आदमखोर टापू से वापसी
सन 1987....
भारतीय खुफिया एजेंसी का सबसे जांबाज़ कमांडो गरुड़ इजिप्ट में अपना खुफिया मिशन सफलता पूर्वक पूरा कर के वापस स्वदेश लौट रहा था। 65 पैसेंजर्स को लेकर हवा में तैर रहा वो विमान अचानक झटके खाने लगा।
यात्रियों के चेहरों पर हवाइयां उड़ने लगी। कॉकपिट में बैठे पायलट विमान से कंट्रोल खोने लगे। कंट्रोल रूम के स्पीकर पर 'मे डे'... 'मे डे' की घबराहट भरी आवाज उभरने लगी। विमान भारी खतरे में था। विमान का स्टाफ पैराशूट लेकर दौड़ पड़ा। यात्रियों को पैराशूट देकर विमान से बाहर कूद जाने के निर्देश दिए जाने लगे। कमांडो गरुड़ सहित 25 यात्री पैराशूट लेकर कूद चुके थे। तभी एक भयानक धमाके के साथ विमान के परखच्चे उड़ गए।
"उफ... काश में उन यात्रियों को बचा सकता।" निराश मन से विमान के गिरते जलते टुकड़ों को देखता हुआ नीचे उतरने लगा कमांडो गरुड़। 25 में से 10 यात्री सीधे समुद्र में जा गिरे थे। अभागे थे ... शार्कों का निवाला बन गए। 15 लोग उतरे समुद्र में उभरे एक छोटे से टापू पर। घनी हरियाली से घिरा वो टापू बहुत ही मनोरम प्रतीत हो रहा था। जान में जान आई उन लोगों की। अपने आप को बहुत खुशकिस्मत समझ कर हर्षित हो रहे थे। कमांडो गरुड़ भी उन 15 लोगों की तरह ही भाग्यशाली था जो उस टापू पर सुरक्षित उतर गया। लेकिन सभी लोग काफी दूर दूर थे... उन्हें ये नहीं पता था कि उनकी तरह कितने लोग सुरक्षित उतर सके हैं। अब हर कोई खुद को ज़िंदा और सही सलामत अपने देश पहुंचने की दुआ करने लगा।
रात घिर आई। सभी लोग अपने - अपने लिए महफूज ठिकाना ढूंढने लगे। कुछ लोग पेड़ों पर चढ़ गए। कुछ लोगों ने गुफाओं में शरण ली। कमांडो गरुड़ टापू के किनारे पर उतरा था। वहीं एक ऊंची टीलेनुमा चट्टान पर चढ़ कर रात काटने की सोची उसने। चट्टान काफी सुरक्षित थी। उस पर चढ़ना हर किसी के बस की बात नहीं थी। उस वीरान टापू पर सन्नाटा सा पसरा था। रात के वक़्त में पक्षियों की आवाज भी खामोश हो चुकी थी। समुद्र की गर्जना और हवा की सरसराहट के अलावा कुछ सुनाई नहीं दे रहा था। एकाएक उस शांत टापू पर हलचल होने लगी। एक दुर्गंध सी फैलने लगी हवा में। 'उफ्फ... ये कैसी बदबू है।" पेड़ पर चढ़ा एक व्यक्ति नाक पर हाथ रखते हुए बुदबुदाया। तभी उसकी आंखे फटी की फटी रह गयी।
उसने देखा एक बदबूदार साया ज़मीन पे गिरी सुखी टहनियों को रोंदता हुआ धीमी गति से उस पेड़ की तरफ बढ़ रहा था।
धीरे - धीरे वो साया निकट आता जा रहा था। उसके गले से धीमी गुर्राहट निकल रही थी। चांदनी रात में जब वो साया स्पष्ट हुआ तो पेड़ पे चढ़े उस व्यक्ति के होश फाख्ता हो गए। बुरी तरह सड़ी - गली बैंगनी पड़ चुकी वो लाश अब पेड़ के नीचे आ कर रुक गयी। गुर्राहट का स्वर तेज हो रहा था। पेड़ पर चढ़ा व्यक्ति घिघियाकर चीख पड़ा। उस भयानक लाश ने पेड़ को जोर से हिलाना शुरू किया। पेड़ जोर से झटके खाने लगा मानो उखड़ ही जायेगा। वो व्यक्ति आम की तरह नीचे आ टपका और बेहोश हो गया।
इसी तरह के हालातों का सामना सभी लोगों को करना पड़ रहा था। गुफाओं में ... पेड़ों पर... कहीं कोई सुरक्षित नहीं था। टापू पर ऐसी कई सड़ी गली बदबूदार लाशें फैल गयी थी। एक एक जगह से लोगों को खींच खींच कर निकाल लिया गया।
कुछ लाशें तट तक भी आ पहुंची थी। भयानक बदबू और गुर्राहटों ने चट्टान पर बैठे कमांडो गरुड़ का ध्यान खींचा। गरुड़ ने देखा चांदनी रात में 4 भयानक बदबूदार लाशें तट की तरफ बढ़ रही थी। वो हैरान था... उसके माथे पे भी पसीना चमक उठा वो भयावह दृश्य देखकर। गुर्राती हुई बैंगनी मौत इधर उधर भटक रही थीं। गरुड़ उस ऊंची चट्टान के ऊपर चिपक कर लेट गया। कुछ देर बाद उसे वो बदबू और गुर्राहटे दूर जाती प्रतीत हुई।
कमाण्डो गरुड़ को कुछ समझ मे नहीं आ रहा था। दिमाग सांय - सांय कर रहा था उसका। "आखिर क्या रहस्य है ये?" मन ही मन सोचने लगा वो।
पूरी रात जागते बिताई उसने। जैसे तैसे सुबह हुई। रात वाली घटना सपना सा लग रही थी उसे। चट्टान से नीचे उतरा वो।
गरुड़ अब रात वाले रहस्य का पता लगाने की ठान चुका था। वो उस घने जंगल मे जाने का मन बना रहा था। लेकिन वो एकदम निहत्था था। ऐसे में उस खतरनाक जंगल में प्रवेश करना मौत को दावत देना था। उसने पहले तटीय इलाके का निरीक्षण करने की सोची। तट पर घूमते हुए उसे कुछ पुराने टूटे हुए जहाज दिखाई दिए। वो उन जहाजों की तरफ सावधानी पूर्वक बढ़ा। जहाज में उसके काम की कई चीजें मौजूद थी। एक जहाज में तेल के भरे ड्रम थे। एक जहाज में मोटे कपड़े के थान मिले। और भी कई ज़रूरी चीजे उसे मिल गयी। एक टूटे जहाज की लकड़ी से उसने मजबूत धनुष और बाण तैयार किये। 2-4 पुराने हारपून मिल गए। बाणों पर उसने तेल से भीगे कपड़े के टुकड़े बांध दिए। लाइटर उसके पास पहले से मौजूद था।वो तैयारी कर चुका था। दोपहर का वक़्त हो चला था। वो प्रवेश कर गया उस मौत के जंगल में।
पूरा जंगल एकदम शांत था। रात को गूंजने वाली गुर्राहटे अब सुनाई नहीं दे रही थी। मानो कुछ हुआ ही ना हो। चलते चलते वो पहुंच गया टापू के बीचों बीच बनी एक विशाल गुफा के आगे। वही बदबू तैरने लगी हवा में। गरुड़ सावधान हो गया।
गुफा में प्रवेश करने से पहले आस पास की टोह लेने लगा वो। उसके पास कुछ ही घण्टे थे। वह गुफा में घुसने ही वाला था कि एक आवाज ने उसका ध्यान खींचा। धीमी सी पुकार थी वो। उसने आवाज की तरफ नजर घुमाई तो देखा एक आदमी इशारे से उसे बुला रहा था। गरुड़ हैरान रह गया उस टापू पर जीवित आदमी देख कर। वो फौरन उसकी तरफ दौड़ा।
" तुम कौन हो?? और यहां क्या कर रहे हो??" कमांडो गरुड़ ने हैरत से पूछा।
"मेरा नाम लुई है। कल जो प्लेन क्रैश हुआ था उसी से बचकर उतरा हूँ मैं। यहां पास ही एक छोटा सा पुराना केम्प नुमा केबिन सा बना हुआ है। मैं रात को उसी में छुप गया था। मैंने देखा कि रात को कुछ भयानक शैतान गुर्राते हुए इधर उधर घूम रहे थे। वो उस केबिन के पास भी आये। लेकिन मैंने केबिन अंदर से बंद कर रखा था। वो बस इधर उधर घूम कर चले गए। शायद उन्हें मेरी भनक नहीं लगी होगी। सुबह जब मैंने केबिन की तलाशी ली तो कुछ सामान मिला। एक बैग जिसमें कुछ कपड़े, कैमरा और ये डायरी मिली। देखो इसे और पढ़ो।"
गरुड़ वो डायरी पढ़ने लगा। "मेरा नाम थॉमस है। मैं फ्रांस का रहने वाला हूं। मैं मेरी एक बोट लेकर इस टापू की खोज में निकला था। इस टापू के बारे में मैंने एक नाविक से सुना था। उसने मुझे इस टापू में कई रहस्य छुपे होने की बात कही। जिसमें एक रहस्यमय केमिकल का जिक्र भी था। जिसे पी लेने से इंसान कभी नही मरता। यही सोच कर मैं यहां तक पहुंचा था कि इन रहस्यों का पता लगाऊंगा और अगर ऐसा कोई केमिकल मिला तो उसे दुनिया के सामने लाऊंगा। इस टापू तक पहुंचना बहुत मुश्किल था। ये किसी समुद्री मार्ग के रास्ते में नहीं पड़ता इसलिए दुनिया की नज़रों से ओझल है। किसी नक्शे पर इसका कोई उल्लेख नहीं है। बड़ी मुश्किल से भटकते हुए जब मैं इस टापू पर पहुंचा तो ये एकदम शांत था। मैं और मेरे दो साथियों ने मिलकर यहां कैम्प लगाया और खोज में निकल गए। उस नाविक ने हमे इस टापू पर शैतानों का कब्ज़ा होने की बात कही थी लेकिन हमने इस बात को गंभीरता से नहीं लिया। लेकिन जब अंधेरा हुआ और हम कैम्प की तरफ लौट रहे थे... तब अचानक दुर्गंधफैलने लगी। हम समझ नहीं सके कि इतनी बदबू अचानक कहाँ से आने लगी। तभी टापू भयानक गुर्राहटों से गूंजने लगा। हमारे हाथ मे टॉर्च थी। उसकी रोशनी में देखा तो सच में कुछ भयानक शैतान हमारी ओर बढ़ रहे थे। हम चिल्लाते हुए भागे। मेरे दोनों साथी उनका शिकार बन गए। मैं जैसे तैसे कैम्प तक पहुंच गया।
गरुड़ ने पन्ना पलटा और बोला "इस डायरी के हर पन्ने पर अलग अलग डेट लगी है। यानी ये जो कोई भी था यहां काफी समय तक रहा।"
"अब आगे पढ़ो।" लुई बोला।
"हम्म।। " गरुड़ आगे पढ़ने लगा। " अगले दिन मैं ये टापू छोड़ने का मन बना चुका था। मैं यहां से तुरंत भाग जाना चाहता था। जब दिन निकला तो मैं कैम्प से बाहर आया। धीरे-धीरे डरते - डरते मैं किनारे तक पहुंचा लेकिन... मेरी बोट वहां नहीं थी। मैं इस टापू पर कैद हो के रह गया हूं ... इन शैतानों के बीच।"
गरुड़ हर पन्ना तेजी से पढ़ने लगा। "मैंने एक बात जान ली है... ये शैतान सूरज की रोशनी में बाहर नहीं निकलते। दिन में टापू एकदम शांत और सुहावना लगता है। लेकिन रात होते ही यहां मौत का तांडव होने लगता है। इस टापू पर कोई जीवित प्राणी नहीं मिलता क्योंकि जो भी यहां आता है वो इन भयानक शैतानों का शिकार बन जाता है।"
"पता नहीं मैं कब तक जीवित बच सकूंगा। मैंने इन शैतानों पर तीर, तलवार, गोली सब आजमा कर देख लिया। इन पर सभी हथियार बेअसर हैं। दिन में मैं इस टापू पर निर्भयता से विचरण करता हूं। अब मैं इस टापू को जान ने लगा हूँ। दिन में मैंने घूम घूम कर इस टापू के कई रहस्यों का पता लगाया है। ये शैतान टापू के बीच स्थित एक बड़ी गुफा में सोये रहते है। मैंने कई बार सोचा कि आखिर इस टापू पर ये शैतान आये कहाँ से?? इन्हें मारा कैसे जा सकता है?? लेकिन कई दिनों तक मुझे इसका उत्तर नहीं मिल सका। आखिर मैंने उस गुफा के अंदर जाने की ठान ली। मैं इस तरह की ज़िंदगी से वैसे भी तंग आ चुका हूं। अब मैंने आर या पार की ठान ली है।"
"आज रात को मैं उस गुफा में जाने की सोच रहा हूँ। मैं जानता हूं... कि मेरा ये फैसला मेरी निश्चित मौत है। लेकिन अब और नहीं... या तो मैं इस रहस्य का पता लगा कर ही रहूंगा या मारा जाऊंगा।"
"ओह... आगे के कुछ पन्ने गल से गये हैं। लेकिन चिंता मत करो। थोड़ा ध्यान से देखो तो पढ़े जा सकते हैं।" गरुड़ ध्यान से उन पन्नों को पढ़ने की कोशिश करने लगा। "कुछ कुछ टूटा फूटा समझ मे आ सकता है। सुनो..."
"मैं बड़ी मुश्किल से बचते बचाते रात को उस गुफा में पहुंचा। रात को गुफा खाली थी। मैं आराम से अंदर पहुंच गया। मुझे एक झरने की आवाज आने लगी। मैंने मशाल जला ली। मैंने ध्यान से उस गुफा का अवलोकन किया। दीवारों पर शिकार के चित्र कुरेदे हुए थे। जैसे पुराने कबिले बनाते थे। गुफा के अंदर ही एक प्राचीन भयानक मूर्ति सी बनी है। मूर्ति के आगे कुछ ऐसे आकार बने थे मानो वहां बलि चढ़ाई जाती होगी। इस से ये साबित होता है कि ये शैतान किसी कबिले के रहे होंगे। और वो कबिला ज़रूर आदमखोर था। गुफा में जगह जगह मांस के टुकड़े और हड्डियों के ढेर बिखरे पड़े थे।
फिर मैं उस झरने की तरफ बढ़ने लगा। बड़ा अजीब सा पानी था उस झरने का। गाढ़ा सा... हरे रंग का। तभी मेरे दिमाग में एक विचार कौंध गया। उस नाविक ने जिस अमरता वाले केमिकल का जिक्र किया था... कहीं वो यही तो नहीं।??? मेरा दिमाग भन्ना गया। मैंने एक जबरदस्त रहस्य ढूंढ लिया था। मैंने तुरंत वो केमिकल अपनी पानी की बोतल में भरा और सरपट भाग लिया। बड़ी मुश्किल से बचते बचाते मैं केबिन तक पहुंचा।"
"आज मेरा दिमाग शांत नहीं है। सवालों और खयालो की बाढ़ सी आई हुई है। हो सकता है ये मामूली झरना रहा होगा और किसी तरह कुछ रसायन अचानक से मिल गए होंगे। इन लोगों ने वो पानी पिया होगा और अमर हो गए। न जाने कितने सालों से ये लोग ऐसे ही ज़िंदा शैतान बने घूम रहे हैं। मैं ये पानी पिउ या नहीं??? "
"ओह... डायरी में इसके आगे कुछ पढ़ा नहीं जा रहा।। और इसके आगे सिर्फ एक पन्ना और लिखा है। वो भी पूरी तरह गल चुका है। आगे के पन्ने बिल्कुल कोरे हैं। यानी ये डायरी का आखिरी पेज था जो उसने लिखा था। .......
उफ... क्या हुआ होगा उस आदमी का??? क्या उसने पानी पी लिया होगा?? अब वो आदमी कहाँ है?? क्या वो इस टापू से निकलने में कामयाब हुआ???" कमांडो गरुड़ मन ही मन सोचने लगा। फिर गरुड़ गंभीर स्वर में बोल पड़ा "लुई... डेट से ये पता चलता है कि ये डायरी 30 साल पहले सन 1957 में लिखी गयी है और ये तो तय है कि इस टापू पर अब सिर्फ हम दोनों ही जिंदा बचे हैं..... और हमें अब सही सलामत इस टापू से निकलना है। इस डायरी ने हमारी काफी मदद कर दी है। अभी शाम होने में वक़्त है। हम आज की रात इसी केबिन में शरण लेंगे। मेरे पास यहां से निकलने का प्लान है लेकिन उस पर कल से काम शुरू करेंगे।" लुई भी मन ही मन समझ गया था कि उसे उस टापू से बाहर सिर्फ कमांडो गरुड़ ही निकाल सकता है। दोनों केबिन की तरफ बढ़ चले।
"हमे ये टापू छोड़ने से पहले इन शैतानों को खत्म करना होगा। वरना कभी ना कभी कोई और इनका शिकार बनेगा। ये भी हो सकता है कि ये शैतान कभी पूरी दुनिया के लिए खतरा बन जाये।"
"लेकिन हम इन्हें रोकेंगे कैसे। ये तो अमर हैं।" लुई ने पूछा।
"तुम समझे नहीं लुई। अमरता जैसी कोई चीज़ नहीं होती। ये अमर नहीं हुए हैं। बस ये केमिकल इनके शरीर को चलाये रख रहा है। जब शरीर ही नष्ट हो जाएगा तो ये भी खत्म हो जाएंगे।"
"तुमने देखा नहीं इनके शरीर कितने गल चुके है। ये केमिकल इनके शरीर के नष्ट होने की गति कम कर देता है। इनका शरीर कब का मर चुका। इनके अंग बहुत कम मात्रा में जीवित बचे हैं। दिमाग बहुत धीरे काम कर रहा है। यानी एक तरह से ये केमिकल इंसान को बहुत भयानक और धीमी मौत देता है। इंतेज़ार करवा - करवा कर। ये सब बस अब मौत का इंतज़ार कर रहे हैं।"
"फिर भी हम इन्हें खत्म कैसे करेंगे।??इन पर तो कोई हथियार असर ही नहीं करता।" लुई घबराते हुए बोला।
"अगर किस्मत ने साथ दिया लुई.. तो इन्हें इन्ही के हथियार से मार देंगे हम।"
गरुड़ के मन में कुछ योजना चल रही थी।
गरुड़ लुई की तरफ मुड़ा "लुई हमें थोड़ा सा वो केमिकल लेना होगा उस गुफा से।"
"नहीं नहीं... मि. गरुड़.. मैं उस बदबूदार मौत की गुफा में हरगिज़ नही जाऊंगा। वहाँ मौत के सिवाय कुछ नहीं है।" लुई चिल्ला के बोला। मौत का खौफ साफ झलक रहा था उसके चेहरे पर।
"चिंता मत करो लुई... मैं तुम्हे अकेला नहीं भेजूंगा उस गुफा में... मैं भी साथ रहूंगा तुम्हारे।थॉमस भी उस गुफा में गया था रात को और सुरक्षित लौट भी आया था। हमें बस वही रास्ता तलाशना होगा। जहां से होकर थॉमस गया था।"
लुई की हालत खराब हो रही थी ये सब सोच सोच के। लेकिन उसके पास और कोई चारा नहीं था। अगले दिन गरुड़ ने केबिन से लेकर गुफा तक का मुआयना किया। उसने देखा केबिन से गुफा की दूरी कुछ ज्यादा नहीं थी। केबिन थोड़ी ऊंचाई पर बना था। उसने गौर से देखा केबिन से लेकर गुफा तक खोखले तनो की एक सुरंग सी बनी थी जो थॉमस ने एक एक तने को जोड़ कर बनाई थी।
गरुड़ उछल पड़ा। "वाह.. कमाल का आदमी था ये थॉमस। यहां इतना समय व्यर्थ ही नहीं बिताया था उसने।"
दिन भर में अच्छे से साफ कर दी गयी वो अनोखी सुरंग।
"लुई आज रात हम इसी से पहुंचेंगे गुफा तक।"
अब रात घिरने का इंतज़ार करने लगे दोनों।
जैसे ही सूरज छिपा और गुफा में हलचल शुरू हुई। गुर्राते हुए बाहर निकले ज़िंदा नरभक्षी शैतान । कमांडो गरुड़ और लुई भी रवाना हो गए गुफा की तरफ। सुरंग में रेंगते हुए। आखिर वो पहुंच गए गुफ़ा के पास। गौर से देखा गरुड़ ने। शांति छाई हुई थी वहां। दोनों गुफा में प्रवेश कर गए। सीधा अंदर जा कर झरने से वो केमिकल लिया। गरुड़ ने तुरंत थोड़ा से केमिकल लिया और एक तरफ ले जाकर जला के देखा। चिंगारी लगते ही वो गाढ़ा द्रव भभक उठा।
मुस्कान खेल गयी गरुड़ के होठों पर। उसने फटाफट कुछ चट्टाने उठा कर झरने के कुंड में डालना शुरू किया। झरने का पानी चट्टानों पे गिर कर कुंड से बाहर बहने लगा। लुई भौचक्का सा देख रहा था सब कुछ। अब दोनों गुफा से बाहर की तरफ लपके और बाहर निकलते ही ठिठक कर रुक गए।
एक शैतान गुफा के मुहाने ही खड़ा था। दोनों की सांस हलक में अटक गई। लेकिन वो शैतान उन पर झपटा नहीं। बल्कि वो शून्य में ताकता हुआ खरखराती आवाज में बुदबुदा रहा था..."आई ssss एमssss थॉमस sssss.... रन - अवे ssss...." ये बड़बड़ाता वो पास ही झाड़ियों में खो गया।
"ये... ये... क्या बड़बड़ा रहा था??" लुई डरते हुए बोला।
गरुड़ धीमे से बोला.." ये ज़रूर थॉमस है लुई... इसने वो केमिकल पी लिया होगा। बहुत बड़ी कीमत वसूल करता है ये केमिकल.... अमर बनाने की।... लगता है ये केमिकल दिमाग की पूरी ऊर्जा चूस लेता है। और उस ऊर्जा को धीरे धीरे शरीर के अंगों को देता है। बहुत खतरनाक और धीमी मौत देता है ये इसे पीने वाले को।"
"लेकिन इसने हम पर हमला क्यों नहीं किया।??" लुई ने आश्चर्य से पूछा।
"इसका एक ही कारण हो सकता है... थॉमस आदमखोर नहीं था... इसलिए इसने हम पर हमला नहीं किया और पेड़ की पत्तियां आदि खाकर भूख मिटाता हो। लेकिन केमिकल के असर से दिमाग ने काम करना बंद कर दिया होगा और भटकता हुआ ये इन दरिंदो में घुल मिल गया होगा। बहुत हल्की याददाश्त बाकी लग रही है इसमें।"
"अब यहाँ से फ़ौरन निकलो।" लुई चिल्लाया।
इधर कुंड से बाहर बहता वो रहस्यमय द्रव पूरी गुफा में फैल चुका था। दोनों भाग कर केबिन में जा छुपे और सुबह का इंतज़ार करने लगे।
दिन निकलते ही गरुड़ लुई को लेकर तट की तरफ चल पड़ा।
"लुई अब हमें इस टापू से निकलने का इंतज़ाम करना है। अब उसी प्लान पर काम करना है।"
"पर मि. गरुड़... प्लान क्या है??" लुई ने पूछा।
"सुनो... " गरुड़ उसे प्लान समझाता चला गया।
टूटे जहाज से कपड़े के थान निकाले उसी जहाज में सुई धागे भी मिल गए उन्हें। टापू पर घूम कर पैराशूट ढूंढे। तटीय इलाके को पूरा छान मारने के बाद एक छोटी टूटी हुई छोटी बोट मिल गयी उन्हें।
" बस अब हमें जल्दी जल्दी काम करना होगा लुई।" गरुड़ बोला।
"इन पैराशूट और कपड़े को सील कर बड़ा बलून तैयार करना है हमे। बाकी कपड़ो के थान से रस्सियां बनानी है। उन से बोट और बलून को बांध देना है।जितने आयल ड्रम ले सकते हैं साथ लेने हैं.... "
गरुड़ के प्लान के अनुसार काम करते करते शाम ढलने तक जुगाड़ से एक हॉट एयर बलून तैयार हो चुका था। तेज हवा की दिशा को ध्यान में रखते हुए बलून में हवा भरी जाने लगी... कपड़े के थानों से आयल ड्रम में बड़ी बड़ी बत्तियां बना कर डाल दी गयी थी।अब उन्हें जलाकर बलून में हवा भरनी शुरू की।
बलून में हवा भर चुकी थी। कपड़े की बत्तियां चिमनी की तरह जल रही थी। गुब्बारे में भरी हवा गर्म होते ही गुब्बारा धीरे धीरे उपर उठने लगा। लुई को बलून के पास छोड़ कर गरुड़ अब वापस गुफा की तरफ जाने लगा।
"मि. गरुड़ हम एक छोटी मोटी बोट तैयार कर के समुद्र के रास्ते भी यहां से निकल सकते थे। फिर इतना ताम झाम क्यों किया हमने??" लुई ने झुंझलाते हुए पूछा।
"लुई...इसका जवाब मैं लौट कर दूंगा तुम्हे। अब मैं अब उन शैतानों को एकसाथ खत्म करने जा रहा हूँ। हो सकता है मेरे इस कदम से पूरा टापू नष्ट हो जाये। तुम अलर्ट रहना। मैं जल्दी ही लौट आऊंगा।"
अपने साथ अपना धनुष और तीर लेकर चल पड़ा गरुड़ उस गुफा की तरफ। इधर गुफा पूरी तरह उस द्रव से तर हो चुकी थी। रात का अंधेरा फैलने लगा था। गुफा गुर्राहटों से गूंज उठी। किसी भी पल वो शैतान बाहर निकलने वाले थे। गरुड़ ने कुछ दूरी से धनुष पर तीर चढ़ाया तेल से भीगा कपड़ा तीर के आगे बंधा था। उसने फ़ौरन कपड़े में आग लगाई और चला दिया गुफा की तरफ। तीर सीधा उड़ता हुआ उस गुफा में जा गिरा और... एक भयंकर झमाके के साथ पूरी गुफा सुलग उठी। गरुड़ तेजी से तट की तरफ भागा। जलते हुए शैतान गुर्राते हुए गुफा से बाहर की ओर भागने लगे। आग उस कुंड तक जा पहुंची और एक धमाके के साथ गुफा उड़ गई। इसी के साथ पूरे टापू पर गड़गड़ाहट के साथ भूकम्प से आने लगा। ज़मीन टूटने लगी। टापू समंदर में समाने लगा। गरुड़ तेजी से बलून की तरफ दौड़ने लगा। टापू पानी मे डूबता जा रहा था। गरुड़ तेजी से बलून तक पहुंच गया। रस्सी से बंधा बलून बोट सहित हवा में तैर रहा था। लुई बोट पर सवार था। कमांडो गरुड़ ने रस्सी काट दी और उसे पकड़ कर ऊपर चढ़ता हुआ उड़ती बोट पर जा पहुंचा। दोनों अब सुरक्षित थे। टापू को समुद्र में समाते हुए देख रहे थे। बलून धीरे धीरे उस आदमखोर टापू से दूर जा रहा था। देखते देखते वो रहस्यमय टापू पूरी तरह समुद्र में समा गया। और उस जगह पर एक खतरनाक भंवर उठने लगा।
"देखा लुई.. अगर हम किसी छोटी जहाज का सहारा लेकर यहां से निकलने का प्रयास करते तो ये भंवर हमे खींच लेता। इसलिए मैंने यहाँ से निकलने के लिए ये तरीका चुना।"
"यानी आपने ये सब अनुमान पहले ही लगा लिया था... मान गए मि. गरुड़ आपको।" लुई खुशी से चिल्लाते हुए बोला। बैलून धीरे धीरे उस जगह से ओझल होता गया।
नरभक्षी टापू पूरी तरह नष्ट हो चुका था और वो भयानक आआदमखोर शैतान भी...... शायद...!
समाप्त !!
वाह वाह वाह❤️🙏
ReplyDeleteThank u
Deleteबहुत बढ़िया।पढ़ते समय उत्सुकता और रोमांच धीरे 2 बढ़ रहा था।टापू के बारे में जानना और उसका रहस्य बहुत सस्पेंस बढ़ा रहा था।गरुड़ के साहस और अक्लमंदी से बचना।आदमखोर से बचना और तरकीब लगाना!....वाह गज्जब कर दिया।80s और 90s के दशक के दहशत और भय का अनुमान हुआ पढ़ते समय।एक लाइन भी खाली नही गया पढ़ते समय।हर वाक्य रोमांच और भय का मिश्रण था।सचमुच बहुत हाहाकारी लेखन हुआ है लेखक द्वारा।आसमान में विमान,फिर विस्फोट,फिर गरुड़ का बचना,आदमखोर से पाला,टापू की सौम्यता दिन में और रात्रि की भयानकता रोंगटे खड़े कर रहा था।सबसे अच्छी बात यह थी कि समय ऐसे दमदार कथानक में बीती की बस मन कर रहा था और ऐसी कहानी पढ़ने मिल जाये तो गज्जब हो जाये।☺️😊👍👌💐
ReplyDeleteThank u so much
Deleteशानदार
ReplyDeletethank u
Deleteवाह ! ❤❤
ReplyDeletethank u very much
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