यह कोई डरावनी कहानी नहीं बल्कि कल्पना आधारित एक बाल कथा है। आशा है आपका भी मनोरंजन करेगी।
सिंघा की बेटी
खतरनाक बियाबान जंगल मे आधी रात को दौड़ता घोड़ा। घोड़े पे सवार एक व्यक्ति और 5 वर्ष की मासूम सी बच्ची।
घुड़सवार बुरी तरह घायल था। कभी भी उसकी जान जा सकती थी। कड़कती बिजलियाँ और तूफानी हवा के बीच दौड़ते उस घोड़े की शायद कोई मंज़िल नहीं थी।...
आखिर कौन था ये घुड़सवार...(फ्लेशबैक)
(राजस्थान का एक छोटा सा राज्य मोरगढ़। जिस पर आज छा रहे थे संकट के बादल। अपनी विशाल सेना लिए मोरगढ़ की तरफ बढ़ रहा था दिल्ली सल्तनत का एक तूफान। जिसकी अगुवाई कर रहा था सरदार अकरम खान।
मोरगढ़ के महाराजा वीर सिंह ने भी पूरी तैयारी कर रखी थी। दोनों सेनाओं में भीषण रण छिड़ गया। टक्कर भयानक थी। मोरगढ़ के रणबांकुरे संख्या में कम थे पर एक बार तो उन्होंने सुल्तान की सेना के पैर उखाड़ दिए। लेकिन ऐन वक्त पर महाराजा वीर सिंह के कुछ गद्दार सरदार अकरम खान के हाथों बिक गए। वीर सिंह इस गद्दारी के कारण जीता हुआ युद्ध हारने लगे। आखिरकार अपने विश्वस्त सरदारों द्वारा प्रार्थना करने पर वे नन्हीं राजकुमारी को लेकर पलायन कर गए। उनके सरदार उनकी रक्षा करते हुए बलिदान हो गए। ......)
अब महाराज को घायल अवस्था में लिए घोड़ा उस जंगल मे दौड़ा जा रहा था।...
आखिर एक जगह महाराज निष्प्राण होकर घोड़े से गिर पड़े। सवार के गिरते ही घोड़ा भी रुक गया। नन्हीं राजकुमारी भी घोड़े से गिर पड़ी। उसका रुदन जंगल के पेड़ों को कंपकंपा रहा था। तूफानी हवाएं भी उसके रुदन से दहल रही थीं। प्रकृति का ये निर्दयी रूप देखकर आसमान भी रो पड़ा।
अचानक एक सिंह की दहाड़ से गूंज उठी चारों दिशाएं। घोड़ा बिदक कर भाग गया। अब वो अकेली बच्ची उस बियाबान में एक सिंह के शिकार के रूप में खड़ी थी।
सिंह झाड़ियों के पीछे से निकला। धीरे धीरे राजकुमारी की तरफ बढ़ रहा था। बच्ची का रोना भय के मारे और तेज हो गया। उसके पैर जड़ हो गए। सिंह उसके बिल्कुल करीब आ चुका था। एक तेज दहाड़ के साथ वो गरजा। बच्ची ने अपना अंत जानकर आंखे बंद कर ली ।
लेकिन आश्चर्य... वो खूंखार सिंह,... जिसकी आंखों में अभी वहशियत नाच रही थी,.. अचानक शांत हो गया। वो उस बच्ची को शांत भाव से देखने लगा। शायद उसके मन में कोई भावना सी जगी और उसने उस बच्ची को प्रेम से चाटना शुरू कर दिया। ये किसी चमत्कार से कम न था। नन्ही राजकुमारी अब धीरे धीरे शांत होने लगी। सिंह उसके पास बैठ गया। और अपने कंधे उनके आगे झुका लिए। बच्ची ने इशारा भांप लिया और उस पर सवार हो गयी। सिंह उस बच्ची को लेकर घने जंगल में गुम हो गया।
ये सिंह... जिसे जंगल के सारे जानवर सिंघा के नाम से जानते थे। जो अपने शौर्य के लिए पूरे जंगल में प्रसिद्ध था। कोई प्रतिद्वन्दी अब तक उसके आगे टिक नहीं पाया था। अपने यौवन के प्रथम चरण पे खड़ा ये बलिष्ट सिंह अब उस नन्ही राजकुमारी का रक्षक बन गया था। शीघ्र ही पूरे जंगल मे ये खबर फैल गयी कि सिंघा ने एक मानव बच्ची को अपनी बेटी बना लिया है। कोई जानवर उस नन्हीं बच्ची की तरफ आंख उठाकर भी नहीं देखता था। वो बेखौफ होकर जंगल मे स्वच्छंद विचरण करने लगी। नन्हीं गिलहरियों से लेकर भयानक जानवर भी उसके मित्र बन गए। वो अब जानवरों के बीच रहके उनकी बोली समझने लगी। धीरे धीरे सिंघा की छत्र छाया में वो जंगली जीवन मे घुलने मिलने लगी। सिंघा उस से बहुत अधिक स्नेह करने लगा। वो सच मे उसे अपनी बेटी ही मानने लगा। एक पिता की भांति उसे शिकार करना, अपनी रक्षा करना और जंगल के तौर तरीके सिखाता। राजकुमारी भी पारंगत होती गयी। समय पंख लगाकर उड़ता जा रहा था। राजकुमारी हिरनियों के साथ खेलती, पक्षियों से बतियाती धीरे धीरे बड़ी हो रही थी। जंगल मे रहते हुए भी उसमें जंगलीपन नहीं आया था। स्वभाव में गंभीरता, कोमलता, जीवों के प्रति दया जैसे गुण शायद उसको 5 वर्ष तक मिले संस्कारों के कारण उसमें अभी भी विद्यमान थे। उसके अवचेतन मन में कुछ पुरानी छवियां छपी हुई थी। वो नहीं जानती थी कि वो कौन है पर कुछ धुंधली यादें कभी कभार उसके मस्तिष्क में छा जाती।
वो खुद को सिंघा की बेटी ही मानती थी। राजकुमारी अब सयानी होने लगी।... उसकी सुंदरता भी एक राजकुमारी की ही तरह निखरने लगी।
एक दिन राजकुमारी जंगल में हिरन के बच्चों के साथ अठखेलियाँ कर रही थी कि तभी उसकी नज़र एक मानव पर पड़ी। उस भयानक वन में कभी कोई मानव उसने नहीं देखा था। उस तरफ आने का साहस कोई मानव नहीं करता था। उसने पहली बार किसी मानव को देखा था। जो उसके जैसा था। उसके हाथ, पैर शरीर उसके जैसा ही था। वो उस मानव को देखकर आश्चर्य में पड़ गयी और छुप के उसे देखने लगी। वो मानव असल में रणपुर रियासत का राजकुमार परम सिंह था जो शिकार की तलाश में जंगल के उस घने हिस्से तक आ पहुंचा था। राजकुमारी उस सजीले नौजवान को देखकर आकर्षित हो गयी। वो समझ ही नहीं पा रही थी कि ये कौनसी भावना उसमे जन्म ले रही है। उसके मन में भय जगा.. कही सिंघा ने उस राजकुमार को देख लिया तो वो उसे मार डालेगा। यही सोचते हुए वो ओट से बाहर निकल आयी। शायद राजकुमार को किसी प्रकार सावधान करना चाहती थी। अब राजकुमार की दृष्टि भी राजकुमारी पर पड़ी। पत्तियों की वेशभूषा में ढंकी वो सुंदर वन कन्या.... उसे देखकर परम सिंह हतप्रभ रह गया। उसने राजकुमारी को पुकारा... " आप कौन है देवी?"
लेकिन वो क्या जवाब देती?? उसे इंसानी भाषा की समझ नही थी। वो इशारे से परम सिंह को भगाने लगी। परम् सिंह समझ नहीं पा रहा था। लेकिन आखिर वो वहां से चला गया।
अब दोनों ही एक दूसरे के बारे में सोचने लगे। राजकुमारी ने पहली बार इंसान देखा था... सजीला सा नौजवान। वो दोबारा उसे देखना चाहती थी। उधर राजकुमार भी जंगल मे मिली उस सुंदर युवती के बारे में सोच सोच कर हैरान हो रहा था। वो उसके बारे में जानने को उत्सुक था। वो भी उससे दोबारा मिलना चाहता था।
अगले ही दिन परम सिंह दोबारा उसी स्थान पर आ पहुंचा। राजकुमारी भी उत्सुकता वश पुनः उस स्थान की तरफ खींची चली आई। दोनों का आमना सामना हो गया। इस बार राजकुमारी ने उसे भगाया नहीं। वो जानना चाहती थी कि वे कौन है?? कहाँ से आया है??..
राजकुमार भी उस सुंदर वनकन्या के बारे में जानने को उत्सुक था। दोनों एक दूसरे को देखते हुए पास आ गए। राजकुमारी ने हाथ बढ़कर परम सिंह के चेहरे को छूकर देखा। परम सिंह भी उसे एकटक देखता रहा। थोड़ी ही देर में परम सिंह समझ गया कि ये वन कन्या मेरी बोली नहीं समझ सकती। वो भी इशारों में बात करने लगा। दोनों बिना बोले इशारों में बतियाने लगे.... हंसने लगे। राजकुमार अब रोज उससे मिलने उस स्थान पर आने लगा। दोनो काफी घुल मिल से गये थे। राजकुमारी का सौम्य स्वभाव परम सिंह को लुभा गया। राजकुमारी उसे अपने जंगल के दोस्तो से मिलाती। हिरण, गिलहरियां, पक्षी अब राजकुमार के आदि हो गए। उनका मिलना जुलना जारी रहा।
एक दिन जब राजकुमारी और परम सिंह साथ हंस खेल रहे थे अभी अचानक सिंघा उस ओर आ गया। उसने राजकुमारी को एक इंसान के साथ देख लिया। उसकी आँखों मे क्रोध उमड़ आया। किसी अनहोनी ने उसके मन को हिला के रख दिया। वो भयंकर गर्जना करते हुए परम सिंह की तरफ बढ़ा। परम सिंह ने भी तलवार खींच ली। सिंघा झपट ही पड़ता परम सिंह पर। तभी राजकुमारी दौड़ कर बीच मे आ गयी और सिंघा से रोती हुई याचना करने लगी।
उसे रोता देखकर सिंघा पीछे हट गया। वो समझ गया अब उसकी बेटी सयानी हो रही है। अब उससे बिछड़ने का वक़्त आ ही गया है। सिंघा ने राजकुमारी को दुलारते हुए कहा "बेटी... मैं जानता हूं... तुम एक मानव कन्या हो। वर्षो पहले मैंने तुझे इस जंगल में अकेली पाया था। मैं स्वभाव से हिंसक पशु हूँ लेकिन तुझे देखकर मेरी सारी हिंसा चली जाती है।शायद किसी जन्म में मैं सच में तेरा पिता रहा होऊंगा।... लेकिन अब मैं तुझे बांध के नहीं रख सकता।
अब मैं तुझे तेरा जीवन जीने के लिए मुक्त करता हूँ। शायद अब तेरा साथ इस युवक के साथ ही लिखा है। जा... बेटी...लेकिन अपने इस पिता को सदा याद रखना... जीवन में कभी भी ज़रूरत पड़ी तो तेरा पिता तेरी सहायता के लिए मौजूद रहेगा। अब जा....." भीगी पलकें लिए सिंघा जंगल की और लौटने लगा। राजकुमारी दौड़ के सिंघा के गले लग गई। उसकी आँखों से भी अश्रुधारा फुट पड़ी। किसी पिता द्वारा अपनी पुत्री की ऐसी विदाई उस जंगल ने पहले नहीं देखी थी। जंगल का हर पशु, हर पक्षी आज उदास था।
परम सिंह उनके वार्तालाप को तो नहीं समझ पाया लेकिन परिस्थिति को समझ गया। उसने राजकुमारी की तरफ अपना हाथ बढ़ाया। राजकुमारी ने परम सिंह का हाथ थाम लिया।
राजकुमार परम सिंह राजकुमारी को लेकर अपनी रियासत में आ पहुंचा। जहां ढोल नगाड़ों के साथ उनका स्वागत किया गया। राजकुमार बहू लेकर पधारे है इस समाचार को सुनकर पूरा नगर झूम उठा। महाराज ने भी बहू को अपनाते हुए विधि पूर्वक उनका विवाह करा दिया। पूरे राज्य में उत्सव मनाया गया। अब राजकुमारी जंगल से महलों में आ गई थी। कुछ ही समय में उसने महल के तौर तरीकों को समझ लिया। राजकुमार ने उसका नाम 'वनपुत्री' रख दिया। राजकुमार के प्रेम और सम्बल से उसने वहां की बोली भी सिख ली। 1-2 वर्षों में ऐसा लगने लगा मानो वो राजकुमारी जंगल से नहीं बल्कि किसी रियासत से ब्याह के लायी गयी हो। उसके अंदर नैसर्गिक राजसी गुण विद्यमान थे। राजकुमारी वनपुत्री को शस्त्र विद्या सीखने का बहुत शौक था। शायद बहादुरी का ये गुण उसके पिता से विरासत में मिला था उसे। राजकुमार ने उसके लिए शस्त्र विद्या सीखने का पूरा बंदोबस्त के दिया। कई बार राजकुमार खुद उसके साथ शस्त्र विद्या का अभ्यास करता। जल्दी ही वनपुत्री हर प्रकार के शस्त्र चलाने में पारंगत हो गयी। राजकुमार उसका कौशल देख कर दंग था। इस दौरान सिंघा काजू नाम के तोते को वनपुत्री के पास भेजकर उसके हाल चाल जानता रहता। काजू अक्सर सिंघा को राजकुमारी के शस्त्र कौशल की बाते सुनाता। जिसे सुनकर सिंघा का सीना फूल जाता। उसे अपनी बहादुर बेटी पर गर्व था। सिंघा अब बूढा हो रहा था। वो ये जानकर निश्चिंत था कि उसकी बेटी सुखी है। समय बीतने लगा... महाराज की अकस्मात मृत्यु हो जाने पर राजकुमार परम सिंह अब महाराज बन गए। राजकुमारी वनपुत्री अब रणपुर की महारानी बन गयी। आनंद से जीवन व्यतीत हो रहा था।
अचानक एक दिन महाराजा परम सिंह के दरबार में एक दूत का आगमन हुआ।
"महाराज की जय हो।" दूत अभिवादन करते हुए परम सिंह के सामने झुक गया।
"कहो क्या कहना चाहते हो।" परम् सिंह बोले।
"महाराज!... मैं अपने सुल्तान की तरफ से एक पैगाम लेकर आपके सामने पेश हुआ हूं।... "
"हाँ... आगे बोलो...!" परम सिंह ने कहा।
"महाराज... हमारे सुल्तान पूरे हिंदुस्तान पर एक हुकूमत चाहते हैं। वो चाहते हैं कि आप अपनी रियासत समेत उनकी पनाह में आ जाये। बदले में आपको और आपकी रियासत को महफूज़ रखा जाएगा। और..."
"बसssss....." महाराज परम सिंह चिल्ला उठे। फिर बोले, " अगर हम इनकार कर दे तो।??"
"तो.. महाराज आपकी रियासत मिट्टी में मिला दी जाएगी... तबाही का खेल शुरू होगा.. और आपकी हस्ती मिटा दी जाएगी। और..... "
"और क्या...????" परम सिंह ने क्रोध से कांपते हुए पूछा।
" और... (दूत लड़खड़ाते स्वर में बोला....)... और महाराज....हमारे सुल्तान ने कहलवाया है कि अगर आपने ये फरमान नहीं माना तो.... महारानी वनपुत्री को..."
"खामोश... दुष्टsssss!!!... महारानी का नाम अपनी जिव्हा पर लाने की धृष्टता न करना।" ये कहते हुए महाराज ने तलवार खींच ली। इसी के साथ पूरे दरबार मे तलवारे खींच गयी।
दूत कांप उठा। "महाराज... बन्दा सिर्फ अपने मालिक का हुक्म बजा रहा है।"
"अगर तू दूत न होता तो तेरी गर्दन आज यहां हमारे चरणों मे लोट रही होती।... इसी पल दरबार से निकल जाओ और अपने सुल्तान से कह देना कि रणपुर को भयभीत करने की चेष्टा न करें। हम तलवारों के साये में ही जीने वाले लोग हैं। अगर अपनी भलाई चाहते हो तो इस ओर रुख करने की कोशिश भी मत करना। अब निकल जाओ।" परम सिंह ने पूरे आवेश के साथ कहा।
दूत सरपट निकल लिया।
युद्ध की तो अब ठन ही चुकी थी। रणभेरियाँ बज उठी। सल्तनत का लाव लश्कर अब रणपुर की तरफ बढ़ने लगा।
विशाल सेना... मानो पूरा इंसानी समुद्र रणपुर की ओर बढ़ा चला आ रहा हो।
कहानी जारी है......
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