Sunday, 24 January 2021

शॉर्टकट पार्ट-3

पिछले अंक में आपने पढ़ा कमल और सुरेश के साथ हुए रहस्यमय हादसे का पर्दा फाश करने के लिए पुलिस का एक तेज तर्रार इंस्पेक्टर 'राणा' अपने साथी हवालदार जोरसिंह के साथ निकल पड़ा  उस भयानक शॉर्टकट की तरफ। जहां मौजूद उस खौफनाक हवेली में उसने ऐसा कुछ देखा कि उसकी रूह फना हो गयी।

अब आगे........


इंस्पेक्टर राणा ने दरवाजे झांक के देखा तो एक भयानक स्त्री आकृति एक हवनकुंड के सामने बैठी कर्कश स्वर में मंत्रोच्चार कर कोई तांत्रिक अनुष्ठान कर रही थी। उसका विकराल और खौफनाक रूप देखकर इंस्पेक्टर राणा जैसा मजबूत दिल वाला आदमी भी थरथरा उठा। भयानक सफेद पड़ चुका चेहरा, लम्बे दांत, लंबे नाखून, नीला पड़ चुका जिस्म और काले रंग का चोगा पहने वो चुड़ैल बड़ी भयानक लग रही थी। अचानक उसके गले से एक डरावना अट्टहास निकला और उसकी गर्दन पीछे की ओर घूम गयी।  "ही ही ही ही ही ही...... यहां तक पहुंचने वाला कभी वापस नहीं जाता...ही ही ही ही।।।" इंस्पेक्टर के आने की उसको  भनक लग चुकी थी। एकाएक इंस्पेक्टर राणा ने वहां से भागने की कोशिश की लेकिन अब देर हो चुकी थी। भागते हुए इंस्पेक्टर को कई कटे हुए सिरों ने घेर लिया। वो कटे हुए सिर भयंकर चीत्कार कर रहे थे। " उफ्फ्फ... आज तो मौत आ ही गयी।" इंपेक्टर राणा जड़ होकर रह गया। अब वो चुड़ैल धीरे धीरे उसकी तरफ बढ़ रही थी। 
"ही ही ही...!"
इंस्पेक्टर के कुछ समझ पाने से पहले ही उस चुड़ैल के पंजे लंबे होकर उसे जकड़ चुके थे। 
"उफ्फ्फ... क्या ये सब सच में हो रहा है??? या कोई सपना है ये???" राणा को अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हो रहा था।
 तभी चुड़ैल के पंजो ने उछाल फेंका उसे एक कोने में। जहां खड़े थे बिना सिर के दो धड़। उन दो धड़ो ने अपनी मजबूत पकड़ में ले लिया राणा को। हर कहीं मानव कंकाल के ढेर, खोपड़ियां और बिखरा खून दिखाई दे रहा था। ये दृश्य देखकर मितली सी आने लगी थी इंस्पेक्टर को। दिमाग कुछ पलों के लिए सुन्न सा हो गया उसका। अभी भी उसको कुछ समझ में नहीं आ रहा था। 
अब वो धड़ चुड़ैल का इशारा पाकर इंस्पेक्टर राणा को घसीट रहे थे एक स्थान विशेष की तरफ। चुड़ैल का अट्टहास गूंज रहा था हवेली के कोने कोने में। इंस्पेक्टर की आंखों में मौत नाच उठी। दो धड़ो ने इंस्पेक्टर को मजबूती से गिरा दिया लकड़ी के एक फट्टे पर। कटे हुए सिर उसके चारों और मंडराने लगे। वो जोर से चीख रहे थे। चुड़ैल हवनकुंड की तरफ बढ़ गयी और जोर जोर से मंत्र पढ़ने लगी।


एकाएक चुड़ैल ने एक मोटा सा गंडासा उठा लिया। इंस्पेक्टर अपनी पूरी शक्ति लगाकर भी उन दो धड़ो की पकड़ से नहीं छूट पा रहा था। चुड़ैल अट्ठहास करते हुए उसके सर पर आ खड़ी हुई। उसके हाथ गंडासा लिए हुए ऊपर उठे। इंपेक्टर ने अपनी आंखें बंद कर ली " मेरा अंतिम समय आ गया है। अफसोस मैं यहां के इस भयानक राज़ को न जान सका।" 

तभी कहीं से चली एक गोली और चुड़ैल के हाथों में थमा गंडासा टूट के एक ओर उछल गया।

हौलनाक गर्जना के साथ पलटी वो भयानक मौत। और उसकी नज़र जा पड़ी गोली चलाने वाले पर। हवलदार जोरसिंह अपनी ड्यूटी बखूबी निभा गया था। इस मौके का फायदा उठाकर इंस्पेक्टर राणा भी छूट गया उस पकड़ से। दोनों अब सावधान भी थे और उस वातावरण को समझ भी चुके थे। इंपेक्टर राणा ने काफी हद तक अपने डर पे काबू पा लिया। दोनों अपने साथ भरपूर गोलियां और मशीनगन लाये थे। इंस्पेक्टर राणा का मानना था कि उनका सामना किसी तस्कर गिरोह या अपराधियों से होगा लेकिन यहां मामला प्रेतशक्ति का था। अब दोनों अपने बचाव में केवल गोलियां ही चला सकते थे। अपने ऊपर मंडराते सिरों और अपनी तरफ लपकते दो धड़ों पर लगातार गोलियों की बौछार करते रहे दोनों लेकिन भला उन पर गोलियां क्या असर करती।वो उनकी तरफ बढ़ते जा रहे थे। हवा में मंडराते सिर चीत्कार कर रहे थे..."आओ हम में शामिल हो जाओ... हा हा हा हा...."
 
दोनों की हिम्मत टूटने लगी। तभी इंस्पेक्टर राणा के दिमाग में एक विचार कौंधा... वह बोला "जोरसिंह ये सब मुर्दा लोग है। इनकी आत्मा अतृप्त होने के कारण ये सब इस योनि को भोग रहे हैं। मैंने सुना है अंतिम संस्कार के अभाव में आत्मा को शांति नहीं मिलती। क्यों न हम इन कंकालों को अग्नि के हवाले कर दें। शायद इससे इन्हें मुक्ति मिल जाये और हमारे प्राण बच जाए।" 
जोर सिंह को भी सम्बल मिला  "सही कहा साहब, शायद ऐसा करने से हम इनसे छुटकारा पा सकते हैं।" 
" तो फिर ठीक है तुम इन पर गोलियां चलाते हुए मुझे कवर दो मैं आग जलाने का इंतज़ाम करता हूं। बस यही आखिरी चारा है।" कहते हुए इंस्पेक्टर राणा हवेली में उगी सुखी घास, टहनियां और पत्तो के ढेर बनाने लगा। 
हवलदार जोरसिंह पूरी हिम्मत के साथ उन मुर्दो से भिड़ा हुआ था। चुड़ैल को उनकी मंशा समझते देर नहीं लगी। वो भयंकर चीत्कार करती हुई बोली... 
" नहीं sssssss... मैं तुम्हे ऐसा नहीं करने दूंगी... खून पी जाऊंगी मैं तुम्हारा।"
तब तक इंस्पेक्टर राणा गोलियों से बारूद निकाल चुका था औरअपना शर्ट फाड़ के मशाल बना ली। बस एक चिंगारी और आग की लपटें दहक उठीं। सुखी टहनियों और पत्तों में आग इस तरह फैली की सारे बिखरे कंकाल आग के हवाले होते गए। हवा में मंडराते सिर गायब होने लगे। धड़ आग की लपटों में घिर गए। 
अपनी तबाही देखकर चुड़ैल जोरसिंह पर झपट पड़ी। "गुर्रर्रर... अब तेरा गर्म खून पिऊंगी मैं.... ही ही ही ही  !" जोरसिंह चुड़ैल के पंजो में फंस चुका था।  वो समझ गया कि अब उसकी मौत निश्चित है। उस चुड़ैल के क़ातिल चंगुल से निकलना उसके लिए नामुमकिन था। चुड़ैल उसका खून पीने लगी।  जोरसिंह ने मरते मरते भी हिम्मत नहीं हारी। वो उस चुड़ैल के साथ घिसटता हुआ सा आग की लपटों की तरफ बढ़ने लगा और चुड़ैल को साथ लिए आग की लपटों में कूद पड़ा। चुड़ैल की दर्दनाक  चीखों से हवेली थर्रा उठी। अगले ही पल चुड़ैल आग की लपटों से घिरी चिल्लाती हुई इधर उधर भागने लगी।   इंस्पेक्टर राणा ये दृश्य देखकर चीख उठा..." नहीं ssss.. जोरसिंह sssss.... उफ्फ!"

तभी आग की लपटों से घिरी चुड़ैल ठोकर खाकर गिर पड़ी उस टूटे हुए गंडासे पर जो धंस गया उसके सिर में।
वो जोर से गर्जना करने लगी। धीरे धीरे वो गर्जना अब कराहों में बदल गयी। इंस्पेक्टर राणा धीरे धीरे उसके पास गया। ये सारा रहस्य जानना उसके लिए बहुत ज़रूरी था। उसके पास जाकर इंपेक्टर राणा ने हौले से कहा "तुम अपनी आखिरी सांसे ले रही हो... क्या तुम बताओगी ये सब क्या था??"
चुड़ैल कराहते हुए अपनी  खरखराती आवाज में बोली ... "हर्रर्रर... मैंने इंसानी जात को कभी तवज्जो नहीं दी...वो मेरे लिए जानवर से ज्यादा कुछ नहीं है... लेकिन आज मेरी तबाही इंसानों के हाथों ही हुई।"
कराहते हुए वो आगे बोली... "(फ्लेशबैक) मैं एक बेघर अनाथ लड़की थी। एक दिन अघोरियों ने मुझे अपने साथ ले लिया। मैं उनके साथ रहकर उनकी तंत्र विद्या सीखने लगी। धीरे धीरे मैंने घोर तांत्रिक अनुष्ठान करने शुरू कर दिये। इसके लिए मैं नरबलि और मानव मांस भक्षण भी करने लगी। उन अघोरियों ने मुझे चेतावनी दी कि इसके परिणाम बड़े भयानक होंगे। पर शक्ति पाने की चाह और मानव मांस की लत ने मेरे कदम नहीं रुकने दिए। अघोरियों ने मुझे त्याग दिया। मुझमे भयानक शारीरक परिवर्तन होने लगे। तब मैंने इस बियाबान में, इस हवेली में डेरा डाल दिया। इस सूने रास्ते पर मुझे बलि के लिए मानव मिल जाते थे। यहां से गुजरने वाले लोगों की गाड़ियां मैं अपनी तंत्र शक्ति से रोक देती थी। और ये हवेली उन्हें अपनी तरफ आने को मजबूर कर देती। यहां आने वाले इंसान का मैं सिर काटकर बलि चढ़ा देती। तंत्र क्रिया के फलस्वरूप वो इंसान कुछ दिन अपना कटा हुआ सिर लेकर इस वीराने में घूमता और उसकी आत्मा मेरी गुलाम बनते ही मैं उसके धड़ का भक्षण कर लेती।"
"ओह! तो सुरेश के साथ भी यही हुआ होगा।" इंस्पेक्टर राणा मन ही मन बुदबुदाया।
"ये कटे हुए सिर ही मेरी शक्ति के केंद्र थे.... इनके नष्ट होते ही मेरी शक्ति खत्म हो रही है।...आह... " ये कहते हुए चुड़ैल ने आखिरी हिचकी ली और उसका सिर एक और लुढ़क गया।
हवेली में आग तेजी से फैल रही थी। इंस्पेक्टर राणा जैसे नींद से जगा। वो तेजी से बाहर की और भागा। बाहर आकर उसने पीछे मुड़कर देखा... पूरी हवेली धधक रही रही। सारे रहस्य हवेली के साथ जल कर खाक हो चुके थे। इंस्पेक्टर राणा को अब भी यकीन नहीं हो रहा था। मन ही मन सोच रहा था वो कि क्या ये सब सच था??
मौत के मुंह से निकल आया था आज वो ।

भौर  का उजाला फैलने लगा था। इंस्पेक्टर राणा कार की तरफ बढ़ चला। उसकी आंखें नम थी अपने बहादुर और वफादार साथी जोरसिंह को खो देने के कारण।

शायद अब फिर से आबाद हो पायेगा वो शॉर्टकट..!


      समाप्त।



फिर मिलेंगे.....


Friday, 22 January 2021

शॉर्टकट पार्ट-2

पिछले अंक में आपने पढ़ा... कमल और सुरेश दो दोस्त फंस गए थे एक अजीबोगरीब घटनाक्रम में। सुरेश अपना कटा सर लेकर घूम रहा है उस सुनसान शॉर्टकट पर और कमल हो चुका है पागल। अब आगे.....

सुरेश के लापता होने की रिपोर्ट हुए 4 साल बीत गए थे। धीरे धीरे वो शॉर्टकट बदनाम होता गया और लोगों के कदम उधर पड़ना बन्द हो गए। पुलिस धूल में लठ्ठ में मार मार कर थक चुकी थी। इसलिए अब ये केस दिया गया पुलिस के सबसे तेज तर्रार इंस्पेक्टर राणा को। लेकिन वो भी अभी तक कुछ खास नही कर सका था। तभी एक दिन इंस्पेक्टर राणा अपनी जीप में सवार होकर इस केस के बारे में ही सोचता हुआ जा रहा था कि अचानक एक फटेहाल आदमी उसकी जीप से टकराया। जीप के ब्रेक लग गए। इंपेक्टर राणा जीप से नीचे उतरा और उस फटेहाल आदमी को देख कर चौंक पड़ा। वो और कोई नहीं पागल कमल था। उसने उस हुलिए में भी कमल को पहचान लिया। " ओह ये तो वही कमल है ना?? अपने केस वाला??!!" राणा ने चौंकते हुए कहा। "हां साब, ये वही है। लेकिन अब पागल हो गया है। अपने किसी काम का नहीं। पुलिस पहले भी इस से पूछताछ की कोशिश कर चुकी है साब। पर ये उटपटांग गप्पे हांकता है।" हवलदार ने जीप से उतरते हुए कहा। "लेकिन ये यहां क्या कर रहा है?" इंस्पेक्टर राणा ने हैरानी से पूछा। "साब पागलखाने से भाग गया होगा। कई बार पहले भी भागा है। अपने किसी काम का नहीं है साब।" हवलदार ने लापरवाही से कहा।
"शटअप हवलदार! इसे उठाओ और जीप में डालो।" इंस्पेक्टर ने कड़क कर कहा।
राणा उसे पागलखाने ले आया। और हल्के इलाज के बाद उसे होश आया। तब तक डॉक्टर से उसने कमल की पूरी जानकारी ले ली। होश में आते ही कमल जोर से हंसने लगा।" हा हा हा हा.... शॉर्टकट..... शॉर्टकट....सर कट गया... सर कट गया... मेरा भी सर काट लेगा... भागो.. भागो.....!!!!" और फिर डर के मारे दहाड़े मार के रोने लगा।
डॉक्टर और अन्य स्टाफ ने उसे शांत करने की कोशिश की और उसे नींद का इंजेक्शन देकर फिर से सुला दिया गया।" ये क्या बड़बड़ा रहा था डॉक्टर?"  ई. राणा ने आश्चर्य से पूछा। "कुछ नहीं कह सकते इंस्पेक्टर! इसके दिमाग पर पता नहीं किस घटना का असर पड़ा है। ये जब पहली बार यहां भर्ती हुआ था तब से यही बाते बड़बड़ाता है। वैसे आपको इससे  कोई मदद मिलने की उम्मीद नहीं है।" डॉक्टर ने धीरे से कहा। 
"मैं 15 मिनट के लिए इससे बातें करना चाहूंगा डॉक्टर। चाहे इससे कोई मदद मिले या न मिले पर मैं जानना जरूर चाहूंगा कि ये कहना क्या चाहता है!!"
"ठीक है इंस्पेक्टर, आप चाहे तो इसके होश में आने के बाद कुछ देर इससे बात कर सकते हैं।" डॉक्टर ने कहा।
कुछ देर बाद ही इंपेक्टर और कमल आमने सामने थे।
इंपेक्टर राणा गौर से कमल के हाव भाव देख रहा था।

"तुम्हारे साथ क्या हुआ कमल?" इंपेक्टर ने हौले से पूछा। इस सवाल के साथ ही मानो कमरे में भूचाल सा आ गया। कमल बेकाबू सा होकर चिल्लाने लगा। बड़ी मुश्किल से उसे काबू किया गया। इंपेक्टर गौर से उसके शब्द सुनने लगा। " शॉर्टकट... शार्ट कट... सिर कट गया.... मेरा भी सिर काट देगा वो... "!

"आखिर ये शॉर्टकट क्या बला है। और किसने किसका सिर काट दिया। मुझे एक बार फिर से इस केस की फ़ाइल गौर से पढ़नी पड़ेगी।" राणा का दिमाग अब तेजी से चलने लगा था। 
उसी रात बैठ कर राणा ने केस को दोबारा स्टडी किया।
केस की फ़ाइल का आखिरी पन्ना पढते हुए उसकी आँखों के सामने केस की एक धुंधली सी तस्वीर सामने आ रही थी। उसके दिमाग में कमल का एक शब्द बार बार गूंज रहा था... शॉर्टकट।

अगले दिन सुबह उसने पता किया कि दूसरे शहर जाने के लिए मैन हाईवे  के अलावा और कौन कौन से रास्ते हैं। लोगों से पूछताछ में उसे पता चला कि एक हाईवे से एक शॉर्टकट अलग होता है लेकिन अब वो कोई इस्तेमाल नहीं करता। 
इंस्पेक्टर राणा समझ चुका था कि इस केस को अगर सुलझाना है तो उसे उस शॉर्टकट से गुजरना ही पड़ेगा।

और अगली रात एक कार दो लोगों को लिए उस शॉर्टकट की तरफ बढ़ी जा रही थी। उसमें सवार थे इंस्पेक्टर राणा और हवलदार जोर सिंह। दोनों ही बहादुर और मजबूत दिल वाले थे। लेकिन रास्ते के सूनेपन और भयावहता से उनके भी माथे पर पसीने की बूंदे चमक रही थीं। तभी गाड़ी एक झटके के साथ रुक गयी। 
ठीक उसी तरह जैसे कमल और सुरेश की रुकी थी। इंस्पेक्टर राणा ने घड़ी देखी। 12:30 का वक़्त हुआ था। हल्की सी झुरझुरी दौड़ गयी थी दोनों के जिस्म में। 15 मिनट के इन्तेज़ार के बाद इंपेक्टर राणा कार से बाहर निकला। उसे उम्मीद थी कार पर हमला होगा पर ऐसा कुछ नहीं हुआ था। अब वो कार के बाहर उस बियाबान सन्नाटे में खड़ा था। हवलदार जोर सिंह को उसने अंदर ही रहने और बैक अप के रूप में तैयार रहने को बोल दिया। पूरी तैयारी के साथ आये थे दोनों। इंपेक्टर राणा की नज़र गयी उसी भयानक हवेली पर और उसके कदम भी चल पड़े उस हवेली की तरफ। बड़ी सावधानी से बढ़ रहा था वो उस तरफ बिल्कुल चीते की मानिंद। किसी टूटी खिड़की से वो हवेली के अंदर प्रविष्ट हुआ।
अंदर आते ही उसे कुछ तीव्र आवाजे सुनाई दी। मानो कोई मंत्रोच्चार हो रहा हो। वह उस आवाज की दिशा में बढ़ चला। धीरे धीरे कदम बढाता वो हवेली के बीच हॉल में पहुंचा। दरवाजे से झांक के देखा तो उसकी रूह फना हो गयी।





आखिर क्या देखा था इंस्पेक्टर राणा ने हवेली में...?
क्या रहस्य था उस शॉर्टकट और उस हवेली का???
क्या इंस्पेक्टर राणा सुरेश के साथ हुए घटनाक्रम का पर्दा फाश कर सका??
या खुद ही शिकार बन गया इस शॉर्टकट का..???

जल्द ही पता चलेगा अगले अंक में...
तब तक के लिए विदा।

Wednesday, 20 January 2021

शार्ट कट पार्ट-1

इस कहानी का किसी जीवित या मृत व्यक्ति अथवा घटना से कोई संबंध नहीं है । यदि ऐसा होता भी है तो ये मात्र संयोग ही होगा।



कभी कभी ज़िन्दगी में कुछ ऐसी घटनाएं घट जाती हैं जो सच होकर भी सच नहीं लगती। कुछ ऐसा जिस पर चाह कर भी विश्वास नहीं किया जा सकता। ऐसा ही कुछ हुआ दो दोस्तों के साथ। एक जान से हाथ धो बैठा और दूसरा किसी को कुछ बताने लायक नहीं रहा....






(सन 1995)
दो दोस्त कमल और सुरेश। कमल एक बैंक में काम करता था और सुरेश एक प्राइवेट कंपनी में जॉब करता था। दोनो को किसी काम से शहर के बाहर दूसरे शहर जाना था। दोनों कमल की कार में रवाना हो गए। दूसरे शहर पहुंचने की जल्दी थी और रात  भी ज्यादा हो गयी थी। दोनों ने शहर जाने के लिए शॉर्टकट चुना जिसका इस्तेमाल पिछले 20 सालों में बहुत कम होने लगा था।
रात को तो लोग उस रास्ते से गुजरने की सोच भी नही सकते थे।कुछ अफवाहें भी उड़ चुकी थी उस रास्ते के बारे में। अब उस रास्ते पर मनहूसियत का ठप्पा सा लग चुका था।
दोनों इस बात को दरकिनार कर उस रास्ते पर निकल पड़े। जल्दी जो पहुंचना था। न कोई बस्ती न कोई वाहन, एक दम सुनसान रास्ता। बीहड़ इलाका। चारों तरफ घनी झाड़ियां। झींगुरों की तेज़ आवाजें। यदा कदा चीखते उल्लू। ऐसे में दो लोगों को लिए हिचकोले खाती गुजरती हुई एक कार। उबड़ खाबड़ सा रास्ता। तभी कार एक झटके के साथ खड़ खड़ की आवाज के साथ रुक गयी।खर्रर... खर्रर्र.. खर्रर्र ssss...! खर्रर्र... खर्रर... खर्ररssss...!! पुनः कार स्टार्ट करने की नाकाम कोशिश। कार की आवाज बन्द हो चुकी थी। चारों तरफ सन्नाटा। सुरेश ने घड़ी देखी 12:36 बजे थे। कार के बाहर देखा दोनों ने, चांद की रोशनी फैली थी हल्की सी।
ऊंचे ऊंचे दानवाकार पेड़, रहस्यों की दुनियां सी लगने वाली घनी झाड़ियां। उल्लुओं की डरावनी तेज आवाजें। झींगुरों का तेज शोर।बीच बीच में सियारों का विलाप और सीटियों सा शोर मचाती, पत्तो को खड़काती तेज हवा। ये माहौल किसी का भी खून जमा देने के लिए काफी था। दोनों कार मैं बैठे वक़्त को कोस रहे थे।"अब क्या कार मैं ही बैठे रहेंगे रात भर??"" सुरेश बोला। 
"तो क्या करूँ?" कमल ने झुंझलाकर जवाब दिया।
सुरेश -" करना क्या है!! नीचे उतर के देखते हैं क्या खराबी है।"
कमल स्वभाव से जरा डरपोक था, सकुचाते हुए बोला " नहीं नहीं मुझे नहीं देखना। सुबह देखेंगे। मैं तो कार मैं ही बंद रहना चाहता हूँ।"
"हुंह... डरपोक कहीं का!!" कहते हुए सुरेश कार से बाहर निकला और कार की खराबी जांचने लगा।
काफी देर बाद भी समझ में नहीं आया कि खराबी क्या है। झुंझला कर कार का बोनट जोर से बंद किया और इधर उधर मदद के लिए देखने लगा। लेकिन वहां सन्नाटे के सिवाय कुछ नहीं था। किसी दूसरे वाहन से लिफ्ट मिलना तो असंभव था क्योंकि उस रास्ते पर किसी वाहन के आने की उम्मीद ही नहीं थी। 
सुरेश इधर उधर देख ही रह था कि तभी उसे 25-30 कदम की दूरी पर झाड़ियों के पीछे एक खंडहरनुमा हवेली सी दिखाई दी। पेड़ों के झुरमुठ से ढंकी हवेली काफी पुरानी थी  सुरेश एकदम उछल पड़ा। उसने कमल से कहा - " अरे! वहां देखो, वह हवेली, वहां चलते हैं। शायद कुछ मदद मिल जाये। कम से कम रात बिताने की जगह तो मिल जाएगी।"
"नहीं! मैं तो कार में ही रात गुजार लूंगा और तुम भी कार में बैठ जाओ। सुबह कुछ इन्तेज़ाम कर लेंगे।" कमल बोला।
"यार तुमसे बड़ा डरपोक आदमी मैंने कहीं नहीं देखा। मैं तो इस कार में रात भर नहीं घुट सकता। तुझे चलना है तो चल वरना मैं तो चला।" कहते हुए सुरेश रवाना हो गया।
"अबे मैं अकेला यहां कैसे रहूंगा, सुरेश रुक जा।" कमल चिल्लाया।
मगर सुरेश न रुका और हवेली की तरफ चला गया। अब कमल की हालत बुरी थी। रह रह कर भगवान को याद कर रहा था। कार पूरी तरह से पैक कर दी थी उसने। उस वीराने में अब वो नितांत अकेला कार में बंद था। एक एक पल काटना भारी पड़ रहा था उसे। कभी कभी मन कर रहा था कि वो भी कार छोड़कर सुरेश के पास भाग जाए। लेकिन हिम्मत नहीं हो रही थी। नींद उसकी आँखों से कोसो दूर थी। कार में घुटन होने लगी। उसने एक खिड़की का शीशा थोड़ा सा नीचे सरका दिया। उल्लुओं की आवाजें उसे बुरी तरह डरा रही थीं। चांदनी रात में लंबे पेड़ और हवा से हिलती झाड़ियां उसे पिशाच नज़र आ रहे थे। जैसे तैसे एक घंटा बीता।
अचानक उस खामोशी में कमल ने कुछ आवाज सुनी।
उसे लगा जैस कोई चल रहा है।  सूखे पत्तों का खड़कना। ज़मीन पे पड़ी सुखी टूटी हुई टहनियों पर चलने की पदचाप   खड़ sss....चड़ sss.... !
उसे लगा जैसे कोई धीमी चाल से कार की तरफ बढ़ रहा हो। वह  रोमांचित हो उठा। छुप कर कार के शीशे के पार झांकने लगा। हवेली की तरफ से किसी के आने का आभास हो रहा था।उस तरफ की झाड़ियां हिली और अचानक जो सामने आया उसे देखकर कमल सिहर उठा। एक घुटी हुई चीख निकल गयी उसके मुंह से।
सामने आने वाला सुरेश ही था... शत प्रतिशत सुरेश।
लेकिन वह वैसी हालत में नहीं था जैसी हालत में गया था। वह कार की तरफ बढ़ रहा था.. अपना कटा हुआ सिर अपने ही हाथों में लेकर।  

कमल बुरी तरह घबरा रहा था।उसकी रूह फना हो रही थी ये दृश्य देख कर। उसने फुर्ती से कार स्टार्ट करने की कोशिश की। लेकिन कार स्टार्ट नहीं हो रही थी। 
खर्रर sss.... खर्रर्र sss... खट्र्रर्रर.... !!!!!
खर्रर्रssss.. खरर्रर ssss...... खट्र्रर्रर sss!!!
सुरेश बढ़ता आ रहा था। कमल डर  के मारे चिल्लाए जा रहा था। 
खर्रर्र sss... खर्रर्र ssss  वररूऊम्म्म्म sssss ...
तीसरी कोशिश सफल रही। कार स्टार्ट हो चुकी थी। सुरेश केवल पांच कदम दूर था। कमल ने अप्रत्याशित गति से कार दौड़ा दी और पीछे मुड़कर भी नहीं देखा। वह बेतहाशा कार दौड़ा रहा था।
पीछे सुरेश का सिर चिल्ला रहा था -" रुक जा कमल, रुक जा। मुझे छोड़ के मत जा कमल, रुक जा।"
कमल जैसे तैसे शहर पहुंचा, लेकिन अपना दिमागी संतुलन खो बैठा।

आज भी ये रहस्य ही है कि आखिर सुरेश को हुआ क्या था???


आगे किसी कहानी में इस रहस्य से पर्दा जरूर उठेगा।
तब तक के लिए विदा।

किले का शैतान (पार्ट - 2)

किले का शैतान   (पार्ट - 2)  पिछले अंक में आपने पढ़ा...  मैनागढ़ के किले में गए एक शोध दल ने वहां जाकर छानबीन की। अनजाने में उन्ह...