कहानी में दिए गए नाम और जगह का वास्तविकता से कोई सम्बन्ध नहीं है। यदि ऐसा होता है तो केवल संयोग होगा।
सन 1990
राधानगर की नामी 'विद्याधर कॉलेज' की शानदार केंटीन में बैठे फाइनल ईयर के 8 दोस्त... अरुण, सुमन, विवेक, अनु, रोशन, प्रिया, शिवा और गिरिजा। मस्ती का माहौल था। तभी विवेक बोला... "दोस्तों.... परसों से अपनी सर्दियों की छुट्टियां होने वाली है.. क्यों न इस बार कहीं घूमने का प्रोग्राम बना लिया जाए??"
सभी चहक पड़े। "अरे हां यार... विचार तो अच्छा है।"
"लेकिन चले कहाँ??" अनु ने पूछा।
विवेक - "सर्दियों का मौसम है। किसी हिल स्टेशन पे तो चलना बेकार है।"
"मेरे पास एक आईडिया है। क्यों न हम मोहर गढ़ चलें। वहां हमारा एक गेस्ट हाउस भी है। मजे से रहेंगे कुछ दिन।" प्रिया बोली।
अरुण- " लेकिन ये मोहर गढ़ है कहाँ??"
प्रिया - " राजस्थान में । प्रकृति की गोद में बसा एक प्यारा सा गांव। अच्छा टूरिस्ट प्लेस है। दादाजी ने कभी गेस्ट हाउस बनवाया था...पहले अच्छा चलता था। फिर अचानक न जाने क्यूँ... बन्द हो गया। पापा को अपने बिज़नस के आगे फुर्सत ही नहीं उसे संभालने की।
एक आदमी रखा हुआ है जो उसकी देखभाल करता है। मैं भी कभी गयी नहीं लेकिन सुना है बहुत खूबसूरत जगह है। इस बार चलते हैं। अच्छा लगेगा।"
सुमन- " ठीक है .. तू इतना कह रही है तो चलते हैं। देखते हैं... कैसा है तेरा मोहर गढ़।"
प्रिया - "तो फिर डन... 4 दिन का टूर बना लेते हैं।"
"डन" सबने एक साथ बोल दिया।
"मैं आज ही पापा से बात करती हूँ।" प्रिया उत्साह के साथ बोली।
प्रिया के घर.... "पापा आपसे कुछ बात करनी है।"
"क्या बात है बेटे?? बोलो ना।"
"हम कुछ दोस्त 3-4 दिन के लिए घूमने जाना चाहते हैं।"
"तो जा आओ ना। वैसे भी तुम्हारे अब छुट्टियां होने वाली है। घूम आओ। वैसे कहाँ जाने का प्रोग्राम बना है??"
"मोहर गढ़ जाने का। अपना गेस्ट हाउस भी है ना वहां!!? वहीं रह लेंगे कुछ दिन।"
"मोहर गढ़??...." प्रिया के पिताजी के चेहरे पर खौफ से छा गया।
"क्या हुआ पापा??"
"अरे कुछ नहीं बेटे... तू वहां जा के क्या करेगी?? कहीं और अच्छी जगह घूम आओ। वैसे भी अब उस गेस्ट हाउस में कुछ नहीं रखा।"
"लेकिन पापा ... मैंने तो अपने दोस्तों से वादा भी कर लिया।।" प्रिया उदास हो के बोली।
"मैंने बोल दिया ना... वहां नहीं जाना बस..."
"आखिर क्यों???... क्या हो जाएगा वहां जाने से???"
"तू नहीं समझती बेटी... कुछ बातें बिना सवाल किए मान लेनी चाहिए।"
"ठीक है पापा..." प्रिया बुझे मन से वहां से चली गयी।
"मालिक.... आप प्रिया बेटी को सब कुछ बता क्यों नहीं देते??" हरखू काका ने पूछा।
हरखू काका प्रिया के दादा के वक़्त से इस घर का ईमानदार नौकर था।
"नहीं काका... प्रिया को मैं वो सब बता के परेशान नहीं करना चाहता। मैं खुद उस भयानक रात को नहीं भूल पा रहा। जब भी मोहर गढ़ का नाम सुन लेता हूँ तो वो भयानक मंजर आंखों के सामने आ जाता है... और मैं दहल जाता हूँ।" प्रिया के पिताजी विचारों में खोते हुए बोले।
"लेकिन मालिक.... अचानक प्रिया बेटी की ज़बान पर मोहर गढ़ का नाम आया कैसे?? वो तो कभी गयी ही नहीं वहां???"
"यही बात तो मुझे परेशान कर रही है। इसको बस इतना पता है कि वहां हमारा एक पुराना सा गेस्ट हाउस है... न वो कभी वहां गयी... और ना ही उसके सामने कभी इसका ज्यादा जिक्र हुआ... फिर अचानक इसके मन में ये बात आई कैसे??"
"कहीं 'वो' उसे बुला तो नहीं रही मालिक... आपके पिताजी का किया सौदा आज भी 'उसको' याद होगा शायद।"
"नहीं नहीं काका... ऐसी बातें मत बोलो... मैं प्रिया को नहीं जाने दूंगा। मोहर गढ़ का नाम भी नहीं लिया जाएगा अब इस घर में ।
प्रिया के पिताजी बहुत ज्यादा चिंता में पड़ गए। रात दस बजे उन्होंने प्रिया के कमरे में झांक कर देखा। वो सो रही थी। उन्होंने दरवाजा बन्द किया और जाकर सो गए। लेकिन आंखों में बेचैनी साफ झलक रही थी।
अगले दिन प्रिया उठी.... कॉलेज गयी।
कॉलेज में....
"प्रिया कल का प्रोग्राम फिक्स है ना... मैंने तो परमिशन ले ली है।" सुमन चहकते हुए बोली।
प्रिया - " हाँ.. हाँ... फिक्स ही समझो।" प्रिया ने सोचा घर जा के एक बार फिर से पापा से बात कर लेगी... और उन्हें मना लेगी।
सब बहुत खुश थे। अगले दिन से छुट्टियां शुरू हो रही थी।
प्रिया घर लौटी... उसके पिताजी घर पे नहीं थे।
"हरखू काका... पापा कहाँ है?" प्रिया ने घर आते ही पूछा।
"बेटी वो तो आज सुबह ही कलकत्ता चले गए। अचानक कोई बिजनस मीटिंग आ गयी।"
" ओह.... कब तक आएंगे वापस??"
"पता नहीं बेटी... 4-5 दिन का कह कर गए थे।"
'अरे वाह... फिर तो मैं 2-3 दिन टूर बना ही लेती हूँ मोहर गढ़ का।' प्रिया ने मन ही मन सोचा।
तभी हरखू काका बोल पड़ा '" लेकिन बेटा...मालिक ने आपके लिए साफ कहा है कि आपको मोहर गढ़ ना जाने देना है।"
"अरे काका मैं नहीं जाऊंगी मोहरगढ़... मैंने अपने दोस्तों के साथ कहीं और जाने का प्लान बना लिया है।"
हरखू काका ने भी चैन की सांस ली।
अगले दिन प्रिया ने अपना बैग पैक किया और निकल गयी रोशन के घर की तरफ।
सबको रोशन के घर ही पहुँचना था । सब समय पर पहुंच गए थे लेकिन शिवा नहीं आया।
"ओफ्फो... अब ये शिवा कहाँ रह गया।??" रोशन झल्लाते हुए बोला।
"अरे भाई वो बजरंग बली का भक्त है। मंदिर जा के आएगा।" विवेक हंसते हुए बोला।
तभी शिवा आता दिखाई दिया।
"आ गए भक्त महाराज?? अब चलें??" अरुण बोला।
"हां.. हां.. चलो।" शिवा गाड़ी में बैग रखते हुए बोला।
सभी रोशन की हंटर जीप में मोहर गढ़ की तरफ रवाना हो गए सब।
"पापा की इजाज़त लिए बिना जाना अच्छा नहीं लग रहा। लेकिन दोस्तों कर सामने बोल कर मुकरना भी मुश्किल था। वैसे भी 3 दिन में वापस आ जाएंगे। पापा को पता भी नहीं चलेगा... और बाद में कभी पता चल भी जाएगा तो मना लुंगी।" इन्हीं विचारों में खोई थी प्रिया कि तभी.. अनु उसे झकझोरते हुए बोली..."लो... टूर की प्लानिंग करने वाली ही गुमसुम बैठी है... ऐसे कैसे चलेगा??!!"
प्रिया मुस्कुरा दी।
8 घंटे का सफर तय कर मोहर गढ़ पहुंच गए सभी।
"वाहssss... क्या नज़ारा है।
"कितनी प्यारी जगह है।"
"गेस्ट हाउस कहाँ है प्रिया?? वहां जाने का रास्ता कौनसा है??"
"ये तो मुझे भी नहीं पता। किसी से पूछ लेते हैं।"
सड़क पर चलते एक बुजुर्ग गड़रिये से उन्होंने गेस्ट हाउस का पता पूछा।
"काका जी .. यहां 'मिलन गेस्ट हाउस' जाने का रास्ता कौनसा है?"
'मिलन गेस्ट हाउस' नाम सुनते ही गड़रिये के चेहरे पर भाव बदल गए। उसने कुछ नहीं पूछा। शायद कुछ पूछना चाहता था। मगर जबान बन्द हो गयी। आंखे पथरा गयी। मानो किसी के वशीभूत हो गया हो। बस अंगुली उठी एक पहाड़ी की ओर।
"ओह.. धन्यवाद काका...!" कहते हुए रोशन ने जीप को पहाड़ी वाली सड़क पर डाल दिया।
रोमांचक पहाड़ी रास्ता था.... बल खाती सड़क...पेड़ों के झुरमटो से ढका... मनमोहक।
पहाड़ी पर पहुंचते पहुँचते गेस्ट हाउस नज़र आने लगा था। गांव से बाहर... एकांत में प्रकृति के बीच... बहुत सुहाना लग रहा था।"
गेस्ट हाउस के बाहर जीप रुकी। सब नीचे उतरे। सालों से बंद पड़ा गेस्ट हाउस मानों मुस्कुरा उठा। लोहे की सफेद रंग की जंग लगी भारी भरकम फाटक बंद पड़ी थी... छोटे छोटे पौधों और बेलों से जाम।
"यहां कोई है?? प्रिया तुमने तो कहा था कि एक आदमी इसकी देखभाल के लिए रखा है!! कहाँ है वो??" गिरिजा ने पूछा।
प्रिया - "आवाज लगा के देखो ना। शायद आ जायेगा।"
अरुण ने पास में लगी छोटी फाटक के पास जाकर फाटक बजाते हुए तेज आवाज लगाई...
"कोई हैssssss...??"
आवाज सुन कर गेस्ट हाउस के एक सर्वेंट क्वार्टर का दरवाजा खुला। एक बूढ़ा आदमी कंबल डाले बाहर निकला। लंबी दाढ़ी... पतला दुबला... कमजोर सा.. ।
"कौन???" फाटक के पास आकर उसने धीमे से पूछा।
बूढा उन्हें ऐसे देख रहा था मानो इंसान पहली बार देख रहा हो।
"फाटक खोलो बाबा... मैं राधानगर वाले शिवनाथ जी की पोती हूं।" प्रिया आगे आते हुए बोली।
"ओह... शिवनाथ जी.... " बूढा बुरी तरह चोंकते हुए बड़बड़ाया।
"हाँ... हम कुछ दिन यहां ठहरने के लिए आये हैं। 2-3 दिन रहेंगे। फिर लौट जाएंगे।"
"तुम्हें यहां... नहीं आना चाहिए था... बेटी..." बूढा फाटक खोलते हुए खरखराती आवाज में बोला।
"क्यों... यहाँ कोई कर्फ्यू लगा है??" अनु हंसते हुए बोली।
सब अंदर चले गए।
गिरिजा - "वाह... गेस्ट हाउस तो बहुत अच्छा है प्रिया... बाबा ने देखभाल तो बड़ी अच्छी की है। गार्डन.. लॉन.... सबकी बढ़िया केअर की है।"
बूढ़े ने सबको रेस्ट रूम में बिठाया।
"सालों बाद कोई इस गेस्ट हाउस में आया है। आपको किसी ने रोका नहीं यहां आने से??" बूढा फिर से धीमे स्वर में बोला।
"नहीं... हमे कोई क्यों रोकेगा। वैसे बाबा .. इतनी बढ़िया लोकेशन पर बना ये खूबसूरत गेस्ट हाउस वीरान क्यों पड़ा है??" प्रिया ने हैरानी से पूछा।"
बूढ़े ने कोई जवाब नहीं दिया। उनके लिए चाय नाश्ते की व्यवस्था करने चला गया। थोड़ी देर बाद चाय पीते पीते सब बतिया रहे थे। तब बूढा बोल पड़ा... "बिटिया... दिन ढलने से पहले आप लोग वापस लौट जाइये। आपका यहां रहना ठीक नहीं। इस से पहले कि आप पर कोई मुसीबत आये... फौरन लौट जाइये।"
विवेक चिढ़ कर बोला - "अरे... ये क्या बात हुई यार... लौट जाएं??? अभी तो आये हैं।... प्रिया... ये क्या बोल रहा है??। लगता है इसको अपना यहां आना पसंद नहीं आया। इसके आराम में खलल जो पड़ गया।"
प्रिया का माथा ठनका... "घर पे पापा बोल रहे थे कि यहां नहीं आना... अब ये बूढा बोल रहा है कि यहां नहीं आना चाहिए था... आखिर कैसी मुसीबत आ सकती है मुझ पर... कहीं दादाजी और पापा का कोई दुश्मन तो नहीं है इस गांव में??!!" प्रिया अब गंभीरता से सोचने लगी।
उसने बूढ़े से पूछा - "बाबा आखिर यहां ऐसा क्या है?? क्या मुसीबत आ सकती है यहां?? इतना सुहाना शांत गेस्ट हाउस है। कोई जानता भी नहीं मुझे यहाँ। फिर आप ऐसी बातें क्यों कर रहे हैं??"
बूढा कुछ बोलने वाला था... लेकिन एकाएक उसके भी चेहरे के भाव बदल गए...जबान बन्द हो गयी... आंखे पथरा गयी.... मानो वशीभूत हो गया.. ठीक उस गड़रिये की तरह। वो चुपचाप उठा और सधे कदमों से सर्वेंट क्वार्टर में चला गया।
सब अचरज में पड़ गए बूढ़े का ये व्यवहार देख कर।
शिवा - "यार ये बूढा बड़ा अजीब है...???"
"अरे ... छोड़ो इस बात को। चलो अपने-अपने रूम पर कब्ज़ा कर लो। बहुत थक चुके है सब। थोड़ा आराम कर के फिर डिसाइड करते है कि 3 दिन क्या करना है??"
"ओ के... मैं तो लॉन के सामने वाला रूम लुंगी... बड़ी पसंद आई है ये जगह मुझे।" कहते हुए सुमन उस रूम की तरफ दौड़ पड़ी।
सब आराम करने चले गए। सीधे शाम को उठे। बूढ़े ने तब तक फिर से चाय नाश्ता तैयार कर रखा था।
बाहर लॉन में टेबल लगवा दी गई। शाम की चाय पीते हुए प्रिया ने बूढ़े से पूछा - "बाबा आप यहां कब से हैं??"
"बेटी...... जब से ये गेस्ट हाउस बना तब से मैं यहीं हूँ। 40 साल हो गए इसको संभालते संभालते।"
अनु - "ये गेस्ट हाउस इतना वीरान क्यों पड़ा रहता है बाबा?? यहां कोई आता जाता क्यों नहीं??"
"पहले बड़ी चहल पहल रहती थी यहां.. लोगों को कमरे तक नहीं मिलते थे रहने को। सब बुक हो जाते थे। लेकिन...."
"लेकिन क्या बाबा??"
बूढा एकाएक फिर जड़वत हो गया। बिना कोई जवाब दिए सम्मोहित सा एक ओर चला गया।
"ये बूढा सच में सनकी सा हैं बोलते बोलते कहाँ खो जाता है?" अरुण ने मजाक उड़ाते हुए बोला।
गिरिजा - "अरे प्रिया... आज डिनर का क्या प्रोग्राम है??"
सुमन- "क्यों न खाना हम सब मिलकर बनाएं??!!... मजा आएगा।"
अरुण - "हाँ... ठीक है... यही करते हैं। आज खाना हम ही बना लेंगे।"
"इसके लिए तैयारी करनी पड़ेगी। खाना आज बाहर चूल्हा बनाकर बनाएंगे। लकड़ियां चाहिए होंगी। बाकी सामान बाबा से ले लेंगे।" प्रिया चहकते हुए बोली।
अरुण और विवेक लकड़ियां इकठ्ठी करने चले गए। शिवा और रोशन चूल्हा तैयार करने में लग गए और लड़कियां खाने की तैयारी में लग गयी।
अरुण और विवेक बाहर जंगल में....
"यार अरुण... कुछ भी कहो ये जगह है बड़ी खूबसूरत। गांव से बाहर जंगल में... एक दम शांत वातावरण... और प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर।"
"हां यार... जगह तो अच्छी है.. लेकिन इतनी बढ़िया जगह पे बना गेस्ट हाउस भी वीरान पड़ा है... ये बात समझ में नहीं आई।"
सुखी लकड़ियों की तलाश में दोनों थोड़ा दूर निकल आये थे। तभी विवेक की नज़र एक आश्चर्यजनक चीज़ पर पड़ी। एक पेड़ के नीचे कुछ अजीब आकृति बनी थी। छोटे - छोटे पत्थरों से बना एक घेरा... उस पर बिखरे काले तिल.... कौव्वे के पंख... और उस पर छिड़के हुए खून के छींटे.... पसीने छूट गए विवेक के... ये दृश्य देख कर।
उसने अरुण को जोर से आवाज लगाई...
" अरुणssss... ये देखो यहाँ क्या बना है???"
अरुण दौड़ते हुए आया-" हाँ यार.. ये तो कोई टोटका या तांत्रिक अनुष्ठान जैसा कुछ लगता है।"
विवेक - " यहाँ ज्यादा रुकना ठीक नहीं अरुण... चलो यहाँ से चलते हैं।"
दोनों फटाफट वहाँ से निकल लिए। गेस्ट हाउस पहुंचे तब तक तैयारी हो चुकी थी। सर्दियों की ठंडी शाम शुरू हो चुकी थी। हल्का अंधेरा फैल चुका था। आग जला कर सब अलाव तापते हुए मजे से खाना बना रहे थे। ।
वो बूढ़ा भी वहीं बैठा था और उनका सहयोग कर रहा था।
सभी लोग आग के चारों ओर बैठ कर खाना खाने लगे। तब विवेक ने बूढ़े से उस चीज़ के बारे में पूछ लिया... जो उसने जंगल में देखी थी।
बूढ़ा एकाएक भयभीत हो कर बोला... "आपने जंगल में वो टोटका देखा??"
विवेक - "हां बाबा लगता है किसी सरफिरे की हरकत है।"
"नहीं नहीं.... ये तो..." कहते कहते बूढा फिर से चुप हो गया। किसी पुतले की तरह उठा वो... और खाना बीच में ही छोड़ कर अपने कमरे में चला गया।
"अरे यार इसकी बीमारी क्या है?? ये बोलते बोलते कहाँ चला जाता है .. बात अधूरी छोड़ के??" शिवा हैरानी से बोला।
रोशन - "छोड़ो यार... खाने पे ध्यान दो... क्या टेस्टी खाना बना है।"
खाना खा कर थोड़ी देर बाद सब अपने अपने कमरे में सोने चले गए। ठंड कड़ाके की थी।
तभी प्रिया के कमरे के बाहर दस्तक हुई।
"कौन??" प्रिया ने अंदर से पूछा।
"मैं हूं... अनु.."
प्रिया ने उठकर दरवाजा खोला।
"क्या हुआ अनु??"
"यार प्रिया मुझे अकेले सोने में डर लगता है.. मैं तेरे कमरे में सो जाऊँ??"
"ठीक है... सो जा... डरपोक कहीं की!!" प्रिया हंसते हुए बोली।
गेस्ट हाउस की बत्तियां बुझ चुकी थी। गहरा अंधेरा छाया हुआ था चारों ओर। सुनसान इलाके में अंधेरे डूबा वो गेस्ट हाउस दिन में जितना सुहावना लग रहा था... उतना ही डरावना और भुतहा लग रहा रहा था। बूढा अभी भी आग के पास बैठा था। आज की रात वो सो नहीं पा रहा था... मानो किसी अनहोनी का इंतज़ार था उसे।
घड़ी की सुइयां दौड़ती हुई 11:30 तक पहुंच चुकी थी। बूढा उठा... गेस्ट हाउस का एक चक्कर लगाया... और अपने कमरे में चला गया।
गेस्ट हाउस पूरी तरह शांत हो चुका था। रेस्ट रूम में घड़ी की टिक टिक साफ सुनाई पड़ रही थी। ठीक बारह बजे.... थोड़ी दूर बने घंटाघर में बारह घंटे बजने का स्वर गूंज उठा। हर एक घंटे के साथ गेस्ट हाउस की तरफ आफत बढ़ी आ रही थी। बारहवें घंटे की आवाज थमते ही... गेस्ट हाउस की जाम हुई बड़ी फाटक एक चरमराहट के साथ खुल गयी। सब नींद में डूबे थे।सिर्फ रेस्ट रूम के बाहर एक छोटी बत्ती जल रही थी। सन्नाटे में डूबे गेस्ट हाउस में लकड़ी के सहारे चलती पदचाप गूंजने लगी। तभी सुमन की नींद खुल गयी।
बाहर हुई आहट सुनकर वो चौंक गई।
उसने सधे कदमों से चलते हुए धीरे से दरवाजा खोला। बाहर झांक के देखा... दूर बरामदे में सीढ़ियों में बैठी अनु रो रही थी।
वो बाहर आई...
"अनु.... तू यहां क्या कर रही है... और ... और ... रो क्यों रही है।??.. इधर देख... मेरे सामने।"
अनु ने जैसे ही सर उठाया... सुमन की चीख निकल गयी। भयानक शक्ल लिए अनु धीरे धीरे उठने लगी.... उसका हुलिया देख कर सुमन के होश उड़ गए.... कटा फटा चेहरा... नुकीले दांत... लंबे नाखून... मानो कोई शैतानी ताक़त उस पर हावी हो चुकी थी....
सुमन चीखते हुए अपने कमरे की तरफ दौड़ी....
आगे जारी है....
अनु को क्या हुआ था???
क्या सुमन उसके हाथों से बच सकी???
क्या गेस्ट हाउस में आये लोग इस मुसीबत से बच सकेंगे??
आखिर क्या रहस्य था उस गेस्ट हाउस का??
सभी रहस्यों से पर्दा उठेगा अगले अंक में।
तब तक के लिए विदा.....
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