कथा पूर्णतया काल्पनिक है। किसी प्रकार के नाम या घटना का किसी वास्तविक व्यक्ति अथवा स्थान से कोई संबंध नहीं है।
लालच की वजह से इंसान कभी कभी बुराई की राह पर चल पड़ता है , उसमें उसे क्षणिक सफलता भी मिल जाती है लेकिन करनी का फल हर हाल में भुगतना ही पड़ता है।
सन 1986...
नेशनल फारेस्ट रिज़र्व के बाहरी कोने पर स्थित एक सुहानी सी झील। झील के पास वृक्षों के झुरमुट में ढका एक कॉटेज। प्रोफेसर रमाकांत राव के लिए छुट्टियां बिताने की सबसे पसंदीदा जगह। ये कॉटेज प्रोफेसर को विरासत में मिला था और हर छुट्टियों में वो और कहीं न जाकर यहीं आकर रहना पसंद करते थे। शोर शराबे से दूर, प्रकृति की गोद मे शांत वातारण किसी का भी मन मोह लेता है। इस दुनियां में प्रोफेसर राव के परिवार के नाम पर कोई नहीं था। बस दूर की बहिन के पुत्र पुत्री अरुण और गीता पर उनका विशेष स्नेह था। इस बार अरुण और गीता को भी उन्होंने कुछ दिन छुट्टियां मनाने कॉटेज पर बुला लिया था। तीनो मजे से छुट्टियां काट रहे थे। झील में पतवार वाली छोटी सी नाव में सवारी कर बड़ा मजा आता। लेकिन इस मौज मस्ती को किसी की नज़र लगने वाली थी।
रात 12 बजे। घोर सन्नाटे में एक वैन उस कॉटेज की तरफ बढ़ रही थी। कच्ची सड़क... अंधेरा रास्ता... और वैन में सवार चार लोग... पंगा, राजा, जोजी और बीक्का। इरादे बिल्कुल नेक नहीं लग रहे थे उनके।
पंगा-" तुम्हारी इनफार्मेशन पक्की तो है ना जोजी?? तीनो इस वक़्त यहीं है ना??"
जोजी - " बिल्कुल सही खबर है पंगा। वो तीनों यहीं है।"
बीक्का - " फिर तो ये शानदार अवसर है सबको एक साथ सलटाने का।"
राजा- "वो सब तो ठीक है, लेकिन काम बहुत होशियारी से करना होगा। हल्की सी चूक सब कुछ मिट्टी में मिला देगी।"
वैन को कुछ दूरी पर छोड़कर वो पैदल ही कॉटेज की और बढ़ चले। उस भयानक रात में खतरा बढ़ रहा था उन तीनों की तरफ जो बेफिक्र सो रहे थे।
बाहर से छत पर चढ़ने लगे वो चारों साये। छत के रास्ते अंदर दाखिल हो चुके थे वो। पहले अरुण और गीता की बारी थी। उनके कमरे के दरवाजे पर खट खट हुई। गीता जाग गयी... "कौन है???... कौन है बाहर?? मामाजी???"
लेकिन जवाब नहीं मिला। कुछ ही देर में फिर से खट खट हुई।।
गीता ने अरुण को जगाया।"अरुण उठो.. देखो बाहर से कोई दरवाजा खटखटा रहा है।"
"कोई चूहा होगा.. सो जाओ ना.." कहकर अरुण फिर से सो गया।
ये लापरवाही भारी पड़ने वाली थी।
इस बार हुई खटखटाहट ने गीता को मजबूर कर दिया दरवाजा खोलने को। उसने धीरे से दरवाजा खोला और हॉल में आ गयी।
अचानक पीछे से एक हाथ उसके मुंह पर आ कसा। घुटी हुई चीख निकली उसके मुंह से। अगले ही पल बेहोश हो गयी गीता। अब अरुण के कमरे में घुस गए वो चारों। क्लोरोफार्म सूंघा कर सोते हुए ही बेहोश कर दिया गया उसे। अब बारी थी प्रो. राव की।
चारों दनदनाते हुए प्रो. के कमरे की तरफ बढ़ गए। हल्के से धक्के से प्रो. का कमरा खुल गया। शायद अंदर से खुला ही था। चारों बहुत धीरे से प्रविष्ट हुए कमरे में। मोमबत्तियों की हल्की सी रोशनी में जब उनकी आंखें देखने की अभ्यस्त हुई तो उनके होश उड़ गए। जमीन पर बनी अजीब सी आकृतियों के ऊपर प्रो. का शरीर छत से बंधा उल्टा लटक रहा था। एकदम शांत, निष्प्राण सा।
चारो हैवान बनकर टूट पड़े उस पर। लातों घूंसों की बारिश सी कर दी गयी। लेकिन उफ्फ तक नहीं निकली प्रो. के जिस्म से। एकाएक रुक गए वो। आश्चर्य से फट पड़ी उनकी आंखें। "ये...ये.. हरकत क्यों नहीं रहा।" पंगा ने हैरत से पूछा।
"मैं...मैंने पहले ही कहा था...इस प्रोफेसर से पंगा मत लो.... ये... ये.. पेरानॉर्मल एक्टिविटीज पर रिसर्च कर रहा है। पता नहीं क्या कर के लटका है..!" जोजी घबराते हुए बोली।
राजा - "तुम जन्मजात डरपोक हो जोजी। मैं तो कहता हूं इन तीनो को उठाओ और ठिकाने लगाने की सोचो।"
बीक्का - "हाँ..हाँ राजा सही कह रहा है। जल्दी इन्हें ठिकाने लगाओ। वरना सब किये धरे ओर पानी फिर जाएगा।"
"इसके पेरानॉर्मल की तो ऐसी की तैसी" चारो ने मिलकर उठा लिया प्रोफेसर के जिस्म को।
बाहर हवाएं तूफान में बदल चुकी थी। आकाश बिजलियों की गड़गड़ाहट से दहल उठा था। एकाएक कॉटेज का शांत माहौल दहशत से भर उठा।
गीता, अरुण और प्रोफेसर को लिए वो कॉटेज से बाहर आ गए।
"इन्हें यहीं ज़िंदा दफना देते हैं।" बीक्का खूनी स्वर में बोला।
"नहीं नहीं... मैंने सब सोच रखा है। इन्हें झील की तरफ ले चलो।" पंगा बोला।
झील के पास पहुंच कर नाव पर डाल दिया गया तीनों को।
"अब क्या करना है पंगा??" राजा ने पूछा।
"अब नाव में हल्का सा छेद कर के झील के बीच मे धकेल दो। डूब के झील के पेंदे में पड़े रहेंगे .. सब इसे दुर्घटना समझेंगे। हा हा हा हा..." पंगा का शैतानी अट्टहास गूंज उठा।
चारों आनन फानन में सारे सबूत मिटा कर वैन में सवार हो गए। वेन तेज रफ्तार से दौड़ लगा गयी। पीछे छूट गया वो कॉटेज, झील और झील के पानी मे उठते वो बुलबुले।
हफ्ते भर तक चारों की नजरें रोज अखबारों की सुर्खियां तलाशती। कहीं कोई ख़बर नहीं थी। लेकिन वो जानते थे कि कभी न कभी तो ये वाकया सामने आएगा ही।
आखिर तीनों के लापता होने की खबर पुलिस के पास पहुंच ही गयी। गीता और अरुण के माता पिता ने रिपोर्ट दर्ज कराई। पुलिस उन तीनों की खोज में कॉटेज और आस पास के पूरे क्षेत्र का चप्पा चप्पा छान रही थी। आखिर पुलिस झील तक जा ही पहुंची।
अगले दिन अखबारों में सुर्खियां छपी..
" प्रो. राव सहित तीन की मौत। झील में डूबने से मृत्यु। (आगे समाचार...)
झील से दो शव बरामद। दोनों शव प्रो. के भांजे और भांजी के मिले। शव बुरी तरह गल सड़ चुके थे। शरीर पर पहने लॉकेट हाथ के कड़े से हुई शिनाख्त। फिलहाल प्रो. राव का शव अभी तक नहीं मिल सका है। लेकिन उनके जुते झील के पेंदे में दोनों शवों के साथ मिले। पुलिस का मानना है कि प्रो. राव की भी मृत्यु हो चुकी है। शव की तलाश जारी है।"
ये ख़बर पढ़कर उछल पड़े पंगा, राजा, जोजी और बीक्का। फोन घनघना उठे। उसी शाम चारों मिले शहर के बाहर बने पंगा के फार्म हाउस पर।
"आखिर अपना प्लान सफल रहा। पुलिस इसे दुर्घटना ही समझ रही है। प्रो. की लाश भी जल्दी ही मिल जाएगी। और फिर हम सब होंगे करोड़ों के मालिक हा हा हा हा..."
कहकहे गूंज उठी उन शैतानों के।
"प्रो. की लाश न मिलना मेरे डर को बढ़ा रहा है पंगा। कहीं प्रो. किसी तरह बच न गया हो। मत भूलो.. वो पेरानॉर्मल एक्टिविटी का ज्ञाता है। काफी रिसर्च कर चुका है उन पर। कहीं कोई आफत बन कर न आ जाये वो।" जोजी मिमियाते हुए बोली।
चिल्ला उठा बीक्का- " बेवकूफ औरत। तुम जैसी डरपोक औरत मैंने ज़िन्दगी में नहीं देखी। अपने इन्ही हाथों से जल समाधि दी है उसे। मुर्दा लोग कभी लौट कर नहीं आते।"
"तुम सब अब आराम से जाकर सो जाओ। कुछ ही दिनों में खुशखबरी मिलने वाली है।" पंगा मुस्कुराते हुए बोला।
वो सब भले ही बेफिक्री दिखा रहे थे लेकिन जोजी की बातें उनके दिल के एक कोने में घर चुकी थी। जोजी को आज नींद नहीं आ रही थी। उसे बार बार प्रो का चेहरा नज़र आ है था। "आज ठीक एक महीना हो चुका है प्रो. को मरे हुए। आज अमावस की रात भी है। उफ्फ... ये खयाल मेरा पीछा क्यों नहीं छोड़ देते।" जोजी का दिमाग ये सब सोचकर खराब हो रहा था। अचानक उसका ध्यान टूटा घड़ी के घंटे की आवाज से। टन.. टन... टन.. उसने घड़ी की तरफ देखा। रात के ठीक 12 बजे थे।
एकाएक बाहर कुत्तों के रोने का स्वर गूंज उठा। जोजी का दिल बैठने लगा। वो बेचैन होने लगी। उठ कर खिड़की की तरफ बढ़ी। बाहर झांका। सन्नाटे के सिवाय वहां कुछ नहीं था। उसने खिड़की बन्द कर ली। एकाएक उसे आवाज आई मानो कोई छत पर कूदा हो। वो चौकन्नी हो गयी। उसने दरवाजे खिड़कियां अंदर से बंद कर ली। उसकी रुलाई फूटने लगी। आनन फानन में उसने बीक्का को फोन लगाया। "हेलो.. हेलो.. बीक्का... वो आ गया... वो आ गया... मैंने कहा था ना... वो आ गया। मुझे मार डालेगा वो।... खट्ट...(तभी लाइन कट गई)
बीक्का हेलो हेलो करता रह गया। झनझना गया था उसका भी दिमाग। इधर जोजी की हालत खराब थी। फोन को बेतहाशा पटके जा रही थी वो। उसके कमरे की लाइट जलने बुझने लगी। अगले ही पल घुप्प अंधेरा छा गया। जोजी चिल्ला उठी। "बचाओ... बचाओ"!
उसके कमरे के दरवाजे पर जोर से दस्तक होने लगी। धाड़ धाड़ करके बजने लगा दरवाजा। जोजी पागलों की तरह चीखे जा रही थी। पूरे घर में वो नितांत अकेली रहती थी। किसी से कोई मदद की उम्मीद नहीं थी। ये बात उसे और भयभीत कर रही थी। दरवाजा पीटे जाने का स्वर और तेज हो गया। अचानक चुप्पी छा गयी।
जोजी एकटक दरवाजे की ओर देखने लगी। तभी एक झटके के साथ उखड़ गया दरवाजा। गुस्से से गुर्राता एक भयानक शैतान उसकी तरफ बढ़ने लगा। बुरी तरह सड़ा गला जिस्म... कीड़े बिलबिला रहे थे उसमे... भयंकर बदबू से भर उठा वो कमरा... जोजी भयानक ढंग से चीत्कार कर उठी.." तुम, तुम वही हो... मुझे पता है तुम वही हो... बचाओ... बचाओ..!"
लेकिन उसकी चीख सुन ने वाला कोई नहीं था। वो शैतान धीरे धीरे उसकी तरफ बढ़ने लगा। उसका भयानक हाथ जोजी के गले पर कस गया। जोजी होश खोने लगी। लेकिन शैतान उसे ऐसे ही नहीं मारने वाला था। कुछ समय बाद जब जोजी की आंखे खुली तो वो उसी झील की छोटी सी नाव में सवार थी। अचानक नाव में पानी भरने लगा। जोजी चीखने लगी। वो धीरे धीरे मौत के मुँह में जा रही थी। आखिर उसकी जल समाधि बन गयी।
इधर बीक्का, पंगा और राजा को लेकर जोजी के घर पहुंच गया। कमरे के टूटे दरवाजे और कमरे में घुली बदबू से उनका दिमाग भन्ना गया। वो तुरंत पुलिस स्टेशन पहुंचे। पुलिस ने FIR दर्ज कर तफ्तीश शुरू कर दी। पंगा, राजा और बीक्का के होश उड़े हुए थे। तीनों शहर के क्लब में बैठे इसी मुद्दे पर बात कर रहे थे..
पंगा- " ये क्या हो रहा है?? आखिर कौन जोजी को इस तरह उठा के ले गया। वो ज़िंदा भी है या मर गयी??"
बीक्का - " वो फोन पर जोर जोर से बोल रही थी.. कि वो आ गया। शायद वो प्रोफेसर के बारे में बोल रही होगी। लेकिन ये बात मैं पुलिस को नहीं बताना चाहता।"
"कहीं ऐसा तो नहीं कि जोजी सच बोल रही हो?? कहीं प्रोफेसर सच में वापस तो नहीं आ गया???" राजा घबराते हुए बोला।
"मुर्दा कब से जिंदा होने लगे बेवकूफ। ये सब किसी की चाल है। अब तुम दोनों अलर्ट रहना। अगला हमला हम पर भी हो सकता है।" पंगा सख्त लहजे बोला।
इधर ये केस पुलिस इंस्पेक्टर विक्रम के हवाले कर दिया गया। खुर्राट दिमाग का विक्रम इस केस को समझने में जुट चुका था।
जोजी की घटना के एक हफ्ते बाद..
राजा अपनी कार में सवार होकर शहर के बाहर कहीं जा रहा था। रात के नौ बजे, पहाड़ी रास्ता एकाएक कार हिचकोले खा कर रुक गयी।
राजा बाहर निकला - " कमबख्त इसे भी यहीं खराब होना था!??"
अचानक माहौल सियारों के रुदन से गूंज उठा। उस सन्नाटे में चांद की हल्की रोशनी फैली थी। राजा पसीने से भीग चुका था। घबराहट बढ़ने लगी। तभी उसने अपनी ओर बढ़ती धीमी पदचाप सुनी। पत्तियों और टूटी टहनियों के खड़कने की आवाज। वो पदचाप धीरे धीरे उसकी तरफ बढ़ रही रही। राजा समझ गया कि कोई उसकी तरफ धीमी चाल से बढ़ रहा है।
वो तुरन्त कार में बैठ गया और कार को लॉक कर दिया। कार की लाइट में उसे एक साया कार की तरफ बढ़ता दिखाई दिया। वो कार स्टार्ट करने की कोशिश करने लगा। खटटर्र्रररर... खट ..खट.... लेकिन कार स्टार्ट नहीं हो रही थी। साया बढ़ता चला आ रहा था। राजा भय से चिल्ला उठा। कार से निकल कर भागने की हिम्मत नहीं बची उसमे। साया एकदम पास आ चुका था। वातावरण में भयंकर बदबू फैल चुकी थी। उस शैतान ने गुर्राहट के साथ कार की विंड स्क्रीन का शीशा तोड़ते हुए राजा को बाहर खींच लिया। "तुम.. तुम सच में वही हो??... जोजी ठीक कहती थी.. सबको मार डालोगे तुम.." राजा दहशत के मारे चीख पड़ा।
शैतान के भयानक पंजे कस गये उसकी गर्दन पर। बेहोश होकर झूल गया उसका जिस्म। राजा की जब आंखे खुली तो उसने अपने आप को कार में बैठे पाया। लेकिन कार उस कॉटेज वाली झील के किनारे खड़ी थी। वो संभल भी न सका था कि कार एक झटके के साथ झील में उतर गई। ठंडे पानी का एक छपाका सा लगा राजा को। लेकिन पूरे होश दुरुस्त होते होते पानी मे डूब चुकी थी कार। भयंकर छटपटाहट के साथ राजा की इहलीला समाप्त हो गयी।
राजा के गायब होने से पंगा और बीक्का की हालत खराब हो गयी।
बीक्का का धीरज टूट गया। वो पुलिस स्टेशन की ओर दौड़ लगा गया। केस इंजार्च इं. विक्रम से मिलकर पागलों की तरह बिलखने लगा बीक्का..." मुझे बचा लो इं. साब!! जोजी और राजा की तरह मुझे भी मार डालेगा वो... मुझे बचा लीजिये।"
"कौन???... कौन मार डालेगा तुम्हें...?? होश में आकर बात करो। क्या कहना चाहते हो तुम??जोजी और राजा से तुम्हारा क्या संबंध है??"
इं. विक्रम ने गंभीरता से पूछा।
"मैं... मैं आपको सब कुछ बताता हूं इं. साब!! सब कुछ बताता हूँ।" घबराया हुआ बीक्का अपना बयान देने लगा...
"इं. साब... पंगा, राजा, जोजी और मैं... रमाकांत राव के पिताजी द्वारा स्थापित ट्रस्ट के वर्तमान सर्वेसर्वा हैं।
उन्होंने अपनी वसीयत के अनुसार हम पर एक ज़िम्मेदारी डाली थी। दरअसल उन्हें अपने बेटे पर ज्यादा भरोसा नहीं था कि वो उनकी विरासत को संभाल सकेगा। क्योंकि प्रोफेसर हमेशा अपने पेरानॉर्मल शक्तियों के रिसर्च में व्यस्त रहते और दुनियादारी से अलग थे। इसलिए उन्होंने अपने ट्रस्ट को तीन लोगों के नाम कर दिया था...प्रोफेसर, गीता और अरुण के नाम। लेकिन उन्होंने ट्रस्ट की देखरेख की समस्त ज़िम्मेदारी हम चारों के नाम कर दी थी क्योंकि हमने उनकी काफी सेवा की थी। साथ ही वसीयत में ये ज़िक्र भी था कि अगर इन तीनों को कुछ हो जाता है तो ट्रस्ट का सम्पूर्ण संचालन हम चारों को प्राप्त हो जाएगा। बस तब से हम मौके की तलाश में थे। और एक दिन हमें वो मौका मिल ही गया। और हमने उन तीनों को उस झील में ठिकाने लगा दिया। लेकिन अब प्रो. वापस लौट आया है इं. साब!! उसी ने जोजी और राजा को मारा है। वो मुर्दा ज़िंदा हो गया है इं. साब... मुर्दा ज़िंदा हो गया...मुझे बचा लो.." फूट फूट कर रो पड़ा बीक्का।
इं. विक्रम के माथे पर बल पड़ गए। उसका सिर चकरा गया ये सारी कहानी सुनकर। अपने आप को संयत कर बोला वो...
"मुझे नहीं पता कि तुम्हारी कहानी में कितनी सच्चाई है बीक्का?? लेकिन तुम्हारे डर ने तुम्हे ये सब उगलने पर मजबूर कर दिया है तो यकीन करना पड़ेगा। मैं तुम्हे गिरफ्तार करता हूं। अब से तुम लॉक अप में पुलिस सुरक्षा में रहोगे। मैं पंगा को गिरफ्तार करने जा रहा हूँ।"
इं. विक्रम तुरन्त पंगा को गिरफ्तार करने निकल पड़ा।
"अगर प्रो. ही इन सबको मार रहा है तो इन्हें बचाना नामुमकिन सा है। आत्मा, भूत प्रेत से भला कैसे लड़ा जा सकता है... उफ्फ... मैं ये सब क्या सोच रहा हूँ। क्या ये संभव है कि कोई मुर्दा ज़िंदा हो जाये???" जीप चलाते हुए इन खयालों में खोया था इंस्पेक्टर विक्रम।
इधर पुलिस स्टेशन में... एकाएक अंधेरा छा गया।। घड़ी का पेंडुलम ठीक 12 बजा रहा था। भयानक बदबू से भर गया पुलिस स्टेशन। "उफ्फ... ये बदबू कैसी... जैसे कोई सड़ा हुआ जानवर थाने में आ गया हो!!" हवलदार नाक भींचते हुए बोला। आस पास फिर से कुत्तों का भयानक विलाप होने लगा। पूरा माहौल ही मनहूस हो उठा। लॉकअप एक झटके में खुल गया। बीक्का समझ गया उसकी मौत आ गयी है।
"बचाओ... बचाओ... वो आ गया... मुझे मार डालेगा... बचाओ.." बीक्का चिल्लाते हुए लॉकअप से बाहर भागा। पुलिस स्टाफ हैरत में था। उन्हें कुछ समझ में नहीं आ रहा था। अंधेरे में कुछ नहीं सूझ रहा था। बस आवाजें सुनाई दे रही थी। "रोशनी करो जल्दी..!!" हवलदार चिल्लाया।
टॉरचे जगमगा उठी। लॉकअप खाली था। चार पुलिस वाले बीक्का को ढूंढने भागे।" जल्दी करो..बीक्का को पकड़ो वरना साहब खाल खींच लेंगे हमारी!"
बीक्का दौड़ा जा रहा था अंधेरी गलियों में। "हम्फ.. हम्फ... काफी दूर आ गया हूं मैं। यहां तक मेरा पीछा नहीं कर सकेगा वो। एक बार यहां से निकल जाऊँ तो ये देश ही छोड़कर चला जाऊंगा मैं... नहीं चाहिए करोड़ों रुपये।" ये सोचते हुए एक पुराने खंडहर में जा छुपा वो।
"ये जगह ठीक रहेगी.. सुबह तक यहीं छुप जाता हूं!"
तभी खंडहर में वही भयानक बदबू तैर गयी...
एक गुर्राहट उभरी... और बीक्का की चीख गूंज उठी। पुलिस वालों ने बीक्का की चीख सुन ली। "उफ्फ .. ये चीख.. मानो किसी को हलाल किया जा रहा हो..!" हवलदार और अन्य सिपाही चीख की दिशा में दौड़ पड़े।
खंडहर तक पहुंच चुकी थी पुलिस टीम।
लेकिन उन्हें वहां कुछ नहीं मिला। बीक्का वहां से गायब था।
इसी दौरान इं. विक्रम जा पहुंचा था पंगा के फार्म हाउस पर।
पंगा -"इतनी रात गए कैसे आना हुआ इंस्पेक्टर??"
" मैं तुम्हे प्रो. रमाकांत राव, गीता और अरुण के क़त्ल के जुर्म में गिरफ्तार करने आया हूँ पंगा। बीक्का ने सब कुछ उगल दिया है। बेहतर होगा तुम भी सरेंडर कर दो।"
पंगा बहुत मजबूत खिलाड़ी था।
"अरेस्ट वारेंट लाये हो इं.??" पंगा ने तैश में आकर पूछा।
"अभी मेरे पास अरेस्ट वारंट नहीं है पंगा। लेकिन तुम्हारी भलाई इसी में है कि तुम मेरे साथ चलो। क्योंकि बीक्का के साथ साथ तुम्हारी जान भी खतरे में है।" इं. गम्भीरता से बोला।
"पंगा अपनी हिफाज़त खुद कर सकता है इं.साहब। एक सरफिरे की बाते सुनकर बिना अरेस्ट वारंट लिए आधी रात को एक शरीफ आदमी को डिस्टर्ब करना ठीक बात नहीं है इं. ! अब आप जा सकते हैं।"
"जा रहा हूँ। लेकिन जल्द ही वारंट के साथ लौटूंगा। मुझे उम्मीद थी कि तुम्हे मेरी बात समझ में आ जायेगी.. लेकिन खैर। जल्द ही फिर मुलाकात होगी पंगा।" इं. विक्रम लौट गया।
थाने पहुंच कर जो सुना उससे बिफर पड़ा इं. विक्रम.. "शट अप हवलदार... एक आदमी को नहीं संभाल सके तुम!?? तुम सबको सस्पेंड कर देना चाहिए!!"
"उफ्फ..अब सिर्फ पंगा बचा है। वो हत्यारा पंगा को जल्द ही शिकार बनाने की कोशिश करेगा। मुझे पंगा पर नज़र रखनी पड़ेगी... लेकिन उस से पहले मुझे बीक्का की तलाश करनी पड़ेगी।" गहरे विचारों में डूब गया इं. विक्रम।
इधर बीक्का को होश आ रहा था। उसकी आंखें खुली तो अपने आप को झील के ऊपर उल्टा टँगा हुआ पाया। हाथ पैर सब मजबूत लताओं से बंधे थे। इससे पहले कि वो कुछ समझ पाता एक झटके से झील में जा गिरा। तड़पते हुए घुटी हुई मौत मरा बीक्का। अब तक तीन हत्यारे समा चुके थे झील में।
अगले दिन इंस्पेक्टर विक्रम ने दो सिपाही पंगा की निगरानी के लिए छोड़ दिये और खुद जा पहुंचा उसी कॉटेज पर..."सारा फसाद यहीं से शुरू हुआ है। मुझे एक बार यहां का गौर से मुआयना करना पड़ेगा।"
इस बार जब कॉटेज में दाखिल हुआ वो तो सारी कहानी उसके सामने थी। प्रो. रमाकांत के कमरे में गहन तलाशी लेने लगा वो। कुछ खास हाथ नहीं लगा उसके। "अगर प्रो. पैरानॉर्मल एक्टिविटीज पर काम कर रहे थे तो कुछ तो मिलना चाहिए था... या ... या कहीं और तो नहीं है उनके रिसर्च की जगह। मुझे एक एक जगह चेक करनी चाहिए।"
कॉटेज के ठीक पीछे बने स्टोर रूम तक पहुंचा वो। देखने में लकड़ी का बना साधारण सा स्टोर रूम था। लेकिन एक पतली सी डोर लटक रही थी छत से। इंस्पेक्टर की तेज नज़रो से न बच सकी वो डोर। इं. विक्रम ने उसे खींचा। डोर के साथ ही एक सीढ़ी लटक गई। इं. धीरे धीरे उस सीढ़ी पर चढ़ने लगा। ऊपर एक गुप्त कमरा बना था। उसी कमरे में मौजूद थी प्रो. रमाकांत की लैब। जहां वो कई तरह से अपना रिसर्च करते थे। कई किताबें और थीसिस मिली वहां। जिन्हें पढ़ कर इं. हैरान रह गया।
"उफ्फ... यानी ... यानी सच में प्रो. का मुर्दा ज़िंदा हो चुका है। जिस तरह की बातें इन पुस्तकों में लिखी है उस से यही साबित होता है कि ये सब सम्भव है। और अब मुझे यहां वही गंध महसूस होने लगी है जो जोजी के कमरे में और रात को थाने में महसूस हुई थी। मुझे तुरन्त यहां से निकल जाना चाहिए।" आनन फानन में इंस्पेक्टर विक्रम वहां से बाहर निकल आया। दिन का समय था इसलिए ज्यादा खतरा नहीं था। वो अब झील की तरफ बढ़ा।
"एक बात और मेरे दिमाग में घूम रही है... ये मुर्दा अपने शिकार को वहीं क्यों नहीं मार देता.. आखिर वो उन्हें कहाँ ले जाता है... कहीं इस झील में तो नहीं... ??? अगर मेरा खयाल ठीक है तो उसका अगला शिकार पंगा ही होगा.. और उसे भी वो यहीं लाएगा।"
झील के पास की गई खोजबीन से उसे कुछ ऐसे क्लू मिले जिससे उसका शक यकीन में बदल गया। झील के किनारे कार के टायर के निशान, बीक्का के गले का लॉकेट जैसी चीज़ों ने उसका शक पक्का कर दिया।
वो तुरन्त पंगा के फार्म हाउस जा पहुंचा। इस बार उसके पास अरेस्ट वारण्ट था लेकिन पंगा फरार हो चुका था।
"रात के अंधेरे में ये शहर छोड़ देना मुनासिब रहेगा। एक तरफ वो मुर्दा दूसरी तरफ वो इं. ... उफ्फ.. बुरा फंसा हूँ मैं। किस मनहूस घड़ी में प्लानिंग की थी..!!"
पुलिस को चकमा देकर शहरी सीमा से सुरक्षित निकल आया था पंगा।
"सुबह तक तो बहुत दूर निकल जाऊंगा। जल्द ही ये मुल्क छोड़ने का जुगाड़ करना पड़ेगा।"पंगा के सारे सपने बिखरने वाले थे। एक झटके के साथ कार को ब्रेक मारने पड़े पंगा को। एक विशाल वृक्ष आ गिरा था रास्ते पर।
"उफ्फ... ये पेड़ कहाँ से आ गिरा??" तभी सामने आया पेड़ गिरने वाला सख्स। जिसे देखकर होश उड़ गए पंगा के। चीथड़ों में लिपटा, सड़ा गला, कीड़ों से भरा मुर्दा भयानक अंदाज़ में गुर्राता उसकी तरफ बढ़ रहा था।
" ओह्ह.. तू.. तू यहां भी आ गया.!!?? लेकिन तू बचेगा नहीं मुर्दे... दोबारा मार डालूंगा मैं तुझे..."
रिवाल्वर निकाल कर एक के बाद एक सारी गोलियां झोंक मारी पंगा ने उस चलते फिरते मुर्दे पर। धायं... धायं... धायं... जंगल थर्रा उठा।।।
लेकिन वो मुर्दा ठीक उसी धीमे अंदाज़ में उसकी बढ़ता आ रहा था।
लेकिन इस से पहले की वो मुर्दा पंगा को शिकार बना पाता एक जीप तेजी से आई और भयानक टक्कर के साथ वो मुर्दा दूर जा गिरा। जीप से बाहर निकला इं विक्रम।
"तुम नज़र रखने का ठीक फायदा हुआ पंगा। एक साथ दोनों हत्यारे मिल गए मुझे। अब भागने की कोशिश मत करना।"
इधर संभल कर खड़ा हो चुका था वो सड़ा गला बदबूदार मुर्दा। खूनी अंदाज़ में गुर्राते हुए झपटा वो पंगा की तरफ।
चीख निकल गयी पंगा की...
"ई.. ई..ई...ssss.... इंस्पेक्टर मुझे बचाओ... ये ... ये ... मार डालेगा मुझे!!"
इंस्पेक्टर विक्रम ने जान जोखिम में डाल ली।
एक फ्लाइंग किक जड़ दी उसने भयानक मुर्दे की पीठ पर।
"उफ्फ... कितना लिजलिजा सा है इसका जिस्म!"
लेकिन मुर्दा हिला तक नहीं। अपने मुंह से एक बदबूदार फुंकार सी छोड़ी उसने और इं अपने होश खो बैठा।
अब पंगा और उसके बीच कोई नहीं था।
पंगा ने भागने की कोशिश की लेकिन मौत से भला कौन भाग सका। दबोच लिया मुर्दे ने उसे। रात के 2:30 बजे...
पंगा की आंखे जब खुली तो वो झील के किनारे कीचड़ में लथपथ पड़ा था। जोंक उसके जिस्म से खून चूस रही थी।
"आह... ये मैं कहाँ आ गया...!"
पंगा कुछ समझ नहीं पा रहा था।
तभी वो खूनी मुर्दा उसकी बढ़ता नज़र आया उसे। "गुर्रर र्र्रर.... " मुर्दा उसका पैर पकड़ कर घसीटने लगा झील की तरफ। पंगा बुरी तरह चिल्ला रहा था। उस सन्नाटे में उसकी आवाज सुनने वाला कोई नहीं था.... या शायद .. था... अचानक एक काली डोरी सी आ लिपटी मुर्दे के जिस्म से। तड़प उठा वो... उसकी गुर्राहटें गूंजने लगी...
पंगा मौके का फायदा उठा कर उससे दूर भागने लगा। तभी एक गोली चली और पंगा का एक पैर बेकार हो गया।
"भागने की कोशिश बेकार है पंगा। तुम जैसे हैवान को खुला छोड़ना समाज के साथ खिलवाड़ है।"
इंस्पेक्टर विक्रम वहां पहुंच चुका था।
इधर वो मुर्दा अपने बंधन पर चीखे जा रहा था।
"प्रो. रमाकांत... मैं जानता हूं आपके साथ बहुत बुरा हुआ.. लेकिन एक सभ्य व्यक्ति होते हुए भी आप इस राह पर क्यों चल पड़े... मानव कल्याण के लिए अपना सब कुछ त्यागने की सोचने वाला व्यक्ति खूनी दरिंदा क्यों बन बैठा?? होश में आइए...!!"
इं. विक्रम ने मुर्दे की ओर देखते हुए बोला।
"बदला... बदला..." भयानक गर्जना के साथ तड़प उठा वो मुर्दा।
"मुझे प्रतिशोध चाहिए.. मैं.. इन शैतानों को अपनी हत्या के लिए माफ कर सकता था.. लेकिन.. लेकिन... इन्होंने उन मासूमों को भी नहीं बख्शा... उन बच्चों ने इनका क्या बिगाड़ा था... जानते हो... मैं उस वक़्त अपने रिसर्च की अंतिम अवस्था मे था.. अपनी आत्मा को अपने शरीर से पृथक कर वापस शरीर मे लौट आने की विधि जान ली थी मैंने... जब इन्होंने हम पर हमला किया तो मैं अपनी आत्मा को शरीर से निकाल चुका था... 24 घंटे से पहले मेरी आत्मा वापस शरीर में नहीं आ सकती थी। जब इन लोगों ने हम तीनों के शरीर उस नाव में डाल के डुबाया तब वो दोनों बच्चे होश में आ चुके थे। मेरी आँखों के सामने तड़प तड़प कर घुट घुट कर मरे वो... गुर्रर्रर्र.... मैं बस आत्मा रूप में देखता रहा... तड़पता रहा... जल्द से जल्द अपना शरीर धारण करना चाहता था लेकिन उस वक़्त ऐसा न कर सका...( सुबक)...
इन कमीनों से बदला लेने के लिए 24 घंटे बाद अपने इस सड़े गले जिस्म को भी धारण करना पड़ा मुझे... इसीलिए पुलिस को केवल दो ही शव मिल सके थे। मेरा मकसद किसी को हानि पहुंचाना नहीं रहा... मैंने किसी बेगुनाह को नहीं सताया... लेकिन इन्हें मैं नहीं छोड़ सकता.. मेरी आत्मा तड़पती रहेगी... आह... गुर्रर्ररर...!"
"आप ही की थीसिस और रिसर्च नोट्स से आपको रोकने का ये उपाय किया है मैंने प्रोफेसर... आप पहले ही तीन लोगों को मार चुकें हैं अब अगला खून आपको नहीं करने दे सकता मैं... इस को सजा देना कानून का हक़ है।"
" मैं तुम्हारी इन दलीलों को नहीं मान सकता इं. ... इसे मरना ही होगा और मेरे हाथों ही मरेगा ये... एकाएक झील में जा गिरा वो मुर्दा.. झील के पानी से वो सूत की डोरी कच्ची पड़ने लगी..."
इं. विक्रम तेजी से पंगा की ओर दौड़ा.. पंगा को उठाकर जीप की ओर लपका ही था वो कि अचानक उसका पैर किसी मजबूत हाथ ने पकड़ लिया... गिर पड़ा इंस्पेक्टर... झील से उस मुर्दे के भयानक पंजे लबे होकर कस गए पंगा के पैरों पर और तेजी से खींच लिया उसे झील में... पंगा की आखिरी चीखें गूंज उठी...
इंस्पेक्टर चिल्लाया.. " नहीं प्रोफेसर... नहीं..."
लेकिन प्रो. का बदला पूरा हो चुका था। आखिरी हत्यारे को भी उसके किये की सजा मिल चुकी थी। इसी के साथ प्रोफेसर ने भी अब वो जिस्म त्याग दिया जो उसने बदला लेने के लिए धारण किया था। उसकी आत्मा को शांति मिल गयी थी।
इंस्पेक्टर हतप्रभ सा खड़ा रह गया उस वीराने में जो अब बिल्कुल शांत हो चुका था।
समाप्त!