काली गढ़ी... खून जमा देने वाला माहौल था!।।

गढ़ी की सीढ़ियों के पास पहुंच गए थे दोनों। जैसे ही उन्होंने गढ़ी की सीढ़ियों पर पांव रखा ... कहीं दूर एक भयानक गुर्राहट गूंजी... गांव का कोना - कोना गूंज उठा... हवा में तैरती वो गुर्राहट सीढ़ियों पे खड़े गगन और राजन के कानों से आ टकराई और... उनका हलक सुख गया। सिरकटा... जो रात के समय गांव के आस - पास घूम रहा था... उसे उन दोनों के गढ़ी तक पहुंचने की भनक लग गयी थी। इधर गगन और राजन तेजी से सीढ़ियों पर चढ़ने लगे।
"जल्दी करो गगन... सिरकटा के आने से पहले हमें कंगूरे से उसके सर को हासिल कर लेना है।"
 दौड़ते हुए ऊपर पहुंचे दोनों। गढ़ी का भारी भरकम दरवाजा खुला पड़ा था। 

"मेरे साथ आओ गगन... मैं अच्छी तरह से जनता हूं इस गढ़ी का कोना कोना। हमे छत की तरफ जाना होगा।"

दोनों अभी हॉल में पहुंचे ही थे कि... तेज आवाज के साथ गढ़ी का वो भारी मजबूत दरवाजा एक चरमराहट की आवाज के साथ बन्द हो गया। सिरकटा गढ़ी में पहुंच चुका था। अब उसे बस शिकार  करना था... उन दोनों लड़कों का।

"जल्दी भागो राजन... वो शैतान गढ़ी में आ धमका है।"

"उफ्फ... उम्मीद से जल्दी आ गया वो। मेरे पीछे तेजी से आओ गगन।"
दोनों अंदर की सीढ़ियों से सीधे छत की ओर दौड़ लगा गए। लेकिन मंज़िल इतनी आसान नहीं थी। तेजी से दौड़ते हुए छत पर पहुंचने ही वाले थे वो कि तभी सबसे ऊपर की सीढ़ी पर खड़ा नज़र आया सिरकटा। चीख निकल गयी दोनों के मुंह से। वापस नीचे की तरफ भागने लगे दोनों। फुफकार भरी हंसी गूंज रही थी गढ़ी के कोने कोने से। मशाल हाथ मे लिए दोनों दूसरी सीढ़ियों की तरफ भागने लगे। तीन मंज़िल की उस गढ़ी की दूसरी मंजिल पर पहुंच गए थे दोनों। और वहीं सामना हो गया उस भयानक प्रेत से। अब सिरकटा उन्हें मौका नहीं देना चाहता था।
उसने अपने हाथ लंबे कर के खूनी पंजो में दबोच लिया दोनों को। कुछ ही पलों में उनका काम तमाम हो जाना था... तभी राजन ने उछाल दिया अभिमंत्रित जल उस शैतान पर। एक पल के लिए पकड़ ढीली हो गयी और मछली की तरह फिसल गए दोनों सिरकटा के पंजो से। गुर्राते हुए दोनों के पीछे भागा वो दरिंदा। गगन ने अपने थैले से कांच की गोलियां निकाल कर बिखेर दी। पीछे भगता सिरकटा लड़खड़ा कर गिर गया उन कांच की गोलियों पर। इतना समय काफी था उन दोनों को छत तक पहुंचने के लिए। छत पर पहुंचते ही गगन ने तेल फैला दिया सीढ़ियों पर। पीछे लपका सिरकटा बुरी तरह फिसल कर नीचे आ गिरा। उसे इस तरह की हरकत का कोई अंदेशा नहीं था।गिरता पड़ता छत पर पहुंच गया सिरकटा भी।
तब तक दोनों कंगूरे तक पहुंच चुके थे।  सारे दांव विफल होते देख सिरकटा फुफकार उठा। अपनी शैतानी शक्ति से खींचने लगा राजन को अपनी तरफ। तब तक गगन कंगूरे पर चढ़ चुका था। 

"आह... गगन... ये.. ये मुझे अपनी तरफ खींच रहा है। जल्दी करोsss...!"

गगन ने कंगूरे को तोड़ कर उस शैतान का खोपड़ीनुमा सर बाहर निकाल लिया। इधर राजन सिरकटा की गिरफ्त में आ चुका था। मौत नाच उठी राजन की आंखों में।

"लो पकड़ो राजनsss..." गगन ने चिल्लाते हुए शैतान का सर राजन की तरफ उछाल दिया।

राजन ने फुर्ती से लपकते हुए धड़ पर टिका दिया उस खूनी पिशाच का सर  और एक ही झटके से भगवान शंकर का अभिमंत्रित त्रिशूल घोंप दिया शैतान के सीने में।

बुरी तरह तड़प उठा सिरकटा... गढ़ी का कोना कोना उसकी भयानक चीत्कार से गूंज उठा। धीरे - धीरे उसकी गुर्राहटें शांत हो गयी। 

गगन और राजन को मानो सब कुछ सपना सा लग रहा था। यकीन नहीं हो रहा था कि वो एक भयानक ख़तरे को खत्म कर चुके हैं जो गढ़ी और पूरे गांव पर सालों से मंडरा रहा था। 

तभी वहां ठाकुर साहब और गांव वालों के साथ आ पहुंचा तांत्रिक मारक। जलती मशालों से सजी उस गढ़ी में मानो दीवाली आ गयी थी। सारा किस्सा जानने के बाद गांव वालों ने गगन और राजन को कंधों पर उठा लिया। ठाकुर साहब गर्व और खुशी से फुले नहीं समा रहे थे। भोर होते ही तांत्रिक मारक की देख रेख में उस शैतान को हमेशा के लिए शिव मंदिर के नीचे दफना दिया गया... ताकि फिर कभी वो खतरा बनकर ना उभर सके।
फिर गढ़ी का भी शुद्धिकरण कर के ठाकुर साहब को सौप दिया गया।

अब गढ़ी में फिर से रौनक लौट आई थी। गढ़ी में नानी के दुलार के साथ मजे से छुट्टियां मनाकर घर लौटते गगन और राजन अपने साथ जीवन भर न भूलने वाली रोमांचक यादें लेकर जा रहे थे।
समाप्त!

किले का शैतान (पार्ट - 2)

किले का शैतान   (पार्ट - 2)  पिछले अंक में आपने पढ़ा...  मैनागढ़ के किले में गए एक शोध दल ने वहां जाकर छानबीन की। अनजाने में उन्ह...