Wednesday, 20 January 2021

शार्ट कट पार्ट-1

इस कहानी का किसी जीवित या मृत व्यक्ति अथवा घटना से कोई संबंध नहीं है । यदि ऐसा होता भी है तो ये मात्र संयोग ही होगा।



कभी कभी ज़िन्दगी में कुछ ऐसी घटनाएं घट जाती हैं जो सच होकर भी सच नहीं लगती। कुछ ऐसा जिस पर चाह कर भी विश्वास नहीं किया जा सकता। ऐसा ही कुछ हुआ दो दोस्तों के साथ। एक जान से हाथ धो बैठा और दूसरा किसी को कुछ बताने लायक नहीं रहा....






(सन 1995)
दो दोस्त कमल और सुरेश। कमल एक बैंक में काम करता था और सुरेश एक प्राइवेट कंपनी में जॉब करता था। दोनो को किसी काम से शहर के बाहर दूसरे शहर जाना था। दोनों कमल की कार में रवाना हो गए। दूसरे शहर पहुंचने की जल्दी थी और रात  भी ज्यादा हो गयी थी। दोनों ने शहर जाने के लिए शॉर्टकट चुना जिसका इस्तेमाल पिछले 20 सालों में बहुत कम होने लगा था।
रात को तो लोग उस रास्ते से गुजरने की सोच भी नही सकते थे।कुछ अफवाहें भी उड़ चुकी थी उस रास्ते के बारे में। अब उस रास्ते पर मनहूसियत का ठप्पा सा लग चुका था।
दोनों इस बात को दरकिनार कर उस रास्ते पर निकल पड़े। जल्दी जो पहुंचना था। न कोई बस्ती न कोई वाहन, एक दम सुनसान रास्ता। बीहड़ इलाका। चारों तरफ घनी झाड़ियां। झींगुरों की तेज़ आवाजें। यदा कदा चीखते उल्लू। ऐसे में दो लोगों को लिए हिचकोले खाती गुजरती हुई एक कार। उबड़ खाबड़ सा रास्ता। तभी कार एक झटके के साथ खड़ खड़ की आवाज के साथ रुक गयी।खर्रर... खर्रर्र.. खर्रर्र ssss...! खर्रर्र... खर्रर... खर्ररssss...!! पुनः कार स्टार्ट करने की नाकाम कोशिश। कार की आवाज बन्द हो चुकी थी। चारों तरफ सन्नाटा। सुरेश ने घड़ी देखी 12:36 बजे थे। कार के बाहर देखा दोनों ने, चांद की रोशनी फैली थी हल्की सी।
ऊंचे ऊंचे दानवाकार पेड़, रहस्यों की दुनियां सी लगने वाली घनी झाड़ियां। उल्लुओं की डरावनी तेज आवाजें। झींगुरों का तेज शोर।बीच बीच में सियारों का विलाप और सीटियों सा शोर मचाती, पत्तो को खड़काती तेज हवा। ये माहौल किसी का भी खून जमा देने के लिए काफी था। दोनों कार मैं बैठे वक़्त को कोस रहे थे।"अब क्या कार मैं ही बैठे रहेंगे रात भर??"" सुरेश बोला। 
"तो क्या करूँ?" कमल ने झुंझलाकर जवाब दिया।
सुरेश -" करना क्या है!! नीचे उतर के देखते हैं क्या खराबी है।"
कमल स्वभाव से जरा डरपोक था, सकुचाते हुए बोला " नहीं नहीं मुझे नहीं देखना। सुबह देखेंगे। मैं तो कार मैं ही बंद रहना चाहता हूँ।"
"हुंह... डरपोक कहीं का!!" कहते हुए सुरेश कार से बाहर निकला और कार की खराबी जांचने लगा।
काफी देर बाद भी समझ में नहीं आया कि खराबी क्या है। झुंझला कर कार का बोनट जोर से बंद किया और इधर उधर मदद के लिए देखने लगा। लेकिन वहां सन्नाटे के सिवाय कुछ नहीं था। किसी दूसरे वाहन से लिफ्ट मिलना तो असंभव था क्योंकि उस रास्ते पर किसी वाहन के आने की उम्मीद ही नहीं थी। 
सुरेश इधर उधर देख ही रह था कि तभी उसे 25-30 कदम की दूरी पर झाड़ियों के पीछे एक खंडहरनुमा हवेली सी दिखाई दी। पेड़ों के झुरमुठ से ढंकी हवेली काफी पुरानी थी  सुरेश एकदम उछल पड़ा। उसने कमल से कहा - " अरे! वहां देखो, वह हवेली, वहां चलते हैं। शायद कुछ मदद मिल जाये। कम से कम रात बिताने की जगह तो मिल जाएगी।"
"नहीं! मैं तो कार में ही रात गुजार लूंगा और तुम भी कार में बैठ जाओ। सुबह कुछ इन्तेज़ाम कर लेंगे।" कमल बोला।
"यार तुमसे बड़ा डरपोक आदमी मैंने कहीं नहीं देखा। मैं तो इस कार में रात भर नहीं घुट सकता। तुझे चलना है तो चल वरना मैं तो चला।" कहते हुए सुरेश रवाना हो गया।
"अबे मैं अकेला यहां कैसे रहूंगा, सुरेश रुक जा।" कमल चिल्लाया।
मगर सुरेश न रुका और हवेली की तरफ चला गया। अब कमल की हालत बुरी थी। रह रह कर भगवान को याद कर रहा था। कार पूरी तरह से पैक कर दी थी उसने। उस वीराने में अब वो नितांत अकेला कार में बंद था। एक एक पल काटना भारी पड़ रहा था उसे। कभी कभी मन कर रहा था कि वो भी कार छोड़कर सुरेश के पास भाग जाए। लेकिन हिम्मत नहीं हो रही थी। नींद उसकी आँखों से कोसो दूर थी। कार में घुटन होने लगी। उसने एक खिड़की का शीशा थोड़ा सा नीचे सरका दिया। उल्लुओं की आवाजें उसे बुरी तरह डरा रही थीं। चांदनी रात में लंबे पेड़ और हवा से हिलती झाड़ियां उसे पिशाच नज़र आ रहे थे। जैसे तैसे एक घंटा बीता।
अचानक उस खामोशी में कमल ने कुछ आवाज सुनी।
उसे लगा जैस कोई चल रहा है।  सूखे पत्तों का खड़कना। ज़मीन पे पड़ी सुखी टूटी हुई टहनियों पर चलने की पदचाप   खड़ sss....चड़ sss.... !
उसे लगा जैसे कोई धीमी चाल से कार की तरफ बढ़ रहा हो। वह  रोमांचित हो उठा। छुप कर कार के शीशे के पार झांकने लगा। हवेली की तरफ से किसी के आने का आभास हो रहा था।उस तरफ की झाड़ियां हिली और अचानक जो सामने आया उसे देखकर कमल सिहर उठा। एक घुटी हुई चीख निकल गयी उसके मुंह से।
सामने आने वाला सुरेश ही था... शत प्रतिशत सुरेश।
लेकिन वह वैसी हालत में नहीं था जैसी हालत में गया था। वह कार की तरफ बढ़ रहा था.. अपना कटा हुआ सिर अपने ही हाथों में लेकर।  

कमल बुरी तरह घबरा रहा था।उसकी रूह फना हो रही थी ये दृश्य देख कर। उसने फुर्ती से कार स्टार्ट करने की कोशिश की। लेकिन कार स्टार्ट नहीं हो रही थी। 
खर्रर sss.... खर्रर्र sss... खट्र्रर्रर.... !!!!!
खर्रर्रssss.. खरर्रर ssss...... खट्र्रर्रर sss!!!
सुरेश बढ़ता आ रहा था। कमल डर  के मारे चिल्लाए जा रहा था। 
खर्रर्र sss... खर्रर्र ssss  वररूऊम्म्म्म sssss ...
तीसरी कोशिश सफल रही। कार स्टार्ट हो चुकी थी। सुरेश केवल पांच कदम दूर था। कमल ने अप्रत्याशित गति से कार दौड़ा दी और पीछे मुड़कर भी नहीं देखा। वह बेतहाशा कार दौड़ा रहा था।
पीछे सुरेश का सिर चिल्ला रहा था -" रुक जा कमल, रुक जा। मुझे छोड़ के मत जा कमल, रुक जा।"
कमल जैसे तैसे शहर पहुंचा, लेकिन अपना दिमागी संतुलन खो बैठा।

आज भी ये रहस्य ही है कि आखिर सुरेश को हुआ क्या था???


आगे किसी कहानी में इस रहस्य से पर्दा जरूर उठेगा।
तब तक के लिए विदा।

2 comments:

  1. डरावना।इसलियें भूत पिशाच से बचो।बहुत अच्छा लेखन

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