इस दुनियां में हर इंसान खुद को श्रेष्ठ साबित करने की होड़ में जी रहा है। इस होड़ में कई लोग महत्वाकांक्षा की सीमाओं के परे जाने का प्रयास करने लगते है। यहां तक कि भगवान बन जाने के सपने तक देखने लगते हैं। ज़िन्दगी और मौत को अपने हाथों का खिलौना बनाने की सोच लेते है। महत्वाकांक्षा की हदों को तोड़ती ऐसी ही एक कहानी है.....
हत्यारा प्रयोग
सन 1991....
राजनगर में आयोजित एक सेमिनार। जिसमें देश के प्रसिद्ध जीव वैज्ञानिकों का जमावड़ा लगा है। यहीं अपने विचार व्यक्त कर रहे हैं जाने माने जीव वैज्ञानिक प्रोफेसर अवतार सिन्हा - "विज्ञान एक बहुत बड़ी चीज है। आज हमने विज्ञान में अभूतपूर्व तरक्की कर ली है। लेकिन कई रहस्य आज भी विज्ञान से परे हैं और हमें विज्ञान की सीमाओं से परे सोचने की भी ज़रूरत है। इसीलिए मैं कहता हूं कि विज्ञान और तंत्र मंत्र की शक्ति को एक साथ लाने की ज़रूरत है। हमें तंत्र मंत्र को नकार नहीं देना चाहिए क्योंकि कई बार विज्ञान जहां सफल नहीं हो पाता वहां मन्त्र शक्ति को कारगर साबित होते मैंने देखा है। इस कारण हमें ज़रूरत है कि विज्ञान के साथ साथ तंत्र मंत्र को भी जोड़ा जाए।"
सेमिनार हॉल में सन्नाटा छा गया। औपचारिक रूप से कुछ तालियां बजीं और प्रोफेसर सिन्हा अपनी सीट पर बैठ गए।
सेमिनार समापन पर बाहर निकलते अवतार सिन्हा के कानों में लोगों की बातें पहुंच रही थी। कोई बोला," ये प्रोफेसर सनकी हो गया लगता है।"
"हाँ यार! जहां आज विज्ञान ने इतनी तरक्की कर ली है.. वहीं ये पढ़ा लिखा प्रोफेसर कैसी बहकी बहकी बातें कर रहा है!??"
"ये प्रोफेसर लोग आधे पागल ही होते है... लेकिन ये तो पूरा पागल निकला!"
हा हा हा हा.....
ये ठहाके प्रोफेसर सिन्हा के दिमाग में धमाकों की तरह गूंज रहे थे। वो मन ही मन सोच रहा था..." बेवकूफों... जिस दिन मैं अपने प्रयोग में कामयाब हो गया उस दिन तुम सबके मुंह पर ताले लग जाएंगे।" मन मे कुढ़ता हुआ वो बाहर निकल गया।
राजनगर के निकट ही एक छोटे से गांव के बाहर पेड़ों के झुरमुटों से घिरा एक पुराना कॉटेज। जिसमें स्थित थी प्रो. अवतार सिन्हा की गुप्त प्रयोगशाला। दुनियां की नज़रों से छुपी इस प्रयोगशाला में किसी का भी प्रवेश निषिद्ध था। रात के 12:30 बजे, तूफानी रात... मूसलाधार बरसात.. बिजलियों की कड़कड़ाहट के बीच वो सूना कॉटेज पूरी तरह अंधेरे में डूबा था। जिसके बेसमेंट में सिर्फ एक बत्ती जल रही थी। वहीं अपने प्रयोग में डूबा प्रोफेसर... " बस अब अपने प्रयोग के अंतिम चरण में पहुंच चुका हूं मैं.. अगर सब कुछ ठीक रहा तो दुनियां का भगवान बन जाऊंगा मैं... ही ही ही!!"
तभी उस भयानक मौसम में अंधेरे में डूबे कॉटेज की डोर बेल बज उठी। प्रो. की तंद्रा अचानक से टूटी... "रात को 1 बजे कौन आ धमका यहां!!"
डोर बेल लगातार बज रही थी। दरवाजा भी जोर से ठोका जा रहा था। प्रो. न चाहते हुए भी बेसमेंट से बाहर निकल आया.... चिढ़ते हुए दरवाजे की बढ़ा।। " इस वक़्त कौन हो सकता है??? दरवाजा नहीं खोलना चाहिए मुझे!!"
तभी बाहर से आवाज आई, " दरवाजा खोलो.. दया कर के दरवाजा खोल दो। मुझे मदद की ज़रूरत है।"
प्रो. ने अपनी रिवॉल्वर निकाली और दरवाजा खोल दिया। दरवाजा खोलते ही एक आदमी सीधा अंदर घुस आया। बुरी तरह घायल... देखने में खूंख्वार डाकू सा हुलिया... बड़ी बड़ी दाढ़ी, बिखरे बाल, कमर पे बंधा गोलियों का पट्टा...।।
प्रो. एक पल में समझ गया कि ये कोई डाकू है। डाकू बिल्कुल मरणासन्न अवस्था में था। प्रो. उसे सहारा देकर नीचे बेसमेंट में ले आया और ऊपर जाकर खून के निशान बिल्कुल साफ कर दिए। तभी दरवाजे पर एक और दस्तक हुई।
"कौन??" प्रो. घबराए स्वर में बोला।
" दरवाजा खोलो... पुलिस है।"
प्रो. ने दरवाजा खोला।
" क्या यहां कोई आया है??"
"जी नहीं.. पर बात क्या है इंस्पेक्टर साब?"
"गब्बार नाम का खतरनाक डाकू हमारी गोलियों से घायल होकर भागा है... उसी को ढूंढ रहे हैं।"
"मगर इस ओर तो कोई नहीं आया इं. साब!"
"ओह!ठीक है... आप दरवाजा बंद रखना और ऐसा कोई आदमी आये तो तुरंत हमें खबर करना।"
पुलिस चली गयी।
प्रो. तुरन्त बेसमेंट की तरफ लपका।
नीचे पहुंचते ही डाकू उस पर झपट पड़ा।
"ये ... ये.. क्या कर रहे हो!?? मैंने तुम्हें बचाया और तुम मुझ पर ही हमला कर रहे हो!!?"
डाकू लड़खड़ाते स्वर में बोला..."तुम्हें पहले पता नहीं था कि मैं पुलिस से भागा हुआ एक डाकू हूँ... लेकिन अब.. तुम मुझे पहचान चुके हो...आह... मैं अधिक समय तक होश में नहीं रहूंगा... लेकिन उस से पहले तुम्हे खत्म करना ज़रुरी है।"
इसी झोंक में प्रो. पर झपटा वो डाकू सीधा एसिड से भरे जार से जा टकराया। उसका चेहरा एसिड से सराबोर हो गया । एक भयानक चीत्कार के साथ घायल डाकू वहीं गिर पड़ा।
प्रोफेसर हतप्रभ सा कुछ पल उसे देखता रहा और अचानक खुशी के मारे उछल पड़ा..."वाह मेरे प्रयोग के लिए ताजा मृत शरीर यहीं बैठे बिठाये मिल गया। अब मुझे सफल होने से कोई नहीं रोक सकता।" पागलों की तरह अट्टहास लगाने लगा वो।मानो शैतान सवार हो गया था उस पर। कड़कड़ाती बिजलियों का शोर... तूफानी बरसात... ये माहौल किसी के भी होश उड़ाने के लिए काफी था। गब्बार के शरीर को टेबल पर लेटाकर कई उपकरण लगा दिए उसने। अगले ही पल बिजली सी दौड़ पड़ी उन उपकरणों में। अब प्रोफेसर अपनी कार लेकर रवाना हो गया अपने तांत्रिक दोस्त कपाल के डेरे की तरफ।अपनी साधना में लीन तांत्रिक कपाल प्रो. को उस वक़्त देखकर चौंक पड़ा..."तुम... इस वक़्त यहां..?? इसका मतलब तुम्हारा प्रयोग..??"
"हाँ..हाँ... मैं सफल होने जा रहा हूँ... हा हा हा हा हा.... कपाल... जल्दी मेरे साथ चलो.. हम दोनों अब भगवान बनने जा रहे हैं।"
जल्दी ही कार में सवार हो गए दोनों। मूसलाधार बरसात में वो कार बढ़ चली कॉटेज की ओर। जल्दी ही कॉटेज तक पहुंच गए वो।
बेसमेंट में - " देखो कपाल... इसके शरीर के मरते अंगों में फिर से एनर्जी दौड़ाई जा रही है। इसका शरीर फिर से जिंदा इंसान की तरह स्फूर्तिवान हो रहा है।बस इसकी आत्मा वापस शरीर में डालनी है। यहीं मुझे तुम्हारी ज़रूरत है!!"
"ज़रूर... मैं ये काम कर सकता हूँ! अब इसके उपकरण हटा कर इसका शरीर मुझे दे दो।"
कुछ ही देर में प्रोफेसर और तांत्रिक कपाल बेसमेंट के आंगन पर बैठे थे। तंत्र चित्रों से घिरा गब्बार का शरीर भी आंगन पर रखा हुआ था।
एक पल के लिए कपाल ठिठका, "प्रोफेसर... हम ठीक तो कर रहे हैं ना?? ये अप्राकृतिक कृत्य होगा। इसका परिणाम मैं भी नहीं जानता।"
" उफ्फ... समय नष्ट मत करो... मंज़िल के इतने करीब आकर अब ये सब सोचना व्यर्थ है, तुम क्रिया शुरू करो जल्दी।"
इसी के साथ कपाल शुरू हो गया। भयंकर तरीके से मंत्रोच्चार गूंज रहा था बेसमेंट में। मौसम की भयानकता पूरे माहौल को सनसनीखेज़ बना रही थी। कुछ ही देर में तीव्र गड़गड़ाहट के साथ एक हल्की चमक शव से टकराई और मानो तूफान सा उठ गया बेसमेंट में। जैसे ही सब कुछ सामान्य हुआ... शव झटके खाने लगा। गब्बार का शरीर धीरे धीरे हरकत में आने लगा था।
हर्रर्रर्रर्रर्रर्रर..... फुफकार सी निकलने लगी उसके मुंह से। एसिड से जला मुंह... चिथड़े हुआ भयानक शरीर अकड़न तोड़ते हुए धीरे धीरे उठने लगा।
प्रो. के ठहाके गूंजने लगे। " मैं सफल हो गया.... मैं सफल हो गया... हा हा हा हा...."
"तुमने कमाल कर दिया प्रोफेसर...एक मृत शरीर को फिर से आत्मा झेलने के लायक बना दिया तुमने। ये असम्भव कार्य था। मैंने कई बार प्रयास किये लेकिन कोई मृत शरीर इस से पहले किसी आत्मा को नहीं झेल पाया था।" कपाल मानो उछलते हुए बोला।
"ये हम दोनों की जीत है कपाल... हम नए भगवान है दुनियां के... हा हा हा..!!"
"अभी जल्दबाजी मत करो प्रोफेसर... इसका परिणाम सामने आने दो। पता नहीं क्यों मेरा मन विचलित हो रहा है।"
कपाल का अंदेशा सही होने जा रहा था क्योंकि गब्बार का शरीर अब खड़ा हो चुका था और उसका भयानक चेहरा सुर्ख आंखों से उन दोनों की ओर खतरनाक अंदाज़ से देख रहा था।गब्बार धीरे धीरे विक्षिप्त की भांति दोनों की ओर बढ़ने लगा।
"रुको गब्बार... मेरा हुक्म है रुक जाओ।" कपाल चिल्लाया।
लेकिन गब्बार न रुका... उसके मुंह से एक भयानक हंसी निकली..." ही ही ही ही ही ही... भूख लगी है मुझे... खून.. खून... भूख..."
" उफ्फ ये हमने क्या कर दिया" कपाल चिल्लाया..."प्रोफेसर कुछ करो... कुछ करो..."
"उफ्फ.. ये तुम्हारी बात क्यों नहीं मान रहा कपाल???" प्रोफेसर घबराए स्वर में बोला।
"पता नहीं... ये मेरे काबू में नहीं है प्रोफेसर..."
तभी प्रोफेसर ने अपनी रिवाल्वर की सारी गोलियां गब्बार पर झोंक मारी।
गब्बार अब प्रो. की तरफ मुड़ गया। प्रो. भय से चिल्ला उठा.."ब... ब..बचाओssss....कपाल मुझे बचाओ...!!" गब्बार ने आगे बढ़कर प्रो. को दबोच लिया।
ये देखकर कपाल वहां से भागने लगा।
"रुक जाओ कपाल... मुझे छोड़कर मत जाओ... बचाओ मुझेsss..."
लेकिन कपाल भाग निकला।
गब्बार ने प्रोफेसर की खोपड़ी भींच डाली। उसकी आंखें उछल कर बाहर आ गिरी। गब्बार अब बिल्कुल अकेला था बेसमेंट में। वह प्रो. की लाश पर टूट पड़ा।
बाहर दिन की रोशनी फैल रही थी। अगले कुछ दिनों तक शांति छाई रही। कपाल ने किसी को कुछ नहीं बताया। वो अंडर ग्राउंड हो गया । प्रो. की गुमशुदगी की रिपोर्ट होने पर पुलिस खोजबीन करती कॉटेज में पहुंची।
बेसमेंट में लगे टूटे फूटे उपकरणो और मानव अंगों से भरे जार के अलावा पुलिस को प्रोफेसर सिन्हा की बुरी तरह नोची गयी आधी अधूरी सी लाश मिली।
"ओह... इतना ब्रूटल मर्डर तो कोई इंसान नहीं कर सकता। ये काम ज़रूर किसी जानवर का है... या किसी शैतान का।"
पुलिस इस गुत्थी को समझ नहीं पा रही थी।
धीरे धीरे मामला ठंडा होने लगा। पुलिस इस हत्याकांड की कोई जानकारी नहीं जुटा सकी।
क्या पुलिस इस रहस्य से पर्दा उठा पाएगी?
क्या प्रो. अवतार सिन्हा के प्रयोग का सच सामने आ सकेगा?
ज़िंदा हुआ गब्बार का मुर्दा अब क्या कहर ढायेगा?
क्या कोई रोक पायेगा उस शैतान को?
जानने के इंतज़ार कीजिये... अगले अंक का।
विदा।
पहला अंक शानदार हैं।
ReplyDeleteshukriya
Deleteशानदार कहानी
ReplyDeletethank u
Deleteशानदार कहानी
ReplyDeleteThank u
Deleteपहला अंक शानदार हैं।
ReplyDeleteThank u
Deleteकमाल बेहतरीन कहानी मज़ा आ रहा है👌
ReplyDeletethank u so much
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