गढ़ी का रहस्य
इस कहानी का किसी जीवित या मृत व्यक्ति से कोई सबन्ध नहीं है। अगर ऐसा होता है तो केवल संयोग माना जायेगा।
सन 1989..
गगन और राजन दोनों पक्के दोस्त थे।दोनों ने 12 वीं कक्षा की परीक्षा दे दी। अब गर्मी की छुट्टियों का प्लान तय कर रहे थे।
गगन - " मैं तो इस बार पापा से ज़िद कर रहा हूँ कि मुझे किसी हिल स्टेशन पे जाने की अनुमति दे दें। गर्मियों से राहत पाकर सुकून से कुछ दिन ठंडे इलाके में घूमना चाहता हूँ। वैसे तू क्या सोच रहा है इस बार???"
राजन - "यार मैं तो हर बार कहीं न कहीं जाता ही रहा हूँ घूमने। इस बार नानी के गांव जाने का मन कर रहा है। कई साल हो गए गांव गए हुए।"
"अच्छा ... वैसे तेरा ननिहाल है कहाँ?" गगन ने पूछा।
"चन्दनगढ़.... पहाड़ों की तलहटी में बसा दुनियां से कटा एक सुंदर सा शांत पहाड़ी गांव।" राजन ने जैसे गांव की यादों में खोते हुए कहा।
फिर अचानक बोल पड़ा राजन "यार गगन... तू भी मेरे साथ ही चल न इस बार। बड़ा मजा आएगा। मेरे नाना गांव के जमींदार हैं। रहने को बढ़िया सी गढ़ी (गढ़ का छोटा रूप) है। खेत हैं। 20-25 दिन मजे से रहेंगे। नानी बहुत लाड़ प्यार से रखेगी।"
गगन - " तेरी बातों ने तो मुझे भी मोह लिया यार... तू एक बार अपने पिताजी से अनुमति ले ले। मैं चलने को तैयार हूं।"
दोनों को जाने की अनुमति मिल गयी। दोनों को लिए ट्रेन चल पड़ी चन्दनगढ़ की ओर।
रात को 9 बजे राजपुर स्टेशन पर उतरे दोनों। यहां से चन्दनगढ़ के लिए कोई तय साधन नहीं था। किसी की बैलगाड़ी, घोड़ागाड़ी से ही मदद मिल सकती थी।
उन्हें वहां कोई साधन नहीं दिख रहा था।
"अरे यार.. तुमने अपने नाना को आने की खबर नहीं दी थी क्या? कम से कम कोई बग्घी ही भेज देते हमे लेने के लिए" गगन परेशान स्वर में बोला।
राजन मुस्कराते हुए बोला- " मैं नाना नानी को सरप्राइज देना चाहता हूँ गगन। इतने सालों बाद वो मुझे अचानक सामने देखकर पहचानेंगे या नहीं!!? ये भी देखना है मुझे।"
गगन (मुंह बनाते हुए) -" तुम्हारे सरप्राइज के चक्कर में परेशानी में पड़ गए न अब!!?"
पास ही लगी एक छोटी सी चाय की थड़ी पर बैठे एक बूढ़े से उन्होंने चन्दनगढ़ के लिए साधन का पूछा। चन्दनगढ़ का नाम सुनते ही चाय वाले बूढ़े के मुंह पर सफेदी छा गयी। गंभीर स्वर में बोल पड़ा वो बूढा " बाबूजी... इस वक़्त आपको चन्दनगढ़ जाने की क्या सूझ गयी?? कहाँ से आये हो आप लोग?? किसके यहां जाना है???"
दोनों को बूढ़े का व्यवहार और सवाल अजीब से लगे। इस से पहले कि दोनों कोई जवाब दे पाते ... पीछे से किसी ने आवाज लगाई उन्हें।
" कहाँ जाना है बाबूजी??" एक तांगे वाला खड़ा था।
दोनों बूढ़े को छोड़ कर उसकी तरफ चले गए।
"चंदनगढ़ जाना है भैया.. चलोगे??" दोनों एक स्वर में बोल पड़े।
"तांगे वाला चन्दनगढ़ का नाम सुन कर सकपका गया लेकिन सवारी नहीं छोड़ना चाहता था। वो बोला " बाबूजी, इस वक़्त आपको चन्दनगढ़ का कोई साधन नहीं मिलेगा। आपको रात को यहीं रुकना पड़ेगा। कहीं रुकने का इंतज़ाम न हो तो मैं करवा सकता हूँ।"
दोनों काफी निराश हो चुके थे। लेकिन तांगे वाले पर भरोसा करना ठीक नहीं लगा उन्हें। रात स्टेशन पर बिताना ही ठीक समझा उन्होंने। जैसे तैसे रात बिताई दोनों ने। सुबह की चहल पहल ने उन्हें जगा दिया। दोनों को चंदन गढ़ के लिए एक बैलगाड़ी मिल गयी। पीछे बैठे दोनों बतियाते हुए सफर काटने लगे।
गगन - " राजन तुमने गौर किया?? लोग चन्दनगढ़ का नाम सुनकर थोड़ा घबरा रहे थे।!?"
राजन - " हां यार.. पता नहीं क्या वजह हो सकती है!?"
"ये तो चन्दनगढ़ जाकर ही पता लगेगा अब" गगन बोला।
बातों बातों में 8 किलोमीटर का सफर कब कट गया पता ही नहीं चला।
" लो बाबूजी आ गया चन्दनगढ़।" बैलगाड़ी वाला बोला।
दोनों अपना सामान लेकर गढ़ी की तरफ जाने वाले रास्ते पर उतर गए।
गढ़ी गांव से थोड़ा बाहर छोटी सी पहाड़ी नुमा टेकरी पर बनी थी।
चढ़ने के लिए बड़े बड़े पत्थरों की सीढ़ियां बनी थी। लेकिन सड़क से देखने से लग रहा था जैसे गढ़ी एकदम सुनसान, वीरान पड़ी हो। ना कोई चहल पहल... ना कोई आवाज।। एकदम सन्नाटा।
गगन - " यहां कोई रहता भी है??"
राजन आश्चर्य चकित था -" यार.. कोई दिख ही नहीं रहा। वरना यहां तो बड़ी चहल पहल रहती है।"
गगन राजन को चिढ़ाते हुए बोला -"अरे भाई तू अपने नाना नानी को सरप्राइज देने आया है या मुझे??"
राजन - "यार बड़ी गलती हो गयी। कम से कम एक चिट्ठी डाल देनी चाहिए थी। इतने सालों बाद आया हूँ। सब काफी बदल गया है। माँ ने भी कभी कुछ बताया नहीं। चलो गांव में चलते हैं वहीं पूछ लेंगे।"
दोनों पैदल ही गांव की तरफ बढ़ गए। थोड़ी ही देर में गांव में पहुंच गए वो।
गांव में किसी से पूछा "जमींदार साब कहाँ रहते हैं?"
उसके बताए पते पर पहुंच गए दोनों। गांव का सबसे आलीशान मकान था वो। बड़ी सी कोठीनुमा हवेली ।
जमींदार महेन्द्र प्रताप सिंह की हवेली। राजन को देखकर बड़े आश्चर्यचकित हो गए उसके नाना और नानी। खूब प्यार से आवभगत हुई दोनों की। फिर राजन ने अपनी नानी से पूछा "नानी यहां कब से रहने लगे गए। गढ़ी क्यों छोड़ दी??। कितना अच्छा लगता था वहाँ!!!"
नानी बड़े प्यार से बोली- "ये सब छोड़। ये बता तू अचानक इतने सालों बाद कैसे आ गया। कम से कम एक कागज तो दे देता। हम तुझे लेने राजपुर आ जाते।"
गगन बोला- " हां नानी... इसकी अच्छे से खबर लो। इसने आपको सरप्राइज देने के चक्कर में बहुत तंग कर दिया मुझे।"
फिर उसने राजपुर में रात बिताने वाली बात से लेकर सुबह गढ़ी के आगे उतरने वाली सारी बातें बता दी।
सुनकर नानी का चेहरा पीला पड़ गया।
राजन बोला - " नानी बताओ ना... वो गढ़ी छोड़कर यहां कब से आ गए?? क्यों आ गए??"
नानी गंभीर हो के बोली - " देखो बेटा... उस गढ़ी का नाम मत लेना अब। बस अब यहीं रहना है और उस गढ़ी की तरफ कभी मत जाना।"
राजन - "ठीक है नानी। लेकिन मेरे दोस्त को अपना गांव तो दिखा लाऊँ ना??"
"हां शाम को घुमा लाना.. लेकिन अंधेरा होने से पहले वापस घर आ जाना। आजकल रात को यहां कोई बाहर नहीं निकलता।" नानी ने मानो चेतावनी देते हुए कहा।
राजन -"क्यों नानी?"
"अरे बस बात मान लिया कर ना... इतने सवाल क्यों करता है?" नानी ने हल्का गर्म होकर कहा।
"ठीक है, ठीक है नानी... हम जल्दी ही घर आ जाएंगे।" राजन हाथ जोड़ते हुए बोला।
"यार राजन... यहां ज़रूर कुछ गड़बड़ है। पहले गढ़ी की तरफ जाने से सख्ती से मना किया। फिर रात को बाहर ना रहने का भी जोर देकर बोला।" गगन धीमे से बोला।
राजन -" हम्म... मुझे भी बहुत अजीब लग रहा है गगन... नाना ने गढ़ी छोड़ कर यहां रहने का फैसला क्यों लिया... इसका जवाब नहीं अभी तक नहीं मिला।"
दोपहर में आराम कर के शाम को दोनों निकल गए गांव में । राजन ने गगन को अपने खेत ज़मीन दिखाए। गगन हैरान था..."इतनी बड़ी ज़मीन है तुम्हारे नाना की??!!... और इतने खेत???!!"
राजन - " हां नाना को खुद नहीं पता कि कितनी ज़मीन, खेत है उनके।"
घूमते - घामते शाम गहराने लगी थी। गांव वाले बड़े स्नेह से मिल रहे थे उनसे। एकाएक गांव में सन्नाटा पसरने लगा। सब लोग अपना काम - धाम छोड़ कर घर जाने लगे।
"बाबू अब तुम भी घर जाओ जल्दी से। रात को बाहर नहीं रहना।" एक गांव वाले ने राजन से कहा।
राजन का माथा फिर ठनका। उसने गांव वाले से पूछ लिया - "मामा क्या बात है?? पहले तो रात को चौपाल लगती थी... सब लोग बाहर बैठ कर बतियाते थे। आजकल ये क्या हो रहा है?"
गांव वाला भय युक्त आवाज में बोला - " तुम काफी सालों बाद आये हो बाबू... तुम्हे शायद पता नहीं। गांव पर आफत का साँया मंडरा रहा है। अब देर मत करो बाबू। जल्दी घर चले जाओ।" कह कर गांव वाला सरपट दौड़ लगा गया।
राजन और गगन भी जल्दी घर आ गए। दोनों के दिमाग मे हज़ारों सवाल घुमड़ रहे थे।
राजन एकदम गम्भीरता के साथ बोला - " गगन मैं नानी से पूछ कर रहूंगा कि वो लोग क्या छुपा रहे हैं मुझसे!!? आखिर यहां चल क्या रहा है??"
दोनों नानी के पास पहुंच गए।
"नानी... आपको बताना ही होगा कि गांव में क्या समस्या चल रही है। आप क्या छुपा रहे हो हमसे।?? जब तक पूरी बात नहीं बताओगी मैं खाना ही नहीं खाऊंगा।" राजन ज़िद पर अड़ गया।
नानी ने फिर टालना चाहा..- "अरे तू कितने सालों बाद आया है। कुछ दिन आराम से रह यहां। क्यों फालतू बातों में उलझता है।??"
"नहीं नहीं नहीं ... आपको बताना पड़ेगा बस।" राजन अब नहीं मान ने वाला था।
"अच्छा क्या जान ना है तुझे?" नानी मानो हारते हुए स्वर में बोली।
"सब कुछ... गढ़ी छोड़ कर यहां क्यों रहने आये? गढ़ी की तरफ क्यों नहीं जाना?? गांव पे क्या आफत आई है?? क्यों लोग रात को घरों से बाहर नहीं निकल रहे?? यहां तक कि रात को राजपुर से हमें कोई यहां लाने तक को तैयार नहीं हुआ ?? इसका क्या कारण है?? ये सब कुछ जानना है मुझे।।" राजन बेचैनी से बोला।
"अच्छा - अच्छा... इतने सवाल???!!!
तेरे नाना ने मुझे मना किया था कुछ भी बताने से...वो चाहते थे कि तू कुछ दिनों के लिए आया है.. फालतू में परेशान होगा। लेकिन तेरी ज़िद है तो बताना पड़ेगा। सुन..."
नानी डरी सहमी और थकी हुई आवाज में आगे बोली.." तुझे तो पता ही है कि हम पहले अपने पुरखों की उस भव्य गढ़ी में बड़े आराम से रहते थे। तेरा भी काफी बचपन भी वहां बीता है। हम सब बड़े चैन से वहां रह रहे थे। नौकर - चाकर, धन - धान्य, किसी चीज़ की कोई कमी नहीं थी। लेकिन एक दिन न जाने किस ज़माने का शाप उजागर हुआ..." नानी का स्वर और भय युक्त हो गया....
(फ्लैशबैक)....."एक रात को एक नौकर रहस्यमयी ढंग से गायब हो गया। हमने पूछताछ की लेकिन कोई पक्का जवाब नहीं मिला। हमने सोचा कुछ चुरा के भाग गया होगा।.... दो दिन बाद एक अन्य नौकर की लाश गढ़ी की छत पर मिली। मैंने खुद अपनी आंखों से उसकी लाश देखी थी। ऐसा लग रहा था मानो हड्डियां भींच कर तोड़ दी गयी हो। किसी इंसान का ये काम नहीं हो सकता।" हवाइयां उड़ने लगी नानी के चेहरे पर ये वाकया याद करते हुए।
"तेरे नाना ने इस घटना को मामूली तौर पर लिया। पुलिस आई और तफ्तीश कर के चली गयी। कोई सुराग नहीं मिला। 3-4 दिन बाद ही एक और नौकर घुड़साल में मृत पाया गया। उसकी मौत भी उसी तरह हुई थी। तेरे नाना ने पुलिस को खबर नहीं करवाई। चुपचाप उसका अंतिम संस्कार करवा दिया । वो बार बार पुलिस नहीं बुलाना चाहते थे।"
राजन और गगन सांस रोके सुन रहे थे।
नानी आगे बोली " मैंने तेरे नाना को कहा कि 3 नौकर हादसों का शिकार हो गए हैं... कुछ तो कारण है। लेकिन तेरे नाना अभी भी गंभीरता से नहीं ले रहे थे इन घटनाओं को। धीरे धीरे नौकर कम होते गए। गांव वाले गढ़ी में काम करने से कतराने लगे। बाकी बचे नौकर भी भाग गए। बस कुछ लठैत और हम दो ही रह गए थे।"
नानी भरे कंठ से बोली, "वो मनहूस रात आज भी अच्छी तरह याद है मुझे। उस रात... ठीक 1 बजे... हमने लठैतों के चीखने की आवाजें सुनी। नींद एक झटके से खुल गयी हमारी। लठैत ऐसे चीख रहे थे मानों हलाल किये जा रहे हों। मैं बुरी तरह घबरा गई। तेरे नाना ने अपनी बंदूक उठाई और बाहर की तरफ भागे। तभी 2 लठैत उन्हीं की तरफ दौड़े आ रहे थे। लठैत तेरे नाना को लगभग खींचते हुए वापस अंदर की तरफ ले आये।"
नानी की सांस तेज हो गयी। वो संयत होकर बोली। "तेरे नाना ने चिल्ला कर कहा ' ये क्या कर रहे हो भूर सिंह। मुझे अंदर क्यों ले आये।'
'हुज़ूर... बाहर मौत नाच रही है... हमारे लठैतों को एक भयानक शैतान ने नोच डाला है।' भूर सिंह ने डरती हुई आवाज में कहा।
मैं बुरी तरह दहशत में थी। तेरे नाना की आंखों में भी खौफ छा गया उस वक़्त। 'कैसा शैतान... क्या बक रहे हो तुम...???' ठाकुर साहब चीख पड़े।
'हुज़ूर यकीन कीजिये... एक भयानक शैतान है बाहर... सिरकटा... केवल धड़ है उसका... बड़ा खौफनाक है हुज़ूर। उस से मुकाबला असंभव है। बस अब किसी तरह अपनी रक्षा की सोचिए। जब तक मैं ज़िंदा हूं तब तक तो आप पर आंच नहीं दूंगा.. बाकी ईश्वर जाने मालिक।' भूरसिंह भर्राई आवाज में बोला।
ठाकुर महेंद्र प्रताप चौंक उठे "क्या??... क्या कहा तुमने??... सिरकटा है वो!!??.... यानी... यानी... वो शाप की कहानी सच थी।।। उफ्फ... यानी वो अनहोनी घट ही गयी... गज़ब हो गया।"
मैंने चीखते हुए पूछा " क्या बड़बड़ा रहे हो आप?? कैसी अनहोनी??"
वो कोई जवाब देते उस से पहले ही दरवाजा भड़भड़ा उठा। दरवाजे पर बुरी तरह पर चोट पड़ रही थी। तभी चरमरा कर गिर पड़ा वो मजबूत दरवाजा... और... सामने नज़र आया वो भयानक शैतान जिसे देखकर रूह फना हो गयी हम चारों की। इतना भयानक शैतान ... कल्पना से परे... गला सड़ा शरीर... लंबे नुकीले नाखून... नीला पड़ चुका जिस्म... अजीब सी फुफकार भरी गुर्राहट निकल रही थी उसके शरीर से.... धीरे धीरे लड़खड़ाते हुए हमारी तरफ बढ़ रहा था। दहशत के मारे मेरे पैर जाम हो गए।"
' सुशीला जल्दी भागो यहां से' तेरे नाना की पुकार सुन कर मैं जैसे होश में आई।'
हम दोनों तुरंत दूसरे दरवाजे से बाहर की तरफ भागने लगे। वो शैतान हमारी तरफ लपका। उसका मुख्य शिकार शायद हम ही थे। लेकिन भूर सिंह और उसका साथी उस शैतान पर टूट पड़े।
तब तक हम तेरे नाना की बग्घी तक पहुंच गए थे। घोड़ों को ऐड़ लगाई और घोड़े तेजी से गांव की तरफ दौड़ लगा गए।
भूर सिंह बखूबी नमक का हक़ अदा कर गया था। मरते - मरते भी उसने अपने मालिक का जीवन बचा लिया।
हम जैसे तैसे गांव तक पहुंचे। बार - बार मुझे पीछा करता वो शैतान दिख रहा था। गांव के अंदर की ये हवेली तेरे नाना के छोटे भाई के लिए बनवाई गई थी। लेकिन वो कम उम्र में ही चल बसा।तब से ये खाली ही पड़ी थी। हमने यहीं आ कर शरण ली। रात आंखों में काटी हमने। सुबह होने पर जी मे जी आया।
बीती रात की घटना का इतना गहरा असर था हम पर कि कुछ ठीक से बोला भी नहीं जा रहा था। ठाकुर साहब ने सुबह गांव के कुछ विश्वस्त लोगों को बुलवाया और उनको रात की घटना विस्तार से सुना दी। "ठाकुर साब.. हमें तो पहले से ही कुछ शक था.. जिस तरह की घटनाएं गढ़ी में घट रही थी... हमें तो अंदेशा हो गया था कि ये किसी काली शक्ति का ही काम है।" गाँव के एक बुजुर्ग ने कहा।
"तो अब क्या करें काका?" ठाकुर साहब बड़े चिंतित स्वर में बोले।
"अब जल्दी से जल्दी आपकी और गांव की सुरक्षा का उपाय कीजिये मालिक। क्योंकि आपके गढ़ी छोड़ देने के बाद अब वो गांव को निशाना बनाएगा। आपकी तलाश में वो गांव का रुख ज़रूर करेगा हुकुम।"
"हमें अभी के अभी अघोरी तांत्रिक 'मारक' को बुला लेना चाहिए।" गांव का एक अनुभवी वृद्ध बोला।
"हां हां... अघोरी मारक ज़रूर इस मुसीबत से छुटकारा दिला सकता है।" गांव वाले एक स्वर में बोले।
उसी वक़्त 2 आदमी 'अघोरी मारक' को लाने रवाना कर दिए गए।
कुछ ही घंटों में मारक ठाकुर साहब के सामने उपस्थित था।
"ठाकुर साहब.... आप पर जो मुसीबत टूट पड़ी है उसका समाधान बहुत कठिन है। अगर आप इस बारे में कुछ और बताएं तो शायद में कुछ प्रभावी उपाय कर सकूंगा।" अघोरी मारक ध्यान लगाते हुए बोला।
ठाकुर साहब धीमे स्वर में बोले "अघोरी महाराज ! पीढ़ियों से हमारे वंश में एक लिखित सन्देश आगे से आगे दिया जाता रहा है। कपड़े पर लिखा वो संदेश आज भी गढ़ी के तहखाने में सुरक्षित पड़ा है। उसकी एक एक लाइन हमें याद है।
तेरे नाना तांत्रिक मारक को विस्तार से सब कुछ बताने लगे...
" सुनो...300 साल पहले जब हमारे पुरखों ने इस गढ़ी की नींव रखी थी तब परम्परा के अनुसार इस गढ़ी और इस ठिकाने की रक्षा के लिए 'मेहला' नाम के आदमी को इसकी नींव में जीवित चुनवाया था। मेहला ने स्वेच्छा से अपना बलिदान दिया था। लेकिन उसकी पत्नी इस बात से रुष्ट थी। उसने अपने बेटे को गोद में लिए गढ़ी के आगे उस वक़्त के ठाकुर साहब भैरव प्रताप सिंह जी को कोसते हुए कहीं चली गयी थी। सालों बाद मेहला का बेटा एक सिद्ध तांत्रिक बन कर अपने पिता की मौत का बदला लेने आया। वह भयानक काली विद्या का ज्ञाता और रक्तपिपासु था। आते ही ठिकाने में उत्पात मचाने शुरू कर दिया उसने। ठाकुर परिवार पर कई जानलेवा हमले किये उसने। कई बार शैतानी शक्तियों, भयानक प्रेत और कृत्या सिद्ध कर के हमारे वंश विनाश के लिए भेजा। लेकिन ठाकुर खानदान के गुरु सिद्ध पुरुष श्री सर्वानंद जी के कारण वो हमेशा विफल रहा। आखिर कई प्रयासों के बाद ठाकुर साहब और गुरुदेव ने उस दुष्ट को गिरफ्तार कर लिया।
जब उसे मांत्रिक रस्सियों से बांध कर ठाकुर साहब के सामने लाया गया तो वो बुरी तरह फुफकार रहा था।
ठाकुर भैरव प्रताप बोले - "इस वहशी दरिंदे को एक ही सज़ा दी जानी चाहिये... मौत की सज़ा।"
गुर्रा उठा वो शैतान "ठाकुर... तू मुझे कभी नहीं मार सकेगा ... तू बस मेरा शरीर नष्ट कर सकता है... लेकिन मैं फिर लौट के आऊंगा... और तेरे वंश के एक - एक चिराग को बुझा दूंगा। हा हा हा हा हा हा....."
गुरु सर्वानंद बोल उठे - "ये सही कह रहा है ठाकुर, इसे मार के भी रोक नहीं सकेंगे हम। मार देने से तो इसकी शैतानी रूह आजाद हो जाएगी और ये और खतरनाक हो जाएगा।"
"ओह... तो क्या करना चाहिए गुरुदेव?" भैरव प्रताप चिंतित स्वर में बोले।
"इसकी रूह को हमेशा के लिए इसके जिस्म में ही कैद करके रखना पड़ेगा ठाकुर। इस नामुराद का सर काट कर इसके जिस्म को बेकार कर दिया जाए। सर गढ़ी के कंगूरे में दफन कर दिया जाए और इसका धड़ ताबूत में बंद कर के गढ़ी के तहखाने में हमेशा के लिए दफन कर दिया जाए।" गुरु सर्वानंद ने भारी आवाज में कहा।
ये सुनते ही चीख पड़ा वो शैतान ,
"नहींsss...नहींsss..... सर्वानंद मैं तेरा खून पी जाऊंगा। ठाकुर sss... तू कुछ भी कर ले ssss... मेरे हाथों तेरे सर्वनाश को नहीं टाल सकेगा तू।"
ठाकुर साहब चिल्ला उठे, "हुक्म की तामील हो।"
उस शैतान का सर काट दिया गया और गढ़ी के कंगूरे में चुन दिया गया। फिर धड़ को कई विधान के साथ तहखाने में गड्डा खोदकर ताबूत में रखकर के जंजीरों से बांध कर दफना दिया गया। तांकि उसकी शैतानी रूह उसके जिस्म में उसी ताबूत में कैद रहे हमेशा के लिए।" नानी कुछ पल के लिए रुकी।
दोनों हैरत और भय से भर चुके थे।
दोनों एक साथ बोले, " फिर क्या हुआ नानी?"
नानी ने नौकरानी को आवाज दी... "बिंदिया... देख अंधेरा हो गया है... लालटेन जला दे और खाना तैयार हुआ क्या?"
नौकरानी बोली," जी माताजी... बस थोड़ी देर में तैयार हो जाएगा।" ये कहकर वो हवेली में लालटेनें जलाने चली गयी।
"नानी बताओ ना फिर क्या हुआ?" राजन ने सहमी आवाज में पूछा।
नानी आगे बोली...
"ये कहानी सुनकर तांत्रिक मारक बोला..."बस... ठाकुर साहब... मैं सब समझ गया। आप इस वक़्त बहुत बड़े खतरे में है। आप पर हर पल मौत मंडरा रही है। अभी इसी वक्त मैं जो कहता ही वो करिए। अब उस शैतान को नष्ट करना बहुत कठिन है। मैं बस आपको सुरक्षित रखने का उपाय कर सकता हूँ।"
"तो जल्दी उपाय करिए" ठाकुर साहब ने व्यग्रता से कहा।
कुछ ही देर बाद मारक ने चार खूंटे सिद्ध कर के ठाकुर साहब को दे दिए। हवेली के सामने एक छोटा शिव मंदिर स्थापित करवाया। और बोला...
"ठाकुर साहब ये खूंटे हवेली के चारों तरफ ज़मीन में ठुकवा दीजिये फिर कोई बला कभी आपकी हवेली में प्रवेश नहीं कर सकेगी और इस शिव मंदिर में रोजाना पूजा होनी चाहिए एक दिन भी चूक ना हो। जब तक इस शिव मंदिर में रोज पूजा होती रहेगी इसके आस पास का क्षेत्र सुरक्षित रहेगा।"
"फिर मारक चला गया। तब से हम यहीं रह रहे हैं। गांव में
आस - पास रात को गुर्राहटों के स्वर गूंजते है। कुछ लोगों ने उस सिरकटे शैतान को गांव में मँडराते देखने का दावा भी किया है। रात को जो भी गढ़ी की तरफ गया वो मृत पाया गया। बुरी तरह नोची, टूटी हड्डियों वाली लाश मिली उन लोगों की। अब तो लोग दिन में भी गढ़ी की तरफ जाने से डरते हैं।"
"लेकिन वो शैतान आज़ाद कैसे हुआ नानी?" गगन ने पूछा।
नानी आगे जवाब देते हुए बोली...
"बाद में हमें पता चला । एक पुराना नौकर, जो पहले गढ़ी में काम करता था और भाग गया था , हमारे पास आया और बोला - 'ठाकुर साहब... गुनाह माफ कर दें मालिक तो एक बात बताऊँ... बड़े दिनों से मन पर बोझ की तरह है ये बात।"
"जो भी कहना है कह दो शामू'' ठाकुर ने नरमी से कहा।
"हुज़ूर गढ़ी में काम करते वक़्त दो नौकर हीरा और लालू का मन काला हो गया था। उन्हें अंदेशा हुआ कि गढ़ी के तहखाने में आपके पुरखों का पुराना धन गड़ा है। उन्होंने मेरे मन मे भी कालख भर दी मालिक..." कहते हुए शामू बिलखने लगा।
ठाकुर साहब ने थोड़ा सख्ती से कहा, "रोना बन्द कर और आगे बोल... क्या हुआ था।?"
शामू संयत होते हुए बोला, "मालिक... वो दोनों रात को तहखाने में उतर गए.. और... मुझे बाहर निगरानी पे रख छोड़ा। काफी देर बाद मुझे तहखाने से एक भयानक गुर्राहट सुनाई दी। मैं वहां से तुरंत भाग गया मालिक। उसके कई दिन बाद मैंने गढ़ी में शैतान होने की बात सुनी तो सीधा आपके पास आ गया। मुझे माफ़ कर दीजिए मालिक।"शामू फिर से बिलखने लगा।
"मन तो कर रहा है तुझे गोली से उड़ा दूं। तूने उन कमीनों का साथ देकर मेरे खानदान के साथ - साथ पूरे गांव को भयानक खतरे में डाल दिया है शामू। अब तेरा फैसला में गांव की पंचायत को सौंपता हूँ।" ठाकुर साहब ने दांत पीसते हुए कहा।
पंचायत ने शामू को शाम के वक़्त गांव निकाला दे दिया और उसी पल गांव छोड़ने को कह दिया। अगले दिन शामू गढ़ी के पास मृत पाया गया।
नानी जैसे उन भयानक यादों से बाहर आते हुए बोली...
"तब से हम और ये पूरा गांव उस सिरकटे शैतान की दहशत के साये में जी रहे हैं। जब तू अचानक आया तो हमारा जी सूख गया। जितनी खुशी तुझे देखकर हुई उतना ही डर बैठ गया तुझे लेकर। हम तुझे और तेरी माँ को ये सब बताकर चिंता में नहीं डालना चाहते थे। अब तुझे सब बता दिया है। बस दोनों यहां आराम से गांव में रहो... कहीं बाहर मत जाना.. और रात को बिल्कुल बाहर मत निकलना।"
"लेकिन नानी आप लोगों ने पुलिस की मदद क्यों नहीं ली??" राजन ने हैरत से पूछा।
नानी थकी मुस्कान से बोली, " अरे बेटा... एक तो थाना यहां से कोसो दूर बड़े शहर में है। कितनी बार आएगी पुलिस। एक बार तेरे नाना गए भी थे थाने में। वहां के इंस्पेक्टर दोस्त थे उनके। तफ्तीश के लिए आये थे ठाकुर साहब के साथ। लेकिन कहीं कोई सबूत, सुराग नहीं मिला तो मजाक में ये कहते हुए लौट गए कि "ठाकुर... चाय पे ही बुलाना था तो साफ कह देते ये बेसिरपैर की कहानी सुना के क्यों लाये यहां तक .. हा हा हा।"
पुलिस को ऐसी बातों पर कोई यकीन नहीं इसलिए बस अब नसीब के भरोसे बैठे हैं।
"अब तो तू समझ गया होगा कि हम तुझे क्यों रोक रहे थे।!" नानी एकाएक रुआंसी सी हो गयी।
"हम समझ गए नानी। अब हम पूरा ध्यान रखेंगे। आप चिंता मत करो।" राजन ने नानी को तसल्ली देते हुए कहा।
"ठीक है। अब तुम दोनों खाना खा लो, तैयार हो गया है।" नानी ने प्यार से कहा और खाना परोसने की तैयारी में लग गयी।
खाना खाकर सोने चले गए दोनों। ऊपर का एक शानदार कमरा उनको सोने के लिए दे दिया था। लेकिन नींद कोसो दूर थी उनकी आंखों के।
"यार ये सब स्वप्नलोक की बातें नहीं लग रही तुझे?" गगन ने चुप्पी तोड़ते हुए कहा।
"यकीन करना तो मुश्किल है गगन। लेकिन नाना नानी और इतने गांव वालों को झुठलाया भी नहीं जा सकता।" राजन बोला।
"मैं तो ये सोच सोच कर घबरा रहा हूँ कि सुबह हम गढ़ी के कितने पास उतरे थे।" गगन भयभीत आवाज में बोला।
राजन - "गगन..... आज मुझे तो नींद आनी मुश्किल है। क्यों न आज हम बाहर नज़र रखें!!? क्या पता कुछ दिख जाए।"
गगन रोमांच के साथ बोला।- " हां यार... मन तो मेरा भी कर रहा है। चलो आज रात को हम हवेली के बाहर नज़र रखेंगे।"
राजन ने कमरे की लालटेन बुझा दी और दोनों खिड़की के पास आकर बैठ गए। बाहर केवल चांद की रोशनी फैली थी। बहुत ध्यान से देखने पर ही कुछ नज़र आ रहा था। उन्हें इधर-उधर भागते कुत्ते नज़र आ रहे थे। कभी-कभी कुत्तो का रोना उनमें झुरझुरी भर देता था।रात के 10 बजे होंगे... तभी उनके कमरे के दरवाजे पर दस्तक हुई। दोनों भय से उछल पड़े।
तेजी से भाग कर अपने अपने बिस्तर पर दुबक गए। बाहर से आवाज आई... " बच्चों सो गए क्या??" तब जी मे जी आया। उठकर दरवाजा खोला तो सामने ठाकुर साहब खड़े थे।
"बस हाल चाल पूछने आ गया था बच्चों। कोई तकलीफ तो नहीं है ना यहां? नींद आ जायेगी??" ठाकुर साहब ने प्यार से पूछा।
"हां हां नानाजी... हम एकदम आराम से हैं । आप भी सो जाइये।"
"ठीक है बच्चों.. सो जाओ।" कहकर नानाजी चले गए।
"यार राजन... मेरी तो जान ही निकल गयी थी दस्तक सुनकर।" गगन दबी आवाज में बोला।
हालत तो राजन की भी खराब हो चुकी थी लेकिन डर छुपाकर बोला, "यार गगन तुम बड़े डरपोक हो। चलो फिर से खिड़की के पास चलते हैं।" दोनों फिर से आ जमे खिड़की के पास।
सन्नाटा छा चुका था गांव में। शांत वातावरण में बाहर जंगल के रोते सियारों की आवाज भी साफ सुनाई पड़ रही थी। 12 बज चुके थे। दोनों की आंखे अब थकने लगी। तभी एक हल्की गुर्राहट भरी आवाज उभरी। दोनों ने कान लगा कर सुनने का प्रयास किया। गुर्राहट फिर से उभरी। खून जम गया दोनों का। गांव के कुछ घरों के बाहर मशाल लगाई हुई थी। दूर मशाल की रोशनी में एक हल्का सा साँया नज़र आया उनको। भय से जड़ हो उठे दोनों।
"र... र... राजन... इतनी रात गए कोई गांव वाला तो नहीं हो सकता वो।?" गगन घिघियाये स्वर में बोला।
"ह..हां यार... वो ज़रूर सिरकटा ही होगा। गांव में भटक रहा है।।।" राजन की ज़बान भी अटकने लगी।
राजन नम आंखों से बोल पड़ा.."यार गगन... मैं अपने नाना और नानी की कोई मदद नहीं कर सकता.. बहुत दुख हो रहा है... हमारी खानदानी गढ़ी छोड़नी पड़ गयी....।"
गगन हिम्मत के साथ बोला, "दोस्त... दुनिया मे ऐसी कोई मुसीबत नहीं.. जिसका कोई हल ना हो। इस सिरकटे का भी कोई न कोई इलाज ज़रूर होगा। कल दिन में इस बारे में पूछताछ करते हैं। चल अब सोने की कोशिश करते हैं।"
राजन - "उसकी झलक दिखने के बाद तुझे लगता है हम सो पाएंगे??"
गगन - "जानता हूँ यार... लेकिन हम यहां सुरक्षित है। वो यहां नहीं आ सकता। इसलिये अभी बेफिक्र हो के सो जाओ। कल कुछ सोचते है इस बारे में।"
राजन "हम्म.. ठीक है।"
थोड़ी देर ख्यालों में खोए रहने के बाद नींद ने आ घेरा उन्हें।
अगले दिन सुबह नाश्ता करने के बाद दोनों निकल गए गांव में।
गगन "क्यों न एक चक्कर गढ़ी की तरफ लगा आएं??"
राजन, "मेरे ख्याल से दिन में तो इतना खतरा नहीं होगा।!"
"अगर खतरा दिखा तो तुरन्त भाग आएंगे।" गगन ने इशारा करते हुए कहा।
दोनों गांव वालों की नज़रे बचाते हुए गढ़ी की तरफ निकल पड़े। गांव से बाहर आते ही एक अंजान डर हावी होने लगा उन पर।
"राजन... आगे जाना चाहिए क्या?... म... मेरे मन में घबराहट सी हो रही है।" गगन धीरे से बोला।
"हम बस गढ़ी दूर से देख के आ जाएंगे गगन... अगर मामला ठीक लगा तो ही पास जाएंगे।" राजन समझाते हुए बोला।
दोनों आगे बढ़ते गए। गढ़ी नज़र आने लगी थी। सुनसान रास्ता... दिन का सन्नाटा... तेज धूप...चारों तरफ़ केवल झाड़ियां ... नागफनी के पौधे... एक अजीब सा सूनापन फैला था गढ़ी के चारों ओर। वे गढ़ी की सीढ़ियों तक जा पहुंचे थे। दिल धाड़ धाड़ बज रहा था उनका। उन्होंने एक नज़र गढ़ी की तरफ देखा.... राजन की आंखे भीग गयी। "गगन इस गढ़ी मैं खूब खेला हूँ मैं। मेरे बचपन की कई यादें जुड़ी है इस से। इस गढ़ी के सुहाने पल आज तक याद है मुझे।" राजन भावुक हो गया।
"मैं ये समझ सकता हूँ राजन। लेकिन
ऐसे हालात में क्या हो सकता है??" गगन ने राजन के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा।
"मैं किसी दुष्ट शैतान की वजह से मेरे नाना की गढ़ी इस तरह नहीं छोड़ सकता गगन। कुछ तो करना पड़ेगा। कोई तो रास्ता ज़रूर होगा उस शैतान से छुटकारा पाने का??!!" राजन आक्रोश के साथ बोला।
गगन - "क्यों न हम उस तांत्रिक से मिलें?? जिसने नाना की हवेली सुरक्षित की थी!!"
राजन - "हम्म... अच्छा विचार है। उसी से मिलते है। शायद कोई उपाय मिल जाये!"
दोनों सीढ़ियों पर खड़े बतिया ही रहे थे... कि अचानक गढ़ी से एक हल्का गुर्राहट का स्वर उभरा। दोनों चौकन्ने हो गए।
"तुमने सुना गगन??"
"हां राजन... हमें यहां से फौरन निकल जाना चाहिए।"
तुरंत गांव की तरफ दौड़ लगा गए। लेकिन काफी दौड़ने के बावजूद गांव का रास्ता नहीं मिल पा रहा था। घूम कर पीछे देखा तो होश संभालने मुश्किल हो गए... अभी भी गढ़ी की सीढ़ियों के पास ही खड़े थे वो...
"उफ्फ... राजन... लगता है हम उस शैतान के जाल में फंस गए हैं..."
"हे भगवान अब क्या होगा...??"राजन भी बुरी तरह घबरा गया।
"घड़ी में दोपहर के 12 बजे हैं .... ये वक़्त इनके हावी होने का होता है। बचना मुश्किल है राजन...!!!" गगन चिल्ला के बोला।
गुर्राहट और तेज होने लगी।
उल्टे पांव सीढ़ियों की तरफ खिंचने लगे दोनों। मौत का खौफ झलक उठा चेहरों पर।
प्रतिरोध के बावजूद दोनों एक एक सीढ़ी चढ़ते जा रहे थे। गढ़ी उन्हें ऐसे खींच रही थी मानों लोहे को चुम्बक।
"आज तो मौत पक्की है राजन"
"बुरे फंसे" ।
अचानक उन्होंने देखा गांव के कई लोग ठाकुर साहब के साथ दौड़े चले आ रहे थे गढ़ी की तरफ। तेज शोर के साथ पूरा हुजूम उमड़ पड़ा वहां। लाठियां , सरिए... जिसको जो मिला उठा लाया था।
तभी सीढ़ियों से लुढ़क पड़े दोनों और अपने होश खो बैठे। कुछ देर बाद जब आंखे खुली तो अपने आप को हवेली के पलंग पर पाया। गांव के कुछ खास लोग और वैद्य जी से घिरे हुए। नानी सुबक रही थी। ठाकुर साहब कुर्सी पर बैठे थे।
"अब कैसा लग रहा है बच्चों?" ठाकुर साहब ने प्यार से सर सहलाते हुए पूछा।
दोनों दुख, भय और शर्म से भरे... उठकर बैठ गए। सर झुकाए बैठे थे दोनों। तभी नानी डांटते हुए बोली..."इन दोनों को प्यार की नहीं मार की ज़रूरत है। इनकी ऐसी पिटाई कीजिये कि सात जन्म तक याद रखे। कितना समझाया था कि गढ़ी की तरफ नहीं जाना है... फिर भी ना जाने कौनसा खज़ाना ढूंढने गए उधर..." कहते हुए नानी सुबकने लगी।
कुछ देर बाद सामान्य हुए दोनों। सबसे माफी मांगते हुए दोबारा ऐसी गलती न दोहराने की बात मानी।
"अब से तुम दोनों हवेली से बाहर नहीं जाओगे।" नानी ने कड़क कर कहा।
"तुम दोनों के साथ अब हर पल 'धीरू' रहेगा।" कहीं भी आना जाना हो इसको साथ लिए बिना कहीं नहीं जाओगे।" नाना ने भी सख्ती के साथ बोल दिया।
धीरू एक मजबूत लठैत था। ठाकुर साहब ने उसे मुस्तैद रहने को कह दिया।
अब दोनों कैद होकर रह गए हवेली में। कहीं आस - पास आना जाना भी हो तो धीरू की निगरानी में।
"यार गगन... आज तो मर ही गए थे।" राजन ने उस भयानक वाकये को याद करते हुए कहा।
"हां राजन.. मौत सामने नज़र आ गयी थी। यकीन नहीं हो रहा कि हमारे साथ ऐसा हुआ है!! अब तक तो मैं सुनी सुनाई बाते ही मान रहा था ये सब... लेकिन आज असल मे महसूस किया... बहुत डरावना एहसास था यार... अभी तक सिहरन उठ रही है.." गगन भयभीत स्वर में बोला।
"लेकिन मेंरी वजह से तू भी मौत के मुंह मे चला जाता यार... गढ़ी और मेरे परिवार के सर से वो साँया हटाने का जुनून मेरा है... उसमे तुझे बेवजह घसीट लिया मैंने।" राजन दुखी मन से बोला।
गगन - "अब फालतू बातें बन्द कर... और ये बता कि गढ़ी का भूत उतर गया या नहीं???"
राजन - " सच बताऊं गगन... अभी भी मैं गढ़ी छोड़ने को तैयार नहीं। मैं उस दुष्ट से हमारी गढ़ी वापस छीन के रहूंगा।"
गगन - " लेकिन अब तो हमारा कहीं आना जाना भी धीरू के रहमो करम पर है। हम ये अब करेंगे कैसे।??"
राजन-" हमें किसी तरह तांत्रिक मारक से मिलना पड़ेगा। वो ही हमें कुछ उपाय बता सकता है।"
गगन - "हम्म... ठीक है। पहले उसके ठिकाने का कुछ पता लगाते हैं। ये धीरू हमें कुछ बता सकता है मारक के बारे में।"
रात को दोनों सोने के लिए ऊपर कमरे में चले गए। धीरू कमरे के बाहर पहरा लगा के सोने लगा। दोनों ने अंदर से दरवाजा खटखटाया... धीरू ने धीरे से दरवाजा खोला।
"क्या बात है बाबू? कुछ चाहिए???" धीरु ने हौले से पूछा।
"नींद नहीं आ रही धीरू। कुछ देर बाहर बैठना चाहते हैं।"
"हां.. हां... बैठो ना। " कहकर धीरू ने बाहर 2 कुर्सियां लगा दी। लालटेन की रोशनी में बैठे तीनों इधर उधर की बातें करने लगे।
"अच्छा धीरू ये तो बताओ... ये तांत्रिक महाराज ने जो उपाय किया है उसके बाद तो वो शैतान कभी इधर तो नहीं आया ना???" गगन ने बात को मुद्दे पर लाने के लिए तपाक से पूछ लिया।
"ओह... तो बाबू तुम अभी तक डर रहे हो??? चिंता मत करो वो शैतान यहां कभी नहीं आ सकता। तान्त्रिक मारक बड़ा पहुँचवान तांत्रिक है। उसने बड़ा सुरक्षित उपाय किया है हवेली के लिए।"
"अच्छा... ये तांत्रिक महाराज रहते कहाँ है??" गगन ने पूछा।
धीरू - "पास ही के गांव तारागढ़ के बाहर जंगल की तरफ उनका मठ है। वहीं अकेले रहते हैं।"
"ओह.... ठीक है धीरू... अब सोना है.. नींद आ ही है।" राजन आंखे मलते हुए बोला।
"हां.. बाबू... ठीक है अब सो जाओ।"
दोनों उठकर अंदर चले गए।
खिड़की खोलकर बैठ गए और बतियाने लगे।
"पास ही के गांव तारागढ़ में रहता है मारक।"
राजन गंभीरता से बोला।
गगन,- "हम्म... तो क्या सोचा है अब?"
"सोचना क्या है... बस मिलना है अब मारक से।" राजन मुस्करा के बोला।
गगन - "लेकिन कैसे??"
राजन - "हमें रात को यहां से निकलना पड़ेगा।"
गगन - " क्या sss?? लेकिन... लेकिन ये असंभव है राजन। हम रात को हवेली से किसी तरह निकल भी गए तो उस खूंखार शैतान से बच कर निकलेंगे कैसे??"
"जानता हूं गगन... ये काम बहुत मुश्किल है। लेकिन तूने नागराज की कॉमिक्स पढ़ी है ना??? जिसका सुपर हीरो नागराज हो वो भला मुसीबत से हार कैसे मान सकता है??!!"
"हम्म.. ये तो तूने ठीक कहा राजन.. तो फिर तैयार हो जाओ। साक्षात मौत से सामना होगा हमारा।" गगन का स्वर कठोर हो उठा।
राजन - "तो अब पहले पूरी तैयारी करते हैं। कल रात को हर हाल में मारक तक पहुंच जाना है।"
अगली सुबह दोनों अपनी तैयारी में लग गए। धीरू साये की तरह साथ लगा था दोनों के। सबसे पहले धीरू की नज़रे बचा के मशाल का इंतज़ाम किया। फिर शिव मंदिर में जा के शिवलिंग का पवित्र जल एक कलश में लिया।
"बस इस मशाल और पवित्र जल का ही सहारा है गगन। अगर ये बेअसर रहे तो हम गए काम से।" राजन ने गगन की ओर देखते हुए कहा।
गगन दृढ़ता से बोला- " जब ठान ली है तो अब पीछे नही हटना राजन।"
रात घिरने का इंतज़ार करने लगे दोनों।
रात के ठीक 11 बजे... पूरे गांव में सन्नाटा छा गया था... हवेली अब खर्राटों से गूंज रही थी... धीरू ऊंघते हुए सो चुका था...
दोनों ने बिना आवाज किये बालकॉनी वाला दरवाजा खोला और बालकॉनी में आ गए। कुछ देर वहीं खड़े रहे दोनों। गांव में कहीं कोई हलचल नहीं हो रही थी। पाइप के सहारे धीरे धीरे नीचे उतरने लगे। अब तक सब कुछ ठीक चल रहा था। तारागढ़ का रास्ता धीरू से पता कर ही लिया था। गांव की सुनसान गलियों से गुजरते हुए काफी बाहर तक आ चुके थे । तभी उनके कानों में वही गुर्राहट पड़ी। खून जम गया दोनों का। फुफकार भरी गुर्राहट उनके पास आने लगी।
"उफ... वो शैतान यहीं कहीं है राजन।" गगन सहमी आवाज में बोला।
"आज या तो उस सिरकटे की मौत के सामान का इंतज़ाम होगा गगन... या हमारी मौत तय है।" राजन धीमे से बोला।
दोनों एक बैलगाड़ी के पीछे छुप गए। सिरकटा गांव के बाहरी इलाके में मंडरा रहा था... हवेली की तरफ ना जा पाने से क्रोध में फुफकारता हुआ.... ।
गगन और राजन सांस रोके दुबके थे । सिरकटा बैलगाड़ी तक आ चुका था। दोनों बैलगाड़ी के नीचे दुबके हुए... सिरकटा के पैर देख रहे थे।
पैर घिसटता सिरकटा बैलगाड़ी के पास आ के रुक गया। जैसे उसे पता हो कि यहां कोई छुपा है। अगले ही पल बैलगाड़ी पीछे सरक गयी। गगन और राजन की ओट हट चुकी थी। दोनों की चीख निकल गयी। एक झटके से मशाल जला ली उन्होंने।
"उफ्फ... आज तो गए काम से।" गगन चिल्ला उठा।
राजन ने हाथ मे पकड़ी मशाल दे मारी सिरकटा पर। फुफकार उठा शैतान। दोनों भागने लगे। लेकिन उस भयानक शैतान से बचकर भागना संभव नहीं था। शैतानी शक्तियों से युक्त उस ज़िंदा मुर्दे से भला दो साधारण लड़के क्या टक्कर लेते। लेकिन उनके पास अभी भी भोलेनाथ का पवित्र जल था जो उनका आखिरी भरोसा था। सिरकटे ने दबोच लिया राजन को। राजन के हाथ मे मशाल थी। वो जलती मशाल मारे जा रहा था उस शैतान पर।
तभी गगन ने कलश का जल छिड़क दिया सिरकटे पर ... एकाएक तड़प उठा शैतान। राजन को छोड़कर पीछे हट गया।
अब गगन और राजन को थोड़ी हिम्मत मिल गयी। दोनों तेजी से दौड़ पड़े तारागढ़ की तरफ। 3 किलोमीटर की दूरी पर ही था तांत्रिक मारक का मठ। कुछ दूरी तक पीछा करता नजर आया सिरकटा। धीरे धीरे पीछे छूट गया। हांफते हुए मारक के मठ तक जा पहुंचे गगन और राजन।
दनदनाते हुए मठ में प्रवेश कर गए दोनों। नींद से अचानक जग गया मारक उन दोनों की हलचल सुन कर।
"कौन हो तुम दोनों?... और इतनी रात गए यहां क्या कर रहे हो??" मारक हैरान था।
दोनों एक सांस में बता गए सारा किस्सा। जिसे सुनकर आश्चर्य से भर गया मारक...फिर बोला- "ओह... तो तुम दोनों चन्दनगढ़ से आए आये हो... साक्षात मौत से बचकर आ गए हो बच्चों। वाकई में बहुत बहादुर हो तुम।"
"हम यहां उस शैतान सिरकटे से हमेशा के लिए मुक्ति का मार्ग जानने आये हैं महाराज। मैं उस शैतान को हमारी गढ़ी नहीं लेने दूंगा और ना ही मेरे खानदान पर उस शैतान का साँया हर पल मौत बनकर मंडराने दूंगा।" राजन बहुत गुस्से में था।
"तुम्हारी हिम्मत की दाद देनी पड़ेगी बेटे... लेकिन याद रखो... वो कोई मामूली शैतान नहीं है। सदियों से सो के जगा है वो... इन्तेक़ाम की आग में जलता हुआ... काली शक्तियों का राजा... । उस से टकराने की तो मैं भी नहीं सोच सकता।" मारक उनको सावधान करते हुए बोला।
"तो क्या आप हमारी कोई मदद नहीं कर सकते??" गगन ने निराशा के साथ पूछा।
"मैं तुम लोगों को उस भयानक प्रेत को नष्ट करने का उपाय बता सकता हूँ बच्चों... लेकिन वो कार्य असंभव सा है। बिल्कुल मौत से दो दो हाथ होंगे। जिस हिम्मत से तुम दोनों उस प्रेत से टकरा कर यहां तक पहुंचे हो... उसे देखकर मैं तुम्हें वो उपाय ज़रूर बताऊंगा।" मारक उनकी बहादुरी से काफी प्रभावित हो चुका था।
"आप बस हमे रास्ता बता दीजिए महाराज... बाकी हम कर लेंगे।" गगन दृढ़ता से बोला।
तो सुनो.. "तुम्हारे नाना ठाकुर महेंद्र प्रताप ने उस शैतान के बारे में जो कुछ मुझे बताया... उस से मेरा निष्कर्ष यही निकलता है कि अब गढ़ी के कंगूरे में लगा उसका सर उसके धड़ से मिला देने से वो नष्ट होने के योग्य हो जाएगा। उसकी आत्मा को उसके धड़ में कैद कर के रखा गया था और सर जुदा कर दिया गया था । लेकिन अब अगर उसको नष्ट करना है तो सर और धड़ को फिर से मिलाकर उसे पूर्ण करना पड़ेगा। उसके बाद ही उस पर कोई उपाय कारगर साबित हो सकेगा। अगर तुम ये करने में कामयाब हो गए तो उसे नष्ट करना आसान हो जाएगा।"
राजन - "लेकिन उसके बाद हम उसे दोबारा मारेंगे कैसे??"
" चिंता मत करो बच्चों... अब से 7 दिन तक मैं एक तांत्रिक अनुष्ठान करूंगा.. और भगवान शंकर का एक छोटा सा त्रिशूल सिद्ध कर के तुम्हें दूंगा। जैसे ही उसका जिस्म पूरा हो .. उसी वक़्त ये त्रिशूल उसके सीने में पैवस्त कर देना। त्रिशूल लगते ही वो पंगु हो जाएगा। उसके आगे का काम मैं कर लूंगा।"
"ठीक है मारक महाराज... हम भी 7 दिन में हमारी तैयारी कर लेंगे।" गगन मुस्कुरा कर बोला।
"आज रात मेरे मठ में ही रुक जाओ बच्चों। यहां तुम पूरी तरह सुरक्षित हो। सुबह होते ही चले जाना।"
दोनों ने मारक की बात मान ली।
अगले दिन सुबह 4 बजे उठकर सीधे जा पहुंचे चंदनगढ़।। छुपते छुपाते हवेली तक जा पहुंचे हवेली तक। पाइप से चढ़ कर बालकॉनी से होते हुए कमरे जाकर ऐसे सो गए जैसे कुछ हुआ ही न हो।
अगले सात दिन काटने बहुत भारी लग रहे थे दोनों को। हर दिन विचारों का तूफान से उमड़ पड़ता। भय हावी होता .... खुद से लड़ते... खुद को तैयार करते...।
सातवें दिन मारक आ पहुंचा चन्दनगढ़। ठाकुर साहब ने बड़े आदर से बिठाया उसे।
"ठाकुर साहब सुना है आपके ये दोनों बच्चे उस गढ़ी के शैतान का शिकार बनते बनते बच गए।!" मारक ने विस्मय के साथ पूछा।
"हां महाराज... नादानी में उस तरफ चले गए थे। लेकिन भोलेनाथ की कृपा से बच गए।"
मारक - "मैं इन दोनों बच्चों से अकेले में कुछ पूछना चाहूंगा ठाकुर साहब।"
"जी ज़रूर पूछिये।"
मारक गगन और राजन के साथ ऊपर वाले कमरे में चला गया। उन्हें सब कुछ दोबारा समझाते हुए एक छोटा सा चमचमाता त्रिशूल उन्हें देते हुए बोला...
"ये लो बच्चों.. अब सब तुम्हारे हाथ में है। भोलेनाथ तुम्हारी रक्षा करेंगे।"
आगे बोला मारक...और सुनो..."मेरा आशीर्वाद तुम लोगों के साथ है.... अब मेरे शरीर मे फुर्ती नहीं रही बच्चों .. वरना मैं भी गढ़ी में तुम्हारे साथ चलता।"
"हम पूरा ध्यान रखेंगे महाराज... कल उस गढ़ी और गांव को उस दुष्ट के पंजों से मुक्त करवा देंगे हम।" दोनों एक साथ बोल पड़े।
मारक चला गया। अगली रात बहुत भयानक होने वाली थी। दोनों के दिल दहल रहे थे। राजन ने हौले से गगन से कहा, "गगन ... गढ़ी का ये किस्सा मुझसे जुड़ा है... ये लड़ाई भी मेरी और मेरे खानदान से जुड़ी है... तुम्हें बेवजह ही इस खतरे में डालना अच्छा नही लग रहा मुझे।
गगन बोला "मैं जानता हूं राजन... मैं मां और पिताजी के बारे में भी सोचता हूं। लेकिन अब तुझे अकेला छोड़ के मैं पीछे नहीं हट सकता और फिर हमारे साथ भगवान शंकर का आशीर्वाद और शक्ति है। मुझे पूरा विश्वास है हम ही जीतेंगे।"
अगली रात दोनों पुरी तैयारी के साथ चुपके से निकल पड़े उस गढ़ी की ओर। पूनम का चांद आकाश पर चढ़ चुका था। मद्धिम सी चांदनी बिखरी थी। सियार अपना राग अलापना शुरू कर चुके थे। रास्ता एकदम साफ था। शायद सिरकटा भी जानता था कि दिन में भी लोग गढ़ी की तरफ नहीं जाना चाहते तो रात में कौन जाएगा!!?? इसलिए वो गांव के दूसरी तरफ ही विचरण कर रहा था। गगन और राजन गांव से बाहर तक सही सलामत पहुंच गए थे। अब सुनसान बियाबान रास्ता शुरू होने वाला था।
हर एक झाड़ी के पीछे सिरकटा छुपा हुआ सा नज़र आ रहा था उन्हें। दिल किसी रेल इंजन की तरह तेजी से धड़कने लगा था। वो लोग अब गढ़ी तक आ पहुंचे थे। रात के भयानक सन्नाटे में सियारों के रोने की डरावनी आवाज गूंज रही थी। हवा से सरसराते पत्ते... फड़फड़ाते चमगादड़ ... ऊंचे सूखे ठूंठ की सूखी टहनियों के पीछे से झांकता चांद... और उस चांद की रोशनी में नहाई वो काली गढ़ी... खून जमा देने वाला माहौल था!।।
गढ़ी की सीढ़ियों के पास पहुंच गए थे दोनों। जैसे ही उन्होंने गढ़ी की सीढ़ियों पर पांव रखा ... कहीं दूर एक भयानक गुर्राहट गूंजी... गांव का कोना - कोना गूंज उठा... हवा में तैरती वो गुर्राहट सीढ़ियों पे खड़े गगन और राजन के कानों से आ टकराई और... उनका हलक सुख गया। सिरकटा... जो रात के समय गांव के आस - पास घूम रहा था... उसे उन दोनों के गढ़ी तक पहुंचने की भनक लग गयी थी। इधर गगन और राजन तेजी से सीढ़ियों पर चढ़ने लगे।
"जल्दी करो गगन... सिरकटा के आने से पहले हमें कंगूरे से उसके सर को हासिल कर लेना है।"
दौड़ते हुए ऊपर पहुंचे दोनों। गढ़ी का भारी भरकम दरवाजा खुला पड़ा था।
"मेरे साथ आओ गगन... मैं अच्छी तरह से जनता हूं इस गढ़ी का कोना कोना। हमे छत की तरफ जाना होगा।"
दोनों अभी हॉल में पहुंचे ही थे कि... तेज आवाज के साथ गढ़ी का वो भारी मजबूत दरवाजा एक चरमराहट की आवाज के साथ बन्द हो गया। सिरकटा गढ़ी में पहुंच चुका था। अब उसे बस शिकार करना था... उन दोनों लड़कों का।
"जल्दी भागो राजन... वो शैतान गढ़ी में आ धमका है।"
"उफ्फ... उम्मीद से जल्दी आ गया वो। मेरे पीछे तेजी से आओ गगन।"
दोनों अंदर की सीढ़ियों से सीधे छत की ओर दौड़ लगा गए। लेकिन मंज़िल इतनी आसान नहीं थी। तेजी से दौड़ते हुए छत पर पहुंचने ही वाले थे वो कि तभी सबसे ऊपर की सीढ़ी पर खड़ा नज़र आया सिरकटा। चीख निकल गयी दोनों के मुंह से। वापस नीचे की तरफ भागने लगे दोनों। फुफकार भरी हंसी गूंज रही थी गढ़ी के कोने कोने से। मशाल हाथ मे लिए दोनों दूसरी सीढ़ियों की तरफ भागने लगे। तीन मंज़िल की उस गढ़ी की दूसरी मंजिल पर पहुंच गए थे दोनों। और वहीं सामना हो गया उस भयानक प्रेत से। अब सिरकटा उन्हें मौका नहीं देना चाहता था।
उसने अपने हाथ लंबे कर के खूनी पंजो में दबोच लिया दोनों को। कुछ ही पलों में उनका काम तमाम हो जाना था... तभी राजन ने उछाल दिया अभिमंत्रित जल उस शैतान पर। एक पल के लिए पकड़ ढीली हो गयी और मछली की तरह फिसल गए दोनों सिरकटा के पंजो से। गुर्राते हुए दोनों के पीछे भागा वो दरिंदा। गगन ने अपने थैले से कांच की गोलियां निकाल कर बिखेर दी। पीछे भगता सिरकटा लड़खड़ा कर गिर गया उन कांच की गोलियों पर। इतना समय काफी था उन दोनों को छत तक पहुंचने के लिए। छत पर पहुंचते ही गगन ने तेल फैला दिया सीढ़ियों पर। पीछे लपका सिरकटा बुरी तरह फिसल कर नीचे आ गिरा। उसे इस तरह की हरकत का कोई अंदेशा नहीं था।गिरता पड़ता छत पर पहुंच गया सिरकटा भी।
तब तक दोनों कंगूरे तक पहुंच चुके थे। सारे दांव विफल होते देख सिरकटा फुफकार उठा। अपनी शैतानी शक्ति से खींचने लगा राजन को अपनी तरफ। तब तक गगन कंगूरे पर चढ़ चुका था।
"आह... गगन... ये.. ये मुझे अपनी तरफ खींच रहा है। जल्दी करोsss...!"
गगन ने कंगूरे को तोड़ कर उस शैतान का खोपड़ीनुमा सर बाहर निकाल लिया। इधर राजन सिरकटा की गिरफ्त में आ चुका था। मौत नाच उठी राजन की आंखों में।
"लो पकड़ो राजनsss..." गगन ने चिल्लाते हुए शैतान का सर राजन की तरफ उछाल दिया।
राजन ने फुर्ती से लपकते हुए धड़ पर टिका दिया उस खूनी पिशाच का सर और एक ही झटके से भगवान शंकर का अभिमंत्रित त्रिशूल घोंप दिया शैतान के सीने में।
बुरी तरह तड़प उठा सिरकटा... गढ़ी का कोना कोना उसकी भयानक चीत्कार से गूंज उठा। धीरे - धीरे उसकी गुर्राहटें शांत हो गयी।
गगन और राजन को मानो सब कुछ सपना सा लग रहा था। यकीन नहीं हो रहा था कि वो एक भयानक ख़तरे को खत्म कर चुके हैं जो गढ़ी और पूरे गांव पर सालों से मंडरा रहा था।
तभी वहां ठाकुर साहब और गांव वालों के साथ आ पहुंचा तांत्रिक मारक। जलती मशालों से सजी उस गढ़ी में मानो दीवाली आ गयी थी। सारा किस्सा जानने के बाद गांव वालों ने गगन और राजन को कंधों पर उठा लिया। ठाकुर साहब गर्व और खुशी से फुले नहीं समा रहे थे। भोर होते ही तांत्रिक मारक की देख रेख में उस शैतान को हमेशा के लिए शिव मंदिर के नीचे दफना दिया गया... ताकि फिर कभी वो खतरा बनकर ना उभर सके।
फिर गढ़ी का भी शुद्धिकरण कर के ठाकुर साहब को सौप दिया गया।
अब गढ़ी में फिर से रौनक लौट आई थी। गढ़ी में नानी के दुलार के साथ मजे से छुट्टियां मनाकर घर लौटते गगन और राजन अपने साथ जीवन भर न भूलने वाली रोमांचक यादें लेकर जा रहे थे।
समाप्त!