इस कहानी का वास्तविकता से कोई संबंध नहीं है। ये केवल एक कल्पना पर आधारित कहानी है। किसी घटना से इसका मिलान होना मात्र संयोग होगा।
सन् 1981
*क़िले का शैतान*
भाग -1
एक छोटा सा पहाड़ी गांव.... मैनागढ़। बिल्कुल अलग थलग... शांति प्रिय। इस पहाड़ी गांव में आने जाने का बस एक कच्चा रास्ता था। जिसपे ज्यादातर बैलगाड़ियां ही चलती थी। गांव से 6 किलोमीटर दूर से एक सड़क निकलती थी। ’बस’ वही पे गांव की सवारियों को उतारती और लेती थी। वहां से गांव तक आने का रास्ता या तो पैदल या बैलगाड़ी से थी। कभी कभार किसी का ट्रैक्टर मिल जाए तो बात अलग है।
गांव में एक छोटा सा तालाब था। थोड़ी दूर एक एनीकट भी बना था। बिजली कनेक्शन सिर्फ एक सरकारी दफ्तर में था जो एनिकट की देख रेख के लिए बना था । वह दफ्तर भी बंद पड़ा रहता था। कभी कभार बारिश के मौसम कोई अफसर वहां आता और कुछ जांच के चला जाता
गांव के बीचो बीच एक मंदिर था। मंदिर के पास ठाकुर की हवेली। हवेली के आगे काफी खुला मैदान। और बाकी गांव वालों के घर।
इन सबसे अलग पास की पहाड़ी पर बना था एक काले पत्थर से बना शानदार क़िला। गांव में कहा जाता था कि इस क़िले का इतिहास बड़ा भव्य था।
लेकिन अब वो क़िला उपेक्षित खंडहर सा वीराने में खड़ा था।
गांव के लोग कम ही जाते थे क़िले की तरफ। कई किंवदंतियां प्रचलित थी उस किले के बारे में।
कुछ उस किले के इतिहास की सराहना करते तो कुछ इसे भूतिया किला बताते।
अब उस किले के दिन फिरने वाले थे। पुरातत्व विभाग की नज़र में आ गया था वो क़िला। विभाग ने उस किले के शोध और पुनरुद्धार लिये एक चार सदस्यीय शोध दल को वहां भेजा। दल के लीडर थे करुण श्रीवास्तव। शेष तीन सदस्य महेंद्रराज, विपिनपाल और श्याम कुमार। एक जीप में चारों सदस्य गांव पहुंच गए।
गांव वाले इन्हें कौतूहल से देख रहे थे।
गांव वालों के सहयोग से उन्होंने पहाड़ी पर किले की चारदीवारी के अंदर अपना टेंट लगा दिया। गांव से एक आदमी को अपने रोजमर्रा के काम के लिए रख लिया। जो गांव से खाने पीने का सामान और अन्य जरूरी सामान ले आता। खाना बना देता और छोटे मोटे काम कर देता।
चारों सदस्य अपने अपने काम में माहिर थे। वहां टेंट वगैरह लग जाने के बाद करुण श्रीवास्तव ने काम शुरू कर दिया। किले का नक्शा और अन्य दस्तावेज लेकर अपनी रूप रेखा तैयार करने लगे। अगली सुबह से काम शुरू कर दिया उन्होंने। किले की छत से लेकर पूरे किले का मुआयना किया। कुछ खास सामान नहीं था वहां अब। पुराने हथियार और सामान ठाकुर हवेली में ले गए थे। कुछ पांडुलिपियां और साहित्य गांव के मंदिर में रखवा दी गई थी।
सब कुछ सामान्य चल रहा था। पहला दिन अच्छे से समाप्त हो गया। कुछ सैंपल लिए उन्होंने... ।
शाम को... जब सब थक चुके थे.. दीनू जो खाना बना रहा था... उसने पहले सबको गरमा गर्म चाय दी। पहाड़ी गांव... शाम का वक्त... कड़ाके की ठंड... अलाव... और गर्म चाय... ।
"वाह दीनू... क्या चाय बनाई है।! तबियत खुश कर दी तूने तो!!" करुण श्रीवास्तव ने चाय की चुस्की लेते हुए कहा। बाकी सब ने भी समर्थन में सर हिला दिए। दीनू मुस्करा दिया।
"अच्छा दीनू... अपने गांव के बारे में तो बताओ।" विपिनपाल ने ऐसे ही टाइम पास के लिए पूछ लिया।
"गांव तो हमारा छोटा सा है साब... लेकिन पहाड़ी गांव है... यहां जंगली जानवर भी घूमते है। रात को कभी कभी गांव की तरफ भी आ जाते हैं। बघेरों और भालुओं का ज्यादा आना जाना होता है। आप लोग ध्यान रखना साब। रात को बाहर मत निकलना टेंट से और आग हमेशा जलाए रखना।"
बाते करते करते दीनू बोला.." लो साहब.. खाना तैयार है।
आप लोग भोजन कर लो तो मेरा काम भी पूरा हो। फिर में भी टाइम से घर चला जाऊं। सुबह जल्दी आ जाऊंगा। अलाव में लकड़ियां भी डाल दी है। रात भर जलता रहेगा।"
चारों एक साथ उठे..." ठीक है भाई दीनू... लगा दे खाना।"
खाना खाने के बाद चारों टेंट में चले गए। अंदर से पूरा पैक था टेंट। बाहर आग जल रही थी। लेकिन करुण श्रीवास्तव थोड़ा सावधानी से काम लेना चाहते थे। दीनू की जंगली जानवरों वाली बात से वो थोड़ा घबरा गए थे। तो उन्होंने कहा...
"हम में से किसी को जाग कर थोड़ा पहरा देना चाहिए। क्या पता रात को कोई जानवर हमला कर दे।? हमे इस तरह असावधान होकर नहीं सोना चाहिए।"
"अरे श्रीवास्तव साब... आप भी ना.... कुछ ज्यादा ही सोचने लग जाते है। रात भर आग जलेगी तो कोई जानवर नहीं आएगा इधर। और फिर अपने टेंट भी तो सुरक्षित है। फायर गन भी है साथ में। आप चिंता न करें।" महेंद्र राज ने बेफिक्री दिखाते हुए कहा।
लेकिन करुण श्रीवास्तव ने वो रात जाग कर ही बिताई। रात को टेंट को हल्का सा खोल कर बाहर का मुआयना करते रहते। हर आहट पर सचेत हो जाते। रात को सन्नाटे में वो क़िला किसी विशाल काले दैत्य के समान प्रतीत हो रहा था उनको। एक अंजना सा डर लगने लगा श्रीवास्तव को... उस माहौल को देख कर।
जैसे तैसे सुबह हुई। दीनू जल्दी आ गया था। उसने आवाज लगा कर उठाया सबको।
"साब चाय बना दूं???"
चाय पीकर सब तैयार हो गए। आज किले के तहखानों का निरीक्षण करना था उनको। काम पर लग गए चारों। सारे तहखाने टटोल डाले। गांव वाले वहां तक नहीं पहुंचे थे कभी। सालों से बंद पड़े वो तहखाने इन चारों ने ही खोले थे। ताले तोड़ने पड़े उनके। हर तहखाने में चमगादड़ भरे पड़े थे। पुराने बक्से... पड़े थे उनमें... सब खाली। कुछ पुराने कपड़े जरूर मिले। वो भी बिल्कुल गल चुके थे। हाथ लगते ही फट रहे थे। इसी छानबीन में एक तहखाने के अंदर एक छोटा सा संकरा सा गड्ढा जैसा कुछ दिखा। टॉर्च की रोशनी उस गड्ढे पर डाल दी गई। आश्चर्य से भर गए वो चारों।
"इ.. इसमें क्या हो सकता है सर???" विपिनपाल ने धीमे से पूछा।
"कोई गुप्त रास्ता लगता है। या तहखाने में कोई और तहखाना लगता है।" करुण श्रीवास्तव ने कयास लगाते हुए कहा
टॉर्च की रोशनी डाली गड्ढे के अंदर। कुछ साफ साफ नहीं दिखाई दे रहा था।
"हमे इसमें उतर कर देखना चाहिए। क्या पता कोई खास चीज मिल जाए।" महेंद्र राज ने उत्सुकता से कहा।
"तो फिर तुम ही उतर जाओ सबसे पहले।" श्याम कुमार ने हंसते हुए कहा ।
इतना सुनते ही महेंद्र उस गड्ढे में सरक गया। संकरे गड्ढे से नीचे कूदते ही उसने अपने आप को एक अंधेरी सुरंग में पाया।
"यहां तो बहुत अंधेरा है सर... कोई सुरंग सी लगती है। आप भी आ जाइए।"
पीछे पीछे उतर गए चारों। सुरंग में देखा तो सामने एक बड़ा सा दरवाजा नजर आ रहा था। टॉर्च की रोशनी में बढ़े जा रहे थे वो दरवाजे की तरफ।
पास जाकर श्रीवास्तव बोल पड़े," ये तो किसी तरह की जेल लगती है।" "इतनी खतरनाक जेल??" श्याम कुमार ने आश्चर्य से पूछा।
"हां... पुराने जमाने में कई खूंख्वार कैदियों को अमानवीय यातनाएं देने के लिए यह जेले बनाई जाती थी। जहां से भागना नामुमकिन होता था।" श्रीवास्तव ने कहा।
"तो ये दरवाजा खोले?" विपिनपाल ने पूछा।
"हां... इसे खोल कर देखते हैं।"
"भारी भरकम अजीब सा ताला लगा है इसके तो।"
"हम्ममम... ताला तोड़ना पड़ेगा।"
सबने प्रयास कर के वो ताला तोड़ दिया... और एक जोरदार आवाज के साथ वो भारी भरकम दरवाजा खुला। सीलन भरी बदबू फैल गई वहां।
"उफ्फ... यहां तो सांस लेना दूभर हो रहा है।"
"हे भगवान!!!!!" टॉर्च की रोशनी में अंदर का दृश्य देख कर रोंगटे खड़े हो गए सबके।
वह कैदखाना एक बहुत बड़ा हॉल था। जिसमें अनगिनत कंकाल बिखरे पड़े थे। अजीब सी बदबू और ऐसा भयानक दृश्य देख कर जी मितलाने लगे चारों के।
उसी हॉल में एक छोटी सी काल कोठरी और बनी थी। जिसके लोहे का जालीदार दरवाजा भी लगा था। लेकिन वो लोग बस वहां से तुरंत निकल जाना चाहते थे।
"ये... ये सब क्या है यहां?? इतने कंकाल क्यों बिखरे पड़े है???"
"ये वो कैदी होंगे... जिन्हें यहां बंद कर दिया गया होगा... आजीवन।"
"अब यहां से चलें... और रिपोर्ट तैयार करें आगे की। यहां। की सफाई करवाने का सुझाव भी लिखना पड़ेगा।" श्रीवास्तव ने बाहर निकलने का इशारा करते हुए कहा।
चारों जल्दी जल्दी वहां से बाहर निकल आए। तहखानों से बाहर आते आते शाम ढल गई थीं दीनू बाहर खाने की तैयारी कर रहा था। "आ गए साब? चाय बना दूं??"
जी खराब हो रहा था सबका।
श्रीवास्तव साब बोले.." दीनू पहले पानी गरम कर दे। आज सब नहाएंगे उसके बाद चाय पियेंगे।"
"ठीक है साब।"
सब नहा लिए। अब अंधेरा सा ढलने वाला था। दीनू ने अलाव जला दिया। चाय की चुस्कियां लेते हुए अलाव के पास बैठे चारों आज की तहखाने की बात करने लगे।
"कितना भयानक माहौल था वहां।!!"
"हम्ममम... अपने इतने साल के अनुभव में मैंने ऐसा दृश्य कभी नहीं देखा था।" श्रीवास्तव ने ठंडे स्वर में कहा।
रात गहराने लगी। दीनू ने खाना लगा दिया। खाना खा कर जैसे ही उठे वो कि पूरा माहौल सियारो के रुदन से गूंज उठा।
"ऊ ऊऊऊऊ sssssss......."
दीनू का चेहरा सफेद पड़ गया। "सा... साब... आज ये... ये... सियार एक साथ रो रहे है... कोई बड़ा खतरा मंडरा रहा है। म... मैं अब चलता हूं। जल्दी घर जाना है। आ...आप भी जल्दी टेंट में चले जाओ। अलाव में भरपूर लकड़ियां डाल दी हैं। मशालें जला कर रख लीजिए। बाहर अकेले कहीं मत जाना साब। आज की रात बड़ी मनहूस लग रही है।"
ये बड़बड़ाते हुए दीनू वहां से चला गया।
श्रीवास्तव का दिल जोर से धड़कने लगा। दीनू की बातें चारों के दिमाग में घूमने लगीं
टेंट में पैक हो गए वो सब। चारों ओर मशालें जला रखी थी। अलाव की लपटें ऊपर तक जल रही थी। आज चारों ने फैसला किया कि 2-2 घंटे के लिए हर आदमी जागेगा और पहरा देगा। कोई जंगली जानवर दिखते ही सबको जगाकर फायर गन से अटैक करना है।
सबसे पहले श्रीवास्तव ही जग कर पहरा देने लगे। बाकी सब भी लेटे हुए तो थे लेकिन नींद आंखों से कोसों दूर थी ।
कुछ ही देर में नींद ने आ घेरा उन तीनों को। श्रीवास्तव अब अकेले जग रहे थे। रात का सन्नाटा पसरा था। श्रीवास्तव टेंट को थोड़ा सा खोल के बाहर का जायजा लेने लगे। सन्नाटा पसरा था.... ठंडी हवा के झोंके खून जमा रहे थे.... पूरा चांद आसमान के बीचों बीच चमक रहा था। झिंगुरों का शोर बिखरा पड़ा था चहुं ओर। सीटियां बजाती तेज हवा पेड़ों को झकझोर रही थी। उल्लुओं की आवाजें गूंज रही थी। सियारों के रोने की आवाजें रोंगटे खड़े कर देने वाला माहौल बना रही थी। सिहरन भरा माहौल था।
श्रीवास्तव को पहली बार किसी जगह पर इतना डर लग रहा था।
मन ही मन सोचने लगा वो...
"अपने इतने सालों के अनुभव में मैंने कई खंडहरों का निरीक्षण किया है... लेकिन आज की रात जो मनहूसियत फैली है यहां ऐसी मनहूसियत कही महसूस नहीं की थी।"
श्रीवास्तव बाहर झांकते हुए ये सोच ही रहे थे कि एक आहट सी हुई और उनका ध्यान इस तरफ चला गया। किसी के चलने की आहट थी वो। श्रीवास्तव ने फायर गन संभाल ली। उन्हें लगा कोई सियार या छोटा मोटा जानवर होगा। आहट पास आती जा रही थी। अंधेरे में एक साया उभरा... एक आदमकद साया। श्रीवास्तव हैरान रह गए। समझ में नहीं आ रहा था कि वो क्या है। उन्होंने बाकी तीनों को फुर्ती से जगाया। तब तक वो साया काफी पास आ चुका था। अलाव और मशालों की रोशनी में जब वो साया स्पष्ट हुआ तो उन चारों की आंखे फट पड़ी। आवाज गले से नहीं निकली। चीख गले में ही घुट के रह गई। सामने आने वाली वो आदम कद आकृति कल्पना से परे भयानक थी।
वीभत्स चेहरा... शरीर पर जगह जगह चमड़ी लटक सी रही थी... खूनी पंजे... टेढ़े मेढे पैर...और मुंह से निकल रही भयानक गुर्राहट.... किसी के भी होश उड़ाने के लिए काफी था वो दृश्य।
चारों टेंट से निकल भागे। भागते हुए श्रीवास्तव ने फायर गन से फायर कर दिया उस पर। लेकिन कोई असर नहीं हुआ। वो भयानक शैतान गुर्राते हुए तेजी से उनके पीछे लपका।
और अगली सुबह..... जब दीनू टेंट के पास आया.. तो देखा टेंट बिखरा हुआ था। दीनू के हाथ पैर फूल गए। उसने आवाजें लगाई पर कोई उत्तर नहीं मिला। दीनू उन्हें खोजने के लिए इधर उधर घूमने लगा। तभी उसे थोड़ी दूर कुछ नजर आया। वो धीरे धीरे उस तरफ बढ़ने लगा। पास जाकर देखा तो एक पल के लिए उसका दिमाग गश खा गया। जो उसने देखा वो उन चारों में से किसी का उखड़ा हुआ हाथ था। वही से थोड़ी दूर विपिनपाल का क्षत विक्षत शरीर पड़ा था। ऐसा लग रहा था मानो किसी ने उसके जिस्म से खून की एक एक बूंद चूस ली हो। चीख निकल गई दीनू की। पागलों की तरह चिल्लाने लगा वो। चिल्लाते हुए गांव की तरफ भागा.... गांव पहुंच कर घबराई आवाज में पूरी घटना बताई गांव वालों को।
आनन फानन में गांव के ठाकुर राजबहादुर सिंह कई गांव वालो के साथ पहुंचे किले के पास। वहां सच में चारों के बिखरे टुकड़े और नुचे हुए जिस्म मिले उन्हें।
"ओह... इतनी बेरहमी से इनका कत्ल कौन कर सकता है।?? ऐसे तो कोई जानवर भी नहीं मारता।"
ठाकुर साब ने चिंतित स्वर में कहा।
"अब क्या करे ठाकुर साब।??" गांव के लोगों ने पूछा।
"ये काम किसी शैतानी ताकत का लगता है ठाकुर साब। ये लक्षण किसी बड़ी विपत्ति के लग रहे है। कोई भयानक संकट मंडराने वाला है गांव पर।" गांव के पुजारी बाबा गंभीरता से बोले ।
फिलहाल इस घटना की सूचना हमे पुलिस को देनी होगी। पास के गांव में पुलिस चौकी थी।
चार सिपाही नियुक्त थे। घटना हत्या की थी तो चौकी से सूचना थाने तक पहुंचाई गई। पुलिस दल आ पहुंचा गांव। दीनू से पूछताछ की गई। किले का मुआयना किया। पहाड़ी इलाका पूरा छान मारा। लेकिन कहीं कोई ठोस सुराग नहीं मिल पाया । अपनी छानबीन कर के पुलिस लौट गई। रिपोर्ट में जंगली जानवरों के झुंड द्वारा हमले की घटना दर्शा दी गई।
इस भयानक घटना के कुछ दिन बाद... अमावस्या की काली रात अपने पूरे शबाब पर छा चुकी थी। मैनागढ़ की गलियों में सन्नाटा पसरा था। एकाएक गलियों के कुत्ते एकसाथ रोने लगे। गांव से बाहर जंगल में सियारो के रोने की आवाजें गूंज उठी। पूरे माहौल में मनहूसियत घुल गई। कुत्तों के रोने से परेशान होकर एक आदमी ने दरवाजा खोला और लाठी लेकर कुत्तों को भगाने निकला। कुत्ते भाग गए... लेकिन उस आदमी के पैर वहीं ठिठक गए...वहां पड़े भूसे के ढेर के पीछे से एक भयानक आकृति उभरी....
"कौ.... कौन है वहां???" घबराई आवाज में बोला वो।
उसके बाद उसे मौका नहीं मिला।।।
अगली सुबह ठीक वैसी ही बिखरी सी लाश मिली उसकी। गांव में तहलका मच गया।
ठाकुर राजबहादुर और सभी गांव वाले पुजारी के पास पहुंचे।
"मैने आपको पहले ही कहा था ठाकुर साब... इस शैतानियत को मैं महसूस कर रहा हूं। इस वक्त गांव पर भयानक संकट छाया है। इस वक्त हमें बेहद सावधान रहना होगा।"
"तो हम क्या करें बाबा??" ठाकुर ने गंभीरता से पूछा
"बस अभी गांव में कुछ नियम बना लेने चाहिए.... रात को कोई घर से बाहर न निकले। अकेले किसी बाहरी जगह पर ना जाए। जंगल में लकड़ी काटने अकेले न जाए। किले की पहाड़ी पर किसी हालत में ना जाए। गांव के मंदिर में शाम की पूजा में पूरा गांव शामिल हो।"
ठाकुर साब ने ऐलान कर दिया, "पूरे गांव में पुजारी बाबा के नियम बता दिए जाए और उनका पूरा पूरा पालन किया जाए।"
पुलिस को फिर से इत्तिला कर दी गई। थानेदार हवासिंह राठौड़ पुलिस जाब्ते के साथ वहां पहुंच गया। चक्करघिन्नी सी हो के रह गई पुलिस। गांव वालों के आक्रोश का भी सामना करना पड़ा उन्हें। बड़ी मुश्किल से गांव वालो से समझाइश कर के थाने पहुंचा।
"उफ्फ... केस तो गले की घंटी बन गया है। आखिर इतनी वीभत्सता से कौन मार रहा है लोगों को??। जंगली जानवर भी इस तरह शिकार नहीं करते।" कुर्सी पर बैठे बैठे सोचे जा रहा था वो।
तभी एक ख्याल कौंधा उसके मन में, "अरे... हां... ये केस एक आदमी सॉल्व कर सकता है।"
उसने एक नंबर डायल किया।
सामने से आवाज उभरी....
"हेलो... द्रोण हियर।" ....
अगले अंक में जारी............
क्या द्रोण इंस्पेक्टर हवा सिंह की मदद कर सका।??? क्या मैनागढ़ का वो खौफनाक केस सॉल्व हो सका?? या द्रोण भी शिकार बन गया उस रहस्यमय शैतान का???
जान ने के लिए इंतजार कीजिए रोमांच और खौफ की स्याही से लिखे अगले भाग का...
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