Wednesday, 3 February 2021

सिंघा की बेटी पार्ट -2

पिछला शेष.....

सिंघा की बेटी 



महाराजा परम सिंह ने अपनी सेना दो भागों में बांट दी। एक उनके स्वयं के नेतृत्व में आगे मैदान में जाकर शत्रु सेना से लोहा लेगी। दूसरी किले में रहकर किले की रक्षा करेगी।

आज मरने मारने का दिन था। राजपूत योद्धाओं की भुजाएं फड़क उठी थी। अपनी जन्मभूमि और कर्मभूमि पर आए संकट को पीछे धकेलने के लिए वो रणबांकुरे आज साक्षात यमराज से टकराने को भी आतुर थे। हर हर महादेव के नारों से गगन गूंज उठा। मानो हर वीर ने केसरिया करने की ठान ली थी। दोनों सेनाएं धूल के गुबार उड़ाते एक दूसरे के सामने डट गयी। कोई किसी का पक्ष मानने को तैयार नहीं था। 

सल्तनत की विशाल सेना का नेतृत्व कर रहा था कल्लन खां... जो एक क्रूर सरदार के रूप में कुख्यात था। उसके बारे में प्रसिद्ध था कि वो युद्ध मैदान में शत्रु को हाथों से ही फाड़ डालने की क्षमता रखता था। कल्लन खां ने एक चेतावनी दी... " महाराजा परम सिंह! तुम्हे एक आखिरी मौका दिया जाता है। अभी भी वक्त है... हमारे सुल्तान का फरमान मान लो... और अपनी रियासत बचा लो।"

"कल्लन खां ssss... तुम अपनी जान की खैर मनाओ। आज तुम में से एक भी जीवित नहीं लौटेगा। हमारी शरण मे आ जाओ और अपने सुलतान को भी यही मशविरा दे दो। हम तुम्हे अभयदान दे देंगे।" परम सिंह ने मूंछो को ताव देते हुए कहा। 
कल्लन खां गुस्से से आग बबूला हो उठा। उसने जंग का आगाज़ कर दिया। भयानक संघर्ष छिड़ गया। दोनो तरफ से भीषण रक्तपात होने लगा। परम सिंह की सेना ने गज़ब का रणकौशल दिखाया। कल्लन खां हैरान रह गया। राजपूती खून का उबाल उसे ख़ौफ़ज़दा कर रहा था। वह मन ही मन अपने परवरदिगार को याद करने लगा। जैसे तैसे सांझ हुई। युद्ध रुक गया। कल्लन खां समझ गया कि परम सिंह को युद्ध मे सीधे सीधे हराना नामुमकिन है।
उसने वही कुटिल चाल खेली जो उससे पहले के सरदार और सुल्तान खेलते आये थे। उसने रातों रात अपने कुछ गुप्तचर परम सिंह के खेमे में भेज दिए। गुप्तचर एक भारी भरकम प्रस्ताव लेकर गए और हर बार की तरह यहां भी उन्हें कुछ गद्दार मिल ही गये। अंदर ही अंदर सौदा हो गया और परम सिंह के कुछ गद्दार सरदारो ने उसे कल्लन खां के हाथों बेच दिया। 
अगले दिन जब रणघोष हुआ तो महाराजा परम सिंह की सेना ने अद्भुत शौर्य दिखाया। लेकिन ऐन वक्त पर परम सिंह के कुछ सरदार दगा दे गए। परम सिंह ने भयंकर युद्ध किया। अपने सरदारों के विश्वासघात के कारण रणपुर का वह सपूत युद्ध भूमि में खेत रहा। 
सुल्तान की सेना अब किले की और बढ़ चली। महारानी वनपुत्री तक ये समाचार पहुंच गए। महिलाएं जोहर की तैयारी करने लगी। इसी बीच वनपुत्री चीख पड़ी...
" नहींssss... जोहर की अग्नि में जलूँ, अभी ये धर्म नहीं निभा सकूंगी मैं। जोहर की उस अग्नि से अधिक भयानक अग्नि मेरे अंदर धधक रही है। प्रतिशोध की अग्नि। जिसने मेरे सुहाग की हत्या की उसे मिटाए बिना मैं मृत्यु का वरण नही  करूंगी।" 

हर हर महादेव का जयघोष किले में गूंज उठा। किले की रक्षा में तैनात राजपूत सरदार वनपुत्री का  रणचंडी रूप देखकर हतप्रभ रह गए। उनकी भुजाएं फड़क उठी। महारानी के हाथों सेना की बागडोर सौंप दी गयी। वनपुत्री के नेतृत्व में सभी राजपूत सरदार किले के फाटक खोल कर मैदान में आ डटे। इसी दिन काजू तोता भी रणपुर पहुंचा। सिंघा ने उसे अपनी बेटी का हाल जानने भेजा था। काजू ने तुरंत सारा माजरा समझ लिया। वो फ़ौरन सिंघा के पास लौटा और रणपुर की हृदयविदारक स्थिति का हाल उसे सुना दिया। अपनी बेटी पे आये इस संकट ने सिंघा को बेचैन कर दिया। आवेश में उसने एक भयंकर गर्जना की। जंगल का पत्ता पत्ता कांप उठा। जानवर और पक्षी हड़बड़ा कर भागने लगे। उस हुंकार के आगे मेघों की गर्जना का मान मर्दन हो गया। तत्काल वो बूढा सिंह रणपुर की और दौड़ लगा गया। अब वो तब तक नहीं रुक सकता था जब तक अपनी बेटी को सुरक्षित नहीं देख लेता। 
इधर कल्लन खां सेना सहित किले तक पहुंच चुका था। 
किले की रक्षा में खड़ी मुट्ठीभर  सेना को देखकर उसने कहकहा लगाया जब उसने देखा कि उन सरदारों का नेतृत्व महारानी वनपुत्री के रूप में एक नारी कर रही है तो उस पर भी व्यंग्य कसे। 
राजपूत सरदारों का रक्त खौल उठा। जय भवानी... हर हर महादेव के नारे लगाते वो शत्रु सेना पर टूट पड़े। मुट्ठीभर सेना उस विशाल सेना के सामने कब तक टिकती। एक एक कर के वीर राजपूत खेत होने लगे। कल्लन खां के कहकहे गूंज रहे थे। उसकी हंसी वनपुत्री के हृदय में कटार की भांति चुभ रही थी। आखिर लड़ते लड़ते रानी घायल होने लगी। उसका घोड़ा भी थक चुका था। शत्रु सैनिक उसे घेरने लगे। उसका घोड़ा निष्प्राण होकर गिर पड़ा। अब वो हाथों में तलवारे लिए धरती पर घुटनो के बल बैठी थी।  कल्लन खां मौका देखकर उसके पास आने लगा। इसी क्षण शत्रु सेना में खलबली मच गई सेना का एक हिस्सा बुरी तरह भयभीत होकर भागने लगा। एक भयानक दहाड़ सी गूंज उठी। सिंघा वहां पहुंच चुका था। शत्रु सैनिकों को एक एक पंजे से ढेर करता....  सेना को चीरता हुआ वो वनपुत्री ओर बढ़ रहा था। सिंघा की आवाज सुनकर वनपुत्री में मानों जान आ गयी। तलवारों को ज़मींन पे टिकाए... जय भवानी का घोष करते वो धीरे धीरे उठ खड़ी हुई। सिंघा उस तक आ पहुंचा। सिंह को सामने देखकर कल्लन खां कांप उठा। सिंघा उसी तरह वनपुत्री आगे झुक गया जैसे वर्षों पहले उस 5 साल की बच्ची के आगे झुका था। वनपुत्री भी उस पर उसी तरह सवार हो गयी जैसे छोटी बच्ची के रूप में सवार हुई थी। सिंघा पर बैठते ही वनपुत्री ने जय भवानी का पुनः घोष किया और सिंघा ने लगाई गगनभेदी दहाड़। सामने खड़े कल्लन खां को वनपुत्री अब साक्षात रणचंडी प्रतीत होने लगी। शत्रु सेना को रौंदते हुए सिंघा पर सवार वो कल्लन खां की ओर दौड़ी। कल्लन ख़ाँ हाथी पर सवार था। वो होदे में दुबकने लगा। सैनिकों ने कल्लन खां को बचाने के लिए तीर और भाले चला दिए। तीर और भाले वनपुत्री और सिंघा के शरीर को भेदने लगे। लेकिन सिंघा  के कदम न रुके। दौड़ते हुए सिंघा कल्लन खां के निकट पहुंच गया। उसने एक लंबी छलांग भरी और हाथी के मस्तक पर पंजे टिका दिए। वनपुत्री ने तलवार चला दी । कल्लन खां होदे में दुबक कर बच गया। इसी के साथ सिंघा हाथी के मस्तक से पुनः उछला और वनपुत्री ने दूसरे हाथ में थमी तलवार घूमा दी। इस बार न बच सका कल्लन खां। अगले ही पल कल्लन खां का सिर हवा में उड़ता हुआ ज़मीन पे लोटने लगा। सुल्तान की सेना में भगदड़ मच गई। वनपुत्री की प्रतिज्ञा पूर्ण हुई। उसका प्रतिशोध पूरा हुआ।

सिंघा के पैर जमीन पे आ टिके।  सिंघा और वनपुत्री बुरी तरह घायल ... भूमि पर गिर पड़े। सुल्तान की सेना मैदान छोड़ कर  भाग रही थी। 

वनपुत्री का रक्त भूमि पर बहने लगा। रणपुर की भूमि ने मानो उसे अपनी हथेलियों में ले लिया। दोनों बहादुर पिता पुत्री ने अपने प्राण त्याग दिए। दोनो रणभूमि में ऐसे लेटे थे मानो पिता अपनी पुत्री को सुला रहा हो। 
इस वीरता पूर्ण  त्याग को रणपुर की भूमि सदैव याद रखेगी और गर्व करेगी।

"खून में लथपथ... बनी विजेता... आज धरा पर लेटी थी....
इतनी झुझारू... इतनी बहादुर... वो सिंघा की बेटी थी।"

हाँ वो सिंघा की बेटी थी।

समाप्त।
 

सिंघा की बेटी पार्ट-1

 यह कोई डरावनी कहानी नहीं बल्कि कल्पना आधारित एक बाल कथा है। आशा है आपका भी मनोरंजन करेगी।

    सिंघा की बेटी
  


खतरनाक बियाबान जंगल मे आधी रात को दौड़ता घोड़ा। घोड़े पे सवार एक व्यक्ति और 5 वर्ष की मासूम सी बच्ची।
घुड़सवार बुरी तरह घायल था। कभी भी उसकी जान जा सकती थी। कड़कती बिजलियाँ और तूफानी हवा के बीच दौड़ते उस घोड़े की शायद कोई मंज़िल नहीं थी।...

आखिर कौन था ये घुड़सवार...(फ्लेशबैक)

(राजस्थान का एक छोटा सा राज्य मोरगढ़। जिस पर आज छा रहे थे संकट के बादल। अपनी विशाल सेना लिए मोरगढ़ की तरफ बढ़ रहा था दिल्ली सल्तनत का एक तूफान। जिसकी अगुवाई कर रहा था सरदार अकरम खान।
मोरगढ़ के महाराजा वीर सिंह ने भी पूरी तैयारी कर रखी थी। दोनों सेनाओं में भीषण रण छिड़ गया। टक्कर भयानक थी। मोरगढ़ के रणबांकुरे संख्या में कम थे पर एक बार तो उन्होंने सुल्तान की सेना के पैर उखाड़ दिए। लेकिन ऐन वक्त पर महाराजा वीर सिंह के कुछ गद्दार सरदार अकरम खान के हाथों बिक गए। वीर सिंह इस गद्दारी के कारण जीता हुआ युद्ध हारने लगे। आखिरकार अपने विश्वस्त सरदारों द्वारा प्रार्थना करने पर वे नन्हीं राजकुमारी को लेकर पलायन कर गए। उनके सरदार उनकी रक्षा करते हुए बलिदान हो गए। ......)


अब महाराज को घायल अवस्था में लिए घोड़ा उस जंगल मे दौड़ा जा रहा था।...

आखिर एक जगह महाराज निष्प्राण होकर घोड़े से गिर पड़े। सवार के गिरते ही घोड़ा भी रुक गया। नन्हीं राजकुमारी भी घोड़े से गिर पड़ी। उसका रुदन जंगल के पेड़ों को कंपकंपा रहा था। तूफानी हवाएं भी उसके रुदन से दहल रही थीं। प्रकृति का ये निर्दयी रूप देखकर आसमान भी रो पड़ा। 

अचानक एक सिंह की दहाड़ से गूंज उठी चारों दिशाएं। घोड़ा बिदक कर भाग गया। अब वो अकेली बच्ची उस बियाबान में एक सिंह के शिकार के रूप में खड़ी थी।
सिंह झाड़ियों के पीछे से निकला। धीरे धीरे राजकुमारी की तरफ बढ़ रहा था। बच्ची का रोना भय के मारे और तेज हो गया। उसके पैर जड़ हो गए। सिंह उसके बिल्कुल करीब आ चुका था। एक तेज दहाड़ के साथ वो गरजा। बच्ची ने अपना अंत जानकर आंखे बंद कर ली । 

लेकिन आश्चर्य... वो खूंखार सिंह,... जिसकी आंखों में अभी वहशियत नाच रही थी,.. अचानक शांत हो गया। वो उस बच्ची को शांत भाव से देखने लगा। शायद उसके मन में कोई भावना सी जगी और उसने उस बच्ची को प्रेम से चाटना शुरू कर दिया। ये किसी चमत्कार से कम न था। नन्ही  राजकुमारी अब धीरे धीरे शांत होने लगी। सिंह उसके पास बैठ गया। और अपने कंधे उनके आगे झुका लिए। बच्ची ने इशारा भांप लिया और उस पर सवार हो गयी। सिंह उस बच्ची को लेकर घने जंगल में गुम हो गया। 

ये सिंह... जिसे जंगल के सारे जानवर सिंघा के नाम से जानते थे। जो अपने  शौर्य के लिए पूरे जंगल में प्रसिद्ध था। कोई प्रतिद्वन्दी अब तक उसके आगे टिक नहीं पाया था। अपने यौवन के प्रथम चरण पे खड़ा ये बलिष्ट सिंह अब उस नन्ही राजकुमारी का रक्षक बन गया था। शीघ्र ही पूरे जंगल मे ये खबर फैल गयी कि सिंघा ने एक मानव बच्ची को अपनी बेटी बना लिया है। कोई जानवर उस नन्हीं बच्ची की तरफ आंख उठाकर भी नहीं देखता था। वो बेखौफ होकर जंगल मे स्वच्छंद विचरण करने लगी। नन्हीं गिलहरियों से लेकर भयानक जानवर भी उसके मित्र बन गए। वो अब जानवरों के बीच रहके उनकी बोली समझने लगी। धीरे धीरे सिंघा की छत्र छाया में वो जंगली जीवन मे घुलने मिलने लगी। सिंघा उस से बहुत अधिक स्नेह करने लगा। वो सच मे उसे अपनी बेटी ही मानने लगा। एक पिता की भांति उसे शिकार करना, अपनी रक्षा करना और जंगल के तौर तरीके सिखाता। राजकुमारी भी पारंगत होती गयी। समय पंख लगाकर उड़ता जा रहा था। राजकुमारी हिरनियों के साथ खेलती, पक्षियों से बतियाती धीरे धीरे बड़ी हो रही थी। जंगल मे रहते हुए भी उसमें जंगलीपन नहीं आया था। स्वभाव में गंभीरता, कोमलता, जीवों के प्रति दया जैसे गुण शायद उसको 5 वर्ष तक मिले संस्कारों के कारण उसमें अभी भी विद्यमान थे। उसके अवचेतन मन में कुछ पुरानी छवियां छपी हुई थी। वो नहीं जानती थी कि वो कौन है पर कुछ धुंधली यादें कभी कभार उसके मस्तिष्क में छा जाती।
वो खुद को सिंघा की बेटी ही मानती थी। राजकुमारी अब सयानी होने लगी।... उसकी सुंदरता भी एक राजकुमारी की ही तरह निखरने लगी।

एक दिन राजकुमारी जंगल में हिरन के बच्चों के साथ अठखेलियाँ कर रही थी कि तभी उसकी नज़र एक मानव पर पड़ी। उस भयानक वन में कभी कोई मानव उसने नहीं देखा था। उस तरफ आने का साहस कोई मानव नहीं करता था। उसने पहली बार किसी मानव को देखा था। जो उसके जैसा था। उसके हाथ, पैर शरीर उसके जैसा ही था। वो उस मानव को देखकर आश्चर्य में पड़ गयी और छुप के उसे देखने लगी। वो मानव असल में रणपुर रियासत का राजकुमार परम सिंह था जो शिकार की तलाश में जंगल के उस घने हिस्से तक आ पहुंचा था। राजकुमारी उस सजीले नौजवान को देखकर आकर्षित हो गयी। वो समझ ही नहीं पा रही थी कि ये कौनसी भावना उसमे जन्म ले रही है। उसके मन में भय जगा.. कही सिंघा ने उस राजकुमार को देख लिया तो वो उसे मार डालेगा। यही सोचते हुए वो ओट से बाहर निकल आयी। शायद राजकुमार को किसी प्रकार सावधान करना चाहती थी। अब राजकुमार की दृष्टि भी राजकुमारी पर पड़ी। पत्तियों की वेशभूषा में ढंकी वो सुंदर वन कन्या....  उसे देखकर परम सिंह हतप्रभ रह गया। उसने राजकुमारी को पुकारा... " आप कौन है देवी?"
लेकिन वो क्या जवाब देती?? उसे इंसानी भाषा की समझ नही थी। वो इशारे से परम सिंह को भगाने लगी। परम् सिंह समझ नहीं पा रहा था। लेकिन आखिर वो वहां से चला गया। 
अब दोनों ही एक दूसरे के बारे में सोचने लगे। राजकुमारी ने पहली बार इंसान देखा था... सजीला सा नौजवान। वो दोबारा उसे देखना चाहती थी। उधर राजकुमार भी जंगल मे मिली उस सुंदर युवती के बारे में सोच सोच कर हैरान हो रहा था। वो उसके बारे में जानने को उत्सुक था। वो भी उससे दोबारा मिलना चाहता था।

अगले ही दिन परम सिंह दोबारा उसी स्थान पर आ पहुंचा। राजकुमारी भी उत्सुकता वश पुनः उस स्थान की तरफ खींची चली आई। दोनों का आमना सामना हो गया। इस बार राजकुमारी ने उसे भगाया नहीं। वो जानना चाहती थी कि वे कौन है?? कहाँ से आया है??..
राजकुमार भी उस सुंदर वनकन्या के बारे में जानने को उत्सुक था। दोनों एक दूसरे को देखते हुए पास आ गए। राजकुमारी ने हाथ बढ़कर परम सिंह के चेहरे को छूकर देखा। परम सिंह भी उसे एकटक देखता रहा। थोड़ी ही देर में परम सिंह समझ गया कि ये वन कन्या मेरी बोली नहीं समझ सकती। वो भी इशारों में बात करने लगा। दोनों बिना बोले इशारों में बतियाने लगे.... हंसने लगे।  राजकुमार अब रोज उससे मिलने उस स्थान पर आने लगा। दोनो काफी घुल मिल से गये थे। राजकुमारी का सौम्य स्वभाव परम सिंह को लुभा गया। राजकुमारी उसे अपने जंगल के दोस्तो से मिलाती। हिरण, गिलहरियां, पक्षी अब राजकुमार के आदि हो गए। उनका मिलना जुलना जारी रहा।

एक दिन जब राजकुमारी और परम सिंह साथ हंस खेल रहे थे अभी अचानक सिंघा उस ओर आ गया। उसने राजकुमारी को एक इंसान के साथ देख लिया। उसकी आँखों मे क्रोध उमड़ आया। किसी अनहोनी ने उसके मन को हिला के रख दिया। वो भयंकर गर्जना करते हुए परम सिंह की तरफ बढ़ा। परम सिंह ने भी तलवार खींच ली। सिंघा झपट ही पड़ता परम सिंह पर। तभी राजकुमारी दौड़ कर बीच मे आ गयी और सिंघा से रोती हुई याचना करने लगी।   

उसे रोता देखकर सिंघा पीछे हट गया। वो समझ गया अब उसकी बेटी सयानी हो रही है। अब उससे बिछड़ने का वक़्त आ ही गया है। सिंघा ने राजकुमारी को दुलारते हुए कहा "बेटी... मैं जानता हूं... तुम एक मानव कन्या हो। वर्षो पहले मैंने तुझे इस जंगल में अकेली पाया था। मैं स्वभाव से हिंसक पशु हूँ लेकिन तुझे देखकर मेरी सारी हिंसा चली जाती है।शायद किसी जन्म में मैं सच में तेरा पिता रहा होऊंगा।... लेकिन अब मैं तुझे बांध के नहीं रख सकता। 
 अब मैं तुझे तेरा जीवन जीने के लिए मुक्त करता हूँ। शायद अब तेरा साथ इस युवक के साथ ही लिखा है। जा... बेटी...लेकिन अपने इस पिता को सदा याद रखना... जीवन में कभी भी ज़रूरत पड़ी तो तेरा पिता तेरी सहायता के लिए मौजूद रहेगा। अब जा....." भीगी पलकें लिए सिंघा जंगल की और लौटने लगा। राजकुमारी दौड़ के सिंघा के गले लग गई। उसकी आँखों से भी अश्रुधारा फुट पड़ी। किसी पिता द्वारा अपनी पुत्री की ऐसी विदाई उस जंगल ने पहले नहीं देखी थी। जंगल का हर पशु, हर पक्षी आज उदास था।

परम सिंह उनके वार्तालाप को तो नहीं समझ पाया लेकिन परिस्थिति को समझ गया। उसने राजकुमारी की तरफ अपना हाथ बढ़ाया। राजकुमारी ने परम सिंह का हाथ थाम लिया। 
राजकुमार परम सिंह राजकुमारी को लेकर अपनी रियासत में आ पहुंचा। जहां ढोल नगाड़ों के साथ उनका स्वागत किया गया। राजकुमार बहू लेकर पधारे है इस समाचार को सुनकर पूरा नगर झूम उठा। महाराज ने भी बहू को अपनाते हुए विधि पूर्वक उनका विवाह करा दिया। पूरे राज्य में उत्सव मनाया गया। अब राजकुमारी जंगल से महलों में आ गई थी। कुछ ही समय में उसने महल के तौर तरीकों को समझ लिया। राजकुमार ने उसका नाम 'वनपुत्री' रख दिया। राजकुमार के प्रेम और सम्बल से उसने वहां की बोली भी सिख ली। 1-2 वर्षों में ऐसा लगने लगा मानो वो राजकुमारी जंगल से नहीं बल्कि किसी रियासत से ब्याह के लायी गयी हो। उसके अंदर नैसर्गिक राजसी गुण विद्यमान थे। राजकुमारी वनपुत्री को शस्त्र विद्या सीखने का बहुत शौक था। शायद बहादुरी का ये गुण उसके पिता से विरासत में मिला था उसे। राजकुमार ने उसके लिए शस्त्र विद्या सीखने का पूरा बंदोबस्त के दिया। कई बार राजकुमार खुद उसके साथ शस्त्र विद्या का अभ्यास करता। जल्दी ही वनपुत्री हर प्रकार के शस्त्र चलाने में पारंगत हो गयी। राजकुमार उसका कौशल देख कर दंग था। इस दौरान सिंघा काजू नाम के तोते को वनपुत्री के पास भेजकर उसके  हाल चाल जानता रहता। काजू अक्सर सिंघा को राजकुमारी के शस्त्र कौशल की बाते सुनाता। जिसे सुनकर सिंघा का सीना फूल जाता। उसे अपनी बहादुर बेटी पर गर्व था। सिंघा अब बूढा हो रहा था। वो ये जानकर निश्चिंत था कि उसकी बेटी सुखी है। समय बीतने लगा...  महाराज की अकस्मात मृत्यु हो जाने पर राजकुमार परम सिंह अब महाराज बन गए। राजकुमारी वनपुत्री अब रणपुर की महारानी बन गयी। आनंद से जीवन व्यतीत हो रहा था। 
अचानक एक दिन महाराजा परम सिंह के दरबार में एक दूत का आगमन हुआ।
"महाराज की जय हो।" दूत अभिवादन करते हुए परम सिंह के सामने झुक गया।
"कहो क्या कहना चाहते हो।" परम् सिंह बोले।
"महाराज!... मैं अपने सुल्तान की तरफ से एक पैगाम लेकर आपके सामने पेश हुआ हूं।... "
"हाँ... आगे बोलो...!" परम सिंह ने कहा।
"महाराज... हमारे सुल्तान पूरे हिंदुस्तान पर एक हुकूमत चाहते हैं। वो चाहते हैं कि आप अपनी रियासत समेत उनकी पनाह में आ जाये। बदले में आपको और आपकी रियासत को महफूज़ रखा जाएगा। और..."

"बसssss....." महाराज परम सिंह चिल्ला उठे। फिर बोले, " अगर हम इनकार कर दे तो।??"
"तो.. महाराज आपकी रियासत मिट्टी में मिला दी जाएगी... तबाही का खेल शुरू होगा.. और आपकी हस्ती मिटा दी जाएगी। और..... "
"और क्या...????" परम सिंह ने क्रोध से कांपते हुए पूछा।

" और... (दूत लड़खड़ाते स्वर में बोला....)... और महाराज....हमारे सुल्तान ने कहलवाया है कि अगर आपने ये फरमान नहीं माना तो.... महारानी वनपुत्री को..."


"खामोश... दुष्टsssss!!!... महारानी का नाम अपनी जिव्हा पर लाने की धृष्टता न करना।" ये कहते हुए महाराज ने तलवार खींच ली। इसी के साथ पूरे दरबार मे तलवारे खींच गयी।

दूत कांप उठा। "महाराज... बन्दा सिर्फ अपने मालिक का हुक्म बजा रहा है।"
"अगर तू दूत न होता तो तेरी गर्दन आज यहां हमारे चरणों मे लोट रही होती।... इसी पल दरबार से निकल जाओ और अपने सुल्तान से कह देना कि रणपुर को भयभीत करने की चेष्टा न करें। हम तलवारों के साये में ही जीने वाले लोग हैं। अगर अपनी भलाई चाहते हो तो इस ओर रुख करने की कोशिश भी मत करना। अब निकल जाओ।" परम सिंह ने पूरे आवेश के साथ कहा।

दूत सरपट निकल लिया।
युद्ध की तो अब ठन ही चुकी थी। रणभेरियाँ बज उठी। सल्तनत का लाव लश्कर अब रणपुर की तरफ बढ़ने लगा।
विशाल सेना... मानो पूरा इंसानी समुद्र रणपुर की ओर बढ़ा चला आ रहा हो।

कहानी जारी है......

Monday, 1 February 2021

खूनी ख्वाहिश

इस कहानी का किसी जीवित, मृत व्यक्ति अथवा घटना से कोई संबंध नहीं है। यदि ऐसा होता है तो मात्र संयोग ही होगा।



ज़िन्दगी में हमारे आस पास बहुत कुछ घटित होता है। किसी घटना को हम गंभीरता से लेते है तो किसी पर ध्यान तक नहीं देते। लेकिन जो कुछ हमारे आस पास हो रहा है  ज़रूरी नही कि वो सामान्य हो। कई बार सामान्य लगने वाली घटना ज़िंदगी बदल देती है। हम क्या कर रहे है, क्या सोच रहे है इस पर सबकी नजर रहती है और हमारी सफलता देख कर न जाने कब, किसके मन में  जाग जाये....
खूनी ख्वाहिश।






(सन 1992)

समर थियेटर....। राजपुर का सबसे प्रसिद्ध एवं लोकप्रिय थियेटर। यहां होने वाले नाटक दूर दूर तक सुर्खियों में रहते थे। थियेटर में लोगों का बढ़ता हुजूम इस बात का परिचायक था। समर थियेटर की  बढ़ती   प्रसिद्धि  बेेवजह नहीं  थी।



इस प्रसिद्धि का कारण थे थियेटर के दो कलाकार विश्वास और प्रभाकर। दोनों की  अभिनय कला का कोई सानी नहीं था। दोनों ही कलाकार बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। अभिनय में दोनों एक दुसरे से कम नहीं थे। ज़ाहिर था एक ही क्षेत्र में दोनों प्रतिस्पर्धी थे तो अहम का टकराव और ईर्ष्या होनी ही थी। लेकिन वो ईर्ष्या एक तरफ़ा थी। प्रभाकर विश्वास से मित्रवत व्यवहार रखता था लेकिन विश्वास ने मित्रता की चादर ओढ़े अंदर ईर्ष्या छुपा रखी थी। ये जलन तब और बढ़ने लगी जब प्रभाकर के कदम और आगे बढ़ने लगे।
दोनो कलाकार न योग्यता में कम थे न मेहनत में। लेकिन कहते है न... कि मेहनत और काबिलियत के साथ किस्मत का होना भी जरूरी होता है। यही किस्मत प्रभाकर का पलड़ा भारी कर रही थी। लोग प्रभाकर को ज्यादा चाहते  थे। हर नाटक के बाद प्रभाकर को ज्यादा तारीफे मिलती। धीरे धीरे प्रभाकर लोगों के दिलों पर छाने लगा और विश्वास पीछे छूटने लगा। यहीं से उसकी ईर्ष्या एक विषबेल में तब्दील होने लगी। 

नाटक के कलाकारों में एक और भी कलाकार थी... 'मेघना'। विश्वास और प्रभाकर के आकर्षण का केंद्र। मेघना को दिल ही दिल में विश्वास भी चाहता था और प्रभाकर भी।  लेकिन मेघना किसे चाहती थी ये तय नहीं था। एक रात शो खत्म होने के बाद लोगों की अपार भीड़ प्रभाकर के कसीदे पढ़ने लगी तो विश्वास कुढ़ के रह गया। देर रात जब सभी कलाकार अपने अपने घर रवाना हो रहे थे तब रिहर्सल हॉल में अकेले रह गए प्रभाकर और मेघना। मौका देखकर  प्रभाकर ने अपने दिल बात उसके सामने रख दी। एक पल के लिए चौंक गई मेघना। अगले ही पल खुशी से किलकरी मारते हुए उसने उसका प्रेम प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। और उसके गले लग गयी। उन दोनों के इस प्रेम मिलन को देख रही थी दो छुपी हुई भीगी हुई आंखें। जी हां वहां वो बिल्कुल अकेले नहीं थे... विश्वास उन्हें पर्दे के पीछे से देख रहा था। अगले ही पल उसकी भीगी आंखे दहकने लगी। ईर्ष्या की प्रचंड ज्वाला उनमे साफ झलक रही थी। आज उसका दिल तड़प उठा था।सब कुछ उससे छिनकर प्रभाकर की तरफ जा रहा था। 
अगले दिन जब विश्वास थियेटर में आया वो तो सब साथी कलाकार प्रभाकर और मेघना को बधाइयां दे रहे थे। दोनों ने शादी करने का फैसला जो कर लिया था। आज वो थियेटर बिल्कुल बेगाना सा लग रहा था विश्वास को। भयंकर कुंठा से भर चुका था विश्वास। ईर्ष्या के मारे उसे चारों तरफ अंधकार ही अंधकार दिख रहा था। मन कर रहा था प्रभाकर का टेंटुआ दबाकर उसकी जान ले ले। लेकिन ये आसान काम नहीं था। प्रभाकर की ज़िंदगी देख देख कर वो जलने लगा। "क्यों मुझे नहीं मिला ये सब???... क्या कमी थी मुझमें??" ये  सवाल उसे झुलसाने लगे। थियेटर अब उसे काटने लगा।

एक दिन उसने थियेटर छोड़ दिया। लापता हो गया कहीं। धीरे धीरे लोग विश्वास का नाम भूलने लगे। प्रभाकर और मेघना भी अपनी दुनिया बसाकर अपना जीवन जीने लगे। विश्वास अब बीते कल की बात बन के रह गया।
इधर ज़िन्दगी अपनी रफ्तार से  भागती रही । देखते देखते 6 साल बीत गए।  प्रभाकर अब एक जाना माना नाम हो गया। वह थियेटर उसी ने खरीद लिया और उसके अभिनय की प्रसिद्धि इतनी बढ़ गयी कि उसे फिल्मों में भूमिकाएं करने के ऑफर भी आने लगे। आलीशान जीवन जी रहा था वो। बस कमी एक ही थी... कोई संतान नहीं हुई थी अभी तक। पर अपने वैवाहिक जीवन में दोनों खुश थे। 


एक दिन प्रभाकर थियेटर से घर लौट रहा था। रात काफी हो चुकी थी। कार वह स्वयं ही ड्राइव कर रहा था। अचानक एक अजीबो गरीब हुलिए वाला आदमी उसकी कार से आ टकराया। कार तेज ब्रेक के साथ रुक गयी। प्रभाकर तुरन्त कार से बाहर निकला। उसने देखा लम्बी दाढ़ी मूंछ, मोटा कम्बल डाले एक कृशकाय व्यक्ति कार से टकरा कर बेहोश पड़ा था। एक मिनट के लिए प्रभाकर ने सोचा कि उस व्यक्ति को वहीं छोड़कर भाग जाए। लेकिन उस व्यक्ति की कराह सुन कर प्रभाकर को रुकना पड़ा। उसने उस आदमी को उठाया और घर ले आया। वो किसी लफड़े में नहीं पड़ना चाहता था। इसलिए उस अजनबी की मरहम पट्टी उसने ही कर कर दी। ज्यादा चोट नहीं लगी थी शायद धक्के की वजह से अर्धमूर्छित सा हो गया था वो अजनबी। प्रभाकर ने उसे एक कमरे में आराम करने के लिए छोड़ दिया। मेघना ने इस बारे में पूछा तो उसने मेघना को उसने एक्सीडेंट वाली घटना के बारे में जानकारी दे दी। 
अगली सुबह प्रभाकर और मेघना उस अजनबी के हाल चाल जानने उसके पास गए। उसे चाय दी गयी। चाय पीते पीते उसका परिचय पूछा गया। उस अजनबी ने अपना नाम ' हरिया' बताया और पास के ही गांव का  निवासी होना बताया। सुबह नाश्ता करवा कर प्रभाकर उससे माफी मांगते हुए विदा करने लगा। हरिया भी अब खुद को ठीक महसूस कर रहा था। जाते जाते बोला.. 
" ठीक है बाबूजी, चलता हूं।" 
"ठीक है हरिया! एक बार फिर से माफी चाहता हूँ... तुम्हे चोट पहुंचाने के लिए।"
"अरे नहीं बाबूजी, आपने तो मुझे यहां लाकर उपकार किया है। कोई और होता तो वहीं छोड़कर भाग जाता।"

मेघना पीछे खड़ी उन्हें देख रही थी।
अचानक हरिया चिल्लाया.. "मेम साब वहां से हट जाइये।" और दौड़ते हुए मेघना के पास जाकर उसे एक और धक्का दे दिया।
"ये क्या बदतमीज़ी है हरिया।"
प्रभाकर गुस्से से चिल्लाया।
उसके ठीक 3 सेकंड बाद भारी भरकम फानूस उस जगह आ गिरा जहां मेघना खड़ी थी।
ये दृश्य देखकर भौचक्के से खड़े रह गए मेघना और प्रभाकर।
" तुम्हे कैसे पता चला हरिया कि फानूस गिरने वाला है!"??
"साब बस यही एक खूबी है मुझमें... कुछ घटनाओं का एहसास पहले ही हो जाता है मुझे। पर मेरे खुद के साथ क्या होगा ये  नही पता चलता।"

प्रभाकर और मेघना अभी भी आश्चर्य के सागर में गोते लगा रहे थे। अपने आप को संभालते हुए मेघना बोली
"अब यहां से कहाँ जाओगे हरिया?"
"बस मेम साब कहीं काम की तलाश करूँगा। इसीलिए तो गांव से शहर आया था।"
"तो फिर हमारे घर का काम ही संभाल लो न।" मेघना ने कहा।
"हाँ, हाँ हरिया हमें भी एक आदमी की ज़रूरत है... थोड़ा बहुत हमारे बगीचे की देख रेख कर लेना और घर के छोटे मोटे काम देख लेना।" प्रभाकर ने भी जोर देकर कहा। वो उससे बहुत प्रभावित हो गया था।
"ठीक है बाबूजी... मुझे भी काम मिल जाएगा। इधर उधर नहीं भटकना पड़ेगा।" कहते हुए हरिया ने हाथ जोड़ लिए।

अब हरिया उनके घर में काम करने लगा। धीरे धीरे कुछ ही महीनों में उसने उनका विश्वास जीत लिया। अब उसे मेघना और प्रभाकर की हर बात पता होने लगी। वो भी उसे अपने घर का ही सदस्य मानने लगे। लेकिन उन दिनों अंडरवर्ल्ड के कुछ बदमाश प्रभाकर को फोन पर धमकी देकर पैसे मांग रहे थे। ये बात अभी तक प्रभाकर ने किसी को नहीं बताई थी। न पुलिस को, न घर में। वह सोच रहा था ये किसी की शरारत भी हो सकती है। हालांकि वो मन ही मन परेशान सा रहता। पर मेघना द्वारा पूछे जाने पर टाल देता।
इसी दौरान एक दिन प्रभाकर को किसी ज़रूरी काम से दूसरे शहर जाना था। हरिया ने कहा "बाबूजी मैं भी चलूं साथ?" प्रभाकर को कोई ऐतराज नहीं था। उसने हरिया को साथ ले लिया। कार प्रभाकर खुद ही ड्राइव करना पसंद करता था। दिन भर अपना काम निपटा के प्रभाकर और हरिया वापस लौट रहे थे। देर रात हो चुकी थी। अचानक कार रुक गई। पेट्रोल खत्म हो गया था। झुंझला उठा प्रभाकर.." उफ्फ... आज सुबह ही तो कार का टैंक फुल कराया था। ये पेट्रोल कैसे खत्म हो गया??"

" पेट्रोल तो खत्म होना ही था।" हरिया कुटिल मुस्कान के साथ हौले से बोल पड़ा।
"क्या मतलब???" प्रभाकर ने आश्चर्य से उसकी तरफ देखा।
"मतलब ये प्रभाकर कि अब तेरे आराम के दिन खत्म।" ये कहते हुए हरिया ने अट्टहास सा लगाया।
प्रभाकर हतप्रभ रह गया।
"क्..क्... कौन हो तुम?" प्रभाकर ने घबरा कर पूछा।
लेकिन जवाब के बदले मिला एक प्रहार। इसी के साथ प्रभाकर होश खो बैठा।
जब उसे होश आया तो अपने आप को किसी पुरानी हवेली के तहखाने में पाया। अंधेरा था चारों ओर। बस एक डरावनी सी हंसी गूंज रही थी। मानो कोई चुड़ैल हंस रही हो। 
प्रभाकर चिल्लाया..." मुझे कहाँ ले आये हो। हरिया... क्या चाहते हो मुझसे।???"
तभी एक मशाल जली। और रोशनी में नज़र आया हरिया का कठोर चेहरा।
प्रभाकर ने घबराते हुए पूछा.. " हरिया! मुझे यहां क्यों लाये हो? क्या चाहते हो??"
हरिया का स्वर कठोर हो गया.. "हरिया नहीं प्रभाकर.. जरा दिमाग पे जोर डाल.... पहचान मुझे... मैं हरिया नहीं विश्वास हूँ... विश्वास। इतना जल्दी भूल गया मुझे।" एक खूंखार अट्टहास लगाया विश्वास ने।
प्रभाकर का सिर भन्ना गया.." विश्वास... तुम विश्वास हो... तुम कहाँ चले गए थे???। और ये सब क्या है?? मुझे यहां क्यों लाये हो??... आखिर तुम चाहते क्या हो?..."
"हा.. हा.. हा... हा.. सवालों की बौछार कर दी तूने तो।रुक जरा सब्र कर। हर सवाल का जवाब मिलेगा।"
विश्वास खूनी अंदाज़ में बोला। एक खनकदार हंसी की आवाज भी गूंज रही थी बार बार।

"क्या यहां कोई और भी है?? ये कौन हंस रही है??"
प्रभाकर ने पूछा।






"ओह... ये आवाज... ये आवाज तो मेरी मददगार की है प्रभाकर। और ये तो तब से लगातार मेरे साथ है जब से मैं हरिया बनकर तेरे घर आया था। ये हर पल मेरे साथ ही रहती है। वादा जो किया है इससे मैंने।" विश्वास रहस्यमय अंदाज में बोला।

"ये तुम क्या बक रहे हो विश्वास..? मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा।।" प्रभाकर ने सकपकाते हुए पूछा।
"हर सवाल का जवाब मिलेगा तुझे। चल सुन... पहले तेरी हर उलझन मिटाता हूँ.. ही ही ही..."
विश्वास ने सुनाना शूरु किया..(फ़्लैश बैक)...
जब मैंने देखा कि हर मामले में मैं तुझसे आगे ही था फिर भी सब कुछ तुझे मिल रहा था। शोहरत, तारीफे, पैसा... यहां तक कि मेघना भी। वो भी तेरी हो चुकी थी जबकि उसे मैं चाहता था। तब... हाँ प्रभाकर तब .. मन ही मन मर चुका था मैं। तब इस दुनियां से कोई लगाव नहीं रहा मुझे। मैं थियेटर.. ये शहर... मेघना.. सब कुछ छोड़कर चला गया था। बस मर जाना चाहता था। आखिर एक दिन मैंने आत्महत्या का मन बना ही लिया और विक्षिप्त सा भटकते हुए इस वीराने में स्थित इस हवेली तक पहुंच गया। इसी हवेली में एक पुराना सूखा कुआं है। उसमे कूद कर मर जाने की सोची। मैं उस कुएं में कूदने ही वाला था कि एक कर्कश सी खनकदार हंसी मेरे कानों में गूंज उठी। मैं ठिठक सा गया। इस वीराने में ऐसी महिला की हंसी का स्वर सुनकर मैं आश्चर्यचकित रह गया था। मैंने जोर से पूछा "कौन है?... कौन है वहां??"
तभी एक आवाज गूंजी.." मौत के आगोश में जाकर क्या मिलेगा??? मेरी मदद कर मैं तुझे ज़िन्दगी की हर खुशी दूंगी.. ही ही ही।"
वहां कोई नहीं था। फिर आवाज कहाँ से आ रही थी सोचकर मैं हैरान था।
"आखिर तुम हो कौन? कहाँ हो? जो खुद मरने वाला हो वो तुम्हारी क्या मदद कर सकेगा??" मैंने पूछा।
"करोगे... तुम मेरी मदद ज़रूर करोगे। मैं तुम्हारे मरने के हर कारण को मिटा दूंगी। ज़िन्दगी बख्श दूंगी तुझे।"

मैं अभी भी हैरान था। इसकी बाते मुझे प्रभावित करने लगी। मैंने पूछा.." क्या मदद चाहिए तुम्हे?"

स्वर फिर से गूंजा.." बस इस कुएं में उतर जाओ इसमें रखा एक छोटा सा कलश उठा लाओ।"





मैं सम्मोहित सा उस अंधेरे कुएं में उतर गया। वहां उतर कर मुझे कुछ दिखाई नही दिया। जब मैंने टटोला तो कपड़े बंधी कलश नुमा चीज़ से मेरे हाथ टकराये। मैं वो कलश लेकर ऊपर आ गया। 
स्वर फिर गूंजा .. "अब इस कलश को खोल दो।"

मैं कांपते हाथों से उस कलश को खोलने लगा। लाल कपड़े में लिपटा कई धागों से बंधा वो कलश कस के बन्द किया गया था। काफी मशक्कत के बाद मैंने वो कलश खोल दिया। इसी के साथ एक भयंकर अट्टहास गुंजा। मैं बुरी तरह भयभीत हो गया। एक भयानक आकृति मेरे सामने खड़ी थी। लंबे कान, काला वीभत्स चेहरा, लंबे नाखून और बड़े बड़े उबड़ खाबड़ दांतो वाली भयानक चुड़ैल। एक कर्कश अट्टहास के साथ वो बोली..
"वैसे तो मैं तुझे नहीं छोड़ती लेकिन तूने मुझे इस कैद  से मुक्ति दिलाई है... इसलिए मैं तुझे ज़िंदा छोड़ देती हूं.. ही ही ही ही ही....! अब बोल तुझे क्या चाहिए?"

मैं भयंकर रूप से डरते हुए पूछ बैठा.." त..त...तुम कौन हो?? और यहां कैद कैसे हो गयी।??"

"मैं कर्ण पिशाचिनी हूँ। जो कोई मुझे सिद्ध कर लेता है उसकी हर कामना पूरी करती हूं... लेकिन बदले में मुझे एक आत्मा और शरीर का भक्षण चाहिए । अन्यथा मैं सिद्ध करने वाले का भक्षण कर लेती हूं। ही ही ही ही...
एक मांत्रिक ने मुझे सिद्ध करके अपना काम निकलवा लिया लेकिन वो बहुत शक्तिशाली था उसने मुझे बलि देने के बजाय यहां कैद कर लिया। आज तेरी वजह से मैं मुक्त हुई हूँ।"

मैं जड़वत उसकी बात सुन रहा था। मेरे मन में तुम्हारे प्रति नफरत और ईर्ष्या उबाल मार रही थी। मैं तुम्हारी ज़िन्दगी जीना चाहता था। जो कुछ तुझे मिला था वो मैं छीन लेना चाहता था। यही सोचकर मैंने उससे कहा...
"मुझे तुम्हे सिद्ध करने की विधि बता दो... बस फिर कुछ नहीं चाहिए।"

"सोच ले... ये बहुत खतरनाक होगा... अगर तूने मुझे बलि नहीं दी तो मैं तेरा भक्षण कर लुंगी... ही ही ही ही ही।"

"मुझे सब मंजूर है। मैं तुम्हे हर कामना पूर्ति पर बलि दूंगा। बस मैं जो चाहता हूँ वैसा कर दो।" 
फिर उसके बताए अनुसार मैं उसको सिद्ध करने में जुट गया। न जाने कैसे कैसे काम करने पड़े। पूरे 3 साल तक कठोर यत्नों के बाद मैं उसे सिद्ध कर सका। अब उसे हर वो काम करना पड़ेगा जो मैं चाहूंगा। फिर मैंने उससे कहा कि... "मैं प्रभाकर का जीवन जीना चाहता हूं। उसकी शोहरत, दौलत और मेघना को हासिल करना चाहता हूं।"

तब इस पिशाचिनी ने मुझे एक मंत्र दिया... 'परकाया प्रवेश मन्त्र।' इस मंत्र को सिद्ध करना काफी कठिन था।
लेकिन तुम्हारे प्रति नफरत ने मुझे ऐसा करने पर आमादा कर दिया।
उस मन्त्र को सिद्ध करके इस रूप में मैं जानबूझ कर तुमसे टकराया और आखिर तुम्हारा विश्वास जीत कर आज तुम्हे यहां तक पहुंचा दिया। तेरे साथ रहकर तेरी ज़िन्दगी के बारे में मैं काफी कुछ जान चुका हूँ मैं।
हा हा हा हा हा...... और आज तेरी आत्मा को तेरे शरीर 
 से मुक्त कर के मेरी आत्मा को उसमे प्रवेश करवाऊंगा। और फिर तेरी ज़िन्दगी मेरी होगी।तेरी शोहरत मेरी होगी। तेरी दौलत मेरी होगी... और मेघना... हाँ मेघना भी मेरी होगी   हा हा हा हा हा....।
पागलपन सवार हो चुका था विश्वास पर।

"तुम सच मे जानवर बन चुके हो विश्वास! ऐसा मत करो। प्रकृति के साथ खिलवाड़ करने का नतीजा एक दिन तुम्हे भुगतना होगा।" प्रभाकर चिल्ला रहा था लेकिन विश्वास अपने पागलपन में कुछ नहीं सुन रहा था। वहां अब विश्वास और कर्णपिशाचिनी के अट्टहास गूंज रहे थे।

अब विश्वास ने भयानक ढंग से परकाया मन्त्र का उच्चारण करते हुए प्रभाकर का कंठ दबाना शुरू कर दिया। प्रभाकर की आंखों पर अंधेरा छाने लगा। वो छटपटाने लगा।  कुछ ही देर में उसने प्राण त्याग दिए। इसी के साथ विश्वास की आत्मा प्रभाकर में शरीर मे प्रवेश कर गयी। भयानक अट्टहास के साथ गूंज उठा हवेली का कोना कोना।

अब उसने प्रभाकर की आत्मा को अपने शरीर मे कैद कर के सुला दिया। और कई मांत्रिक धागों से बांध कर उसी तहखाने में पटक दिया।

फिर वो पिशाचिनी को संबोधित करते हुए बोला.." हे कर्ण पिशाचिनी... वादे के मुताबिक कल आने वाली अमावस्या  को मैं अपना शरीर और प्रभाकर की आत्मा तुझे भक्षण के लिए सौंप दूंगा।तब तक के लिए तुम इसकी निगरानी रखना।"

जवाब में पिशाचिनी की खूनी हंसी वहां गूंज उठी।

अब विश्वास प्रभाकर बनकर पहुंच गया प्रभाकर के बंगले पर। 
उसे देखते ही मेघना बोल पड़ी "कितनी देर लगा दी तुमने। मैं कब से चिंता कर रही थी। सुबह के 4 बजे हैं। ऐसा क्या काम था वहां?? और... और... हरिया कहाँ है??"

"ओफ्फो... कितने सवाल करती हो तुम!! सांस तो लेने दो... सब बताता हूँ।" प्रभाकर बना विश्वास झल्लाते हुए बोला।
फिर अपने आप को संयत करते हुए विश्वास बोला...
" रास्ते मे कार खराब हो गयी थी और हरिया.... वो कम्बख्त... ऐसे मौके पर बहाना बना कर मुझे वहीं छोड़ कर भाग गया। बड़ी मुश्किल से यहां तक पहुंचा हूँ।....और आज के बाद वो हरिया नज़र आये तो भगा देना उसे।।।"

प्रभाकर के इस बदले अंदाज़ को देखकर मेघना हैरान थी। फिर सोचा शायद थकान और कार खराब होने की घटना के कारण चिड़चिड़ाहट हो गयी होगी।
अगली सुबह 10 बजे उठा प्रभाकर और थियेटर जाने के लिए तैयार हो गया। वो उसी तरह लाइफ स्टाइल दिखाना चाहता था जैसी प्रभाकर जीता था। तांकि किसी को कोई शक न हो। 

थियेटर की तरफ निकला ही था वो कि अचानक उसकी कार को दो अन्य कारों ने घेर लिया। कार झटके के साथ रोकनी पड़ी उसे। आनन फानन में उन दो कारों से से उतरे कुछ बदमाश और गन तान दी प्रभाकर की तरफ। प्रभाकर बना विश्वास कुछ समझ नहीं पा रहा था। उसे प्रभाकर की ज़िन्दगी की इस घटना की कोई जानकारी नहीं थी कि कुछ बदमाश उसे धमकी भरे कॉल्स करते थे।
" कार से बाहर निकलो।" एक बदमाश कड़क स्वर  में बोला।
हाथ उठाकर कार से बाहर निकला वो। उसे अपनी कार में डालकर दिन दहाड़े अपहरण कर लिया गया प्रभाकर का। बदमाश उसे उठाकर एक निर्जन फेक्ट्री में ले आये।जहां उनका बॉस पहले से उनका इन्तेज़ार कर रहा था।
"हम उसे ले आये हैं बॉस।" बदमाश ने प्रभाकर को वहां पटकते हुए कहा।
" चर्बी बहुत ज्यादा चढ़ी है तुझे... क्यों रे...??!" बॉस ने कड़क कर प्रभाकर की तरफ देखा।
प्रभाकर बना विश्वास भौचक्का सा मामला समझने की कोशिश कर रहा था। 
बदमाशो के बॉस ने कहा "जब तुझे कॉल लगाया तो बड़ा अकड़ रहा था फोन पे .....अब बोल... कहाँ गयी तेरी हेंकड़ी!??"
"तुम लोग क्या कह रहे हो मुझे कुछ समझ में नही आ रहा है!!" प्रभाकर हतप्रभ था।
तभी एक बदमाश बोला " साले प्रभाकर... तुझसे बॉस ने प्रोटेक्शन मनी मांगी थी... तो दे देनी थी ना फोन पे तो बड़ा फन्ने खां बन रहा था।... अब गिड़गिड़ा रहा है।" 

चीख पड़ा प्रभाकर बना विश्वास.." नहीं... मैं प्रभाकर नहीं हूं... तुम लोगों को गलत फहमी हो रही है... मैं प्रभाकर नहीं हूं।"

सब बदमाश जोर से हंसने लगे..." पागल हो गया है साला, हमें बेवकूफ समझता है।"
 "मारो इसे.. " बॉस चिल्लाया।
सब बदमाश उस पर टूट पड़े। उसकी जमके मरम्मत की गई। दिन भर उसे प्रताड़ित किया गया।
वो चिल्लाता रहा कि वो प्रभाकर नहीं है.... विश्वास है... लेकिन आज विश्वास पर किसी को विश्वास नहीं था।

रात  को  बॉस ने कहा.. "इसे ऐसी मौत दो कि आइंदा कोई भी हमारी धमकी को नज़रंदाज़ करने की भूल न करे।"

प्रभाकर बने विश्वास के चेहरे का रंग उड़ गया। तिरपन कांप उठे उसके। बुरी तरह फंस चुका था वो। 

आज अमावस्या भी थी।विश्वास कर्ण पिशाचिनी को किया हुआ वादा नहीं निभा सका था। बलि के लिए जो विधान उसे करना था वो नहीं कर सका। 

बदमाशों ने उसके घायल शरीर को उठाया और फांसी के फंदे पे लटकाने लगे। प्रभाकर के शरीर में बंद विश्वास की आत्मा कांप उठी। वो चिल्लाता रहा लेकिन उसकी किसी न सुनी। उसे फांसी पे लटका दिया गया। कुछ मिनट की तड़प के बाद उसकी आत्मा प्रभाकर का शरीर छोड़कर बाहर आने पे मजबूर हो गयी। बदमाश उसकी लाश को उतार कर ज़मीन पे पटक कर भाग गए।

विश्वास की आत्मा द्वारा प्रभाकर का शरीर छोड़ते ही हवेली के तहखाने में पड़े विश्वास के शरीर पर बंधे धागे टूटने लगे। विश्वास के शरीर में कैद प्रभाकर की आत्मा फिर से अपने शरीर की और उड़ चली। 
इधर निश्चित समय पर बलि न मिलने के कारण कर्ण पिशाचिनी बेचैन हो उठी। भयंकर गुर्राहट करते हुए वो हवेली के तहखाने की तरफ भागी। तहखाने में विश्वास की आत्मा उसके शरीर में जा घुसी। विश्वास जी उठा... उस अंधेरे तहखाने में वो कुछ समझ भी नहीं पाया था कि कर्ण पिशाचिनी ने उसे जकड़ लिया। वो बेकाबू हो उठी थी। विश्वास भय से चिल्लाने लगा ।देखते ही देखते पिशाचिनी ने विश्वास का भक्षण कर लिया।







इधर प्रभाकर जैसे नींद से जगा। उसकी आत्मा उसके शरीर में पुनः प्रवेश कर चुकी थी। वह उठा और इधर उधर देखने लगा। उसे विश्वास द्वारा हरिया बनकर किया गया विश्वासघात याद आया। लेकिन वो फेक्ट्री में कैसे पहुंचा... उसका शरीर क्यों दुख रहा था... ये सब वो नहीं जान पाया। वो धीरे धीरे फैक्टरी से बाहर निकला और घर की और चल पड़ा। ये सोचते हुए कि उसके साथ जो हुआ... वो किसी को बताए या नहीं??... कोई विश्वास करेगा या नहीं... शायद नहीं। उसने चुप रहना ही बेहतर समझा। घर पे मेघना उसकी राह देख रही थी। अब उसकी जिंदगी फिर से उसकी हो गयी थी....

और विश्वास के अंत के साथ  ही खत्म हो चुकी थी उसकी खूनी ख्वाहिश..

समाप्त।

फिर मिलेंगे...

विदा।








किले का शैतान (पार्ट - 2)

किले का शैतान   (पार्ट - 2)  पिछले अंक में आपने पढ़ा...  मैनागढ़ के किले में गए एक शोध दल ने वहां जाकर छानबीन की। अनजाने में उन्ह...