Thursday, 27 January 2022

हत्यारा प्रयोग पार्ट-2

अब तक आपने पढ़ा....

प्रो. अवतार सिन्हा के पागलपन से जिंदा हुआ गब्बार नाम का वो 'मुर्दा' ज़िंदा होकर प्रो. का ही काल बन गया। प्रो. का दोस्त और सहयोगी तांत्रिक कपाल मौका देख कर फरार हो चुका था। पुलिस अवतार सिन्हा के कॉटेज तक पहुंची.. लेकिन इस गुत्थी को नहीं सुलझा पाई। .... अब आगे.....



प्रो. का कॉटेज जिस गांव से सटा हुआ था उस गांव का नाम था गोरमगढ़। कोई नहीं जानता था कि पहाड़ियों से घिरे उस शांत गांव पर तबाही के बादल फटने वाले थे। सर्दियों की ठंडी शाम के बाद गहराता रात का धुंधलका गांव के रास्ते सुनसान कर देता था। हर कोई घर जल्दी पहुंच जाना चाहता था। सड़क के दोनों और लगे विशाल पेड़ प्रेत  की भांति प्रतीत होते। ऐसी ही एक सुनसान सी सड़क पर गांव का एक साईकल सवार तेजी से पेडल मारते हुए गांव की तरफ बढ़ रहा था। देर हो जाने का भय उसके चेहरे से साफ झलक रहा था। अचानक कर्रर्रर्ररsssss.... की आवाज के साथ साईकल की चैन उतर गई। बदनसीब साईकल सवार साईकल खड़ी कर के चैन चढ़ाने लगा। तभी एक आहट ने उसका ध्यान खींच लिया। कड़कड़ाती ठंड में भी पसीना उतर आया उसके माथे पर। वो खड़ा होकर आहट की दिशा में घूरने लगा। खड़ड़ड़.... कड़ड़ड़... की धीमी पदचाप टहनियां कुचलती हुई उसकी तरफ बढ़ रही थी। एकाएक कम्बल में लिपटा हुआ एक साया झाड़ियों के पीछे से उभरा। भयानक सी फुफकार निकल रही थी उस साये के मुंह से। साईकल सवार भय से जड़ होकर रह गया। साया धीमी चाल से उसकी तरफ बढ़ने लगा।साईकल सवार घिघियाये स्वर में चिल्ला उठा। भागने के लिए उसके पैर ही नहीं उठ पा रहे थे। साया उसके बिल्कुल करीब आ चुका था। दो मोटे, भारी भरकम नीले पड़ चुके हाथ उसकी गर्दन पर आ जमे।साईकल सवार का शरीर हवा में उठ गया। उसकी आंखें बाहर निकलने लगी... जीभ बाहर लटकने लगी..... गले से घुटी हुई सी चीख निकली... पैर छटपटाने लगे। धीरे धीरे उसका शरीर शांत पड़ गया। साए ने उसकी लाश को कंधे पर डाला और झाड़ियों में खो गया। 

अगले दिन गांव का माहौल गरमाया हुआ था। साईकल सवार, जिसका नाम बिरजू था, के गायब होने  से सनसनी फैली थी। उसकी साईकल सड़क पर मिल गयी थी। सब जगह ढूंढ लिया गया पर वो ना मिला। दो तीन दिन बाद ही खेत की रखवाली करने गया मोहन गायब हो गया। गोरम गढ़ में भय व्याप्त हो गया। पुलिस बुला ली गयी। लेकिन कोई कामयाबी अब तक हाथ नहीं लग पा रही थी। पुलिस पार्टी खाली हाथ लौट गई। लेकिन लोगों के गायब होने का सिलसिला नहीं रुका। 4-5 लोगों के और गायब होने की सूचना पर पुलिस दोबारा गोरमगढ़ पहुंची। शिकारियों का सहारा लिया गया। जंगल की खाक छान ली गई। मगर नतीजा 'ढाक के तीन पात' रहा। पुलिस इंस्पेक्टर  दिमाग चक्करघिन्नी सा हो गया था। एक भी सुराग नहीं लग पा रहा था। वापस थाने लौटकर भी इंपेक्टर को चैन नहीं मिला। वो परेशान सा इसी केस के बारे में सोच रहा था। तभी थाने में उससे मिलने आया उसका एक दोस्त... डिटेक्टिव द्रोण... जो पेशे से एक खुर्राट प्राइवेट जासूस था। जिसे देखते ही इंपेक्टर कि सारी परेशानी काफूर हो गई।
"क्या बात है इंस्पेक्टर?? आज बड़े परेशान लग रहे हो?" द्रोण ने इं. के चेहरे पर उड़ती हवाइयां देखकर पूछा।

"क्या करूँ यार!! इस गोरमगढ़ वाले केस ने तो नाक में दम कर रखा है।"

परेशान स्वर में इं. आगे बोला...
"अभी कुछ दिन पहले अवतार सिन्हा के कॉटेज में उनकी लाश मिली थी और अब उसी गांव में लोग गायब होने लग गए है.... आज ही गोरमगढ़ जाकर आया हूं... लेकिन कहीं कुछ नहीं मिल रहा।" 
"क्या तुम पुलिस की कुछ मदद कर सकते हो द्रोण???" इं. ने द्रोण की तरफ देखते हुए कहा।
K
"ज़रूर यार!! पुलिस की मदद करने के लिए तो बन्दा हमेशा तैयार रहता है।"
"तुम मुझे जो जानकारी हो सकती है दे दो।"
इं. ने केस की फ़ाइल की एक कॉपी द्रोण को दे दी।

डिटेक्टिव द्रोण ने पूरे केस को गहनता से पढ़ने के बाद निष्कर्ष निकाला...
" ह्म्म्म..! लगता है इस केस की तफ्तीश के लिए सबसे पहले मुझे गोरमगढ़ जाना ही पड़ेगा.... पता नहीं क्यों मेरा मन कहता है कि प्रो. अवतार सिन्हा और गोरमगढ़ केस में कुछ न कुछ लिंक ज़रूर है।"
अगले ही दिन द्रोण अपनी जीप और ज़रूरी सामान लेकर गोरमगढ़ की ओर निकल पड़ा। पहाड़ी रास्ते को पार कर जब वो गोरमगढ़ पहुंचा तो तो वहां विलाप मचा था...

" हाय मेरा छगन... कहाँ चला गयाssss। ???" "कोई उसे वापस ला दो....!!!" रोते रोते वो महिला पछाड़ खा के गिर पड़ी।
 
द्रोण ने मामला जानने की कोशिश की तो किसी ने बताया...
"इस औरत का लड़का छगन कल रात से ही गायब है साहब। खेत पर गया था वो। वापस ही नहीं लौटा, न ही कोई खोज खबर है। न जाने किसकी नज़र लग गयी है गांव को.... लेकिन आप कौन है साहब??" उस आदमी ने अपनी नम आंखे पोछते हुए पूछा।

" मैं एक पत्रकार हूं बाबा। आपके गांव के हालात सुनकर ही यहां आया हूँ। यहां हो रहे घटनाक्रम को अखबार में छपवाऊंगा... तांकि सरकार, पुलिस गंभीरता से गांव के बारे में सोचे। उम्मीद है आप सब मेरा सहयोग करेंगे।"

"ज़रूर साहब.. ज़रूर... आओ मैं आपको मुखिया जी से मिला दूं।"

इस तरह द्रोण एक पत्रकार की हैसियत से गांव वालों बीच जगह बनाने में कामयाब रहा। मुखिया के यहां ही उसके ठहरने का इंतज़ाम भी हो गया और गांव के लोग उसको पूरा सहयोग देने को राजी हो गए।

द्रोण ने अगले दिन गोरमगढ़ में घूम कर लोगों से पूछताछ की। शाम को मुखिया के घर में अलाव तापते हुए वो विचारों में गुम था...
" यहां आकर ये पता चला है कि अब तक 7 लोग गायब हो चुके है। प्रत्येक व्यक्ति तभी गायब हुआ है जब वो अकेला और गांव की बाहरी जगह पर था। हर शिकार केवल रात में ही हुआ है.. दिन में नहीं।"
 डिटेक्टिव द्रोण का दिमाग तेजी से चल रहा था..."यानी अगर मुझे इस रहस्य तक पहुंचना है तो मुझे भी रात के वक़्त वीरान जगह पर अकेला जाना पड़ेगा!!.... लेकिन उस से पहले मुझे वो पॉइंट भी चेक कर लेना चाहिए जिसे मैं अब तक मिस कर रहा था। प्रो. सिन्हा का कॉटेज.... एक बार वहां भी जाकर देखना पड़ेगा। लेकिन वहां मैं कल दिन में जाऊंगा!" यही सोचते सोचते द्रोण की आंख लग गयी।

अगले दिन वो उठा और अपना बैग तैयार कर चल पड़ा प्रो. के कॉटेज की ओर।

आजकल उस कॉटेज की तरफ जाने से तो जानवर भी डरते थे। सुनसान पगडंडीनुमा सड़क पर हिचकोले खाती उसकी जीप कॉटेज की तरफ बढ़ रही थी। कुछ दूर पहले ही जीप छोड़कर वह धीरे धीरे कॉटेज की ओर बढ़ने लगा। उस जंगली सन्नाटे में दिन के समय भी रात जैसी शांति लग रही थी।  एकाएक डिटेक्टिव को एक झलक दिखी। वो पेड़ के पीछे छुपकर देखने लगा। एक अघोरी जैसे हुलिए वाला आदमी कॉटेज की तरफ बढ़ रहा था।

"ये कौन है?? और यहां क्या कर रहा है??" द्रोण आश्चर्य में पड़ गया।
वो उस अघोरी की तरफ दबे पांव बढ़ा।

अघोरी कॉटेज के पास जाकर रुक गया। उसने झोले से एक हड्डी निकाली और मन्त्र पढ़ने लगा। फिर हड्डी को जमीन से छुआ और कॉटेज के चारो ओर रेखा खींचने लगा। 

ये सब देखकर द्रोण का दिमाग सनसनाने  लगा। जैसे ही अघोरी अपना काम करके रुका द्रोण उस पर टूट पड़ा। अपने ऊपर हुए अचानक हमले से अघोरी चौंक पड़ा। लेकिन जल्दी ही सम्भल कर द्रोण पर प्रहार कर दूर धकेल दिया। अघोरी भागने लगा। लेकिन द्रोण से बचकर भागना मुश्किल था। द्रोण ने जल्द ही उसे काबू कर लिया। 
" बोलो कौन हो तुम?? और यहां कॉटेज के पास क्या कर रहे थे??"
 द्रोण ने कड़क स्वर में पूछा।
"गांव के लोगों के गायब होने का इस कॉटेज से कुछ न कुछ सम्बन्ध ज़रूर है... और ये तुम मुझे बताओगे।"

अघोरी पस्त हो चुका था। उसने समझौता करना ही बेहतर समझा। वो बोला..."मेरा नाम कपाल है। मैं एक तांत्रिक हूँ। मैंने और प्रो.अवतार सिन्हा ने मिलकर यहां एक जलजले को जीवन दे दिया था"....(फ्लैशबैक की तरह उसने गब्बार के जिंदा होने की कहानी सुना दी) जिसे सुनकर द्रोण उछल पड़ा। उसे अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ। 
"तो तुम आज यहां क्या करने आये हो?"द्रोण ने कड़क के पूछा।

"दरअसल मैं अपने आपको इस घटना का गुनहगार मानता हूं। मेरी वजह से ही आज वो भयानक मौत इन पहाड़ों में घूम रही है। मैं उसे नष्ट तो शायद नहीं कर सकता लेकिन उसे इस कॉटेज में बांध ज़रूर सकता हूँ। इस रेखा के वजूद में रहते वो कभी इस से बाहर नहीं आ सकेगा।"

" लेकिन हम उसे हमेशा के लिए तो बांध कर नहीं रख सकते ना। कुछ ही दिनों में ये रेखा बेअसर हो जाएगी। फिर हम क्या करेंगे??" द्रोण ने आशंका व्यक्त करते हुए पूछा।
 फिर उसने आगे पूछा.."कपाल.. क्या तुम बता सकते हो कि उसे कैसे मारा जा सकता है??"

कपाल गंभीर स्वर में बोला "उसे गोलियों या तलवारों से नहीं मारा जा सकता। वो इन सबसे परे जा चुका है।
अगर उसे मारना है तो उसका पूरा शरीर एक साथ पूरी तरह से नष्ट करना होगा।"

"ओह! फिर तो उसे अलग तरीके से ही मारना होगा।" द्रोण कुछ सोचते हुए बोला।

"अब मुझे जाने दो द्रोण... मैं तुमसे फिर मिलूँगा... ।"

"अगर मैं पुलिस वाला होता तो तुम्हें नहीं जाने देता। तुम जैसे बेवकूफ दुष्ट के कारण आज ये गांव सात लोगों को खो चुका है और न जाने कितने लोगों पर भयानक खतरा मंडरा रहा है। लेकिन मैं ये देख रहा हूँ कि तुम पश्चाताप की अग्नि में झुलस रहे हो और तुम्हे अपनी गलती का एहसास है। इसलिए मैं तुम्हे जाने देता हूं।"

 " मैं जाता हूं द्रोण... लेकिन इस कॉटेज में दिन मैं भी प्रवेश करने का प्रयास मत करना। इसमें साक्षात मौत विचरण कर रही है।" कहकर कपाल वहां से चला गया।

पूरे दिन द्रोण कॉटेज के आस पास के इलाके का मुआयना करता रहा। उसने कॉटेज के अंदर न जाना ही मुनासिब समझा। शाम को जीप लेकर गांव की तरफ लौटते हुए उसके दिमाग में पूरा प्लान फिट हो चुका था।
 गांव लौट कर आराम से अलाव तापते हुए चाय का कप लेकर वह अपनी योजना को अंतिम रूप दे रहा था। अगले दिन उसने गांव के चार पांच बहादुर लड़के चुने और जीप में बैठाकर कॉटेज की तरफ चल दिया ।अपने प्लान को अंजाम देने के लिए उसने कमर कस ली। सबसे पहले कॉटेज से गांव की तरफ जाने वाले पगडंडीनुमा रास्ते के बीचो बीच 8 फुट गहरा खड्डा खुदवाया और उसे बड़ी सावधानी से पेड़ की डालियों और पत्तों से छुपाकर ढकवा दिया। इस दौरान कुछ लड़कों को 100 लीटर पेट्रोल का केन लाने के लिए शहर भेज दिया गया।
 गढ्ढे का काम निबटा कर उसने गांव के लड़कों को वापस भेज दिया। वो उनकी जान खतरे में नहीं डालना चाहता था। द्रोण अब तैयार था। इधर गब्बार का मुर्दा कॉटेज से बाहर नहीं आ पा रहा था। कॉटेज उसकी गुर्राहटों से गूंजने लगा। अब बारी थी गब्बार को बाहर लाने की। द्रोण अब कॉटेज की ओर बढ़ा और जाकर वह रेखा मिटा दी और कॉटेज के पास छुपकर गब्बार के बाहर आने की राह देखने लगा। रात घिरने लगी। सियारों का रुदन शुरू हो गया। उल्लुओं की मनहूस आवाजें सन्नाटे में गूंज उठती। झींगुर तेज आवाज में शोर बिखेरने लगे। इस खून जमा देने वाले माहौल में कॉटेज के बाहर एक आहट हुई। एक भयानक घुटी हुई गुर्राहट के साथ गब्बार का मुर्दा धीरे - धीरे कॉटेज से बाहर निकला। द्रोण की नज़र उस पर जम गई। 

"हर्रर्रर्रर्रर्रर्ररssss.....हर्रर्रर्रर्रर्रर्रर ssss"
मुर्दे की गुर्राहट से द्रोण का कलेजा भी एक पल के लिए कांप उठा। अब बारी थी डिटेक्टिव द्रोण के प्लान के अगले चरण की। अपनी ज़िंदगी खतरे में डाल कर उसके सामने कूद गया वो। मुर्दे की आंखे चमक उठी। वह गुर्राता हुआ द्रोण की तरफ झपटा। चांदनी रात में वो भारी भरकम नीला पड़ा हुआ शरीर, लम्बे नाखून वाले भयानक हाथ और एसिड से जला वीभत्स चेहरा.... मजबूत दिल वाले की भी रूह फना करने के लिए काफी थे। 

"उफ्फ कितना भयानक है ये।" 
तुरंत अपने आप को संभाल के पगडंडी पर दौड़ पड़ा द्रोण। गब्बार उसके पीछे लपका। डिटेक्टिव का प्लान अब तक ठीक चल रहा था। अचानक अंधेरे में ज़मीन पर फैली बेलों से उलझ कर गिर पड़ा द्रोण। उसके प्लान में रुकावट आ गयी थी और ये रुकावट उसकी जिंदगी पर भारी पड़ने वाली थी। शैतान मुर्दा उसके निकट आ पहुंचा था। द्रोण की मौत उसके सामने खड़ी थी। तभी... एक अभिमंत्रित हड्डी का टुकड़ा गब्बार और डिटेक्टिव द्रोण के बीच आ गिरा। मुर्दा एकाएक पीछे हट गया। द्रोण की नज़र अपने मददगार पर पड़ी। कपाल वहाँ आ पहुंचा था। अभिमंत्रित हड्डी फेंक कर उसने द्रोण को तो बचा लिया लेकिन अब वो खुद भयानक खतरे में था। गब्बार अब कपाल की और बढ़ रहा था। इससे पहले कि कपाल वो अभिमंत्रित हड्डी उठा पाता गब्बार के  हाथ कपाल के सीने में जा धंसे।
"ही ही ही... भूख... भूख... खून...."

कपाल हलक फाड़ कर चीख उठा "आsssssss....."

अगले ही पल कपाल के जिस्म को बुरी तरह एक ही झटके में फाड़ डाला गब्बार ने। उसके टुकड़े उठा कर कॉटेज वाले रास्ते की तरफ मुड़ गया वो मुर्दा। लेकिन द्रोण उसे जाने नहीं देना चाहता था। उस भयानक दृश्य को देखकर अपने दिमाग पर काबू पाते हुए वो अभिमन्त्रित हड्डी लेकर मुर्दे की तरफ झपटा। हड्डी देखकर गब्बार पीछे हटने लगा। 

"हर्रर्रर्रर्रर्रर्रर ssss... हर्रर्रर्रर्रर्रर्रर sss की फुफकारे निकल रही थी उसके मुंह से।
उसने कपाल के शरीर को वहीं पटक दिया और धीरे धीरे पीछे हटने लगा। द्रोण उसे पगडंडी पर खोदे गए उस गढ्ढे की तरफ धकेलने लगा। गुर्राहट के साथ पीछे हटता गब्बार उस गढ्ढे में जा गिरा। इसी पल कई लीटर पेट्रोल की बौछार से भीग गया उसका जिस्म। शहर से मंगाए पेट्रोल का केन वहीं छुपा के रखवा दिया था द्रोण ने। भयानक तरीके से चीखता हुआ गढ्ढे से बाहर आने के प्रयास करने लगा वो मुर्दा। 
अगले ही पल द्रोण ने आग का एक शोला दाग दिया उस शैतान पर। भयंकर चीत्कार कर उठा वो मुर्दा। मानो पचासों भेड़िये एक साथ रो पड़े हों।
 रात का सन्नाटा उसकी गुर्राहटो से गूंज उठा। उसका शरीर धीरे धीरे राख में तब्दील होने लगा। पेट्रोल की आग काफी समय तक जलती रही। धीरे धीरे लपटें बुझने लगी। गढ्ढे में बाकी रह गयी गब्बार की कुछ हड्डियां और राख।

भोर का उजियारा फैलने लगा। एक भयानक आतंक का खात्मा हो चुका था। प्रकृति के साथ खिलवाड़ करने वाले भी भयानक अंत के भागीदार बने थे। गांव के लोग धीरे धीरे वहां इकट्ठा होने लगे। कपाल का अंतिम संस्कार कर दिया गया और उनकी अस्थियों के साथ ही गब्बार की हड्डियों का भी विसर्जन कर दिया गया। गांव वाले डिटेक्टिव द्रोण को धन्यवाद दे रहे थे।

द्रोण उस गांव से रोमांचक और भयानक यादें लेकर लौट पड़ा वापस शहर की ओर। ये सोचता हुआ कि...
"कौन विश्वास करेगा मेरी बातों पर...????"

समाप्त।

कहानी के बारे में अच्छे/बुरे विचार ज़रूर जानना चाहूंगा।

विदा।

Saturday, 15 January 2022

हत्यारा प्रयोग पार्ट-1

                            

इस दुनियां में हर इंसान खुद को श्रेष्ठ साबित करने की होड़ में जी रहा है। इस होड़ में कई लोग महत्वाकांक्षा की सीमाओं के परे जाने का प्रयास करने लगते है। यहां तक कि भगवान बन जाने के सपने तक देखने लगते हैं। ज़िन्दगी और मौत को अपने हाथों का खिलौना बनाने की सोच लेते है। महत्वाकांक्षा की हदों को तोड़ती ऐसी ही एक कहानी है.....



                           हत्यारा प्रयोग

सन 1991....
राजनगर में आयोजित एक सेमिनार। जिसमें देश के प्रसिद्ध जीव वैज्ञानिकों का जमावड़ा लगा है। यहीं अपने विचार व्यक्त कर रहे हैं जाने माने जीव वैज्ञानिक प्रोफेसर अवतार सिन्हा - "विज्ञान एक बहुत बड़ी चीज है। आज हमने विज्ञान में अभूतपूर्व तरक्की कर ली है। लेकिन कई रहस्य आज भी विज्ञान से परे हैं और हमें विज्ञान की सीमाओं से परे सोचने की भी ज़रूरत है। इसीलिए मैं कहता हूं कि विज्ञान और तंत्र मंत्र की शक्ति को एक साथ लाने की ज़रूरत है। हमें तंत्र मंत्र को नकार नहीं देना चाहिए क्योंकि कई बार विज्ञान जहां सफल नहीं हो पाता वहां मन्त्र शक्ति को कारगर साबित होते मैंने देखा है। इस कारण हमें ज़रूरत है कि विज्ञान के साथ साथ तंत्र मंत्र को भी जोड़ा जाए।"

सेमिनार हॉल में सन्नाटा छा गया। औपचारिक रूप से कुछ तालियां बजीं और प्रोफेसर सिन्हा अपनी सीट पर बैठ गए।
सेमिनार समापन पर बाहर निकलते अवतार सिन्हा के कानों में लोगों की बातें पहुंच रही थी। कोई बोला," ये प्रोफेसर सनकी हो गया लगता है।"
 "हाँ यार! जहां आज विज्ञान ने इतनी तरक्की कर ली है.. वहीं ये पढ़ा लिखा प्रोफेसर कैसी बहकी बहकी बातें कर रहा है!??"
"ये प्रोफेसर लोग आधे पागल ही होते है... लेकिन ये तो पूरा पागल निकला!" 
हा हा हा हा.....

ये ठहाके प्रोफेसर सिन्हा के दिमाग में धमाकों की तरह गूंज रहे थे। वो मन ही मन सोच रहा था..." बेवकूफों... जिस दिन मैं अपने प्रयोग में कामयाब हो गया उस दिन तुम सबके मुंह पर ताले लग जाएंगे।" मन मे कुढ़ता हुआ वो बाहर निकल गया।

राजनगर के निकट ही एक छोटे से गांव के बाहर पेड़ों के झुरमुटों से घिरा एक पुराना कॉटेज। जिसमें स्थित थी प्रो. अवतार सिन्हा की गुप्त प्रयोगशाला। दुनियां की नज़रों से छुपी इस प्रयोगशाला में किसी का भी प्रवेश निषिद्ध था। रात के 12:30 बजे, तूफानी रात... मूसलाधार बरसात.. बिजलियों की कड़कड़ाहट के बीच वो सूना कॉटेज पूरी तरह अंधेरे में डूबा था। जिसके बेसमेंट में सिर्फ एक बत्ती जल रही थी। वहीं अपने प्रयोग में डूबा प्रोफेसर... " बस अब अपने प्रयोग के अंतिम चरण में पहुंच चुका हूं मैं.. अगर सब कुछ ठीक रहा तो दुनियां का भगवान बन जाऊंगा मैं... ही ही ही!!"
तभी उस भयानक मौसम में अंधेरे में डूबे कॉटेज की डोर बेल बज उठी। प्रो. की तंद्रा अचानक से टूटी... "रात को 1 बजे कौन आ धमका यहां!!"



डोर बेल लगातार बज रही थी। दरवाजा भी जोर से ठोका जा रहा था। प्रो. न चाहते हुए भी बेसमेंट से बाहर निकल आया.... चिढ़ते हुए दरवाजे की बढ़ा।।  " इस वक़्त कौन हो सकता है??? दरवाजा नहीं खोलना चाहिए मुझे!!" 
तभी बाहर से आवाज आई, " दरवाजा खोलो.. दया कर के दरवाजा खोल दो। मुझे मदद की ज़रूरत है।"
प्रो. ने अपनी रिवॉल्वर निकाली और दरवाजा खोल दिया। दरवाजा खोलते ही एक आदमी सीधा अंदर घुस आया। बुरी तरह घायल... देखने में खूंख्वार डाकू सा हुलिया... बड़ी बड़ी दाढ़ी, बिखरे बाल, कमर पे बंधा गोलियों का पट्टा...।।
प्रो. एक पल में समझ गया कि ये कोई डाकू है। डाकू बिल्कुल मरणासन्न अवस्था में था। प्रो. उसे सहारा देकर नीचे बेसमेंट में ले आया और ऊपर जाकर खून के निशान बिल्कुल साफ कर दिए। तभी दरवाजे पर एक और दस्तक हुई। 
"कौन??" प्रो. घबराए स्वर में बोला।
" दरवाजा खोलो... पुलिस है।"
प्रो. ने दरवाजा खोला।
" क्या यहां कोई आया है??"
"जी नहीं.. पर बात क्या है इंस्पेक्टर साब?"
"गब्बार नाम का खतरनाक डाकू हमारी गोलियों से घायल होकर भागा है... उसी को ढूंढ रहे हैं।"
"मगर इस ओर तो कोई नहीं आया इं. साब!"
"ओह!ठीक है... आप दरवाजा बंद रखना और ऐसा कोई आदमी आये तो तुरंत हमें खबर करना।"
पुलिस चली गयी।
प्रो. तुरन्त बेसमेंट की तरफ लपका।
नीचे पहुंचते ही डाकू उस पर झपट पड़ा।
"ये ... ये.. क्या कर रहे हो!?? मैंने तुम्हें बचाया और तुम मुझ पर ही हमला कर रहे हो!!?"

डाकू लड़खड़ाते स्वर में बोला..."तुम्हें पहले पता नहीं था कि मैं पुलिस से भागा हुआ एक डाकू हूँ... लेकिन अब.. तुम मुझे पहचान चुके हो...आह... मैं अधिक समय तक होश में नहीं रहूंगा... लेकिन उस से पहले तुम्हे खत्म करना ज़रुरी है।"
इसी झोंक में प्रो. पर झपटा वो डाकू सीधा एसिड से भरे जार से जा टकराया। उसका चेहरा एसिड से सराबोर हो गया । एक भयानक चीत्कार के साथ घायल डाकू वहीं गिर पड़ा।
प्रोफेसर हतप्रभ सा कुछ पल उसे देखता रहा और अचानक खुशी के मारे उछल पड़ा..."वाह मेरे प्रयोग के लिए ताजा मृत शरीर यहीं बैठे बिठाये मिल गया। अब मुझे सफल होने से कोई नहीं रोक सकता।" पागलों की तरह अट्टहास लगाने लगा वो।मानो शैतान सवार हो गया था उस पर। कड़कड़ाती बिजलियों का शोर... तूफानी बरसात... ये माहौल किसी के भी होश उड़ाने के लिए काफी था। गब्बार के शरीर को टेबल पर लेटाकर कई उपकरण लगा दिए उसने। अगले ही पल बिजली सी दौड़ पड़ी उन उपकरणों में। अब प्रोफेसर अपनी कार लेकर रवाना हो गया अपने तांत्रिक दोस्त कपाल के डेरे की तरफ।अपनी साधना में लीन तांत्रिक कपाल प्रो. को उस वक़्त देखकर चौंक पड़ा..."तुम... इस वक़्त यहां..?? इसका मतलब तुम्हारा प्रयोग..??"

"हाँ..हाँ... मैं सफल होने जा रहा हूँ... हा हा हा हा हा.... कपाल... जल्दी मेरे साथ चलो.. हम दोनों अब भगवान बनने जा रहे हैं।"

जल्दी ही कार में सवार हो गए दोनों। मूसलाधार बरसात में वो कार बढ़ चली कॉटेज की ओर। जल्दी ही कॉटेज तक पहुंच गए वो।

बेसमेंट में - " देखो कपाल... इसके शरीर के मरते अंगों में फिर से एनर्जी दौड़ाई जा रही है। इसका शरीर फिर से जिंदा इंसान की तरह स्फूर्तिवान हो रहा है।बस इसकी आत्मा वापस शरीर में डालनी है। यहीं मुझे तुम्हारी ज़रूरत है!!"

"ज़रूर... मैं ये काम कर सकता हूँ! अब इसके उपकरण हटा कर इसका शरीर मुझे दे दो।"

कुछ ही देर में प्रोफेसर और तांत्रिक कपाल बेसमेंट के आंगन पर बैठे थे। तंत्र चित्रों से घिरा गब्बार का शरीर भी आंगन पर रखा हुआ था।

एक पल के लिए कपाल ठिठका, "प्रोफेसर... हम ठीक तो कर रहे हैं ना?? ये अप्राकृतिक कृत्य होगा। इसका परिणाम मैं भी नहीं जानता।"

" उफ्फ... समय नष्ट मत करो... मंज़िल के इतने करीब आकर अब ये सब सोचना व्यर्थ है, तुम क्रिया शुरू करो जल्दी।"
इसी के साथ कपाल शुरू हो गया। भयंकर  तरीके से मंत्रोच्चार गूंज रहा था बेसमेंट में। मौसम की भयानकता पूरे माहौल को सनसनीखेज़ बना रही थी। कुछ ही देर में तीव्र गड़गड़ाहट के साथ एक हल्की चमक शव से टकराई और मानो तूफान सा उठ गया बेसमेंट में। जैसे ही सब कुछ सामान्य हुआ...  शव झटके खाने लगा। गब्बार का शरीर धीरे धीरे हरकत में आने लगा था। 

हर्रर्रर्रर्रर्रर्रर..... फुफकार सी निकलने लगी उसके मुंह से। एसिड से जला मुंह... चिथड़े हुआ भयानक शरीर अकड़न तोड़ते हुए धीरे धीरे उठने लगा।

प्रो. के ठहाके गूंजने लगे। " मैं सफल हो गया.... मैं सफल हो गया... हा हा हा हा...."

"तुमने कमाल कर दिया प्रोफेसर...एक मृत शरीर को फिर से आत्मा झेलने के लायक बना दिया तुमने। ये असम्भव कार्य था। मैंने कई बार प्रयास किये लेकिन कोई मृत शरीर इस से पहले किसी आत्मा को नहीं झेल पाया था।" कपाल मानो उछलते हुए बोला।

"ये हम दोनों की जीत है कपाल... हम नए भगवान है दुनियां के... हा हा हा..!!"

"अभी जल्दबाजी मत करो प्रोफेसर... इसका परिणाम सामने आने दो। पता नहीं क्यों मेरा मन विचलित हो रहा है।"

कपाल का अंदेशा सही होने जा रहा था क्योंकि गब्बार का शरीर अब खड़ा हो चुका था और उसका भयानक चेहरा सुर्ख आंखों से उन दोनों की ओर खतरनाक अंदाज़ से देख रहा था।गब्बार धीरे धीरे विक्षिप्त की भांति दोनों की ओर बढ़ने लगा।

"रुको गब्बार... मेरा हुक्म है रुक जाओ।" कपाल चिल्लाया।

लेकिन गब्बार न रुका... उसके मुंह से एक भयानक हंसी निकली..." ही ही ही ही ही ही... भूख लगी है मुझे... खून.. खून... भूख..."

" उफ्फ ये हमने क्या कर दिया" कपाल चिल्लाया..."प्रोफेसर कुछ करो... कुछ करो..."

"उफ्फ.. ये तुम्हारी बात क्यों नहीं मान रहा कपाल???" प्रोफेसर घबराए स्वर में बोला।

"पता नहीं... ये मेरे काबू में नहीं है प्रोफेसर..."

तभी प्रोफेसर ने अपनी रिवाल्वर की सारी गोलियां गब्बार पर झोंक मारी।
गब्बार अब प्रो. की तरफ मुड़ गया। प्रो. भय से चिल्ला उठा.."ब... ब..बचाओssss....कपाल मुझे बचाओ...!!" गब्बार ने आगे बढ़कर प्रो. को दबोच लिया।
ये देखकर कपाल वहां से  भागने लगा।
"रुक जाओ कपाल... मुझे छोड़कर मत जाओ... बचाओ मुझेsss..."
लेकिन कपाल भाग निकला।
गब्बार ने प्रोफेसर की खोपड़ी भींच डाली। उसकी आंखें उछल कर बाहर आ गिरी। गब्बार अब बिल्कुल अकेला था बेसमेंट में। वह प्रो. की लाश पर टूट पड़ा।

बाहर दिन की रोशनी फैल रही थी। अगले कुछ दिनों तक शांति छाई रही। कपाल ने किसी को कुछ नहीं बताया। वो अंडर ग्राउंड हो गया । प्रो. की गुमशुदगी की रिपोर्ट होने पर पुलिस खोजबीन करती कॉटेज में पहुंची।
बेसमेंट में लगे टूटे फूटे उपकरणो और मानव अंगों से भरे जार के अलावा पुलिस को प्रोफेसर सिन्हा की बुरी तरह नोची गयी आधी अधूरी सी लाश मिली।
"ओह... इतना ब्रूटल मर्डर तो कोई इंसान नहीं कर सकता। ये काम ज़रूर किसी जानवर का है... या किसी शैतान का।"


पुलिस इस गुत्थी को समझ नहीं पा रही थी।

धीरे धीरे मामला ठंडा होने लगा। पुलिस इस हत्याकांड की कोई जानकारी नहीं जुटा सकी।

क्या पुलिस इस रहस्य से पर्दा उठा पाएगी?
क्या प्रो. अवतार सिन्हा के प्रयोग का सच सामने आ सकेगा?
ज़िंदा हुआ गब्बार का मुर्दा अब क्या कहर ढायेगा?
क्या कोई रोक पायेगा उस शैतान को?


जानने के इंतज़ार कीजिये... अगले अंक का।
विदा।

किले का शैतान (पार्ट - 2)

किले का शैतान   (पार्ट - 2)  पिछले अंक में आपने पढ़ा...  मैनागढ़ के किले में गए एक शोध दल ने वहां जाकर छानबीन की। अनजाने में उन्ह...