Sunday, 2 August 2026

किले का शैतान (पार्ट - 2)

किले का शैतान  (पार्ट - 2)







 पिछले अंक में आपने पढ़ा... 
मैनागढ़ के किले में गए एक शोध दल ने वहां जाकर छानबीन की। अनजाने में उन्होंने एक तहखाने से ऐसे जलजले को आजाद कर दिया जिसने उन सभी को मार डाला। इतना ही नहीं अब वो संकट पूरे गांव पर मंडराने लगा। पुलिस बेबस थी। कोई क्लू हाथ नहीं आ रहा था।  आखिर इंस्पेक्टर हवासिंह ने एक नंबर डायल किया....और सामने से आवाज उभरी....

"हेलो... द्रोण हियर।"

अब आगे.....


"हेलो...

 "हेलो.. डिटेक्टिव द्रोण..... मैं इंस्पेक्टर हवासिंह।"
 

"जी कहिए।"

"मुझे आपके बारे में मेरे दोस्त इंस्पेक्टर कश्यप ने बताया था। गोरम गढ़ * वाले केस के सिलसिले में।"
(*गोरम केस के बारे में जान ने के
 लिए पढ़े एक सनसनीखेज कहानी... हत्यारा प्रयोग।")

"ओह... कहिए.. मै आपके लिए क्या कर सकता हूं?"

"एक अजीब सा केस आया है सामने... यहां  मैनागढ़ में। कहीं कोई क्लू नहीं मिल पा रहा। इसलिए इस केस में तुम्हारी मदद चाहिए। क्या तुम कुछ सहायता कर सकते हो द्रोण??"

 "जरूर... पुलिस की मदद को तो बंदा हर वक्त तैयार रहता है। आप बस इस केस की फाइल की एक कॉपी मुझे दे देना।" द्रोण ने केस के लिए हामी भर दी ।
"ठीक है द्रोण... तुम जल्दी से जल्दी  उधमपुर पहुंचो। इसी थाने के एरिया में एक गांव है मैनागढ़। मैं तुम्हे उधमपुर में मिलूंगा। वहीं से इस केस की पूरी डिटेल तुम्हे दे दूंगा और भी कोई सामान या साधन चाहिए तो मिल जाएगा।"

"ओके इंस्पेक्टर... मैं आज ही रवाना हो जाता हूं।" कहते हुए द्रोण ने रिसीवर रख दिया।
द्रोण ने ट्रेन पकड़ ली। वो नहीं जानता था कि ये केस लेकर उसने एक तरह से अपनी मौत के परवाने पर दस्तखत कर दिए थे। अगली सुबह वो उधम पुर पहुंच चुका था। उधमपुर थाने   में वो मिला इंस्पेक्टर हवासिंह से। 

"ये लो द्रोण... मैनागढ़ केस की डिटेल। एक बार फिर से सोच लो द्रोण... ये केस गौरमगढ़ केस से भी ज्यादा खतरनाक लग रहा है।"

"डिटेक्टिव द्रोण की जिंदगी ऐसे खतरों के बीच ही पनप रही है इंस्पेक्टर... कानून की मदद के लिए मेरे कदम कभी पीछे नहीं हटते।"

"गुड...तुम्हे और कुछ चाहिए??"

"बस एक जीप का इंतजाम करवा दीजिए।"

"हो जाएगा... ऑल द बेस्ट द्रोण। ईश्वर तुम्हारी सहायता करे।"
 जीप में अपना बैग और साथ लाया जरूरी सामान लेकर निकल पड़ा द्रोण। शाम होते होते द्रोण मैनागढ़ पहुंच गया। इंस्पेक्टर हवा सिंह ने उसके रुकने का इंतजाम ठाकुर साब की हवेली के गेस्ट हाउस में करवा दिया था। हवेली में पहुंचते ही ठाकुर राजबहादुर ने मुलाकात की द्रोण से।
"आइए... आइए द्रोण साहब। बहुत सुना है आपके बारे में। मैनागढ़ में आप हमारे मेहमान रहेंगे। थोड़ा आराम कर लीजिए फिर रात के खाने पर मिलते हैं।"

" शुक्रिया ठाकुर साहब।" फिर द्रोण थोड़ी देर गेस्ट हाउस में चला गया। 

रात को खाने पर जब वो ठाकुर साब से मिला तो इस केस पर बात चीत हुई। ठाकुर साब गंभीर स्वर में बोले," देखो द्रोण... इस वक्त गांव के हालात बहुत खतरनाक है। पुजारी जी ने गांव की सुरक्षा लिए कुछ नियम बनाएं है। मैं चाहूंगा कि तुम भी उनका पालन करो। तुम यहां इस केस की तहकीकात करने आए हो... पुलिस और इस गांव की मदद करने आए हो... मुझे तुम्हारी सुरक्षा की भी चिंता है। इसलिए तुम रात को कभी बाहर मत निकलना।"

"आप चिंता न करिए ठाकुर साब। मेरा पाला ऐसे ही हालातों से पड़ता रहता है।"
 फिर रात का खाना खाकर द्रोण फिर से गेस्ट हाउस में चला गया।
भयंकर सर्दी में वहां अलाव का अच्छा इंतजाम था। लालटेन की रोशनी में रात को केस की पूरी फाइल दोबारा अच्छे से पढ़ी। 
गेस्टहाऊस की खिड़की से वो क़िला साफ दिख रहा था उसे। पहाड़ी पर चांद की रोशनी में चमकता वो खतरनाक किला।
"कल गांव वालो से पूछताछ करनी पड़ेगी।"
सोचते हुए नींद ने आ घेरा उसे। अगले दिन सुबह निकल पड़ा द्रोण गांव की सैर पर। लोगों से घटनाओं की जानकारी लेता हुआ सीधा दीनू के पास पहुंचा।
"दीनू... उन चार पुरातत्ववेताओं के पास तुम ही काम करते थे। तुमने ही पहली घटना को करीब से देखा था। क्या तुम शुरू से कुछ बता सकते हो???"
"साब.... मैं बस इतना कह सकता हूं कि ये... ये सब जो कोई कर रहा है... वो... वो कोई इंसान नहीं है साब... य... ये काम किसी शैतानी ताकत का है।"

"शैतानी ताकत???" द्रोण ने आश्चर्य से पूछा।

"हां साब... जिस तरह से उन चारों को मारा गया था... ऐसे कोई इंसान या जानवर किसी को नहीं मार सकता.... ।"

"ओह... क्या तुम मुझे विस्तार से सब बता सकते हो??"

जवाब में दीनू ने पूरी कहानी द्रोण को सुना दी। 

जिसे सुन ने के बाद द्रोण बोला...
"हम्ममम... यानी पुरातत्ववेताओं के आने के 2-3 दिन बाद ही ये घटना घट गई?"
"हां साब।"
"अच्छा एक बात बताओ... उनकी हत्या से ठीक पहले उन्होंने क्या किया था???"
"वो... वो लोग तहखानों की खोज कर के आए थे साब।"
"अच्छा... ठीक है दीनू।" कहते हुए द्रोण ने दीनू से विदा ली।
 पूरे दिन गांव की खाक छान ने के बाद द्रोण गेस्ट हाउस में लौटा। कुछ खास मदद नहीं मिली उसे। बस दीनू का बयान ही अब तक सहारा था।
 "क्या कुछ पता चला द्रोण?? कोई खास जानकारी पता चली?" ठाकुर साहब ने शाम को मिलकर पूछा।

"अभी बस कुछ खास पता नहीं चल सका ठाकुर साहब। लेकिन कल बहुत कुछ पता चल जाएगा।"

"कल क्या करोगे द्रोण?"

"बस ठाकुर साहब... ये बात कल पर छोड़ देते हैं।"

"ठीक है भाई... तुम पर ही भरोसा है अब।" कहते हुए ठाकुर साब उठ कर  चले गए।
 द्रोण की आंखों से नींद कोसों दूर थी। गेस्ट हाउस के बेड पर सोए हुए खिड़की से किले को देख रहा था वो।
"कल सुबह मुझे किले के अंदर जाना होगा। लेकिन बहुत संभल कर।" सोचते सोचते नींद आ गई उसे।
अगले दिन उठ कर... अपनी तैयारी की.. और किले की तरफ निकल गया।
किले की पहाड़ी पर चढ़ते हुए दिल जोर से धड़क रहा था उसका। सर्दियों की दोपहर में एकदम सन्नाटा पसरा था वहां। बस पक्षियों के कलरव और हवा की सरसराहट के अलावा कोई आवाज नहीं थी। किले में पहुंच कर बड़ी सावधानी से जुट गया वो छान बीन में। छत पर देखा। कमरों में देखा। सब खंडहर थे। कहीं कुछ नहीं था। अब उसे तहखान की तरफ जाना था। अनजाने से डर के साथ वो तहखाने की तरफ बढ़ा।
लेकिन एकाएक उसकी छठी इन्द्री सतर्क हो गई। उसके कानों ने गहरे तहखाने से आती एक भयानक आवाज सुनी और वो फौरन वहां से निकल गया।

"किले में आने का कोई खास फायदा नहीं मिला। लेकिन एक बात पक्की हो गई कि तहखानों में कुछ छुपा है। हो सकता है शैतान वाली बात सच हो। वो आवाज किसी जानवर या इंसान की नहीं थी।"
 किले में कोई ऐसी चीज़ नहीं मिली जो इस राज़ को खोल सके। घूमते हुए द्रोण मंदिर में जा पहुंचा। 
" शायद पुजारी कुछ मदद कर सके।"

पुजारी मंदिर में ही था। शाम ढलने को थी। "राम राम पुजारी जी।"
"राम राम जी।" पुजारी  द्रोण को देख कर खुश होते हुए बोला।
"कहिये डिटेक्टिव साब... क्या पता लगाया आपने??"

"कुछ खास नहीं पुजारी जी। बहुत मुश्किल केस है। कोई क्लू नहीं मिल रहा। आप मुझे बता सकते है कि इस किले की जानकारियां कहां से मिल सकती है?? यहां की सारी चीजें कहां चली गई???"

पुजारी कुछ गहरा सोचते हुए बोला...
" बड़ा पुराना किला है डिटेक्टिव साब। हमारी कई पीढ़ियों ने इसे देखा है। मेरे पुरखे सालों से इस किले के राजपरिवार के गुरु और इस मंदिर के पुजारी रहे हैं। बदलते ज़माने के साथ जब ठाकुरो ने ये किला छोड़ा और गांव में हवेली में आकर बस गये तो साथ में सारी जरूरी चीजें लेकर आ गए.... कीमती सामान, हथियार वगैरह। पुराना साहित्य इस मंदिर के एक कमरे में रखवा दिया। जिसे देखने की फुर्सत किसी को थी नहीं। मेरे बाप दादा ने भी नहीं पढ़ा उसे और न मैने। लिखने वालों ने लिख दिया होगा और पढ़ने वालों ने पढ़ लिया होगा लेकिन अब यह सब कौन पढ़ता है मैंने तो कभी देखा भी नहीं।"

यह सुन कर द्रोण की आंखों में चमक आ गई। 

"क्या इस किले से जुड़ा हुआ साहित्य मैं देख सकता हूं बाबा।?"

"हां.... हां.. क्यों नहीं।।। बरसों से बंद पड़ा है। आज तुम आए हो देखना चाहो तो देख लो। लेकिन अभी शाम हो चुकी है। आरती की तैयारी हो रही है। समूचा गांव था एकत्रित होगा। तुम्हे व्यवधान होगा। तुम कल सवेरे आकर आराम से शांति से अब देख लेना।"

"ठीक है पुजारी जी। ऐसा ही सही।"

फिर आरती के बाद द्रोण गेस्ट हाउस में जा पहुंचा। रात होते ही गाँव सुनसान सन्नाटे में घिर चुका था। द्रोण लेटा हुआ अब सुबह होने का बेसब्री से इंतजार कर रहा था। तभी उसे ना जाने क्यों ऐसा लगा मानो दूर  किले से दो चमकती आँखे उसे घूर रही है।  उस आवाज का ख्याल उसके जहन में कौंध गया। और फिर उसने करवट ली और सो गया।
सुबह जल्दी उठ कर वो सीधा मंदिर पहुंच गया। मंदिर में पुजारी ने द्रोण को उस कमरे की चाबी दे दी जिसमें किले से जुड़ा इतिहास और साहित्य रखा था। न जाने कितने सालों बाद वो कमरा खुला था। द्रोण ने पूरे दिन एक एक किताब को टटोला। किले के इतिहास से जुड़ी एक बिखरी सी किताब में एक छोटा सा अंश उसके सारे सवालों का जवाब गया। द्रोण को अच्छी तरह समझ में आ गया कि ये सब क्या हो रहा है? !!!  2  पन्नों  की वो कहानी इस भयानक रहस्य को खोल गई।  उसने वो किताब उठाई और  कमरे से बाहर निकल गया।
 उसे बाहर आता देख पुजारी ने उत्सुकता से पूछा, "कुछ मिला डिटेक्टिव साब?"
"हां बाबा... एक भयानक कहानी सामने आई है।"
"कैसी कहानी??"

द्रोण ने बताना शुरू किया..."ये कितनी पुरानी है ये तो नहीं कहा जा सकता... लेकिन ये पन्ने और लिखावट देख कर लगता है सैकड़ों साल पहले की है। पन्ने हाथ लगाते ही बिखर रहे हैं बड़ी मुश्किल से समेट कर लाया हूँ।"
द्रोण ने आगे बताना शुरू किया... "कई साल पहले इस किले में राजा हुकुम सिंह का राज था। उसकी दुश्मनी पास के ठिकाने करमगढ़ से थी। करमगढ़ एक शक्तिशाली ठिकाना था। सीधी लड़ाई में मैनागढ़ का करम गढ़ से कोई मुकाबला नहीं था। तब मैनागढ़ के ठाकुर हुकुम सिंह ने एक भयानक दांव खेला। उसने करम गढ़  की पराजय की लालसा में अंधा होकर एक तांत्रिक को बुलावा भेजा और  उसे एक अत्यंत गुप्त और भयानक काम सौंपा। तांत्रिक ने स्पष्ट शब्दों में कहा, " ठाकुर... जो काम तुम मुझे करने के लिए कह रहे हो... वो उल्टा भी पड़ सकता है।
"मुझे बस करमगढ़ की तबाही चाहिए।"
"ठीक है ठाकुर.... तो कौन है वो सैनिक?? जो तैयार है बलिदान के लिए।??""
 "सैनिक तुम्हे मिल जाएगा। बस तुम अपनी तैयारी शुरू कर दो।"
ठाकुर ने भारी आवाज में कहा।

तांत्रिक ने अपनी क्रिया आरम्भ कर दी। एक सिपाही को जबरदस्ती घसीट कर लाया गया। वो बुरी तरह चिल्ला रहा था।
तांत्रिक के इशारे पर उसे एक ताबूत में बंद कर दिया गया। ताबूत के अंदर से उसकी घुटी घुटी चीखे गुंजने लगी। तेज मंत्रोच्चार के साथ उस ताबूत को पानी से भरे कुंड में उतार दिया गया। मंत्रोच्चार तेज होता गया। तांत्रिक ने कुंड में मानव मांस और मानव रक्त प्रवाहित करना शुरू कर दिया। भयानक माहौल था उस वक्त।
कुछ समय बाद तांत्रिक ने श्मशान से लाई भस्म उस कुंड में डाल दी।  इसी के साथ भूचाल सा आ गया उस कुंड में। भयानक ढंग से ताबूत भड़भड़ाने लगा।
थोड़ी देर बाद माहौल एकदम शांत हो गया।
 ताबूत को बाहर निकाला गया।  अंधेरी अमावस्या की रात में आसमान में कड़कती बिजलियों के बीच जंजीरो से जकड़ा वो ताबूत कुंड से बाहर खिंचा जाने लगा। ताबूत को बाहर निकाल कर जमीन पर बनाए हुए एक तंत्र आरेख पर रख दिया गया।
 चारो तरफ मशालें जल उठी। छोटे छोटे अग्नि कुण्डों में अग्नि धधक उठी। तांत्रिक के तीव्र मंत्रोच्चार से माहौल गूंजने लगा। थोड़ी देर बाद तांत्रिक ने सभी लोगों को पीछे हट जाने को कहा।
धीरे धीरे ताबूत खुला और उसमें से जो बाहर निकला... वो हर किसी का दिल दहला देने के लिए काफी था। भयानक गर्जना के साथ एक शैतानी पंजा निकला ताबूत के बाहर। और फिर सामने आया एक भयानक  शैतान जिसे देख कर अच्छे अच्छों की रूह फ़ना हो जाए। तांत्रिक के अट्टहास गूंज रहे थे। वहाँ मौजूद दूसरे सिपाही भय से जड़ खड़े थे।

एक साधारण से सैनिक का इतना वीभत्स हाल कर डाला उस तांत्रिक ने।
बाहर निकलते ही शैतान ने गर्जना के साथ सबकी तरफ देखा। तांत्रिक उसके सबसे पास खड़ा था। वह भयानक अंदाज में उसकी तरफ बढ़ने लगा। तांत्रिक ने उसे रुकने का हुक्म दिया। लेकिन वो ना रुका।  वह तांत्रिक की तरफ बढ़ता जा रहा था मानो उसका खून पी जाएगा। लेकिन तांत्रिक ने अचानक एक माला निकाल कर उस दरिंदे के आगे लहरा दी। वो शैतान ठीठक कर रुक गया।

 उस अभिमंत्रित माला ने उस शैतान के कदम रोक दिए। वह गुर्राता हुआ पीछे हट गया। तांत्रिक ने ठाकुर हुकमसिंह को वो माला सौंप दी और कहा... " ये खूनी शैतान अब तुम्हारा हुआ ठाकुर... इसे जैसे चाहो जहाँ चाहो काम में लो। लेकिन याद रखना... जब तक ये माला तुम्हारे पास रहेगी तब तक ये तुम्हारा दास रहेगा। अगर ये माला खो गई या टूट गई तो ये किसी के वश में नहीं रहेगा और फिर क़यामत तुम पर भी टूट सकती है।" 
इतना कह कर तांत्रिक चला गया।

ठाकुर हुकुम सिंह अब कहकहे लगा रहा था। उसने करम गढ़ को बर्बाद करने की तैयारी कर ली।   बस उस शैतान को अब करमगढ़ भेजना था।
 अगली अमावस्या की रात करम गढ़ पर क़हर बन के टूटने वाली थी। लेकिन उस से पहले ही एक घटना घट गई। ठाकुर हुकुम सिंह पर जान लेवा हमला हो गया। हथियार बंद हमलावरों ने उसे घेर लिया।
 उसके अंगरक्षक उसे बचाते हुए ढेर हो गए। हुक्म सिंह के प्राण तो बच गए लेकिन इस हमले में उसकी माला टूट के बिखर गई। और इसी के साथ वो भयानक शैतान हुक्म सिंह के प्रभाव से आजाद हो चुका था।

 तहखाने के अंदर कोठरी में बंद वो अमर शैतान अब मैनागढ़ के लिए ही मुसीबत बन चुका था।
 उस तांत्रिक की खोज की गई लेकिन अब वो  लापता हो चुका था। उसे ढूंढा न जा सका।
 अब एक मात्र उम्मीद राजघराने के राजगुरु शिवानंद ही थे।
जो सालों से मैनागढ़ के घने जंगल में साधना में लीन थे। संकट की इस घड़ी में उन्हें बुलावा भेजा गया।
 राजगुरु शिवानंद स्थिति की गंभीरता को समझते हुए... तुरंत मैनागढ़ पहुंच गए। सारी बात सुनकर वो तुरंत समझ गए कि खतरा कितना भयानक है। शिवानंद ठाकुर से बोले,  "ठाकुर... तुमने जिस आपदा को आमंत्रित किया है... उसकी अब कोई स्थायी काट नहीं।
उस तांत्रिक ने 'पनियाला शैतान’  को जिंदा किया है। इसे मारा नहीं जा सकता। ये अनंतकाल तक जीवित रहता है। इसे केवल रोक के रख सकते है। जिस तहखाने में इसे रखा है उसे पानी से भर दो।  बस यही एकमात्र उपाय है। जब तक ये जल में डूबा रहेगा... ये निष्क्रिय रहेगा।"
 इधर उस शैतान को तहखाने में ही रोके रखने के लिए रोज 2 अपराधियों को जेल से निकाल कर उसके पास भेजा जाने लगा ताकि वो  उत्पात न मचाए और शांत रहे। लेकिन ये कोई उचित समाधान नहीं था। ठाकुर द्वारा पैदा करवाई गई मुसीबत अब उसी के गले पड़ चुकी थी। आखिर कार शिवानंद के कहे अनुसार उस सुरंग और तहखाने को पानी से भर दिया गया। 
 वक़्त बीतता गया। जल से भरी सुरंग में पनियाला कमजोर पड़ता गया और एक लंबी नींद में सो गया। वो सुरंग हर महीने जल से भरी जाने लगी। धीरे धीरे बीते वक्त के साथ उस सुरंग को बंद कर दिया गया। पनियाला शैतान उसी तहखाने में दफन हो कर रह गया। पीढ़िया बीत गई और ये भयानक खतरा सिर्फ किताब के पन्नो में खो गया।
द्रोण और बाबा मानो किसी नींद से जागे। इस भयानक दास्तान में पूरी तरह खो गए थे दोनों।

द्रोण आगे बोला..." बाबा... लगता है पुरातात्विक दल के लोगों ने गलती से उस शैतान को जिंदा कर दिया है। वही इस वक्त मैनागढ़ में तबाही मचा रहा है।"
 " तुम शायद ठीक कह रहे हो बाबू...  लेकिन अगर ये सच है तो हम सब इस भयानक मौत के पंजे में है। इस से छुटकारा कैसे पाएंगे।?"
"सबसे पहले ये पता लगाना होगा कि अगली बार वो शैतान गांव में कब और कहां आएगा।"  द्रोण मन ही मन कुछ सोच चुका था।
गेस्ट हाउस में आ कर अब वो रात होने का इंतजार करने लगा।
 रात का सन्नाटा पसर जाने के बाद...  गेस्ट हाउस का दरवाजा धीरे से खुला। द्रोण बाहर जाने का खतरा मोल ले चुका था। उसे ये जान न जरूरी था कि पनियाला शैतान सच में ऐसी हत्याएं कर रहा है या  इनके पीछे कोई  और कारण है।
वह सबसे पहले गेस्ट हाउस की छत पे पहुंचा। वहां से गांव जा पूरा जायजा लिया। कहीं कोई हरकत या आहट नहीं सुनाई दे रही थी। पूरा गांव एकदम शांत था। कहीं कहीं से कुत्तो के भोंकने की आवाजें जरूर आ रही थी। वह एक दम शांति से बिना हिले गौर से बाहर गांव की तरफ देख रहा था। बस चाँद की रोशनी फैली थी। कही कोई हरकत न देखकर अब वो बाहर की तरफ उतरा।
 अंधेरे कोनो में छुपता हुआ वो गांव में घूम रहा था। भारी खतरे में था वो। किसी भी पल उसका सामना मौत से हो सकता था। और तभी.... किले से उतरती सड़क पर एक अमानवीय आकृति दिखाई पड़ी उसे।
 दिल धाड़ धाड़ कर के बज उठा उसका।  वह तुरंत दौड़ कर मंदिर की छत पर जा चढ़ा। गुंबद के पीछे से उस आकृति पर पैनी नजर रख रहा था वो। जैसे जैसे वो भयानक आकृति पास आई... द्रोण की साँस हलक में अटक गई। साक्षात मौत का दूसरा रूप था वो। मंदिर के बाहर जलती मशालो की रोशनी में उसका भयानक हुलिया चमक उठा। 
"उफ्फ... तो सच में ये शैतान ही जिम्मेदार है इन क्रूर हत्याओं का!!"
 शैतान गांव में आ चुका था। द्रोण उसका पीछा करना चाहता था लेकिन बिना किसी ठोस तैयारी के वो ऐसी रिस्क नहीं ले सका।
उधर गांव में एक घर के बाहर बकरियों के बाड़े  में हलचल मच गई। बकरियों में मची भगदड़ से घर में उपस्थित अकेली महिला अपने आप को रोक नहीं सकी और उन्हें नियंत्रित करने के लिए बाहर निकल आई। ये गलती उसके जीवन पर भारी पड़ गई। पनियाला उसे खींच के ले गया। उसके जिस्म से टपकता खून उस रास्ते पर बिखरता गया जहां से पनियाला शैतान उसे खींच ले गया था। मंदिर की छत पर खड़ा द्रोण विवशता से इस भयानक दृश्य को देखता रहा।


 अगली सुबह किले की पहाड़ी के पास उस औरत का बुरी तरह नुचा हुआ बिखरा हुआ शव मिला। द्रोण ने रात की घटना का जिक्र ठाकुर और गांव वालों से किया।
 गांव में दहशत छाई थी। ठाकुर राज बहादुर काफी चिंतित थे। "अब क्या करें द्रोण??? ये मुसीबत तो बढ़ती जा रही है।"

द्रोण का तेज दिमाग अब पूरी योजना तैयार कर चुका था।
उसने पूरे आत्मविश्वास के साथ कहा..." इस मुसीबत से छुटकारा पा लिया जाएगा ठाकुर साहब। बस मुझे थोड़ी मदद चाहिए।"
ठाकुर साब एकदम से खड़े होते हुए बोले, " क्या सच??? सच में तुम इस मुसीबत का अंत कर दोगे द्रोण???तुम्हे जो मदद चाहिए अब मिल जाएगी... बस इस शैतान से गांव को छुटकारा दिला दो।"
 "पूरा गांव तुम्हारे साथ है।"

"ठीक है ठाकुर साब।  मेरी जो योजना है उसमें मुझे पूरे गांव का सहयोग ही चाहिए।"

अगले दिन सुबह द्रोण गांव वालो को अपनी योजना समझाने लगा। पास बने एनीकट से एक लंबी और गहरी किंतु संकरी सी नहर खुदवाई गई। दिन भर काम चलता और रात को सभी लोगों को सुरक्षित रहने की हिदायत दी जाती। लेकिन फिर भी अप्रिय घटना घट ही जाती।
 लगभग 7 दिन में नहर पूरी तरह तैयार हो गई। उस नहर में 4 फिट व्यास के सीमेंट के पाइप उतारे गए।   अब उस नहर को एक सीमेंटेड पाइप की सुरंग का रूप दे दिया गया था। जिसका एक मुंह एनिकट से जुड़ा था लेकिन
लेकिन एक लोहे की भारी पतरेनुमा ओट से एनिकट का पानी उसमें भरने से रोक दिया गया था। दूसरा मुंह खुला छोड़ दिया गया लेकिन उसे ढक्कन से बंद किया जा सके ऐसा इंतजाम कर दिया गया। एक मुंह उस पाइपनुमा सुरंग के ऊपर की तरफ खुला छोड़ दिया गया... जिस से बाहर निकल कर लोहे के मजबूत ढक्कन से उसे बंद किया जा सके। चूहेदानी तैयार हो चुकी थी। बस अब चूहा फसना बाकी था।
किले से लेकर उस पाइप के मुंह तक पक्की संकरी सी सड़क बना दी गई। गांव वालो के सहयोग से ये सारा काम 10 दिन में पूरा हो गया। अब योजना का सबसे खतरनाक चरण शुरू होने वाला था... जिसमें दांव पर लगनी थी डिटेक्टिव द्रोण की जान। एक हल्की सी चूक का मतलब था... उस शैतान के हाथों दर्दनाक मौत ।
अगली रात डिटेक्टिव द्रोण उस किले की पहाड़ी के पास छुप गया। रात गहराते ही गुर्राहट गुंजने लगी। वो भयानक दरिंदा बाहर निकला। द्रोण उसकी पदचाप और गुर्राहट सुन पा रहा था। 

उसका ध्यान अपनी तरफ खींचने के लिए द्रोण तेजी से भागा। शैतान ने भनक पाते ही द्रोण का पीछा करना शुरू कर दिया। भयंकर गुर्राहट के साथ वो द्रोण के पीछे लपका।
 द्रोण तेजी से उस संकरी  सड़क पर जा चढ़ा और अपने साथ लाये स्पेशल स्केट शूज से तेजी से फिसलने लगा।  वो शैतान इसके बावजूद बहुत तेजी से पीछा कर रहा था। दोनों के बीच की दूरी कम होती जा रही थी 
द्रोण तेजी से फिसलता हुआ सुरंग तक आ पहुंचा। और वहीं रुक गया। पीछे देखा वो शैतान तेजी से गुर्राते हुए उसके पीछे आ चुका था। द्रोण तेजी से झुक कर पाइपनुमा सुरंग में घुस गया। पनियाला शैतान भी उसके पीछे सुरंग ने जा घुसा। द्रोण तेजी से फिसलता हुए आगे बढ़ रहा था। शैतान को इतनी संकरी जगह में पीछा करने में कठिनाई हो रही थी। इसका फायदा उठा कर द्रोण तेजी से ऊपर खुलने वाले मुंह तक जा पहुंचा। इधर गांव वालो ने उस सुरंग का वो मुंह ढक दिया  जिस से द्रोण और पनियाला ने अंदर प्रवेश किया था।
 द्रोण ने पीछे घूम कर देखा... शैतान पास आता जा रहा था। द्रोण तेजी से ऊपर चढ़ गया और ऊपर वाले मुंह से होते हुए सुरंग से बाहर आ गया। वहां मौजूद गांव के कुछ लोगों ने तुरंत भारी भरकम ढक्कन से वो मुंह बंद कर दिया । तेजी से उस  ढक्कन पर मिट्टी डाल कर सुरंग पूरी तरह से बंद कर दी गई।
 इसी के साथ एनिकट से सुरंग को जोड़ने वाले मुंह पर लगा पतरा हटा दिया गया । एनिकट का पानी तेजी से सुरंग में घुस गया। पनियाला शैतान उस पानी से भरी सुरंग में क़ैद होकर रह गया। जल के भराव में शैतान तड़प कर निष्क्रिय हो गया। उसकी अंतिम गुर्राहाटे उसी सुरंग में दफन हो के रह गई।
गांव वाले खुशी से चिल्ला उठे। वो शैतान अब हमेशा के लिए वहां कैद हो के रह गया था। एनिकट में कभी पानी की कमी नहीं होनी थी और सुरंग हमेशा जल से भरी रहनी थी। ये एक तरह से पनियाला शैतान का अंत था।
गांव वालो ने द्रोण को कंधों पे उठा लिया। पूरी रात जश्न मना। लेकिन द्रोण अभी भी शंका में था। उसने ठाकुर से कहा," ठाकुर साब, हो सकता है आगे भविष्य में फिर किसी गलती से ये शैतान दोबारा जाग जाए।  ऐसा ना हो इसके लिए मैं चाहूंगा कि इस सुरंग के ऊपर एक शिव मंदिर बना दिया जाए। और उस मंदिर के एक पत्थर पर इस पनियाला शैतान की दास्तां खुदवा कर लिख दी जाए। ताकि आने वाली पीढ़ियों सावधान रहे और ये शैतान हमेशा हमेशा के लिए दफन हो कर रह जाए।"

ठाकुर साहब और गांव वालो ने द्रोण की बात मान ली। 
वहां एक शिव मंदिर के निर्माण का कार्य शुरू करवा दिया गया। नींव का पत्थर डिटेक्टिव द्रोण के हाथों रखवाया गया।
फिर 1-2 दिन बाद पूरे आदर सहित विदा ली डिटेक्टिव द्रोण ने मैनागढ़ से। लौटते वक्त उस किले के पास से जब उसकी जीप गुजरी तो एक अजीब से रोमांच से भर गया उसका अंतर्मन। 

      समाप्त! 




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