Wednesday, 3 February 2021

सिंघा की बेटी पार्ट -2

पिछला शेष.....

सिंघा की बेटी 



महाराजा परम सिंह ने अपनी सेना दो भागों में बांट दी। एक उनके स्वयं के नेतृत्व में आगे मैदान में जाकर शत्रु सेना से लोहा लेगी। दूसरी किले में रहकर किले की रक्षा करेगी।

आज मरने मारने का दिन था। राजपूत योद्धाओं की भुजाएं फड़क उठी थी। अपनी जन्मभूमि और कर्मभूमि पर आए संकट को पीछे धकेलने के लिए वो रणबांकुरे आज साक्षात यमराज से टकराने को भी आतुर थे। हर हर महादेव के नारों से गगन गूंज उठा। मानो हर वीर ने केसरिया करने की ठान ली थी। दोनों सेनाएं धूल के गुबार उड़ाते एक दूसरे के सामने डट गयी। कोई किसी का पक्ष मानने को तैयार नहीं था। 

सल्तनत की विशाल सेना का नेतृत्व कर रहा था कल्लन खां... जो एक क्रूर सरदार के रूप में कुख्यात था। उसके बारे में प्रसिद्ध था कि वो युद्ध मैदान में शत्रु को हाथों से ही फाड़ डालने की क्षमता रखता था। कल्लन खां ने एक चेतावनी दी... " महाराजा परम सिंह! तुम्हे एक आखिरी मौका दिया जाता है। अभी भी वक्त है... हमारे सुल्तान का फरमान मान लो... और अपनी रियासत बचा लो।"

"कल्लन खां ssss... तुम अपनी जान की खैर मनाओ। आज तुम में से एक भी जीवित नहीं लौटेगा। हमारी शरण मे आ जाओ और अपने सुलतान को भी यही मशविरा दे दो। हम तुम्हे अभयदान दे देंगे।" परम सिंह ने मूंछो को ताव देते हुए कहा। 
कल्लन खां गुस्से से आग बबूला हो उठा। उसने जंग का आगाज़ कर दिया। भयानक संघर्ष छिड़ गया। दोनो तरफ से भीषण रक्तपात होने लगा। परम सिंह की सेना ने गज़ब का रणकौशल दिखाया। कल्लन खां हैरान रह गया। राजपूती खून का उबाल उसे ख़ौफ़ज़दा कर रहा था। वह मन ही मन अपने परवरदिगार को याद करने लगा। जैसे तैसे सांझ हुई। युद्ध रुक गया। कल्लन खां समझ गया कि परम सिंह को युद्ध मे सीधे सीधे हराना नामुमकिन है।
उसने वही कुटिल चाल खेली जो उससे पहले के सरदार और सुल्तान खेलते आये थे। उसने रातों रात अपने कुछ गुप्तचर परम सिंह के खेमे में भेज दिए। गुप्तचर एक भारी भरकम प्रस्ताव लेकर गए और हर बार की तरह यहां भी उन्हें कुछ गद्दार मिल ही गये। अंदर ही अंदर सौदा हो गया और परम सिंह के कुछ गद्दार सरदारो ने उसे कल्लन खां के हाथों बेच दिया। 
अगले दिन जब रणघोष हुआ तो महाराजा परम सिंह की सेना ने अद्भुत शौर्य दिखाया। लेकिन ऐन वक्त पर परम सिंह के कुछ सरदार दगा दे गए। परम सिंह ने भयंकर युद्ध किया। अपने सरदारों के विश्वासघात के कारण रणपुर का वह सपूत युद्ध भूमि में खेत रहा। 
सुल्तान की सेना अब किले की और बढ़ चली। महारानी वनपुत्री तक ये समाचार पहुंच गए। महिलाएं जोहर की तैयारी करने लगी। इसी बीच वनपुत्री चीख पड़ी...
" नहींssss... जोहर की अग्नि में जलूँ, अभी ये धर्म नहीं निभा सकूंगी मैं। जोहर की उस अग्नि से अधिक भयानक अग्नि मेरे अंदर धधक रही है। प्रतिशोध की अग्नि। जिसने मेरे सुहाग की हत्या की उसे मिटाए बिना मैं मृत्यु का वरण नही  करूंगी।" 

हर हर महादेव का जयघोष किले में गूंज उठा। किले की रक्षा में तैनात राजपूत सरदार वनपुत्री का  रणचंडी रूप देखकर हतप्रभ रह गए। उनकी भुजाएं फड़क उठी। महारानी के हाथों सेना की बागडोर सौंप दी गयी। वनपुत्री के नेतृत्व में सभी राजपूत सरदार किले के फाटक खोल कर मैदान में आ डटे। इसी दिन काजू तोता भी रणपुर पहुंचा। सिंघा ने उसे अपनी बेटी का हाल जानने भेजा था। काजू ने तुरंत सारा माजरा समझ लिया। वो फ़ौरन सिंघा के पास लौटा और रणपुर की हृदयविदारक स्थिति का हाल उसे सुना दिया। अपनी बेटी पे आये इस संकट ने सिंघा को बेचैन कर दिया। आवेश में उसने एक भयंकर गर्जना की। जंगल का पत्ता पत्ता कांप उठा। जानवर और पक्षी हड़बड़ा कर भागने लगे। उस हुंकार के आगे मेघों की गर्जना का मान मर्दन हो गया। तत्काल वो बूढा सिंह रणपुर की और दौड़ लगा गया। अब वो तब तक नहीं रुक सकता था जब तक अपनी बेटी को सुरक्षित नहीं देख लेता। 
इधर कल्लन खां सेना सहित किले तक पहुंच चुका था। 
किले की रक्षा में खड़ी मुट्ठीभर  सेना को देखकर उसने कहकहा लगाया जब उसने देखा कि उन सरदारों का नेतृत्व महारानी वनपुत्री के रूप में एक नारी कर रही है तो उस पर भी व्यंग्य कसे। 
राजपूत सरदारों का रक्त खौल उठा। जय भवानी... हर हर महादेव के नारे लगाते वो शत्रु सेना पर टूट पड़े। मुट्ठीभर सेना उस विशाल सेना के सामने कब तक टिकती। एक एक कर के वीर राजपूत खेत होने लगे। कल्लन खां के कहकहे गूंज रहे थे। उसकी हंसी वनपुत्री के हृदय में कटार की भांति चुभ रही थी। आखिर लड़ते लड़ते रानी घायल होने लगी। उसका घोड़ा भी थक चुका था। शत्रु सैनिक उसे घेरने लगे। उसका घोड़ा निष्प्राण होकर गिर पड़ा। अब वो हाथों में तलवारे लिए धरती पर घुटनो के बल बैठी थी।  कल्लन खां मौका देखकर उसके पास आने लगा। इसी क्षण शत्रु सेना में खलबली मच गई सेना का एक हिस्सा बुरी तरह भयभीत होकर भागने लगा। एक भयानक दहाड़ सी गूंज उठी। सिंघा वहां पहुंच चुका था। शत्रु सैनिकों को एक एक पंजे से ढेर करता....  सेना को चीरता हुआ वो वनपुत्री ओर बढ़ रहा था। सिंघा की आवाज सुनकर वनपुत्री में मानों जान आ गयी। तलवारों को ज़मींन पे टिकाए... जय भवानी का घोष करते वो धीरे धीरे उठ खड़ी हुई। सिंघा उस तक आ पहुंचा। सिंह को सामने देखकर कल्लन खां कांप उठा। सिंघा उसी तरह वनपुत्री आगे झुक गया जैसे वर्षों पहले उस 5 साल की बच्ची के आगे झुका था। वनपुत्री भी उस पर उसी तरह सवार हो गयी जैसे छोटी बच्ची के रूप में सवार हुई थी। सिंघा पर बैठते ही वनपुत्री ने जय भवानी का पुनः घोष किया और सिंघा ने लगाई गगनभेदी दहाड़। सामने खड़े कल्लन खां को वनपुत्री अब साक्षात रणचंडी प्रतीत होने लगी। शत्रु सेना को रौंदते हुए सिंघा पर सवार वो कल्लन खां की ओर दौड़ी। कल्लन ख़ाँ हाथी पर सवार था। वो होदे में दुबकने लगा। सैनिकों ने कल्लन खां को बचाने के लिए तीर और भाले चला दिए। तीर और भाले वनपुत्री और सिंघा के शरीर को भेदने लगे। लेकिन सिंघा  के कदम न रुके। दौड़ते हुए सिंघा कल्लन खां के निकट पहुंच गया। उसने एक लंबी छलांग भरी और हाथी के मस्तक पर पंजे टिका दिए। वनपुत्री ने तलवार चला दी । कल्लन खां होदे में दुबक कर बच गया। इसी के साथ सिंघा हाथी के मस्तक से पुनः उछला और वनपुत्री ने दूसरे हाथ में थमी तलवार घूमा दी। इस बार न बच सका कल्लन खां। अगले ही पल कल्लन खां का सिर हवा में उड़ता हुआ ज़मीन पे लोटने लगा। सुल्तान की सेना में भगदड़ मच गई। वनपुत्री की प्रतिज्ञा पूर्ण हुई। उसका प्रतिशोध पूरा हुआ।

सिंघा के पैर जमीन पे आ टिके।  सिंघा और वनपुत्री बुरी तरह घायल ... भूमि पर गिर पड़े। सुल्तान की सेना मैदान छोड़ कर  भाग रही थी। 

वनपुत्री का रक्त भूमि पर बहने लगा। रणपुर की भूमि ने मानो उसे अपनी हथेलियों में ले लिया। दोनों बहादुर पिता पुत्री ने अपने प्राण त्याग दिए। दोनो रणभूमि में ऐसे लेटे थे मानो पिता अपनी पुत्री को सुला रहा हो। 
इस वीरता पूर्ण  त्याग को रणपुर की भूमि सदैव याद रखेगी और गर्व करेगी।

"खून में लथपथ... बनी विजेता... आज धरा पर लेटी थी....
इतनी झुझारू... इतनी बहादुर... वो सिंघा की बेटी थी।"

हाँ वो सिंघा की बेटी थी।

समाप्त।
 

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