अब आगे........
इंस्पेक्टर राणा ने दरवाजे झांक के देखा तो एक भयानक स्त्री आकृति एक हवनकुंड के सामने बैठी कर्कश स्वर में मंत्रोच्चार कर कोई तांत्रिक अनुष्ठान कर रही थी। उसका विकराल और खौफनाक रूप देखकर इंस्पेक्टर राणा जैसा मजबूत दिल वाला आदमी भी थरथरा उठा। भयानक सफेद पड़ चुका चेहरा, लम्बे दांत, लंबे नाखून, नीला पड़ चुका जिस्म और काले रंग का चोगा पहने वो चुड़ैल बड़ी भयानक लग रही थी। अचानक उसके गले से एक डरावना अट्टहास निकला और उसकी गर्दन पीछे की ओर घूम गयी। "ही ही ही ही ही ही...... यहां तक पहुंचने वाला कभी वापस नहीं जाता...ही ही ही ही।।।" इंस्पेक्टर के आने की उसको भनक लग चुकी थी। एकाएक इंस्पेक्टर राणा ने वहां से भागने की कोशिश की लेकिन अब देर हो चुकी थी। भागते हुए इंस्पेक्टर को कई कटे हुए सिरों ने घेर लिया। वो कटे हुए सिर भयंकर चीत्कार कर रहे थे। " उफ्फ्फ... आज तो मौत आ ही गयी।" इंपेक्टर राणा जड़ होकर रह गया। अब वो चुड़ैल धीरे धीरे उसकी तरफ बढ़ रही थी।
"ही ही ही...!"
इंस्पेक्टर के कुछ समझ पाने से पहले ही उस चुड़ैल के पंजे लंबे होकर उसे जकड़ चुके थे।
"उफ्फ्फ... क्या ये सब सच में हो रहा है??? या कोई सपना है ये???" राणा को अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हो रहा था।
तभी चुड़ैल के पंजो ने उछाल फेंका उसे एक कोने में। जहां खड़े थे बिना सिर के दो धड़। उन दो धड़ो ने अपनी मजबूत पकड़ में ले लिया राणा को। हर कहीं मानव कंकाल के ढेर, खोपड़ियां और बिखरा खून दिखाई दे रहा था। ये दृश्य देखकर मितली सी आने लगी थी इंस्पेक्टर को। दिमाग कुछ पलों के लिए सुन्न सा हो गया उसका। अभी भी उसको कुछ समझ में नहीं आ रहा था।
अब वो धड़ चुड़ैल का इशारा पाकर इंस्पेक्टर राणा को घसीट रहे थे एक स्थान विशेष की तरफ। चुड़ैल का अट्टहास गूंज रहा था हवेली के कोने कोने में। इंस्पेक्टर की आंखों में मौत नाच उठी। दो धड़ो ने इंस्पेक्टर को मजबूती से गिरा दिया लकड़ी के एक फट्टे पर। कटे हुए सिर उसके चारों और मंडराने लगे। वो जोर से चीख रहे थे। चुड़ैल हवनकुंड की तरफ बढ़ गयी और जोर जोर से मंत्र पढ़ने लगी।
एकाएक चुड़ैल ने एक मोटा सा गंडासा उठा लिया। इंस्पेक्टर अपनी पूरी शक्ति लगाकर भी उन दो धड़ो की पकड़ से नहीं छूट पा रहा था। चुड़ैल अट्ठहास करते हुए उसके सर पर आ खड़ी हुई। उसके हाथ गंडासा लिए हुए ऊपर उठे। इंपेक्टर ने अपनी आंखें बंद कर ली " मेरा अंतिम समय आ गया है। अफसोस मैं यहां के इस भयानक राज़ को न जान सका।"
तभी कहीं से चली एक गोली और चुड़ैल के हाथों में थमा गंडासा टूट के एक ओर उछल गया।
हौलनाक गर्जना के साथ पलटी वो भयानक मौत। और उसकी नज़र जा पड़ी गोली चलाने वाले पर। हवलदार जोरसिंह अपनी ड्यूटी बखूबी निभा गया था। इस मौके का फायदा उठाकर इंस्पेक्टर राणा भी छूट गया उस पकड़ से। दोनों अब सावधान भी थे और उस वातावरण को समझ भी चुके थे। इंपेक्टर राणा ने काफी हद तक अपने डर पे काबू पा लिया। दोनों अपने साथ भरपूर गोलियां और मशीनगन लाये थे। इंस्पेक्टर राणा का मानना था कि उनका सामना किसी तस्कर गिरोह या अपराधियों से होगा लेकिन यहां मामला प्रेतशक्ति का था। अब दोनों अपने बचाव में केवल गोलियां ही चला सकते थे। अपने ऊपर मंडराते सिरों और अपनी तरफ लपकते दो धड़ों पर लगातार गोलियों की बौछार करते रहे दोनों लेकिन भला उन पर गोलियां क्या असर करती।वो उनकी तरफ बढ़ते जा रहे थे। हवा में मंडराते सिर चीत्कार कर रहे थे..."आओ हम में शामिल हो जाओ... हा हा हा हा...."
दोनों की हिम्मत टूटने लगी। तभी इंस्पेक्टर राणा के दिमाग में एक विचार कौंधा... वह बोला "जोरसिंह ये सब मुर्दा लोग है। इनकी आत्मा अतृप्त होने के कारण ये सब इस योनि को भोग रहे हैं। मैंने सुना है अंतिम संस्कार के अभाव में आत्मा को शांति नहीं मिलती। क्यों न हम इन कंकालों को अग्नि के हवाले कर दें। शायद इससे इन्हें मुक्ति मिल जाये और हमारे प्राण बच जाए।"
जोर सिंह को भी सम्बल मिला "सही कहा साहब, शायद ऐसा करने से हम इनसे छुटकारा पा सकते हैं।"
" तो फिर ठीक है तुम इन पर गोलियां चलाते हुए मुझे कवर दो मैं आग जलाने का इंतज़ाम करता हूं। बस यही आखिरी चारा है।" कहते हुए इंस्पेक्टर राणा हवेली में उगी सुखी घास, टहनियां और पत्तो के ढेर बनाने लगा।
हवलदार जोरसिंह पूरी हिम्मत के साथ उन मुर्दो से भिड़ा हुआ था। चुड़ैल को उनकी मंशा समझते देर नहीं लगी। वो भयंकर चीत्कार करती हुई बोली...
" नहीं sssssss... मैं तुम्हे ऐसा नहीं करने दूंगी... खून पी जाऊंगी मैं तुम्हारा।"
तब तक इंस्पेक्टर राणा गोलियों से बारूद निकाल चुका था औरअपना शर्ट फाड़ के मशाल बना ली। बस एक चिंगारी और आग की लपटें दहक उठीं। सुखी टहनियों और पत्तों में आग इस तरह फैली की सारे बिखरे कंकाल आग के हवाले होते गए। हवा में मंडराते सिर गायब होने लगे। धड़ आग की लपटों में घिर गए।
अपनी तबाही देखकर चुड़ैल जोरसिंह पर झपट पड़ी। "गुर्रर्रर... अब तेरा गर्म खून पिऊंगी मैं.... ही ही ही ही !" जोरसिंह चुड़ैल के पंजो में फंस चुका था। वो समझ गया कि अब उसकी मौत निश्चित है। उस चुड़ैल के क़ातिल चंगुल से निकलना उसके लिए नामुमकिन था। चुड़ैल उसका खून पीने लगी। जोरसिंह ने मरते मरते भी हिम्मत नहीं हारी। वो उस चुड़ैल के साथ घिसटता हुआ सा आग की लपटों की तरफ बढ़ने लगा और चुड़ैल को साथ लिए आग की लपटों में कूद पड़ा। चुड़ैल की दर्दनाक चीखों से हवेली थर्रा उठी। अगले ही पल चुड़ैल आग की लपटों से घिरी चिल्लाती हुई इधर उधर भागने लगी। इंस्पेक्टर राणा ये दृश्य देखकर चीख उठा..." नहीं ssss.. जोरसिंह sssss.... उफ्फ!"
तभी आग की लपटों से घिरी चुड़ैल ठोकर खाकर गिर पड़ी उस टूटे हुए गंडासे पर जो धंस गया उसके सिर में।
वो जोर से गर्जना करने लगी। धीरे धीरे वो गर्जना अब कराहों में बदल गयी। इंस्पेक्टर राणा धीरे धीरे उसके पास गया। ये सारा रहस्य जानना उसके लिए बहुत ज़रूरी था। उसके पास जाकर इंपेक्टर राणा ने हौले से कहा "तुम अपनी आखिरी सांसे ले रही हो... क्या तुम बताओगी ये सब क्या था??"
चुड़ैल कराहते हुए अपनी खरखराती आवाज में बोली ... "हर्रर्रर... मैंने इंसानी जात को कभी तवज्जो नहीं दी...वो मेरे लिए जानवर से ज्यादा कुछ नहीं है... लेकिन आज मेरी तबाही इंसानों के हाथों ही हुई।"
कराहते हुए वो आगे बोली... "(फ्लेशबैक) मैं एक बेघर अनाथ लड़की थी। एक दिन अघोरियों ने मुझे अपने साथ ले लिया। मैं उनके साथ रहकर उनकी तंत्र विद्या सीखने लगी। धीरे धीरे मैंने घोर तांत्रिक अनुष्ठान करने शुरू कर दिये। इसके लिए मैं नरबलि और मानव मांस भक्षण भी करने लगी। उन अघोरियों ने मुझे चेतावनी दी कि इसके परिणाम बड़े भयानक होंगे। पर शक्ति पाने की चाह और मानव मांस की लत ने मेरे कदम नहीं रुकने दिए। अघोरियों ने मुझे त्याग दिया। मुझमे भयानक शारीरक परिवर्तन होने लगे। तब मैंने इस बियाबान में, इस हवेली में डेरा डाल दिया। इस सूने रास्ते पर मुझे बलि के लिए मानव मिल जाते थे। यहां से गुजरने वाले लोगों की गाड़ियां मैं अपनी तंत्र शक्ति से रोक देती थी। और ये हवेली उन्हें अपनी तरफ आने को मजबूर कर देती। यहां आने वाले इंसान का मैं सिर काटकर बलि चढ़ा देती। तंत्र क्रिया के फलस्वरूप वो इंसान कुछ दिन अपना कटा हुआ सिर लेकर इस वीराने में घूमता और उसकी आत्मा मेरी गुलाम बनते ही मैं उसके धड़ का भक्षण कर लेती।"
"ओह! तो सुरेश के साथ भी यही हुआ होगा।" इंस्पेक्टर राणा मन ही मन बुदबुदाया।
"ये कटे हुए सिर ही मेरी शक्ति के केंद्र थे.... इनके नष्ट होते ही मेरी शक्ति खत्म हो रही है।...आह... " ये कहते हुए चुड़ैल ने आखिरी हिचकी ली और उसका सिर एक और लुढ़क गया।
हवेली में आग तेजी से फैल रही थी। इंस्पेक्टर राणा जैसे नींद से जगा। वो तेजी से बाहर की और भागा। बाहर आकर उसने पीछे मुड़कर देखा... पूरी हवेली धधक रही रही। सारे रहस्य हवेली के साथ जल कर खाक हो चुके थे। इंस्पेक्टर राणा को अब भी यकीन नहीं हो रहा था। मन ही मन सोच रहा था वो कि क्या ये सब सच था??
मौत के मुंह से निकल आया था आज वो ।
भौर का उजाला फैलने लगा था। इंस्पेक्टर राणा कार की तरफ बढ़ चला। उसकी आंखें नम थी अपने बहादुर और वफादार साथी जोरसिंह को खो देने के कारण।
शायद अब फिर से आबाद हो पायेगा वो शॉर्टकट..!
समाप्त।
फिर मिलेंगे.....